Photo: बुलंदशहर बलात्कार कांड को यह ‘मौन समर्थन’ क्यों!
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वरिष्ठ पत्रकार विकास मिश्रा के फेसबुक पेज से साभार।
डेढ़ दशक पुरानी बात है। अमर उजाला मेरठ में उपसंपादक ने एक खबर संपादित की। हेडिंग लगाई- दलित लड़की से बलात्कार। संपादक जी ने पूछा-इस हेडिंग का क्या मतलब है। उपसंपादक ने कहा-सर, इसमें गलत क्या है। संपादक बोले-क्या बलात्कार की वजह लड़की का दलित होना है। उपसंपादक बोला- जी सर, किस साले में दम है जो ब्राह्मण-ठाकुर की बेटी की तरफ आंख उठाकर भी देखे। संपादक जी मौन हो गए।
ये नजीर मैंने जानबूझकर रखी है। शुरू में ही कहा कि ये घटना डेढ़ दशक से ज्यादा पुरानी है। तबसे बहुत कुछ बदला है देश में। तबसे यूपी में बीजेपी की एक, बीएसपी की एक सरकार चली गई और समाजवादी पार्टी की दूसरी सरकार चल रही है। बहरहाल अभी समाज इस सवाल का जवाब देने में उलझा है कि ‘आतंकवादियों का कोई धर्म नहीं होता’ । तो क्या बलात्कारियों की कोई जाति होती है, कोई धर्म होता है..? मेरी राय में तो बलात्कारियों की कोई जाति नहीं होती, कोई धर्म नहीं होता, लेकिन बलात्कार पर समाज कैसे रिएक्ट करेगा, जब ये देखता हूं तो लगता है कि बलात्कारियों की हो न हो, लेकिन बलात्कार के शिकारों की जाति जरूर होती है।

बुलंदशहर में नेशनल हाइवे 91 पर की 29 जुलाई की रात सामूहिक बलात्कार की वारदात हुई। एक इंसान अपनी दादी की तेरहवीं में शामिल होने परिवार के साथ अपने गांव जा रहा था। रास्ते में दरिंदों ने पूरे परिवार को बांध दिया। जरा सोचिए उस इंसान पर क्या गुजरी होगी। जिस पत्नी की सुरक्षा के सात वचन लेकर उसने सात फेरे लिए थे, उस पत्नी की इज्जत उसकी आंखों के सामने ही तार तार कर दी गई। फूल जैसी 12-13 साल की बच्ची को गिद्धों ने पिता के सामने नोंच डाला, रस्सियों में बंधा बेबस पिता बस देखता रह गया। कहता रह गया-पैसे ले लो, लेकिन मेरी बेटी, मेरी पत्नी की इज्जत बख्श दो। गैंगरेप की शिकार महिला और उस मासूम बच्ची का का क्या हाल होगा, हम-आप तो बस अंदाजा लगा सकते हैं।

बुलंदशहर के हाइवे पर हुई इस हैवानियत पर मैं अखिलेश यादव और उनकी सरकार को नहीं कोसूंगा। इसका ये मतलब भी नहीं कि मैं उनको बख्श रहा हूं। दरअसल चैनलों में तो हम लोग सरकार, पुलिस की दाई-माई कर ही रहे हैं। ये मामला बहुत बीभत्स था, एनसीआर में था, लिहाजा मीडिया अटेंशन हो गया। मीडिया ने इसे उठाया, उठा भी रहा है, लेकिन इस घटना या फिर ऐसी घटनाओं पर समाज में जैसा रिएक्शन हो रहा है, वो मुझे हैरान कर रहा है।

छोटी-छोटी घटना पर छाती कूटने वाले बौद्धिक, वामपंथी, कुछ स्वघोषित और पोषित सेकुलर खामोश हैं। तो क्या उनकी खामोशी की वजह ये मानी जाए कि इस घटना में जो मां-बेटी सामूहिक बलात्कार की शिकार हुईं, वो सवर्ण थीं। साफ-साफ बताता हूं। बलात्कार की शिकार मां-बेटी ब्राह्मण परिवार की हैं। अब फेसबुक पर जरा रिएक्शन देखिए। महिलाओं ने एक सुर से इस घटना की वीभत्सता की चर्चा की है, बहन-बेटियों की सुरक्षा के प्रति चिंता जताई है। कुछ मुस्लिम मित्रों ने भी इस दरिंदगी की घटना को लानत भेजते हुए बलात्कारियों के लिए शरीयत का कानून लागू करने की सलाह दी है। लेकिन इतनी वीभत्स घटना पर उनका तालू नहीं चटक रहा है, जो गुजरात में दलितों के आंदोलन पर अरण्य रोदन कर रहे हैं, जो कश्मीर में जुल्मो-सितम पर छाती कूट रहे हैं।

मैं इनकी खामोशी पर मैं क्या सिर्फ इस नाते सवाल उठा रहा हूं कि बुलंदशहर बलात्कार कांड के पीड़ित ब्राह्मण थे..? वरिष्ठ पत्रकार अजीत अंजुम, पत्रकार साहित्यकार गीताश्री, पद्मश्री से विभूषित लोकगायिका मालिनी अवस्थी, अंजू शर्मा समेत तमाम लोगों ने इस जघन्य कांड पर लिखा है और हां, ये सब सवर्ण परिवार से हैं। और जो लोग खामोश हैं, मैं उनसे पूछना चाहता हूं कि क्या अब बलात्कार के पीड़ितों, बलात्कारियों की जाति और धर्म तय करने जा रहे हैं आप लोग। कहां हैं दिलीप सी मंडल साहब..। कहां हैं अरुंधती राय, कहां हैं शबा नकवी, कहां हैं कविता कृष्णन, बरखा दत्त..? और हां…कहां है वो अवार्ड वापस करने वाला गिरोह..। भाई साहब, बहनजी, देवियों और सज्जनों..! आप लोगों की खामोशी सवर्ण बहन-बेटियों के गैंगरेप को मौन समर्थन दे रही हैं। क्या ब्राह्मणवाद को लेकर आपका विरोध यहां तक पहुंच चुका है.? क्या सवर्णों की बेटियों से बलात्कार की घटनाओं से कुछ लोगों का अहंकार संतुष्ट हो रहा है।

इस घटना पर जिस तरह समाज का एक बड़ा तबका खामोश है, उसकी प्रतिक्रिया भी देख लीजिए। अभी तक पीड़ित परिवार को एक नए पैसे के मुआवजे का ऐलान नहीं हुआ है। कोई संस्था उस परिवार का दर्द बांटने के लिए आगे नहीं आई है। दानवीरों के हाथ पीछे की तरफ बंधे हैं तो बात बात पर ट्वीट करने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक ट्वीट करने का भी मौका नहीं मिल पा
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सुशील वशिष्ठ
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बुलंदशहर बलात्कार कांड को यह ‘मौन समर्थन’ क्यों!
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वरिष्ठ पत्रकार विकास मिश्रा के फेसबुक पेज से साभार।
डेढ़ दशक पुरानी बात है। अमर उजाला मेरठ में उपसंपादक ने एक खबर संपादित की। हेडिंग लगाई- दलित लड़की से बलात्कार। संपादक जी ने पूछा-इस हेडिंग का क्या मतलब है। उपसंपादक ने कहा-सर, इसमें गलत क्या है। संपादक बोले-क्या बलात्कार की वजह लड़की का दलित होना है। उपसंपादक बोला- जी सर, किस साले में दम है जो ब्राह्मण-ठाकुर की बेटी की तरफ आंख उठाकर भी देखे। संपादक जी मौन हो गए।
ये नजीर मैंने जानबूझकर रखी है। शुरू में ही कहा कि ये घटना डेढ़ दशक से ज्यादा पुरानी है। तबसे बहुत कुछ बदला है देश में। तबसे यूपी में बीजेपी की एक, बीएसपी की एक सरकार चली गई और समाजवादी पार्टी की दूसरी सरकार चल रही है। बहरहाल अभी समाज इस सवाल का जवाब देने में उलझा है कि ‘आतंकवादियों का कोई धर्म नहीं होता’ । तो क्या बलात्कारियों की कोई जाति होती है, कोई धर्म होता है..? मेरी राय में तो बलात्कारियों की कोई जाति नहीं होती, कोई धर्म नहीं होता, लेकिन बलात्कार पर समाज कैसे रिएक्ट करेगा, जब ये देखता हूं तो लगता है कि बलात्कारियों की हो न हो, लेकिन बलात्कार के शिकारों की जाति जरूर होती है।

बुलंदशहर में नेशनल हाइवे 91 पर की 29 जुलाई की रात सामूहिक बलात्कार की वारदात हुई। एक इंसान अपनी दादी की तेरहवीं में शामिल होने परिवार के साथ अपने गांव जा रहा था। रास्ते में दरिंदों ने पूरे परिवार को बांध दिया। जरा सोचिए उस इंसान पर क्या गुजरी होगी। जिस पत्नी की सुरक्षा के सात वचन लेकर उसने सात फेरे लिए थे, उस पत्नी की इज्जत उसकी आंखों के सामने ही तार तार कर दी गई। फूल जैसी 12-13 साल की बच्ची को गिद्धों ने पिता के सामने नोंच डाला, रस्सियों में बंधा बेबस पिता बस देखता रह गया। कहता रह गया-पैसे ले लो, लेकिन मेरी बेटी, मेरी पत्नी की इज्जत बख्श दो। गैंगरेप की शिकार महिला और उस मासूम बच्ची का का क्या हाल होगा, हम-आप तो बस अंदाजा लगा सकते हैं।

बुलंदशहर के हाइवे पर हुई इस हैवानियत पर मैं अखिलेश यादव और उनकी सरकार को नहीं कोसूंगा। इसका ये मतलब भी नहीं कि मैं उनको बख्श रहा हूं। दरअसल चैनलों में तो हम लोग सरकार, पुलिस की दाई-माई कर ही रहे हैं। ये मामला बहुत बीभत्स था, एनसीआर में था, लिहाजा मीडिया अटेंशन हो गया। मीडिया ने इसे उठाया, उठा भी रहा है, लेकिन इस घटना या फिर ऐसी घटनाओं पर समाज में जैसा रिएक्शन हो रहा है, वो मुझे हैरान कर रहा है।

छोटी-छोटी घटना पर छाती कूटने वाले बौद्धिक, वामपंथी, कुछ स्वघोषित और पोषित सेकुलर खामोश हैं। तो क्या उनकी खामोशी की वजह ये मानी जाए कि इस घटना में जो मां-बेटी सामूहिक बलात्कार की शिकार हुईं, वो सवर्ण थीं। साफ-साफ बताता हूं। बलात्कार की शिकार मां-बेटी ब्राह्मण परिवार की हैं। अब फेसबुक पर जरा रिएक्शन देखिए। महिलाओं ने एक सुर से इस घटना की वीभत्सता की चर्चा की है, बहन-बेटियों की सुरक्षा के प्रति चिंता जताई है। कुछ मुस्लिम मित्रों ने भी इस दरिंदगी की घटना को लानत भेजते हुए बलात्कारियों के लिए शरीयत का कानून लागू करने की सलाह दी है। लेकिन इतनी वीभत्स घटना पर उनका तालू नहीं चटक रहा है, जो गुजरात में दलितों के आंदोलन पर अरण्य रोदन कर रहे हैं, जो कश्मीर में जुल्मो-सितम पर छाती कूट रहे हैं।

मैं इनकी खामोशी पर मैं क्या सिर्फ इस नाते सवाल उठा रहा हूं कि बुलंदशहर बलात्कार कांड के पीड़ित ब्राह्मण थे..? वरिष्ठ पत्रकार अजीत अंजुम, पत्रकार साहित्यकार गीताश्री, पद्मश्री से विभूषित लोकगायिका मालिनी अवस्थी, अंजू शर्मा समेत तमाम लोगों ने इस जघन्य कांड पर लिखा है और हां, ये सब सवर्ण परिवार से हैं। और जो लोग खामोश हैं, मैं उनसे पूछना चाहता हूं कि क्या अब बलात्कार के पीड़ितों, बलात्कारियों की जाति और धर्म तय करने जा रहे हैं आप लोग। कहां हैं दिलीप सी मंडल साहब..। कहां हैं अरुंधती राय, कहां हैं शबा नकवी, कहां हैं कविता कृष्णन, बरखा दत्त..? और हां…कहां है वो अवार्ड वापस करने वाला गिरोह..। भाई साहब, बहनजी, देवियों और सज्जनों..! आप लोगों की खामोशी सवर्ण बहन-बेटियों के गैंगरेप को मौन समर्थन दे रही हैं। क्या ब्राह्मणवाद को लेकर आपका विरोध यहां तक पहुंच चुका है.? क्या सवर्णों की बेटियों से बलात्कार की घटनाओं से कुछ लोगों का अहंकार संतुष्ट हो रहा है।

इस घटना पर जिस तरह समाज का एक बड़ा तबका खामोश है, उसकी प्रतिक्रिया भी देख लीजिए। अभी तक पीड़ित परिवार को एक नए पैसे के मुआवजे का ऐलान नहीं हुआ है। कोई संस्था उस परिवार का दर्द बांटने के लिए आगे नहीं आई है। दानवीरों के हाथ पीछे की तरफ बंधे हैं तो बात बात पर ट्वीट करने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक ट्वीट करने का भी मौका नहीं मिल पा

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