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मित्रों..... सर्वोच्च न्यायालय का आदेश सर्वमान्य है, सूखाग्रस्त राज्यों में मिड डे मील मिलना चाहिए, सही बात है। परंतु अधिकांश जनपदों में भुखमरी की स्थिति नही है। गाँव का व्यक्ति चैन से खाने के साथ पी भी रहा है। अप्रैल और मई माह में विद्यालय में औसतन ही बच्चे रहे है। केवल सूखा की फिकर मात्र और मात्र शिक्षक के ऊपर थोपकर अपना पल्ला झाड़ लिया। कँहा गए जनप्रतिनिधि, ग्राम प्रधान, पंचायत सेक्रेटरी, कोटेदार, तहसीलदार, जिला पंचायत, सांसद, विधायक व अन्य लम्बी लिस्ट है, उनके दायित्व क्या है। क्या उनकी जिम्मेदारी नही है कि इसको देखें और जिम्मेदारी ले। केवल बच्चे एक टाइम खाना खाकर भूख की पूर्ति पूर्ण करेंगे। दोपहर और रात्रि की जिम्मेदारी ऊपर वाले की है, धन्य हो सभी का। इतना ही चिंता ही तो सरकार को भोजन के बदले पूरे 1 माह 10 दिन का अनाज, चावल, दाल कोटेदारों के माध्यम से घरों को उपलब्ध करा दे, शायद कुछ उत्तम रहेगा। अनाज वितरण मा0जनप्रतिनिधियो के एक मंच के तहत गाँव गाँव में कार्यक्रम करे और सरकार अपना प्रचार भी कर ले। मनरेगा और अन्य योजनाओ का भी लाभ सीधे गरीब को दिया जा सकता है। केवल सूखा की जिम्मेदारी शिक्षक ही उठाएगा, शेष लोंगो का काम तो ऊँगली उठाना ही रहेगा।

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Milan
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