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It has been good to be here. But I have a problem with language here. I do not understand the characters of the language commonly used for writing here. Thus, any moment, I am pulling way from the group. Thank you all for wonderful association.

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http://www.paiacacps.org/ViewInformation.aspx?InformationId=19
सदस्यता शर्तें

 

सदस्यता पाने वाला आवेदक भारतीय नागरिक या भारतीय मूल का होना चाहिए।
सदस्यता पाने से पहले आवेदक को सोसायटी के संविधान व कार्य प्रणाली का ज्ञान प्राप्त करना होगा। जो वह किसी सदस्य एवं पदाधिकारी से प्राप्त कर सकता है।
आवेदन सोसायटी की वेबसाईट को अध्ययन करके भी ज्ञान प्राप्त कर सकता है।
आवेदक को सोसायटी के द्वारा जारी सदस्यता फार्म के कोरम पूरे करके फार्म में दर्शाये गए गणमान्य पदाधिकारियों से प्रमाणित कराने होगें।
आवेदक के आवेदन को राष्ट्रीय अध्यक्ष की अनुमति प्राप्त करने के बाद ही सदस्यता प्रदान की जाऐगी।
सदस्यता स्वीकृति के बाद सदस्य को एक यूनिक पहचान नम्बर और पहचान पत्र जारी किया जाऐगा।
सदस्यता पाने के बाद सदस्य का पूर्ण ब्यौरा सोसायटी की वेबसाईट पर दिया जाऐगा।
वह सदस्य ही सोसायटी का सदस्य माना जाऐगा। जिसका पूर्ण रिकार्ड सोसायटी की वेबसाईट और सोसायटी के सदस्यता रिर्काड में मौजूद होगा।
जिस सदस्य का रिकार्ड सोसायटी मुख्यालय एवं सोसायटी की वेबसाईट पर नही है। वह सोसायटी का सदस्य नही होगा।
आम सदस्यता पाने के लिए आवेदक को 2000 रूपये अदा करने होगे। जिसमें वार्षिक चंदा एवं सोसायटी विकास फण्ड शमिल है।
आम सदस्य को अपनी सदस्यता जारी करने के लिए प्रति वर्ष 600 रूपये अदा करने होगें।
एसोशियेट सदस्यता पाने के लिए आवेदक को 5100 रूपये अदा करने होगें।
आजीवन सदस्यता पाने वाले आवेदक को 11000 रूपये अदा करने होगें।



                                      निर्णय राष्ट्रीय कार्यकारिणी

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शाखा गठन नियम
 

सोसायटी की शाखा कार्यकारणी का कार्यकारणी गठित करने की विधिः-


1. सोसायटी की शाखाओं की कार्यकारिणी का गठन करने के लिए सोसायटी का राष्ट्रीय अध्यक्ष खंण्ड शाखाओं, जिला शाखाओं, प्रदेश शाखाओं के अध्यक्षों को स्वयं मनोनीत करेगा और शाखा अध्यक्ष कुल सदस्यों के दो तिहाही बहुमत से राष्ट्रीय अध्यक्ष की लिखित या मौखिक अनुमति लेकर अपनी कार्यकारिणी का गठन स्वयं कर सकेंगें। जिसकी विज्ञप्ति मुख्यालय की तरफ से सरकार और प्रशासन को भेजी जाएगी और शाखाओं के गठन के बाद विज्ञप्ति करानी अति आवश्कता  है।
2. विज्ञप्ति का खर्च गठित शाखा कार्यकारिणी को खुद वहन करना होगा।
3. शाखाओं की कार्यकारिणी का गठन करने के लिए कम से कम पच्चीस सदस्य होने अति आवश्यक है।

http://www.paiacacps.org/ViewInformation.aspx?InformationId=4

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आप सभी नागरिक भी अपने-अपने राज्यों के लोक सूचना आयोगों के सम्मुख इस तरह की अपील दायर सकते है। एक पहल करने के बाद ही परिवर्तन की शुरूआत होती है। अगर इतिहास के परिवर्तनों को देखा जाए। उन परिवर्तनों मे पहले एक जागरूक नागरिक ने ही कदम उठाया और बहुत बड़े परिवर्तन हो गए।
जनहित अपील
सम्मुखः प्रमुख अपील प्राधीकरण एवं केन्द्रीय जनसूचना आयोग, पुराना जे.एन.यू परिसर, कल्ब बिल्डिंग, आर.के. पुरम, नई दिल्ली- 110067
जनहित अपील क्रमांक............................... वर्ष 2011
राजेश कुमार भारती।
पत्राचार पताः
मार्फत- राष्ट्रीय अध्यक्ष- पीप्ल्स आल इन्डिया एन्टी करपषन एन्ड क्राईम प्रिवेन्षन् सोसायटी, रामकिषन दूबे हाऊस, मकान न॰ 201, नहरवाली गली, गांव सिघंु, दिल्ली- 40, निजि सहायकः 8802861013
........................अपीलार्थी
बनाम
1. प्रमुख सचिव भारत सरकार एवं केन्द्रीय मुख्य लोक प्राधिकारी, केन्द्रीय सचिवालय नार्थ ब्लाक, नई दिल्ली
2. भारत के सभी राज्यों के मुख्य सचिव एवं राज्य मुख्य लोक प्राधिकारी।
3. भारत के सभी केन्द्रीय शासित प्रदेशों के प्रशासक एवं मुख्य लोक प्राधिकारी। .
...........................दोषिगण
सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के अर्न्तगत सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के अध्याय-1 की धारा-1 (3) में दर्षायी गई धारा- 4 की उपधारा-1 को समस्त भारत में लागू कराने बारें में जनहित अपील।
माननीय आयोग,
माननीय आयोग को सूचित किया जाता है कि सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के अध्याय-1 की धारा-1 (3) में स्पष्ट लिखा है कि धारा- 4 की उपधारा-1 की पालना इस अधिनियम के शेष उपबन्ध अधिनियम के लागू होने के 120 दिन के अन्दर-2 प्रवृत होगे। लेकिन बहुत ही चिन्ताजनक विषय है कि भारत सरकार और राज्य सरकारों के मुख्य लोक प्राधिकारियों ने सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के अध्याय-1 की धारा-1 (3) की पालना में धारा- 4 की उपधारा-1 की पालना आजतक पूर्णरूप से नही की है। जिसका परिणाम यह है कि सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 भारतीय नागरिकों के लिए सुकर नही हो पा रहा है। सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 को इसलिए बनाया गया था कि भारतीय नागरिकों को जनसूचना के साथ केन्द्र सरकार और राज्य सरकारों के सभी लोक प्राधिकारियों के नाम, पदनाम, कर्त्तव्यों, शक्तियों और पत्राचार पते और लोक प्राधिकारियों को जनहित में सरकारों के द्वारा दिये गए मोबाईल व टेलीफोन नग्बर सुलभ हो सके। जिससें लोक प्राधिकारी नागरिकों के सर्म्पक मे रहे और प्रशासन की कार्यशैली में पारदर्शिता आ सके और नागरिकों को जनसूचना पाने और अपने कष्टों का निवारण करवाने में आसानी हो सके।
माननीय आयोग को यह भी सूचित किया जाता है कि सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के लागू होने के बाद सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 की धारा- 4 की उपधारा-1 की पालना में भारत के मुख्य लोक प्राधिकारीयों के द्वारा वेबासाईटो का निर्माण तो करा दिया गया है लेकिन उन वेबसाईटों पर सभी लोक प्राधिकारियों के नाम, पदनाम, पत्राचार पते पिन कोड सहित, उनके कर्त्तव्य और शक्तियों का विवरण नही दिया गया है। केवल ई-मेल और फोन नम्बर दिये गए है। लेकिन वह भी झूठे है। जब जनसाधारण इन ई-मेल पतो और टेलीफोन नम्बरों का उपयोग करके लोक प्राधिकारीयों को अपनी समस्यों के समाधान हेतू सर्म्पक करते है तो टेलीफोन नग्बर मिलते ही नही है और कम्पयूटरीकृत सदेंष आता है मिलाया गया नम्बर गलत है या स्थाई तौर पर बन्द है और अगर भारतीय नागरिक लोक प्राधिकारण की वेबसाईट में दर्शाये लोक प्राधिकारियों को ई-मेल के माध्यम से अपनी समस्या भेजते है। तो वह भी असफल होती है और उनके मेल पर फेलियर नोटिस आ जाता है कि यह मेल स्थाई तौर पर बन्द है। (जोकि आई.पी.सी. की धारा- 466 और 474 के अर्न्तगत घोर दण्डनीय अपराध है) यह हाल केवल भारत के लोक प्राधिकारियों का ही नही है बल्कि भारत के केन्द्रीय जनसचूना आयोग और राज्यों के मुख्य जनसूचना आयोगों के कार्यालयों की वेबसाईटों का भी है। जोकि बहुत ही चिन्ता जनक बात है।
इसके अतिरिक्त अपीलार्थी आपको विशेषतौर पर सूचित करता है कि लोक प्राधिकरणों की वेबसाईटों पर लोकप्राधिकारियों के सर्म्पक का ब्योरा न होने के कारण सभी लोक प्राधिकारी जनसाधारण से बिलकुल कटे हुए है और सभी लोक प्राधिकारियों ने अपनी-2 वेबसाईटों पर अपने पत्राचार पते और असल टेलीफोन और मोबाईल नम्बर इसलिए नही दर्शाये है कि अगर भारतीय नागरिकों को उनके पत्राचार पतों, टेलीफोनों और मोबाईल नम्बरों का पता चल जाऐगा तो भारतीय नागरिक उनको अपनी समस्याए बताऐगें और लोक प्राधिकारियों को भारतीय नागरिक की समस्याओं के समाधान के लिए कार्य करना पडेगा। जो कोई भी लोक प्राधिकारी नही करना चाहता है तथा मोबाईल फोन और टेलीफोनों का उपयोग तो लोक प्राधिकारीयों के परिवार के सदस्य निजितौर पर करते है। जिससे टेलीफोन और मोबाईल के बिल के रूप में सरकारों के उपर करोड़ो रूपये मासिक का भार तो पडता ही है साथ में उपरोक्त प्राधिकारी बिना अपने कर्त्तव्यों का निवार्ह करें मुत का वेतन लेकर भारतीय नागरिकों के उपर बेकार का आर्थिक भार डाल रहे है।
पूर्ण जानकारी पर इस लिंक का गहराई से अध्ययन करें और सहमत होने के बाद इसे शेयर करें।

http://www.paiacacps.org/ViewInformation.aspx?InformationId=11

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