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यह कहानी लवली नाम की लड़की जो की पंजाब के एक गांव #Patiala के पास रहती है उसके आस पास घूम रही है, यह एक #Hindi Tv #Serial की कहानी की तरहां है जिसको आप पढते समय टीवी सीरीयल की तरहां अनुभव करेगे।
यह कहानी #Sunday को हमारी इस वेबसाईट पर प्रकाशित की जाऐगी,हमे उम्मीद है की आपको पसंद आऐगी।

http://www.vishvtrading.com/2018/08/hindi-laghu-katha.html

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एक खूबसूरत लव स्टोरी
# _चाँदनी
Written By-Manish Pandey'Rudra'

जाने क्यों मैं हर बार उसे देखते ही बस उसकी ओर खिंचा चला जाता था।ऐसी कौन सी कशिश थी उसकी भूरी आँखों में ये आज तक समझ नहीं पाया था मैं।काफी भागदौड़ और उथल-पुथल करने के बाद किसी तरह दोस्तों से मिन्नतें करते और उन्हें बंशी काका के दुकान की चाय पिलाने के बाद आखिरकार मुझे उसका नाम पता चल ही गया।
चाँदनी!
जैसा कि उसका नाम था चाँदनी और ठीक उसी प्रकार उसका चेहरा चाँद के उजले किरण की तरह ही हमेशा चमक-दमक से भरा और खिला-खिला रहता था।दूधिया रंगत के उसके चमकदार चेहरे पर आँखों के आगे से झाँकती उसकी लटें बस दिल चीर जाती थीं मेरा।
जबकि मैं दुबला पतला सा मगर सामान्य कद वाला असामान्य लड़का था।हमेशा की तरह आज भी मैंने बडी़ और बिना फिटिंग वाली सर्ट और सूती के कपड़े की पैंट पहन रखी थी।मैं बालों में ढे़र सारा तेल और पानी लगाकर हमेशा बालों को गीला और चिपका कर रखता था जो कि कईयों को बेहद बकवास लगता था सिवाय मेरे जिगरी दोस्त ऊँकार के जो लगभग मेरी तरह ही दिखता था बस उसकी कद काठी मुझसे ज्यादा बेहतर थी।
"यार पांडेय तू उससे बात क्यों नहीं कर लेता?"
मेरे अजीज दोस्त ऊँकार ने हर रोज कि तरह आज फिर मुझे उकसाने की कोशिश की।
"प.... प... पागल ह... है क... क्या?"
मेरे अंदर एक बहुत बड़ी कमी थी और यही सबसे बड़ी वजह थी जिसके कारण मैंने कभी उससे बात करने की कोशिश नहीं की और ये था मेरा हकलाना।
मुझे ये कोचिंग जाॅइन किये हुए करीब एक हफ्ते से ज्यादा हो गया था और तब से कोई मुझे हकला, कोई छुकछुक गाड़ी तो कोई ढक्कन बुलाता था और उन सबका मुँह तोड़ने का मन करता था लेकिन अपना डेढ़ पसली का शरीर और उनका एक फुट ऊँचा कद देखकर मैं शांत रह जाता था।
"क्यों क्या दिक्कत है?"
ऊँकार ने एकबार फिर सवाल किया।
"क.... क.... क..... कोई दिक्कत.... न.... नहीं है।"
मैंनें उसकी बात काटते हुए कहा पर असल में मैं भीतर से दहक रहा था और ऐसा लग रहा था जैसे मेरे भीतर कोई ज्वालामुखी दहक रहा हो।
"यार ये अंग्रेजी अपने पल्ले नहीं पड़ती।"
जोरों से काॅपी पटकते हुए ऊँकार ने खहा और जम्हाई लेते हुए बेंच पर सिर रखकर लुढ़क गया।
"इसीलिए तो अंग्रेजी भाषा की कोचिंग पढ़ने आते हैं।"
मैंने कटुता से जवाब दिया और वह प्रैराग्राफ अनुवाद करने लगा जो कविता मैडम ने करने को कहा था।और आखिरी लाइन का अनुवाद पूरा करते ही मैं झट से खड़ा हो गया।
"ह.... ह....!" 
मैंनें बोलने की कोशिश की पर जाने क्यों मैं बोल नहीं पाया और ज्यादातर लड़के-लड़कियाँ मुझ पर हँस रहे थे सिवाय कविता मैम और ऊंकार को छोड़कर।
"ओये ह.... ह.... हकले जल्दी बोल वरना कोचिंग का टाइम निकल जायेगा।"
आनंद ने फिर आज मेरा मजाक उड़ाया पर अब मुझे इसकी आदत हो चुकी थी लेकिन हाँ, बुरा तो अब भी लगता था।इसलिए मैंनें सोंचा मेरा वापस अपनी जगह पर बैठ जाना ही ठीक होगा।
"हो गया मैम हम दोनों का।"
इससे पहले कि मैं बैठता एक मधुर आवाज मेरे कानों में घुलती चली गई।और हालांकि मैंने उसकी ओर देखा पर उससे पहले ही मेरे दिल ने मुझे बता दिया था कि यह आवाज उसी की थी चाँदनी की।
मैं बस हैरान इस बात पर था कि उस वक्त मेरी ओर देखते समय उसके होंठों पर मुस्कान तो थी मगर मेरा मजाक उड़ा रही हँसी उन भूरी आँखों में कहीं भी नहीं थी।
"आओ!"
कविता मैम ने हमें पास बुलाया और एक साथ हम अपनी-अपनी नोटबुक लेकर आगे बढ़े।मैं अपने दिल को बार-बार उसकी ओर देखने से रोक रहा था पर कम्बख्त ऐसा लग रहा था जैसा मेरा दिल किसी और की जी हजूरी करने लगा हो।कविता मैम के पास पहुंचने के बाद मैंनें पहले उसे मौका दिया ताकि वह अपने जवाब की जाँच पहले करा सके।हालाँकि मेरा ऐसा करने के पीछे यही कारण था कि मैं कम से कम कुछ देर ज्यादा उसके पास खड़ा रह सकूं।
कविता मैम उसकी काॅपी में लिखा जवाब चेक कर रही थीं जबकि मेरी नजर उसकी हैंडराइटिंग पर जमी हुई थी।
"वाह क्या खूबसूरत राइटिंग है इस लड़की की।" 
मैंनें मन ही मन कहा कि और धीरे-धीरे डरते हुए अपनी नजरें उसके चेहपर घुमाई।और ठीक उसी वक्त उसने अपना चेहरा मेरी ओर घुमाया और उसने मुस्कुरा दिया पर और मेरा चेहरा फौरन शर्म के मारे लाल हो गया।और जल्दी से मैंनें अपनी नजरें उस पर से हटा लीं ओर नीचे अपने पैरों की ओर देखने लगा।
"क्या कर रही हो चाँदनी बेटा यहाँ एन नहीं द का प्रयोग करना था।"
कविता मैम ने उसे समझाते हुए कहा।
"साॅरी मैम!"
एक बार फिर कानों में मिश्री घोलने जैसी उसकी आवाज़ सुनाई दी और मेरा दिल जोरों से धड़कने लगा।
"कोई बात नहीं बाकी सब सही है।"
कहने के साथ ही कविता मैडम ने उसकी काॅपी उसकी ओर बढ़ा दी।
इसके बाद वो वापस मुडी़ और हिरनी जैसी चाल चलते हुए अपनी बेंच पर जाकर बैठ गई।
"और अविनाश बेटा घर पे सब कैसे हैं?"
कविता मैम ने मेरी काॅपी चेक करते हुए मुझसे पूछा।
"ठ... ठीक हैं।"
मैनें आराम से जवाब दिया खैर इसके बाद कविता मैम ने एक-दो सवाल और पूछे और फिर उन्होंने मेरी काॅपी मेरी तरफ बढ़ा दी।
"लो एकदम सही है कोई गलती नहीं।"
उन्होंने गर्व से कहा और वापस अपनी बेंच की ओर लौटते वक्त मैं फूल कर कुप्पा हो रहा था।
खैर इसके बाद कोचिंग खत्म होते ही सारे लड़के-लड़कियाँ एक-एक करके बाहर निकलने लगे।
"तू चल मैं फीस क्लियर करके आता हूँ।"
बोलकर ऊँकार ने जबरदस्ती मुझे बाहर निकाल दिया और मैं बाहर निकल कर ये सोंचते हुए उसका इंतजार करने लगा कि आखिर जब हम दोनों ने कोचिंग एक साथ स्टार्ट किया था और इस महीने की फीस पिछले हफ्ते ही हमने एक साथ भर दिया था तो वह अब कौन सा फीस क्लियर करने गया था।
"अच्छा काम किया।"
अभी मैं इसी उधेड़बुन में लगा हुआ था कि अचानक चांदनी की आवाज़ सुनकर मुझे झटका सा लगा.... For Full Story Please Visit on my blog

पूरी कहानी पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें और मेरा ब्लॉग जरूर फाॅलो करें

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#प्यार_का_पंचनामा
#_प्यार में धोखा खाये हुए लड़के जरूर पढें

Chapter-9
#_Based_on_School_Life_Love_Stories
एक खूबसूरत लव स्टोरी.....
Writer - Manish Pandey’Rudra'

अधूरे पन्ने@जिंदगी
(अधूरे इश्क़ की पूरी कहानी)
अध्याय-नौ
बेवफ़ाई का सिला

"हैलो!अमित को जानती हो?"
ध्रुव ने सीधे-सीधे उससे सवाल किया।
"मैं नहीं जानती ओके!"
इति ने टका सा जवाब दिया।
"तुम्हारा फेसबुक फ्रेंड है"
"ओह!हाँ एक है अमित मिश्रा उसका फ्रेंड रिक्वेस्ट एक्सेप्ट किया है लेकिन कभी उससे बात नहीं हुई।"
"फिर झूठ वो साला लोगों को बताते फिर रहा है कि तुम उसकी गर्लफ्रेंड हो।जिस दिन भी मिल गया चीर के रख दूंगा साले को।"
बोलते हुए उसका चेहरा गुस्से में भभकने लगा।
"जो करना है करो यार मुझे नहीं पता।"
"वो तो मैं करूंगा ही पहले तुम उसे ब्लॉक करो।"
ध्रुव ने जोरदार आवाज में कहा।
"मेरे में आप्शन नहीं है ब्लॉक का।"
"अच्छा मार्क जुकरबर्ग ने तुम्हारे लिए कोई स्पेशल एकाउंट बनाया है क्या!"
ध्रुव ने उसका मजाक उड़ाया।
"तुम मेरा दिमाग मत खराब करो।"
"दिमाग तो तुम मेरा खराब कर रही हो ब्लॉक का आप्शन नहीं है तो आईडी और पासवर्ड मुझे दो मैं कर दूंगा।"
"नहीं दे सकती।"
इति ने साफ इंकार कर दिया।
"क्यों?"
"यार मेरी प्राइवेसी का मतलब क्या रह जायेगा फिर तुम्हें अमित से प्राब्लम है न रुको उसे अनफ्रैंड कर देती हूँ।"
बोलने के बाद इति ने फोन कट कर दिया और दो मिनट बाद दोबारा उसे काॅल किया।ध्रुव ने उसकी काॅल कैंसिल करके खुद काॅल लगाया।
"हाँ हो गया अब खुश।"
इति ने तीखे अंदाज में कहा।
"क्या यार साफ-साफ झूठ बोल रही है तू अभी भी तेरी फ्रैंड लिस्ट मेरे सामने है और छूने किसी को भी अनफ्रैंड नहीं किया है सुन अब सीधे मैटर पे आता हूँ या तो तुम फेसबुक और या फिर मुझे दोनों में से किसी एक को चुन लो"
"क्या हुआ यार दिमाग़ खराब है क्या?"
"मैं कोई एक क्यों चुनूँ और फालतू बात ना करो!"
"साला जो देखो चूतिया बना के निकल जाता है शक्ल पे मेरे चूतिया लिखा है क्या?भाड़ में जाये शराफ़त दिमाग़ मेरा खराब हो गया है"
"तुम्हारा रोज का नाटक हो गया मैं फेसबुक भी नहीं बंद करूंगी और तुम्हें नहीं छोड़ना चाहती।"
"आखिरी बार पूछ रहा हूँ फेसबुक या मैं?"
ध्रुव अपनी बात पर डटा रहा।
"मैं फेसबुक नहीं छोड़ सकती मैं अपनी फ्रीडम नहीं छोड़ सकती तुमको जो करना है करो।"
इति ने एक बार फिर साफ-साफ इंकार कर दिया।
"तो सुन भाड़ में जा तू?"
गुस्से भरे लहजे में कहने के साथ ही उसने फोन पटक दिया इसके बाद इति बार-बार उसे फोन लगाती रही लेकिन उसने इति के किसी भी काॅल का जवाब नहीं दिया।
अगले एक हफ्ते तक वो बार-बार बस इति के बारे मेंसोंच रहा था जबकि इस बार खुद उसने ही इति से रिश्ता तोड़ा था।
दो दिनों बाद उनका बोर्ड का पेपर था और चाहते हुए भी वो अपने इक्जाम पर फोकस नहीं कर पा रहा था और इसका नतीजा यह हुआ कि उनका पहला पेपर जो फिजिक्स का था काफी खराब हो गया।
"उसकी बहन सच कह रही थी साली मुझे शुरू से धोखा दे रही थी।"
एक सुनसान इलाके में नदी पर ऊँचे पुल पर जय के साथ बैठे ध्रुव ने कहा जिसके हाथ में बियर की भरी हुई बोतल थी जबकि आसपास तीन-चार खाली बोतलें और भी पड़ी थीं।
"तो भाई क्या बोलते हो कुछ किया जाए?बदला लिया जाए?"
जय ने वहशी अंदाज में उससे सवाल किया।
"हाँ मैं यही तो चाहता हूँ बदला और इसका इंतजाम भी कर चुका हूँ।" 
उसने बियर की घूँट पीकर कहा जबकि जय हैरान था।
"कैसा इंतजाम?"
"मैंने उसके फेसबुक अकाउंट पर लाॅग इन किया था पर मेरे पास पासवर्ड नहीं था इसलिए फाॅरगाट पासवर्ड पर क्लिक कर दिया और चूंकि नम्बर उसके मम्मी का था इसलिए उसके नम्बर पे एक टोड गया होगा पासवर्ड रीसेट करने का जो अभी उसकी बहन मुझे बतायेगी।" 
बोलते वक्त ध्रुव की आँखें वहशी अंदाज़ में चमक रही थीं।
"भाई वो कोड देगी?"
जय ने अनिश्चितता से पूछा।
"देगी जरूर देगी।लो आ गया कोड..... For Full Story Please Visit On My Blog -
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एक खूबसूरत लव स्टोरी.....
Writer - Manish Pandey’Rudra'
अधूरे पन्ने@जिंदगी
(अधूरे इश्क़ की पूरी कहानी)
अध्याय-एक
पहली नजर का प्यार

ये कहानी ना तो किसी हीरो की है,और ना ही किसी विलेन की....ये कहानी है प्यार में पागल एक लड़के की जो अच्छे लोगों के बीच बहुत अच्छा और बुरे लोगों के बीच बहुत बुरा था।ध्रुव सामान्य सा दिखने वाला पर मस्तमौला किस्म का लड़का था जो एक मध्यमवर्गीय परिवार से था।उसके पिता वन विभाग के एक आॅफिसर थे जिनका हालही में इस नये शहर में तबादला हुआ था।उसके घर में उसके मम्मी-पापा के अलावा उसकी सिर्फ एक बड़ी बहनथी।पिताजी की नौकरी के वजह से आये दिन उन्हें शहर बदलना पड़ता था और साथ ही ध्रुव को बार-बार स्कूलभी बदलना पड़ता था जिसकी वजह से वो हमेशा उदास और चिड़चिड़ा रहता था।उसे बार-बार पुराने दोस्तों को छोड़कर नये लोगों के साथ दोस्ती करना अच्छा नहीं लगता था फिर भी अब तो जैसे उसे इसकी आदत सी पड़ चुकी थी।खैर मुद्दे की बात ये है कि इस शहर में अभी तीन दिन पहले ही उसके पिता का ट्रांसफर हुआ था।और उसेकिसी तरह शहर के एक कान्वेंट स्कूल में बारहवीं क्लास में एडमिशन मिल गया।स्कूल का नाम सिटी स्टैंडर्ड पब्लिक स्कूल था।वो शायद अगस्त की पांच तारीख थी और स्कूल में पहला दिन था उसका।सामान्य कद-काठी का गोरा हलके पिचके हुए गालों वाला वह लड़का काफी खूबसूरत दिख रहा था।बालों में खुशबूदार तेल लगाकर बड़ी ही सफाई से मांग काढे़ हुए ध्रुव किसी पुराने ब्लैक एंड व्हाइट फिल्म के हीरो जैसा दिख रहा था।दुबला-पतला और सामान्य हाईट का पूरी तरह से वेल ड्रैस्ड, कुल मिलाकर वह ठीक-ठाक लग रहा था।लोहे के बड़े दरवाजे को पार करने के बाद कंधे पर काले रंग की डिजाइनर बैग लटकाए अपने आस-पास के माहौल और लड़के-लड़कियों को देखते हुए अपनी साईकिल सही जगह पर खड़ी करने के बाद वह स्कूल के बड़े से हाल में घुस गया।उसकी ही तरह बाकी सारे लड़कों ने भी भूरे रंग की पैंट और क्रीम कलर की शर्ट पहन रखी थी जबकि लड़कियों ने भूरे रंग के कुर्ता, सफेद रंग का पैजामा और सफेद रंग का ही दुपट्टा पहन रखा था।खैर अपना क्लास रूम खोजने में उसे ज्यादा दिक्कत नहीं हुई क्योंकि हर क्लास के दरवाज़े पर क्लास का नाम लिखा हुआ था।उसका क्लास बरामदे के अंदर की ओर पड़ता था जिसके ठीक सामने एक हाॅल जैसा खुला हुआ कमरा था और उसके बगल एक तरफ कम्प्यूटर रूम था जबकि दूसरी ओर छठवींकी क्लास चलती थी जिसके बगल उपर जाने के लिए सीढ़ियाँ लगी हुई थीं जहाँ सातवीं और आठवीं की क्लासें लगतीं थीं और इनके अलावा फिजिक्स, केमिस्ट्री और बायोलॉजी की लेबोरेट्रीस बनीं हुई थीं।वहीं बगल के हाल वाले कमरे में ग्यारहवीं की क्लास चलती थी।चारों ओर नजरें दौड़ाते हुए वो अपने क्लास में घुस गया जहाँ उसकी मुलाकात उसकी क्लास के कई नये लड़के लड़कियों से हुई।ध्रुव को देखकर ज्यादातर लोगों को कोई सदमा नहीं लगा क्योंकि उनके क्लास टीचर ने एक दिन पहले ही सभी को उस लड़के के बारे में बता दिया था।हां लेकिन कुछ लड़कियाँ जरूर उसे दिलचस्प से देख रहीं थीं और आपस में फुसफुसाहट भरे स्वर में कुछ बातें भीं कर रहीं थीं।खैर उसे अपने इस फीके और हल्के-फुल्के स्वागत से कोई खास दिक्कत नहीं हुई क्योंकि उसे इन सबकी आदतपड़ चुकी थी।"हाय!तो तुम ही हो वो न्यू एडमिशन!वेलकम भाई"कहने के साथ ही दुबले-पतले शरीर वाले लड़के जय नेउसकी ओर हाथ बढ़ाकर अपना परिचय दिया।"हुम्म्!"ध्रुव ने जय से हाथ मिलाते हुए बेहद ठंडा सा जवाब दिया।"मेरा नाम जय है!""मैं ध्रुव।"उसने भी अपना परिचय दिया और बारीकी से जय को देखने लगा।जय भी ध्रुव की तरह दिखने में कुछ खास नहीं था पर उसे देखकर ध्रुव ने अंदाजा लगाया कि वह पढ़ाई में काफी अच्छा और होशियार होगा।उसके पतले अंडाकार चेहरे पर मैगी-नूडल्स जैसे उलझे हुए खिचड़ी बाल और भी अजीब दिखते थे।और फिर इसी के साथ ध्रुव ने अपना स्कूल बैग पहली लाईन में बीच के एक बेंच पर रख दी और बगल वाली खिड़की भी खोल दी ताकि खुली हवा अंदर आ सके।खिड़की से सीधे ग्यारहवीं क्लास के दूसरे औरतीसरी लाईन में बैठे कुछ लड़के-लड़कियाँ दिखाई देते थे पर उसने उन पर ध्यान नहीं दिया और वापस जयकी ओर चल पड़ा जो अपना बैग उसी लाइन में आखिरी बेंच पर जमा रहा था।"हाय जय भाई क्या हाल है?"क्लासरूम के पिछले दरवाजे से घुसते हुए प्रद्युम्न ने बेहद गर्मजोशी से पूछा और उसने आपना बैग जय की ओर उछाल दिया जिसने उसे आसानी से लपक लिया और अपने बैग के बगल जमा दिया।"ठीक है भाई!"जय ने जवाब दिया तभी प्रद्युम्न की नजर ध्रुव पर पड़ी और उसने जय की ओर देखते हुए इशारे से पूछा किक्या ये वही नया लड़का है।जबकि ध्रुव दूसरी ओर देखने लगा जहां कुछ लड़कियाँ बैठी हुईं थीं।उनमें से एक ने जिसका नाम तृप्ति था, उसने ध्रुव को प्यारी सी स्माइल पास की ओर शर्माते हुए वह वापस प्रद्युम्न और जय की ओर देखने लगा।"हाय भाई मैं प्रद्युम्न मिश्र हूँ।"प्रद्युम्न ने आगे आकर ध्रुव की ओर हाथ बढ़ाते हुए मुस्कुरा कर कहा।"आय एम ध्रुव!"ध्रुव ने भी आगे बढ़कर उससे हाथ मिलाया और फिर उसने ध्यान से उसकी ओर देखा और पाया कि उसने पूरे कैम्पस में अब तक जितने भी लड़कों को देखा था प्रद्युम्न उनमें सबसे ज्यादा स्टाइलिश और स्मार्ट लग रहा था।"अभी तो तुम नये हो पर भाई धीरे-धीरे तुम्हें भी यहां अच्छा लगने लगेगा और मजा भी आने लगेगा।""हाँ।शायद!"वो बु़झे मन से बोला क्योंकि उसे मालूम था कि वो ज्यादा दिन यहाँ भी नहीं रह पायेगा पर चूँकि कम से कम अगले एक साल तक तो उसे यहाँ रहना ही था इसलिए उसे यहां के माहौल को समझने की कोशिश तो करनी ही थी।पर उसे उसके पुराने दोस्तों और स्कूल की याद आ रही थी और खुद ध्रुव भी वापस पुराने शहर में ही जाना चाहता था।इसके बाद भी कई लड़के क्लास में आये जिनमें से कुछ ने उससे मिलने में दिलचस्पी दिखाई जबकि कईयों ने उसे नजरंदाज भी कर दिया।लगभग सभी लड़के-लड़कियों के नाम और थोड़ी बहुत डिटेल्स प्रद्युम्न ने उसे बताई पर सबके नाम याद रखना थोड़ा मुश्किल था।हालांकि उनमें से कुछ लड़के-लड़कियों के नाम उसे याद हो गए थे जो थोड़ेज्यादा हंसमुख और बातूनी किस्म के थे।जैसे उलझे बालों वाला सांवला लड़का विराट श्रीवास्तव जिसे क्रिकेट खेलने का बहुत ज्यादा शौक था और साथ ही वह थोड़ा मजाकिया किस्म का भी था।उसके अलावा थोड़े भारी-भरकम शरीर वाला चश्मिशलड़का वीर सिंह और विनीत सिंह जो लम्बा और काफी गोरा-चिट्टा दिख रहा था।इसके बाद एक-एक करके दुबला-पतला और दिन भर फोन में घुसा रहने वाला देवांश,सांवले रंग-रूप वाला बेवकूफ़ किस्म का प्रतीक मिश्र जिसे इंग्लिश ठीकसे आती नहीं थी मगर फिर भी वह इंग्लिश में ही बात करता रहता था, चौड़े माथे वाला थोड़ा अजीब सा लड़का रजत, गोल-मटोल और फूहड़ किस्म का दिखने वाला भरत और सामान्य कद-काठी का पीले चेहरे वाला अमित भी उससे हाथ मिलाने के लिए आगे आया।उन्होंने उससे हालचाल पूछा और उसके पुराने स्कूल और वहाँ के लोगों के बारे में काफ़ी सवाल-जवाब किया खैर फिर इसके बाद वो सभी आपस में बातें करने लगे और वो ध्रुव बाकियों से हाथ मिलाते हुए पिछले गेट से अपने क्लास के बाहर निकलआया।उसके क्लास की कई लड़कियाँ भी उसे देख के मुस्कुराते हुए उसका स्वागत करतीं और बदले में वो भी मुस्करा देता।पर उसे वहां रुकने में या उनसे बातें करने में कोई दिलचस्पी नहीं थी और तभी उसने बाहर दूसरी क्लास में खड़ी एक लड़की को देखा और बस देखता ही रह गया जैसे इससे पहले उसने किसी लड़की को कभी देखा ही नहीं हो।उसी पल से लड़के की जिंदगी ही बदल गई।वक्त मानों थम सा गया था और ऐसा लगा जैसे मानों सारी काय़नात ठहर सी गई थी।वो अपने होशो-हवा़स खोकर बस उस लड़की को देखे जा रहा था।वो लड़की उसी स्कूल की ग्यारहवीं क्लास की स्टूडेंट थी।गोल हल्का गुलाबी सा चेहरा, सीप जैसी पलकों के भीतर कैद मोती जैसी बड़ी-बड़ी चमकदार काली आँखें,गुलाबी से रसभरे होंठ, उभरी हुई ठुड्डी और उसके नीचे छोटी सी सुराहीदार गर्दन और उस पर काले घने लम्बे बाल जिन पर काली पतली सी हेयर-बैंड लगी थी, चुस्त भूरे सूट और सफेद चूड़ीदार मोहडी़ के पैजामे पर सफेद दुपट्टे से छिपा यौवन कुल मिलाकर किसी सांचें में ढ़ली संगमरमर की मूर्ति जैसी गोरी लड़की थी।ध्रुव उसकी मासूमियत से भरी मुस्कुराहट पे मर मिटा था ऐसा कहना गलत न होगा की ध्रुव उसे बस देखता ही रह गया था मानों उसके यौवन के सागर में डूबने का इरादा रखता हो।खैर उसकी दीवानों जैसी अजीबो-गरीब हालत देखकर ऐसा लग रहा था जैसे उसके दिल ने उसके सीने में अभी-अभी धड़कना शुरू किया था।उसकी सोंच बदल गयी थी अब बस वो यहीं रुकना चाहता था।वो तो बस उस खूबसूरत बला को निहारते जा रहा था और उसकी खूबसूरती में डूबा चला जा रहा था।हालाँकि लड़की जो हँसते हुए अपने सहेलियों से बातें कर रही थी उसका ध्यान ध्रुव की ओर एक बार भीनहीं गया था और न तो उसने अब तक एक बार भी ध्रुव की ओर देखा था।पर ध्रुव उसी को देखता जा रहा था जैसे किसी राहगीर को उसकी मंजिल मिल गई हो।जब लड़की अपनी सहेलियों से बातें कर रही थी तो बीच-बीच में उसके बालों की लटें उसके चेहरे पर आ जाती थी और जिनको वो अपने कोमल उँगलियों से अपने मखमली कानों के पीछे ले जाती थी...ध्रुव अपने होश खो देने वाला ही था कि तभी प्रेयर के लिए बेल बजने लगी जिसे सुनकर सभी लोग बाहर बड़े हॉल की तरफ भागे।वो लड़की और उसकी सहेलियाँ भी उठ कर जाने लगी पर ध्रुव जो अभी भी उसकी ही धुन में खोया हुआ था उसे झटका सा लगा और वो जैसे जाग गया....
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Adhoore Panne@Zindgi http://diehardstoriesrudra.blogspot.com/2018/01/adhoore-pannezindgi.html
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Chapter-4
एक खूबसूरत लव स्टोरी.....
Writer - Manish Pandey’Rudra'

अधूरे पन्ने@जिंदगी
(अधूरे इश्क़ की पूरी कहानी)
अध्याय-चार
होमसाइंस की लड़की

बीते दिनों हुई घटना से उसे ज्यादा फर्क नहीं पड़ा था सिवाय इसके कि अब ध्रुव के क्लास की लड़कियाँ और कुछ लड़के मौका मिलते ही उस पर व्यंग्य करते थे और और उसका मजाक बनाते थे।
क्लास में घुसने से पहले ही उसकी नज़र एक कोने में खड़ी कुछ लड़कियों, जिनमें वीर की गर्लफ्रेंड रश्मि भी थी, तृप्ति, रजनी और उनके सामने बेंच पर बैठे रोहित और अमित पर पड़ी जो उनके साथ किसी गहरी चर्चा में डूबे हुए थे।लेकिन उन्होंने उसे नहीं देखा और जब उन लोगों की बातें उसके कानों में पड़ीं तो वह रुक गया और खिड़की के पीछे खड़ा होकर उनकी बातें सुनने लगा।
"सच कहूं तो मुझे तो वो शुरू से ही अजीब लगता था।"
रश्मि ने कहा जिसका उसकी फ्रैंड तृप्ति ने बखूबी समर्थन किया।
"और मुझे तो वो शुरू से ही पसंद नहीं था!"
तृप्ति ने भी नाक-भौं सिकोड़कर उसका मखौल उड़ाते हुए ऐसे कहा जैसे वो कोई बदबूदार कीड़ा हो।
"हाँ!क्योंकि उसने तुम्हें कभी भाव नहीं दिया इसीलिए!" 
आकांक्षा ने अपनी किताब से सिर उठाते हुए तृप्ति को जवाब दिया और हिकारत से भरे तृप्ति के चेहरे पर से नजरें हटाकर वापस उसने अपनी नजरें कापी पर गडा़ लीं।हालांकि ध्रुव ने कभी भी उससे बात करने की कोशिश नहीं की थी लेकिन फिर भी आज उसका जवाब सुनकर ध्रुव के मन में उसके लिए असीम श्रद्धा उमड़ पड़ी।
"हुंह!मुझे तो लगता है उसने सच में इलेवन्थ की उस लड़की को छेड़ा था और इसीलिए उसे सजा मिली।उसके साथ यही होना चाहिए था।"
तृप्ति ने फिर से कहा।
"वो एक नम्बर का कमीना है!"
रोहित ने उसका साथ दिया और एक बार फिर ध्रुव के मन में उन दोनों के लिए जबर्दस्त नफरत का भाव उमड़ आया।इसी बात पर आकांक्षा को छोड़कर बाकी सभी बुदबुदाते हुए आपस में बातें करने लगे।
और जब ध्रुव के लिए जब इससे ज्यादा बर्दाश्त कर पाना मुश्किल हो गया तो वो खिड़की के पीछे से निकल कर बाहर आ गया और बेहद गुस्से में पहली लाइन को छोड़कर जिसमें लड़कियाँ बैठती थीं आगे बढ़ गया और दूसरी लाइन में पीछे से दूसरी बेंच पर उसने अपना बैग पटक दिया।
उधर क्लास में पहले से मौजूद हर लड़के-लड़की के चेहरे का रंग उड़ गया था जबकि आकांक्षा मुस्कुरा रही थी।
"हाय!"
ध्रुव ने आकांक्षा की ओर हाथ हिलाकर कहा।
"हाय!"
आकांक्षा ने भी मुस्कुराते हुए उसका हाय का जवाब दिया और फिर ध्रुव क्लास से बाहर निकल कर मैदान की ओर निकल गया जहाँ उसके कई दोस्त पहले से ही मौजूद थे।
खैर इसके बाद ध्रुव जहाँ भी जाता था लोगों की भीड़ उसे बुदबुदाहट भरे स्वर में बातें करती या आपस में कानाफूसी करती मिल ही जाती थी और उसे इस बात से काफी चिढ़ महसूस होती थी।
"छोड़ो बे इन बातों पर ध्यान मत दे कुछ दिनों में ये लोग सबकुछ भूल जायेंगे!"
प्रेयर के लिए साथ जाते हुए प्रद्युम्न ने उसे समझाने की कोशिश की।
"लेकिन..."
ध्रुव ने दांत पीसकर कुछ कहने की कोशिश की पर सामने से आती हुई इति और उसकी सहेलियों को देखकर चुप हो गया और आगे से उठकर पीछे जय और प्रद्युम्न के पास खड़ा हो गया।
"तुम टेंशन  न लो भाई सब सेट हो जायेगा अच्छा चलो आज खाली पीरियड में तुम्हें अपनी लवस्टोरी सुनाऊँगा।"
देवांश ने कहा और इसके बाद दुखी मन से वो बाकी लोगों से बातें करने लगा।
खैर हर दिन की तरह प्रेयर के बाद आज भी हेडमास्टर उपाध्याय सर ने उन्हें पढ़ाई और इसके महत्व को लेकर लम्बा-चौड़ा लेक्चर दिया।
"क्या बताएं कैसे-कैसे गधे लड़के पढ़ते हैं यहाँ अभी कल शाम को विद्यालय के दो लड़के यहीं परिसर मैं बैठे गुठखा खाकर उद्यान के पौधे पर थूक रहे थे"
उन्होंने हाॅल के बगल लगे कुछ पौधों की एक नर्सरी की ओर इशारा करते हुए कहा।
"और तभी हमने उन्हें देख लिया और उन्हीं से साफ करवाया लेकिन इतने विध्वंसक प्रकृति के बच्चे हैं कि आज सुबह जब मैं आया तो देखा उन्होंने पूरा पौधा ही उखाड़ दिया था।"
हेडमास्टर जी ने यह बात गहरे अफसोस के साथ व्यक्त की जबकि वहां मौजूद सारे टीचर्स और स्टूडेंट्स जोरों से हँसने लगे और ध्रुव ने इति को भी खिलखिला कर हँसते हुए देखा और क्लास चेंज होने के बाद आज पहली बार वो भी खुलकर हँसा था।खासकर कि इसलिए क्योंकि वह घटना उसी के सामने हुई थी जब वो अपने दोस्तों के साथ अरविंद से मिलने हास्टल आया था और वे दो लड़के कोई और नहीं बल्कि देवांश और प्रतीक थे।
इसके बाद न जाने क्यों मगर अब उसका दिल हल्का हो गया था और अब उसे जरा भी फर्क नहीं पड़ता था कि लोग उसके पीठ पीछे क्या कानाफूसी करते थे।
"अरे मुझे तो अब भी समझ में नहीं आता है कि ऐसी प्रवृत्ति रखने वाले बच्चों को इस तरह ऊधम मचाकर मिलता क्या है।स्कूल की बेंचें तोड़ना, उद्यान के फूल और पौधों को नष्ट करना, सीढ़ियाँ पर कूद-फाँद मचाना, स्कूल में टॅायलेट होते हुए भी जनरेटर पर विसर्जन करना और शौचालय की दीवारों पर अभद्र वाक्य लिखना अरे भाई मुझे समझ में नहीं आता इससे इस प्रकार के बच्चों को क्या मजा मिल जाता है।"
हेडमास्टर उपाध्याय जी ने सिर हिलाकर अफसोस व्यक्त करते हुए कहा जबकि ऐसे कामों में उनका खुद का बेटा आकर्षित सबसे आगे रहता था जो इस समय रजत के साथ बैठा मुस्कुरा रहा था।खैर इसी तरह की और भी बातें बताकर हेडमास्टर जी ने उन्हें छोड़ दिया।
"व्ही!अब अच्छा लग रहा है!"
उसने होंठों से व्हिसल बजाते हुए कहा।
"मैंनें कहा था न ज्यादा टेंशन मत पालो।"
जय ने उसका कंधा थपथपाते हुए कहा और फिर दोबारा किसी मैग्जीन का क्रासवर्ड साॅल्व करने लगा।
"तुम मुझे कुछ बताने वाले थे!"
ध्रुव ने आराध्या और प्रद्युम्न पर से नजरें हटाकर देवांश की ओर मुड़ते हुए कहा।
"ओह हाँ!"
देवांश ने खुशी से मुस्कुराते हुए कहा।
"मैं तुम्हें अपनी लव स्टोरी सुनाने वाला था.....
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Chapter-3
एक खूबसूरत लव स्टोरी.....
Writer - Manish Pandey’Rudra'

अधूरे पन्ने@जिंदगी
(अधूरे इश्क़ की पूरी कहानी)
अध्याय-तीन
प्यार गलती और सजा

पंद्रह अगस्त के बाद न जाने क्यों अगले तीन दिनों तक इति स्कूल नहीं आई जबकि ध्रुव रोज स्कूल आता था लेकिन इति के स्कूल न आने की वजह से उसे सब कुछ फीका-फीका सा लगता था।
हालांकि इस बीच उसके दोस्त जय और प्रद्युम्न बाकियों के साथ मिलकर उसे खुश रखने का भरसक प्रयास करते थे बात कुछ बन नहीं रही थी और ध्रुव को लगता था कि वे सभी उसकी भावनाओं को नहीं समझते थे।
खैर इसी बीच उसे देवांश और प्रतीक के बारे में और ज्यादा जानने को मिला और उसे पता चला कि हाईस्कूल की वो लड़की देवांश की गर्लफ्रेंड थी जिससे पंद्रह अगस्त के दिन वो टकराते-टकराते बचा था।उसे यह जान कर और भी जलन होने लगी कि उस लड़की ने खुद देवांश को प्रपोज किया था।हालांकि उसके हिसाब से इसमें कोई शक नहीं था कि देवांश उस लड़की से हमेशा ज्यादा अच्छा दिखता था।
इति के ना दिखाई पड़ने से वो काफी परेशान रहता था पर फिर भी उसे ज्यादा वक्त नहीं मिल पाता था ताकि वो उसे याद कर सके या उसके बारे में ज्यादा सोंच सके क्योंकि इसी बीच उसने विजय सर के पास फिजिक्स और मैथ्स की जबकि विनय सर के पास केमिस्ट्री की कोचिंग ज्वॉइन कर ली थी और अब स्कूल की छुट्टी के बाद लगातार चार बजे से सात बजे तक उसे कोचिंग पढ़ना पड़ता था।खैर उसे इससे कोई दिक्कत नहीं थी क्योंकि जैसा कि उसने सोंचा था दोस्तों के साथ कोचिंग पढ़ने में उसे बहुत मजा आता था खास कर के जब वे दोस्त प्रद्युम्न और जय जैसे हों।प्रद्युम्न तो दोनों टीचर्स की नाक में दम किये रहता था और जब तक कि कोचिंग बंद न हो जाए वो कमेंट करते रहता था।इसी दौरान ध्रुव को पता चल गया कि प्रद्युम्न और उसके बाक़ी दोस्त विजय सर को गोली क्यों कहते थे और वो इसीलिए क्योंकि एक बार जब वे किसी को डांटने लगते थे तो वे इतनी स्पीड में बोलते थे कि सारे बच्चे उनकी पहली और आखिरी लाइन छोड़ के बाकी कुछ समझ ही नहीं पाते थे
इसके बाद अगस्त का आखिरी सप्ताह शुरू हो गया और उस दिन स्कूल में पहुंचने के बाद ध्रुव की खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा जब उसे पता चला कि इति स्कूल आ गई थी।
"ध्रुव!"
बड़े गेट को पार करते ही जय ने उसे पुकारा और ध्रुव अपनी साईकिल पार्किंग में खड़ी करने के बाद जय की ओर बढ़ गया।
"भाई तेरी वाली आज आई है जल्दी चल!"
जय ने उसके कंधे पर हाथ रखकर इतने उत्साह और खुशी से कहा जैसे ध्रुव के बजाए उसकी गर्लफ्रेंड आज कई हफ्तों बाद स्कूल आई हो।बहरहाल इति के स्कूल आने की न्यूज़ पाकर ध्रुव के चेहरे पर जो मुस्कान उभरी वो वाकई देखने लायक थी।और इसीलिए देर न करते हुए वो तेज कदमों के साथ गैलरी के अंदर चला गया।गैलरी से बाहर निकलते ही ध्रुव की नजर इति पर पड़ी जो तीन-चार लड़के-लड़कियों के बीच खड़ी थी और अपने सामने खड़े अदरक जैसी शक्ल वाले एक लड़के जिसका नाम सौरभ था उसीसे बहस कर रही थी जबकि तीन-चार लड़के पास खड़े हुए हँस रहे थे।
खैर इस दृश्य को देखकर उसे ज्यादा कुछ तो समझ में नहीं आया पर सौरभ की अकड़ से भरी और मवालियों जैसी असभ्य भाषा सुनकर इतना जरूर समझ में आ गया कि इति को उससे कुछ प्राब्लम थी और इतना समझते ही लगभग फौरन उसकी मुठ्ठियाँ भिंच गईं जिनसे उसका मन सौरभ का जबडा़ तोड़ने को कर रहा था पर इससे पहले की वो सौरभ पर झपटता जय ने उसे पकड़ लिया और खींचकर अपने क्लास में ले गया।
"ध्रुव भाई मैं ये नहीं कह रहा कि तुम उससे जीत नहीं पाओगे पर कुछ करने से पहले थोड़ा सोंच लो वरना बाद में पछताना पड़ेगा।"
जय ने उसे समझाने की कोशिश की जबकि गुस्से के मारे उसकी सांसे किसी धौंकनी की तरह तेज चल रही थीं।
और हालांकि जय मन ही मन जानता था कि अगर उसने ध्रुव को न रोका होता तो जरूर सौरभ उसकी चटनी बना देता क्योंकि वो हर तरह से ध्रुव से काफी ज्यादा तगड़ा था लेकिन वो ध्रुव से अपनी दोस्ती आगे बनाये रखना चाहता था इसलिए इस बारे में उसने ध्रुव को सच्चाई नहीं बताई।
"भाई सोंचो अगर इति तुम से पूछ लेती कि उनके बीच में बोलने वाले तुम कौन हो तब?"
"और क्या!"
आकर्षित और विराट ने भी जय का ही साथ दिया।
वहीं दूसरी तरफ आकर्षित की बातों ने ध्रुव को सोंचने पर मजबूर कर दिया था और धीरे-धीरे उसका गुस्सा ठंडा हो गया।
और तभी उसने खिड़की के बाहर नजर डाली जहां इति अपनी कुछ सहेलियों के साथ खड़ी थी और फिलहाल वह भी ध्रुव को देख रही थी।ठीक उसी वक्त उसका सारा गुस्सा ठंडा हो गया और अब उसे सौरभ की परवाह बिल्कुल भी नहीं थी।बल्कि अब तो वो बस इति के बारे में सोंचना चाहता था।
सिर्फ उसी के बारे में...
खैर प्रेयर के बाद ध्रुव और जय दोनों ही आज देवांश के पास बैठ गये क्योंकि प्रद्युम्न आज स्कूल नहीं आया था इसलिए दोनों उसे काफी ज्यादा मिस कर रहे थे।
"यार ये इति की फ्रैंड्स आज बार-बार इधर ही क्यों देख रही हैं?"
देवांश ने ध्रुव और जय से सवाल किया जिसके जवाब में दोनों ने कंधे उचका दिये।
"मुझे क्या पता!
उसने गुस्से में जवाब दिया क्योंकि इससे उसे काफी चिढ़ हो रही थी।
हालांकि ध्रुव इति को नहीं देख पा रहा था लेकिन फिर भी वह उसी के बारे में सोंच रहा था।
"यार ये बोरिंग क्लास और कितनी देर चलेगी?"
जय ने द्रव्यमान तुल्यता शब्द को तीसरी बार काट कर सही करते हुए पूछा।
"जल्दी निपट जाये वही अच्छा है!"
आगे बैठे अमित ने कहा जबकि उसके पास बैठे प्रतीक और विनीत पेन-फाइट खेल रहे थे और तभी प्रतीक ने इतनी जोर से पेन मारा कि उसके पेन का कैप उछल कर विजय सर के माथे पे लगा और फौरन उनके मुँह से एक भद्दी गाली निकल गई।
"किस गधे ने मारा है ये?"
उन्होंने हवा में पेन का कैप लहराते हुए पूछा लेकिन सब खामोश रहे।
"अभी खुद बता दो तो कम मार पडे़गा नहीं तो बाद में ज्यादा मार पडे़गा!"
जब किसी ने कोई जवाब नहीं दिया तो उन्होंने कैप का पेन और उसे फेंकने वाले को खोजने की काफी कोशिश की लेकिन उन्हें दोनों में कोई भी नहीं मिला क्योंकि प्रतीक ने पेन अपने मोजे में छुपा लिया था।
इसके बाद लगातार तीन और बोरिंग क्लासेज के बाद जब लंच पीरियड आया तो उन सबके चेहरे पर मुस्कान दोबारा दिखाई पड़ने लगी लेकिन उनकी मुस्कुराहट ज्यादा देर तक नहीं टिक सकी।
अपना लंच खत्म करने के बाद जय और उत्कर्ष के साथ ध्रुव बड़े मैदान की ओर चल पड़ा और बीच-बीच में बार-बार दोनों उत्कर्ष को उनके कंधों पर से हाथ हटाने के लिए कहते रहे क्योंकि उत्कर्ष उनसे एक फुट ऊंचा चश्मिश लड़का था जो दिखने में उनकी तरह ही काफी दुबला-पतला था।
ध्रुव आराम से बैठा हुआ जय और प्रद्युम्न को पेन फाइट खेलते हुए देख रहा था तभी बायोलॉजी की क्लास खत्म करके उसके बाकी दोस्त भी आ गए।
"क्या ध्रुव भाई क्या कर रहे हो?"
अमित ने आकर उससे सवाल किया और उसके कंधे पर हाथ रखकर बैठ गया।
"कुछ नहीं भाई बस ऐसे ही!"
ध्रुव ने यूं ही जवाब दिया तभी उसे आकर्षित और प्रशांत आते हुए दिखाई दिये जो काफी ज्यादा हँस रहे थे।
"इन्हें क्या हुआ?"
ध्रुव ने अमित से सवाल किया।
"मुझे क्या पता?"
बोलकर अमित ने अपने कंधे उचका दिये और दूर प्रगति के साथ बैठी दीप्ति पर से नजरें हटाकर प्रशांत की ओर देखने लगा।लेकिन तबतक वे दोनों भी उसके पास ही आ गए थे।
"आज पता है हम सबके बायोलॉजी के टीचर नहीं आये थे तो राम सर हम लोगों की क्लास लेने आये थे।"
"कौन वो काले टीचर!तो?"
ध्रुव ने हैरान होते हुए पूछा क्योंकि उसे नहीं  मझ में आया था कि इसमें हँसने की क्या बात थी।
"अरे वो आज अपने बारे में पढा़ रहे थे!"
"मतलब?"
ध्रुव ने हँसते हुए प्रशांत और आकर्षित को देखा।
"मतलब आज वो हमें इंडियन कौए के बारे में बता रहे थे।"
प्रशांत के बोलते ही सिर्फ ध्रुव ही नहीं बल्कि अमित और आसपास बैठे बाकी सारे लड़के-लड़कियां भी खिलखिलाकर हँस पड़े।
इति की क्लास के बाहर से गुजरते वक्त उसकी नजर इति पर पड़ी जिसे एक बार फिर तीन-चार लड़कियों ने घेर रखा था जबकि इति के हाथ में कोई धागा लटक रहा था।खैर वो कनखियों से उसे देखते हुए बाहर मैदान में घूमने चला गया और फिर पूरे लंच पीरियड वो बाहर ही रहा जहाँ उसके बाकी सारे दोस्त गेंद धडा़क(एक तरह का गेंद से एक-दूसरे को मारने का खेल) खेल रहे थे।जिसमें उत्कर्ष को सबसे ज्यादा मार पड़ती थी क्योंकि वो सबसे ज्यादा लंबा था और इसीलिए दूसरे लड़के उसपर आसानी से निशाना लगा लेते थे।
इसी तरह कुछ देर तक मौजमस्ती करने के बाद ध्रुव और उसके दोस्त सब अपनी क्लास में आ गए पर आते वक्त ध्रुव को इति नहीं दिखाई पडी़ लेकिन इससे उसे ज्यादा परेशानी नहीं हुई क्योंकि उसे लगा शायद वो ऊपर छत पर गई होगी।और अभी वो अपने बैग से हिंदी की काॅपी निकाल ही रहा था कि तभी गौतम भागते हुए आया और उसने ध्रुव का कंधा पकड़ लिया और जोर-जोर से हाँफने लगा।
खैर दोबारा सामान्य अवस्था में आते ही उसके मुँह से जो शब्द निकले उन्होंने ध्रुव का दिमाग खराब कर दिया।
"भ.... भाई वो त.... तुझे राखी बाँधने वाली है मैंनें खुद सुना वो अपनी सारी सहेलियों से बोल रही थी।"
उसने जल्दी से किसी तरह अपनी बात पूरी की लेकिन ध्रुव को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था।बल्कि सिर्फ उसे ही क्यों किसी को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था।
"अबे तू कहना क्या चाहता है......
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