Jai shri mataji

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Jai shri mataji 😊

योगीः श्रीमाताजी, हम पूरे दिन भर गहन ध्यान की अवस्था किस प्रकार से प्राप्त कर सकते हैं? 
श्री माताजी - देखिये आप एक प्रकार से ध्यान में ही हैं। आप आधा ध्यान में हैं और आधा नहीं हैं। अब यदि आप साक्षी अवस्था विकसित करने का प्रयास करें तो भी आप ध्यानावस्था में हैं, केवल साक्षी अवस्था। जो कुछ भी आप देखते हैं … बस इसे देखते जाइये …. देखते जाना ही सबसे अच्छा तरीका है। तब आपको आश्चर्य होगा कि आप एक नये ही विश्व में हैं और ये लोग एक दूसरे ही विश्व में हैं। आप उन्हें किसी और ही विश्व से देख रहे हैं। तब आपको उनके लिये करूणा उपजेगी … दया उपजेगी … आप उन्हें पसंद भी नहीं कर सकते हैं। आपके अंदर ये सभी भावनायें आ जायेंगी लेकिन आप फिर भी उन लोगों से स्वयं को अलग कर पायेंगे। योगीः कई बार आपको लगता है कि आपके चक्र बिल्कुल ठीक हैं परंतु आप किन्ही ऐसी परिस्थितियों में पड़ जाते हैं जिससे आपके अंदर असंतुलन आ जाता है। श्री माताजी - ये सविकल्प अवस्था है। इसका अर्थ है कि आप निर्विचार अवस्था में हैं, फिर भी आप सविकल्प में चले जाते हैं जहां आपको फिर से विकल्प मिल जाता है। लेकिन आखिरकार आप एक साक्षात्कारी व्यक्ति हैं। इसके लिये तीन स्पष्ट चीजें बनाई गई हैं – कि आप सविकल्प समाधि में जा सकते हैं …. आप निर्विचार समाधि में जा सकते हैं और आप निर्विकल्प समाधि में जा सकते हैं। लेकिन यहां से भी आप सविकल्प समाधि में जा सकते हैं और इसी को आपने छोड़ना है। जैसे ही आप ऐसी स्थिति में आंयें जहां आप लिप्त हो रहे हैं … आप कह सकते हैं नेति…नेति अर्थात ये नहीं …ये नहीं और इससे बाहर आ जायें। ये अभ्यास करने से हो सकता है ….. थोड़े से अभ्यास से हो सकता है। जिस प्रकार से आप थोड़े से अभ्यास के बाद ड्राइविंग में निपुण हो जाते हैं, उसी प्रकार से इसमें भी आप निपुण हो जाते हैं। जब मुझे मालूम होता है कि कुछ गड़बड़ है या मुझे लगता है कि वे गड़बड़ कर रहे हैं तो मैं एकदम चुप हो जाती हूं और उन्हें पता चल जाता है कि कहीं कुछ गलत है । लोगों को बताने की अपेक्षा उन्हें उनकी गलतियों से सीखने का अवसर देना चाहिये। किसी को भी अच्छा नहीं लगता यदि उसे बताया जाता है कि उसे क्या करना चाहिये। वे अपने आप अपनी गलतियों से सीखते हैं कि हां मैंने ये गलती की है …. वो गलती की है। मैंने अपना जीवन बरबाद कर दिया है। लेकिन यदि आप उन्हें बतायेंगे तो उन्हें बुरा लगेगा और वे आपसे बदला भी ले सकते हैं   और वे स्वयं को बदलने के इच्छुक भी नहीं रहेंगे।

 प. पु. श्री माताजी 
 हर श्वास में सहजयोग प्रस्थापित करना पड़ेगा २५ जनवरी १९७५ - मुंबई 
माँ जब चली जाती है तो घर संभालना बच्चोका काम हो जाता है ,आने पर दिखाना चाहिए सहजयोग बढाकर रखा है मेरे बच्चो ने , और नहीं तो आने पर दिखा आठ , दस वहा उन के आज्ञा चक्र पकड़ा है , किसके नाभि चक्र , किसका विशुद्ध चक्र पकड़ा है ,कोई उनके पास चले गए कोई, इसके पास चले गए ,कोई बीमार पड गए किसी के बीवी अस्पताल में , कोई पागल खाने में , अरे भाई ये क्या हो गया ? और ये नहीं सोचना तुम छोटे आदमी हो , अरे तुम लोग बहोत बड़े आदमी हो , ये बड़े किसी काम के नहीं ये कभी पार नहीं होते , अपना बड़प्पन जान कर बात करो अपने को खोलकर के बात करो , एक अक्षर सहजयोग में जो बोलता है सरस्वती साक्षात वहा आकर बैठ जायेगी ,मैं आप को बताती हु , आप बोलो आपको अनुभव आयेंगे , आप बोलना शुरु करो सरस्वती आप के वाणी में आएगी , लिखना शुरू करो आप के लेखनी में आ  जायेगी, किसी कार्य को लो साक्षात हनुमान खड़े हाथ जोड़कर कहेंगे माँ किसके साथ खडा हो जावू में ? हनुमान जी सारा काम कर रहे है आप का ,कोई भी काम लो माँ का नाम लेकर के , सहजयोग के लिए तो साक्षात पांचो चिरंजीव खड़े हुए है आप के लिए , सब लोग अपनी शक्तिया तुम्हारे ऊपर लगा के पीछे बैक ग्रावुंड में खड़े है आप के लिए खड़े है और देखा नट जी जो आये है उनकी हालत खराब वो इधर उधर देख रहे है , नाटक कैसे रचेगा , आधा अधुरा पण नहीं चाहिए . 
जय श्री माताजी 
 सहजयोग मे आत्म साक्षात्कार को प्राप्त करने के पश्चात साधक को मिलने वाले लाभ ".
..................सहजयोग से ही मनुष्य का आत्मिक परिवर्तन हो सकता है । जब आप सहजयोग में आत्मसाक्षात्कार को प्राप्त करते है तो आपमें आत्मिक परिवर्तन होने लगता है । सहजयोग से ही मनुष्य का आध्यात्मिक उत्थान हो सकता है । सहजयोग से आप शुद्ध होते जाते है । आपके अंदर की सारे दोष,बुरे विचार,बुरी संगत सब अपने आप दूर हो जाते है । आपका व्यवहार पूरी तरह बदल जाता है । आप के अंदर आत्मिक प्रेम जागृत हो जाता है । आप एक पावन व्यक्ति बन जाते है । आपके कुविचार दूर हो जाते है आप निर्विचार और साक्षी हो कर परमात्मा के आत्मिक प्रेम को उठाने लगते है । आप के अंदर मिठास आ जाती है । आप परमात्मा को जानने लगते है । आप को लगता है की आप को जो प्रेम प्राप्त हुवा वही प्रेम किस प्रकार हम सबको दे सकते है । आप का हृदय विशाल हो जाता है। आप माँ से सम्पूर्ण विश्व के हित के लिए प्रार्थना करने लगते है । आप विश्व के हित के बारे में सोचने लगते है । ....................आप का चित्त आत्मा के प्रेम से प्रकाशित हो जाता है । आप पावन चित्त का आनंद लेने लगते है । आप जान जाते है की परमात्मा आपकी देखभाल कर रहे है । आपसे बहु प्रेम करते है । आप परमात्मा के अच्छे माध्यम बन जाते है । आप सबके हित के बारे में सोचकर अपने आपको आनंद में महसूस करने लगते है । आप एक शुद्ध आत्मा बन जाते है । आप विनम्र हो जाते है ।"
 ---- H.H.SHRI MATAJI - 
श्री गणेश तत्व को पाने के लिए क्या आवश्यक है? सहजी:- 
1)चित्त की शुध्दता;-आपका चित्त पावन,निर्मल होना चाहिए।आप को देखना होगा चित्त कहा जा रहा है।उसे पावनता में और अबोधिता में रखे। व्यर्थ की बातचीत,व्यर्थ की चीजों में चित्त नही जाना चाहिए। चित्त को साक्षी और निरपेक्ष,निर्विचार रखे। 
2)क्रोध ना करे-जो व्यक्ति पावन है वो किसीसे क्रोध करके अपनी पावनता को नष्ट नही करता।क्रोध से समस्या बढ़ती है। सामजस्य,विवेक,और क्षमाशीलता होनी ही चाहिए। 
3)भयभीत होने की जरुरत नही आदिशक्ति माँ याने आपकी पावनता की शक्ति आपके साथ है-अगर आप पावन आत्मा है तो आप अत्यंत सुरक्षित है।आप के हृदय में साक्षात जगदम्बा निवास करती है।आप का चित्त की पावनता याने श्री गणेश आप के हर भय का विनाश करते है।आपके एक प्रार्थना से ही हर समस्या का समाधान हो जायेगा। 
4)आनंदमय रहना चाहिए- आप को दुःखी नही होना है।पावन आत्मा हमेशा आनंदमय होती है। अगर कोई आपको थोडासा भी परेशान कर रहा है।आपको उसपर क्रोध नही करना है।आप की माँ से प्रार्थना करे।अपने आनंदमय में रहे।वो व्यक्ति नर्क में जा रहा है आप नही जा रहा है तो उस अज्ञानी व्यक्ति को क्षमा करे। 
5)वाणी में माधुर्य होना चाहिए:-भले ही दूसरा व्यक्ति आपको बुरा बोले।आप की वाणी में दूसरों के लिए क्षमाशीलता की शक्ति और प्रेम होना चाहिए। 
6)आपका आचरण अत्यंत शुद्ध निर्मल,प्रेममय होना चाहिए।आप के पास पावनता है तो सबकुछ है।आप अपने आनंद में रहिये।माँ के ध्यान का आनंद उठाये।काम,क्रोध,मोह,माया,मत्सर से ऊपर आप चले गये।आप का चित्त पावन हो गया है।आप समाधान के उच्च श्रेणी में पहुच गये है। 
7)खुद को दोष ना दे:-अपने दोष दूर करना है और वो गलती दुबारा नही करना है।किसीको भी दोष नही देना है। 8)मर्यादा में रहना चाहिए,संतुलन में रहना चाहिए:-किसी भी चीज के अति में नही जाना चाहिए।इससे चित्त में राक्षसी विकृत्ति आ सकती है।कार्तिकेय का नाम रोज ले।चित्त को माँ के आग्या और प्रोटोकॉल में रखे। हमे सहजयोग में खुद का महत्व स्थापित नही करना चाहिए।हम सिर्फ माँ के instrument है।हम में से ना कोई ऊँचा है ना कोई नीचा।हम सब एक है।और एक ही माँ के बालक है। 
जय श्री माताजी। from my iris 

 महालक्ष्मी तत्व से मनुष्य समाधानी हो जाता है 
"...................महालक्ष्मी तत्व से तो मनुष्य समाधानी हो जाता है , इस तत्व से > वह शक्ति को ढूंढता है और ढूंढते हुए असत्य को छोड़ता है । सांसारिक एव भौतिक चीजों से जब > हमारे अंदर समाधान आ जाता है तभी महालक्ष्मी तत्व हमारे अंदर जागृत हो जाता है । यह > महा लक्ष्मी तत्व ही आपको सत्य साधना की ओर ले जाता है,तब आप विशेष श्रेणी के लोग बन > जाते है । महा लक्ष्मी तत्व जब जागृत होता है तब मनुष्य के अंदर नवधा नौ शक्ति की > अभिव्यक्ति होती है । > .....................महालक्ष्मी ऐसी देवी है जो कुछ आपके पास उपलब्ध है उसी से पूर्ण > संतोष प्रदान करती है । महालक्ष्मी तत्व जब जागृत होता है तो आपको और अधिक प्राप्त > करने की इच्छा नही रहती,आप औरों को देना चाहते है । ये बात समझनी आवश्यक है महाकाली > और महालक्ष्मी दोनों एकसाथ चलती है । महाकाली आपको देती है और आपके साथ रहती है और > महालक्ष्मी आगे आती है निच्छित रूप से आत्मसाक्षात्कार प्रात करने और आपकी समस्याओंको हल > करने आपकी सहायत्ता करती है आर्थिक समस्योंको साथ वे आपकी अन्य समस्याओं का समाधान > करती है ।" > > ---- H.H.SHRI MATAJI ---- > कोल्हापुर 1.1.1983  

।।जय श्रीमाताजी।।
री गणेश कुण्डलिनी की रक्षा करते है 1"गौरी श्री गणेश की मॉ है और अपनी पावनता की रक्षा के लिए उन्होंने श्री गणेश का सृजन किया ! इस प्रकार कुण्डलिनी ही गौरी हैऔर शरीर तन्ञ में श्री गणेश मूलाधार चक्र पर विराजित है1 मूलाधार,गौरी (कुण्डलिनी ) का निवास हैऔर श्री गणेश उसकी रक्षा करते हैं 1 वे हमारी अबोधिता के देवता हैं1 केवल श्री गणेश ही इस स्थिति में हो सकते हैं क्योंकि श्रे!णीय चक्र ( Pelvic Plexus ) ही मल - मूञ त्याग की सभी गतिविधियों का संचालन करता है और वातावरण से दूषित हुए बगैर केवल श्री गणेश ही वहाँ पर रह सकते हैं1 वे इतने पावन एवं अबोध हैं1 कुण्डलिनी श्री गणेश की कुंवारी मॉ ( Virgin mother ) है1......जागृतीके समय श्री गणेश कुण्डलिनी को पूर्ण आश्रय प्रदान करते हैं और उसकी देखभाल करते हैं1कुण्डलिनी निष्कलंक शक्ती हैं1--- 
( परम पूज्य श्रीमाताजी, आँकलैण्ड,न्यूजीलैण्ड.8 / 4 /19 91.)
"ध्यान में आने वाली आम कठिनाइयां"

"ध्यान के दौरान भूतकाल की घटनायें, इच्छायें और समस्यायें अक्सर रीप्ले (Replay) होने लगती हैं क्योंकि साधक या तो भूतकाल या भविष्य के बारे में सोचता रहता है और उसकी कुंडलिनी उठ नहीं पाती है। यदि साधक का चित्त बांई ओर गतिमान रहता है तो वह व्यक्ति कलेक्टिव सबकांशस में चला जाता है और उसे पूर्व की घटनाओं की झलकियाँ मिलती रहती हैं। ध्यान करते करते यह काफी कम हो जाता है। उदाहरण के लिये यदि किसी व्यक्ति के साथ कोई दुर्घटना घटती है तो उस व्यक्ति के मस्तिष्क पर इस दुर्घटना के स्पष्ट चिन्ह अंकित होते हैं और वह अक्सर इस विषय पर सोचता रहता है। जितना अधिक वह इस विषय पर सोचता रहता है..... उतनी ही वह दुर्घटना उसके मस्तिष्क में ताजा रहती है। इससे वह व्यक्ति दुखी रहने लगता है और धीरे-धीरे यह उसकी प्रवृत्ति ही बन जाती है।
जब भी कोई बचपन के दुखों दमित इच्छाओं व क्रोध को दबाता है तब इनका दर्द सतह पर आकर इनके कर्मों व कार्यों पर दिखाई पड़ने लगता है। इन परेशानियों को प्रश्रय देने का अर्थ है बांई नाड़ी प्रधान व्यक्ति बन जाना जो अत्यंत खतरनाक है। ऐसा देखा गया है कि ऐसे लोग मानसिक परेशानी, माइग्रेन, मिरगी और कैंसर जैसे रोगों के शिकार हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में यह आवश्यक हो जाता है कि वह व्यक्ति पहले अपनी बांई नाड़ी को ठीक करके ध्यान करे। धीरे-धीरे ध्यान के माध्यम से उसकी बांई नाड़ी ठीक हो जाती है। इसी प्रकार व्यक्ति यदि अति महत्वाकांक्षी है और योजनायें बनाता है तथा भविष्य के विषय में सोचता रहता है तो वह दांई नाड़ी प्रधान व्यक्ति बन जाता है। अर्थात वह क्रूर, दबंग, उग्र, स्वार्थी, नीच, अति महत्वाकांक्षी और अहंवादी व्यक्ति का स्वामी बन जाता है। ऐसे लोगों को साधारणतया डाइबिटीज़ उच्च रक्तचाप, पक्षाघात व कडनी के रोग हो जाते हैं। इन लोगों को पहले अपनी दांई नाड़ी को साफ करके तब ध्यान प्रारंभ करना चाहिये। धीरे-धीरे व्यक्ति संतुलन में आने लगता है। उसका ध्यान गहरा होने लगता है और उसे विचार आने बंद होने लगते हैं। वह व्यक्ति वर्तमान में रहने लगता है और विचारों के झंझावात में नहीं फंसता। यही कारण है कि सहज ध्यान विधि में आपको कहा जाता है कि विचारों को आने-जाने दें और उनसे उलझें नहीं। दो विचारों के मध्य में एक अंतराल होता है और निर्विचारिता के इसी अंतराल में कुंडलिनी उठती है तथा व्यक्ति को प्रकाशवान बनाती है और उसे चैतन्य लहरियां प्राप्त होती है। ....चैतन्यित चेतना एंटीना की भांति कार्य करती है। जब भी कोई बाह्य कारक आपके वाइब्रेशन्स को प्रभावित करता है, आपकी उंगलियों के पोरों पर आपको गर्मी या झनझनाहट का अनुभव होता है ताकि आप सहजयोग में बताये गये तरीकों से उस कारक की सफाई कर सकें। इन प्रभावित चक्रों पर कैंडलिंग या बंधन देने से उनका अवरोध समाप्त हो जाता है और साधक को दुबारा से वाइब्रेशन्स का अनुभव होने लगता है।
......अतः सहजयोग को उचित ढंग से सीखना अत्यंत महत्वपूर्ण है ताकि आपको चैतन्य का अनुभव हो...आप चैतन्य को ग्रहण करने की संवेदनशीलता को विकसित कर सकें व उन्हें समझना भी सीख सकें। निरंतर अभ्यास से एक स्थिति ऐसी भी आती है जब आपको सतत चैतन्य का अनुभव होने लगता है। ध्यान में गहरे उतरने के लिये संतुलित जीवन आवश्यक है।
कुंडलिनी जागरण के बाद आप जान जाते हैं कि ध्यान एक अवस्था (State of Being) है। यह स्वतः एवं प्रयासविहीन होना चाहिये। यह मानसिक अभ्यास भी नहीं है। व्यक्ति अन्य कार्यों को करते हुये भी एक साक्षी के रूप में ध्यान में रह सकता है। सहजयोग में सामूहिक ध्यान अति आवश्यक है क्योंकि समूह में चैतन्य की मात्रा अत्यधिक होती है ... आपके चक्र शीघ्रता से ठीक होते हैं। अतः सप्ताह में एक बार अवश्य सामूहिक ध्यान केंद्र पर जाकर ध्यान करना चाहिये।
(मेडिकल साइंस एनलाइटेंड से साभार, लेखक श्री यू.सी.राय)
।।जय श्रीमाताजी।।

सहजयोगी क्‍या करते है, क्‍या नही करते है ?
‘‘सब अवतरणो का मान करना, जितने भी आज तक बडे बडे संत, साधू, दृष्टा हो गये, सबका मान करना विश्व निर्मल धर्म सिखाता है। ये सिर्फ कहने से नही होता, समझाने से नही हो सकता। ये आत्मा के प्रकाश में अपने आप अन्दर बेठ जाता है, उसको फिर कहनें की जरूरत नहीं होती । तब आप सोचिए कि आप सहजयोगी हो गये। सहजयोगी हो गये, माने आप बढिया लोग हो गये । देखिये आप किसी का कत्ल नहीं कर सकते। आप किसी की कोर्इ चीज छीन नहीं सकते, आप चोरी चकारी कुछ नही कर सकते। आप किसी की बुरार्इ नहीं करते, आप किसी को भी नीचे खींचने का प्रयत्न नहीं करते या आप किसी भी प्रतिस्पर्धा में नहीं पडते । आपको ये नहीं लगता कि, मैं इसकी खोपडी में जाकर बैठ जाउं, इसकी गर्दन काट लूं। जहां है वहाँ समाधान में आप बैठे है और अपने ही आप उन्नत हो रहे है। आप किसी के साथ दुष्टता नहीं करते। देखिये, सास होती है बहू होती है, कभी बहू सास को सताती है, कभी सास बहू को सताती है पर सहजयोग में ऐसा बहुत कम है । दिखार्इ नहीं देता। ऐसे ही आपकी गृहस्थी मे आदमियों की और औरतों की जो स्थिति है वह विशेष है। पति पत्नि में आपस में पूरी तरह से ऐसी एक तारता (समन्वय) है कि पत्नि किसी ओर पुरूष की ओर देखती नहीं। इतनी शुद्धता है। बाह्य का आकर्षण जो लोगों को होता है वो आप नही रहे। क्योंकि आप स्वाभिमान में है। आपको अपने स्व का अभिमान है। आपकी आंख ठहर गर्इ, अब चंचल नहीं रहीं।  इधर-उधर नही घूमती। अब तो आपके बच्चे, आपके मां-बाप आपको देखते है तो वह भी आश्चर्यचकित हो जाते है, अभिभूत हो जाते है कि देखो कैसे हो गये ये लोग। ये चोरी नहीं करते, झूठ नहीं बोलते, मारते नहीं, पीटते नहीं, कोर्इ दंगा नहीं, फसाद नहीं, कुछ नहीं, इतने शांतिमय, इतने आनन्दमय आप सब लोग हो गये। लोग मुझसे कहते है कि आप इतनी बीमारी ठीक करते हैे, इतना कुछ करते है आप पैसा नहीं लेते। और आप लोग कहां लेते है ? आप लोग भी तो सहज का काम मुफ्त में ही कर रहे है। मैने तो किसी को नहीं देंखा कि सहज के नाम के लिए आप लोग पैसा मांगते है या कुछ करते है, ऐसी कविताएं आप लिखते है, एक से एक गाने आप गाते है। कोर्इ भी मैने देखा नही जो कहता हो कि, नही इस काम में मुझे पैसा चाहिये। कितनो को आपने जागृति दी ? कितनों को आपने पार कराया है ? कितने ही सेंटर्स आपने चलाये है ? लेकिन मैने कही नहीं सुना कि इसके लिये मां तुमने इतनो को जागृति दी तो आप हमें उसका पैसा दीजिए या उसके लिये कोर्इ आप हमें खिताब (सम्मान) दीजिए कि इतने 108 जागृति वाले या 1008 जागृति वाले। ऐसा कुछ नही। इस पर आपको हंसी भी आती है कि ये सब क्या है ? इन सब बाह्य चीजो से आप लोग अपने आप ही उठ गये और आप अपने बारे में कुछ जानते ही नहीं।‘‘
-----परमपूज्य श्रीमाताजी निर्मलादेवी, जन्मदिवस पूजा, 21 मार्च 1992

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By the Grace of H.H.Shri Mataji invitation for Meditation Program in Chhattisgarh, Durg on 3, 4 May and Sahastrar Puja on 5th May.All are cordially invited by the Chhatisgarh, India collectivity.
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