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Good evening
Good thoughts Freind welcome yours faithfully

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Good afternoon welcome yours faithfully Aakanchha Yadavji
Good luck you Freind thanks all the best of future

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Happy birthday you Freind congratulations
Who is this in figer?..
🎉🎉🎉🎉🎉🎉🎉🎉🎉🎉🎉🎉🎉🎉🎉🎉
#Happy-Birthday

The #Beautiful #gorgeous #Actress of #Bollywood and #Hollywood fame #PriyankaChopra celebrates her 35th #Birthday today.
Wishing you happiness dear #PeeCee
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Good night with love you Freind thanks you
Hi guys,... Wishing you sweet dreams and a restful night 💟❤💟🌙🙏🌃💦❤💟❤
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Good morning
Best yours life...
What is your newes family members with you ?

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Very good thoughts Freind welcome

जलधारा का उद्गम नित्य है , जलधारा का जो जल आगे बह जाता है वह लौटकर नहीँ आता , पर धारा समाप्त नही होती । तत्काल जाने वाले जल का स्थान आने वाला जल ले लेता है । उद्गम स्थान पर नया नया जल प्रतिक्षण उत्पन्न होकर बहता रहता है । संसार मेँ जीवन का प्रवाह भी इसी प्रकार का है । निरन्तर सृष्टिक्रम चल रहा है जो जाते है उनका स्थान दूसरे ले लेते है , प्रवाह निरन्तर चलता है , समाज की गति रुकती नहीँ ।।

मनुष्य कर्म करता है कुछ चाहकर , फल की आशा रखकर और चिरकाल तक तरह तरह की इच्छाओँ से प्रेरित होकर कर्म करता रहता है । कभी कभी जब इच्छाएँ पूरी होने मेँ बाधा पड़ने से और संघर्ष की विकट दशाएँ आ जाने से अथवा मन के अनुकूल फल न मिल पाने पर वह ऊबता है तो कर्म से बिमुख होकर सन्यास ले लेता है या ले लेना चाहता है ।
जब कभी तो वह कर्म करना चाहता है और कभी कर्म से हार मान लेता है । यह है द्वन्द्व जो मनुष्य को थका मारने और पीड़ित करने का कारण । इस दशा मेँ उसके लिए हितकारी होगा कि वह सामने उपस्थित परिस्थितियाँ तथा कर्त्तव्य कर्मो को स्वीकार कर क्रियाशील बना रहे ।।

कामान् दुग्धे विप्रकर्षत्यलक्ष्मी ;कीर्तिं सूते दुष्कृतं या हिनस्ति ।
शुद्धां शान्तां मातरं मङ्गलानां धेनुं धीरा: सूनृतां वाचमाहु: ।।

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धैर्यवानों (ज्ञानियों) ने सत्य एवं प्रिय (सुभाषित) वाणी को शुद्ध ,शान्त एवं मंङ्गलों की माता रूपी गाय की संज्ञा दी है , जो इच्छाओं को दुहती अर्थात् पूर्ण करती है , दरिद्रता को हरती है ,कीर्ति (यश) को जन्म देती है एवं पाप का नाश करती है । इस प्रकार यहाँ सत्य और प्रिय वाणी को मानव की सिद्धियों को पूर्ण करने वाली बताया गया है !!

>>> भावना <<<
महत्त्व वस्तु का नही ,
भावना का है ।
सद्भावपूर्वक सेवा करने से
ही सेवा सफल होगी ।
सेवा करते समय रोंगटे खड़े
हो जायँ आँखो से
अश्रुधारा बहने लगे ,
तो उसी को सच्ची सेवा समझना चाहिए।
सेवा मात्र क्रियात्मक
ही नहीँ , भावात्मक
भी होनी चाहिए ।
सेवा करते हुए आनन्द मिले,
वही सेवा है । जो भी करेँ ,
प्रेम से करेँ । भगवान के
लिए भोजन
बनाना चाहिए । भगवान
को अर्पित करने के बाद
ही भोजन करना चाहिए।
साथ मे
प्रार्थना करना चाहिए
कि हे नाथ ! आप
तो विश्वंभर हैँ ,सब के
स्वामी हैँ ।आपको कौन
खिला सकता है?
तो भी यह पदार्थ मै
आपको मन से अर्पण
करता हूँ ।
जो ईश्वर का है वही उन्हेँ
समर्पित करना है
" तेरा तुझको अर्पण
क्या लागे मेरा "
यह जीव दूसरा कुछ कहाँ से
लायेगा ? केवल
भावना का मूल्य ।
परमात्मा तो परिपूर्ण
हैँ ,उन्हेँ कोई
अपेक्षा नहीँ है । उन्हे
किसी भी वस्तु
की क्षुधा नहीँ है ।वे
तो मात्र भाव के भूखे हैँ ।
उन्हे जो भाव से अर्पित
किया जायेगा ,वे
उसका कई गुना अधिक
बनाकर ही वापस करेँगे ।
भक्तिमार्ग मेँ भाव के
बिना सिद्धि प्राप्त
नहीँ होगी ।ज्ञान मार्ग
मेँ त्याग और वैराग्य
आवश्यक है ।
सेवा करने से सेवक को सुख
होता है । भगवान
को तो क्या सुख मिलेगा ?
वे तो परमानन्द स्वरुप हैँ
। जीव को देने
वाला तो ईश्वर ही है ,
किन्तु मनुष्य के निवेदन से
वे प्रसन्न होते हैँ ।
"सेवा और पूजा मेँ भेद -
जहाँ प्रेम का प्राधान्य
है , वह सेवा है और
जहाँ वेदमन्त्र
की प्रधानता है वह
पूजा है ।"
पूजा तो प्रेम से
करनी चाहिए ,
अन्यथा स्नेहादि का समर्पण
व्यर्थ ही रहेगा ।
कहीँ हमारे वस्त्र न गंदे
हो जायँ इस डर से हम
मन्दिर मे साष्टांग दंडवत्
प्रणाम भी नही करते ->
"नर कपड़न को डरत हैँ ,
नरक पड़न को नाहि !!!
!! जय श्रीमन्नारायण !!
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