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क्या आप यह मानते हैं कि देश की ज्वलंत समस्याओं पर चर्चा के अतिरिक्त हमें अपनी संस्कृति को संजोए रखने की भी जरूरत है? आज इस भागम-भाग जिन्दगी में लोग संस्कारों से दूर होते जा रहे है। हमारा यह प्रयास है कि उन्हे सच्चे मार्ग पर लाया जाये। यदि यह आपको सामयिक, सांस्कृतिक और ज्ञानवर्धक लगता है तो कृपया इस ज्ञान पूंज को, अपनी संस्कृति की सुवासित सुगंध को चतुर्दिश बिखरने में भागीदार बनें। 
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रहीम एक बहुत बड़े दानवीर थे। उनकी ये एक खास बात थी कि जब वो दान देने के लिए हाथ आगे बढ़ाते तो अपनी नज़रें नीचे झुका लेते थे।

ये बात सभी को अजीब लगती थी कि ये रहीम कैसे दानवीर हैं। ये दान भी देते हैं और इन्हें शर्म भी आती है।

ये बात जब तुलसीदासजी तक पहुँची तो उन्होंने रहीम को चार पंक्तियाँ लिख भेजीं जिसमें लिखा था -

ऐसी देनी देन जु
कित सीखे हो सेन।
ज्यों ज्यों कर ऊँचौ करौ
त्यों त्यों नीचे नैन।।

इसका मतलब था कि रहीम तुम ऐसा दान देना कहाँ से सीखे हो? जैसे जैसे तुम्हारे हाथ ऊपर उठते हैं वैसे वैसे तुम्हारी नज़रें तुम्हारे नैन नीचे क्यूँ झुक जाते हैं?


रहीम ने इसके बदले में जो जवाब दिया वो जवाब इतना गजब का था कि जिसने भी सुना वो रहीम का कायल हो गया।
इतना प्यारा जवाब आज तक किसी ने किसी को नहीं दिया।

रहीम ने जवाब में लिखा -

देनहार कोई और है
भेजत जो दिन रैन।
लोग भरम हम पर करैं
तासौं नीचे नैन।।

मतलब, देने वाला तो कोई और है वो मालिक है वो परमात्मा है वो दिन रात भेज रहा है। परन्तु लोग ये समझते हैं कि मैं दे रहा हूँ रहीम दे रहा है। ये सोच कर मुझे शर्म आ जाती है और मेरी आँखें नीचे झुक जाती हैं।

💐💐सुप्रभात

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इस दिवाली में कुछ नया करते हैं।
आओ बचपन की यादें ताजा करते हैं।

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मूकं करोति वाचालं पंगुलङ्घ्यते गिरिम्।
यत्कृपातमहं वन्दे परमानन्द माधवम्।।

श्री राधामोहन श्यामशोभन अंगकटि पीताम्बरम्।
जयति जय जय जयति जय जय जयति श्री राधावरम्।।

आरती आनन्दघन घनश्याम की अब कीजिये।
दीजिये निज भक्तिका वरदान श्रीधर गिरिधरम्।।
जयति जय जय जयति जय जय जयति श्री राधावरम्।।

सत्य दे हमको अभय शिव कामना कल्याण की।
दे सुमति सुन्दर हमें सुन्दर सरस् गुनगान की।।
ज्ञानघन विज्ञान धन श्री भक्तवत्सल सुन्दरम्।
जयति जय जय जयति जय जय जयति श्री राधावरम्।।

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशम्।
विश्वाधारं गगन सदृशं मेघवर्णं शुभांङ्गम्।।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यम्।
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्व लोकैकनाथम्।।
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जय जय श्री राधे।
जय जय श्रीकृष्ण।
सुप्रभात सुमङ्गलम्।
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कश्मीरी जितना भारत को कोसते हैं, अगर उन्हें यदि पाकिस्तान को दे भी दिया जाय तो फिर बलोचिस्तान की तरह रोयेंगे ।

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सभी मित्रों को स्वतंत्रता दिवस 2016 की बहुत बहुत बधाई, हार्दिक शुभकामनाएं।
भारत माता की जय।
वन्देमातरम्।
जय हिन्द की सेना।

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माता सुमित्रा का विशाल ह्रदय
महाराजा दशरथ की कई रानियाँ थीं। कौसल्या माता पट्टमहिषी थीं। माता कैकेयी महाराजा को सर्वाधिक प्रिय थीं और शेष में श्री सुमित्रा जी ही प्रधान थीं। महाराज दशरथ प्रायः कैकेयी के महल में ही रहा करते थे। सुमित्रा जी महारानी कौसल्या के सन्न्किट रहना तथा उनकी सेवा करना अपना धर्म समझती थीं। पुत्रेष्टि –यज्ञ समाप्त होने पर अग्नि के द्वारा चरु का आधा भाग महाराज ने कौसल्या जी को दिया। शेष का आधा कैकेयी को प्राप्त हुआ चतुर्थाश जो शेष था, उसके दो भाग करके महाराज ने एक भाग कौसल्या तथा दूसरा कैकेयी के हाथों पर रखा दिया। दोनों रानियों ने उसे सुमित्रा जी को प्रदान किया। समय पर माता सुमित्रा ने दो पुत्रों तो जन्म दिया। कौसल्या जी के दिये भाग के प्रभाव से लक्ष्मण , श्रीराम के और कैकेयी जी द्वारा दिये गये भाग के प्रभाव से शत्रुध्न जी श्रीभरत जी के अनुगामी हुए। वैसे चारो कुमारो को रात्री में निद्रा माता सुमित्रा की गोद में आती थी। सबकी सुख सुविधा ,लालन-पोषण तथा क्रीड़ा का प्रबन्ध माता सुमित्रा ही करती थी। अनेक बार माता कौसल्या श्रीराम को अपने पास सुला लेतीं। रात्रि में जगने पर वे रोने लगते। माता रात्रि में ही सुमित्रा के भवन में पहुँच कर कहती – सुमित्रा! अपने राम को लो । इन्हें तुम्हारी गोद के बिना निद्रा ही नहीं आती। देखो, इन्होंने रो- रोकर आँखे लाल कर ली हैं। श्री राम सुमित्रा की गोद में जाते ही सो जाते।
पिता से वनवास की आज्ञा पाकर श्रीराम ने माता कौसल्या से तो आज्ञा ली, सुमित्रा के समीप वे स्वयं नहीं गये। वहाँ उन्होंने लक्ष्मण को भेज दिया। माता कौसल्या श्रीराम को रोककर कैकेयी का विरोध नही कर सकती थीं, कितुं सुमित्रा जी के सम्बन्ध में यह बात नहीं थी। माता सुमित्रा का ही वह आदर्श हृदय था कि प्राणाधिक पुत्र को उन्होंने कह दिया कि लक्ष्मण! तुम श्रीराम को दशरथ, सीता को मुझे तथा वन को अयोध्या जानकर सुख पूर्वक श्रीराम के साथ वन जाओ।
दूसरी बार माता सुमित्रा के गौरवमय हृदय का परिचय वहाँ मिलता है, जब लक्ष्मण रणभूमि में आहत होकर मूर्छित पड़े थे। यह समाचार जानकर माता सुमित्रा की दशा विचित्र हो गयी। उन्होंने कहा- लक्ष्मण! मेरा पुत्र ! श्री राम के लिये युद्ध में लड़ता हुआ गिरा। मैं धन्य हो गयी। लक्ष्मण ने मुझे पुत्रवती होने का सच्चा गौरव प्रदान किया। महर्षि वशिष्ठ ने ना रोका होता तो सुमित्रा जी ने अपने छोटे पुत्र शत्रुध्न को भी लंका जाने की आज्ञा दे दी थी-तात जाहु कपि संग और शत्रुघ्न भी जाने के लिये तैयार हो गये थे। इस सेवा की अग्नि में तप कर लक्ष्मण जब लौटे तभी उन्होंने उनको हृदय से लगाया। सुमित्रा जी- जैसा त्याग का अनुपम आदर्श और कहीं मिलना असम्भव हैं। साभार: विष्णु प्रसाद अग्रहारी। https://www.facebook.com/Apanadeshapnisanskriti/

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आज राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त जी की जन्मतिथि है.
क्या आपको उनकी कोई कविता याद है ? यदि नहीं तो लीजिए प्रस्तुत है आपके लिए उनकी एक कविता –
नर हो न निराश करो मन को
कुछ काम करो कुछ काम करो
जग में रह के निज नाम करो।
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