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आज के जमाने मे दुःखी / पिडीत बुढों की तादाद दिन ब दिन बढ रही है.. ऐसे ही अपनोंने ठुकराये व्यक्तिओं की व्यथाऐं दर्शाती यह रंगोली..
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30/09/2018
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इन्सानों को किस चिज का घमेंड ( गुरूर) है..? निम्न दर्शित बॉलीवुड के वो मशहुर सितारें / अदाकार है.. जिनके खुबसुरति के पुरे विश्व मे चर्चे थे .इस दुनिया से रूखसत होने के पहले उनके चेहरो से स्मार्टनेस गायब थी ........या युं कहीये पुरी की पुरी स्मार्ट
नेस उपरवाले ने छीन ली थी ..
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I श्री गुरुभ्यो नमः I
I वन्दे संस्कृतमातरम् I

जय गजानन.

प्रभू थोर शेगावचा तूच आहे ।।
'अनन्यासी रक्षी' तुझे ब्रीद आहे।
'करुणाकरा' या, ब्रिदा सार्थ व्हावे।।
महाराज माझे जवळी राहावे।।१।।

असे मागणे ते, तुझ्या पायी आता ।
तुझ्याविण कोणी मला नाही त्राता ।।
प्रभो सर्व या, संकटा निरवावे ।
महाराज, माझे जवळी राहावे ।।२।।

प्रभो! जन्मी या मी, किती पाप केले |
तया जाणीवेने, मन हे जळाले ||
आता मात्र देवा, मला सावरावे |
महाराज माझे जवळी राहावे ||३||

अपराध माते! पदरात घ्यावे |
आता बालका या, जवळी करावे ||
तुझ्या 'प्रकृतीला', गडे आवरावे |
महाराज, माझ्या जवळी राहावे ||४||

प्रभातीस अस्पष्टसी जाग यावी |
तुझिया कृपेने, कुडी हि उठावी ||
शुचिर्भूत प्राची 'स्मृती' दान द्यावे |
महाराज, माझ्या जवळी राहावे ||५||

कदा क्रोध, दोषा, मना ना शिवावे |
शुचिर्भूत आचार वृत्तीत यावे ||
तै शुद्ध बुद्धी मला दान द्यावे |
महाराज, माझ्या जवळी राहावे ||६||

आम्हा अन्न देतो, तया आधी देणे |
तयावीण आम्ही, कदा नाही खाणे ||
इये वृत्तिने 'शक्ती' दानास द्यावे |
महाराज माझे जवळी राहावे ||७||

नीतीयुक्त सात्विक, लक्ष्मि मिळावी ।
प्रपंचात सत्कर्मी, ती वापरावी ।।
अशा दृष्टीने, 'लक्ष्मि' दानास द्यावे ।
महाराज माझ्या जवळी राहावे ।।

सुखे झोपता, जाण काढोनी घ््यावी ।
बरे, वाईटाची स्मृती ना रहावी ।।
कृपाळूपणे 'शांती' दानास द्यावे ।
महाराज, माझे जवळी राहावे ।। ९ ।।

प्रपंचात कर्मे, असता करीत ।
तयामाजी राहो, सदा सावचित ।।
अनैतिक कृत्ये, कदा ना घडावे ।
महाराज, माझे जवळी राहावे ।।१०।।

भवामाजी कर्मे, नियमित व्हावी ।
कुटुंबा, मुलांची, प्रिती सार्थ व्हावी ।।
व्यवहारी चित्ते, असक्तेन रहावे ।
महाराज, माझे जवळी रहावे ।।११।।

नको काम, क्रोध, नको दुष्ट बुद्धी ।
सुविचार, शांत, समाधान वृद्धी ।
असे भाव माझ्या, मनी नित्य यावे ।
महाराज, माझ्या जवळी रहावे ।।१२।।

प्रती मासी वा वर्षी हा योग यावा ।
तुझ्या मंदिरी दर्शना लाभ व्हावा ।।
अखंडीत वारी, मला गंुतवावे ।
महाराज, माझे जवळी राहावे ।।१३।।

धन, मान, कीर्ती, प्रपंची मिळाले ।
कधी दुःख, भोग, पदरांत आले ।।
इये दोन्ही काळी, समत्वे वरावे ।
महाराज, माझे जवळी राहावे ।।१४।।

तुम्हा वर्णिता, वर्णिता, मी रमावे ।
समस्तांचिया अंतरी एक व्हावे ।।
माझे, तुझे तई, अभिन्नत्व व्हावे ।
महाराज, माझे जवळी राहावे ।।१५।।

तुझ्या चिंतनी चित्त एकत्र व्हावे ।
तुझ्या दर्शने, नेत्र त्रूप्तीत व्हावे ।।
तुला पाहता पाहता, भान जावे ।
महाराज, माझे जवळी राहावे ।।१६।।

तुझी मूर्त दृष्टी समोरी असावी ।
प्रभो! माझी देहस्थिती विसरावी ।।
तुझेवीण आता, कुणी ना दिसावे ।
महाराज, माझे जवळी राहावे ।।१७।।

यमुना जलाने, शुचि स्नान व्हावे ।
मुखी शुद्ध गंगोदके बा पडावे ।।
ओठांत तुलसी, दलाने राहावे ।
महाराज, माझे जवळी राहावे ।।१८।।

त्रिगुणात्मके, भाव वृत्ती नसावा ।
प्रसादे तुझ्या, भोग माझा सरावा ।।
पुढे जन्म-मृत्यु कदाना मिळावे ।
महाराज, माझे जवळी राहावे ।।१९।।

दिला मोक्ष तू, भास्करा बा जसा रे ।
दिला मोक्ष तू, भक्त बाळा जसा रे ।।
मलाही प्रभो, त्या स्थळा पोचवावे ।
महाराज, माझे जवळी राहावे ।।२०।।

क्षणी शांत ऐशा, प्रभो प्राण जावा ।
जिवा आसरा त्या शिवाचा मिळावा ।।
मिसळून ज्योतीस तेजात घ्यावे ।
महाराज, माझे जवळी राहावे ।।२१।।
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विवेकानन्दजी के संग में

स्थान - दक्षिणेश्वर काली मन्दिर और आलमबाजार मठ

वर्ष - 1897 ( मार्च )

विषय - दक्षिणेश्वर में श्रीरामकृष्ण का अन्तिम जन्मोत्सव - धर्मराज्य में उत्सव तथा पर्व की आवश्यकता - अधिकारियों के भेदानुसार सब प्रकार के लोकव्यवहारों की आवश्यकता - किसी भी नवीन सम्प्रदाय का गठन न करना ही स्वामीजी के धर्मप्रचार का उदेश्य।

* * *

स्वामीजी जब प्रथम बार इंग्लैंड से लौटे तब आलमबाजार में रामकृष्ण मठ था । जिस भवन में मठ था उसे लोग 'भूतभवन' कहते थे - परन्तु वहाँ संन्यासियों के सत्संग से यह भूतभवन रामकृष्ण तीर्थ में परिणत हो गया था । वहाँ के साधन-भजन, जप, तपस्या, शास्त्र-प्रसंग और नामकीर्तन का क्या ठिकाना था ! कलकत्ते में राजाओं के समान सम्मान प्राप्त होने पर भी स्वामीजी उस टूटे-फूटे मठ में ही रहने लगे । कलकत्तानिवासियो ने उन पर श्रद्धान्वित होकर कलकत्ते की उत्तर दिशा काशीपुर में गोपाललाल शील के बाग में एक स्थान एक मास के लिए निर्धारित किया था । वहाँ भी स्वामीजी कभी-कभी रहकर दर्शनोत्सुक लोगों से धर्मचर्चा करके उनके मन की इच्छा पूर्ण करने लगे ।
श्रीरामकृष्ण का जन्मोत्सव अब निकट है । इस वर्ष दक्षिनेश्वर, रानी रासमणि के काली मन्दिर में उत्सव के लिए काफी जोरों से तैयारी हुई है । प्रत्येक धर्मपिपासु मनुष्य के आनन्द और उत्साह की कोई सीमा नहीं है; रामकृष्ण-सेवकों का तो कहना ही क्या है । इसका विषेश कारण यही है कि विश्वविजयी स्वामीजी श्रीरामकृष्ण की भविष्यवाणी को सफल करके इस वर्ष विलायत से लौट आये हैं । उनके सब गुरूभाई आज उनसे मिलकर श्रीरामकृष्ण के सत्संग का आनन्द अनुभव कर रहे हैं । माँ काली के मन्दिर के दक्षिण दिशा में प्रसाद बन रहा है । स्वामीजी कुछ गुरूभाईयों को अपने साथ लेकर नौ-दस बजे लगभग आ पहुँचे । उनके पैर नंगे थे और सिर पर गेरूए रंग की पगड़ी थी । उनकी आनन्दित मूर्ति का दर्शन कर चरणकमलों का स्पर्श करने और उनके श्रीमुख से जाज्वल्य अग्निशिखा के सदृश कथाओं को सुनकर कृतार्थ होने के लिए लोग चारों ओर से आने लगे । इसी कारण आज स्वामीजी के विश्राम के लिए तनिक भी अवसर नहीं है । माँ काली के मन्दिर के सामने हजारों लोग एकत्रित हैं । स्वामीजी ने भूभिष्ठ होकर माँ काली जगन्माता को प्रणाम किया और उनके साथ ही साथ सहस्त्रों और लोगों ने भी उसी तरह वन्दना की । तत्पश्चात् श्रीराधाकान्त जी की मूर्ति को प्रणाम करके श्रीरामकृष्ण के वासगृह में पधारे । यहाँ ऐसी भीड़ हुई थी कि तिल भर भी स्थान शेष न रहा । काली मन्दिर की चारों दिशाएँ 'जय रामकृष्ण' से गूँज उठीं । होरमिलर ( Hoarmiller ) कम्पनी का जहाज लाखों दर्शकों को अपनी गोद में बिठाकर बराबर कलकत्ते से ला रहा है । नौबत आदि के मधुर स्वर पर सुरधुनी गंगा नृत्य कर रहीं हैं । मानो उत्साह, आकाक्षा, धर्मपिपासा और अनुराग साक्षात देहधारण कर श्रीरामकृष्ण के पार्षदों के रूप में चारों ओर विराजमान है । इस वर्ष के उत्सव का अनुमान ही किया जा सकता है । भाषा में इतनी शक्ति कहाँ कि उसका वर्णन किया जा सके।
स्वामीजी के साथ आयी हुई दो अंग्रेज महिलाएँ उत्सव में उपस्थित हैं । उनसे शिष्य अभी तक परिचित न था । स्वामीजी उनको साथ लेकर पवित्र पंचवटी और विल्ववृक्ष को दिखला रहे थे । स्वामीजी से शिष्य का विशेष परिचय न होने पर भी उनके पीछे-पीछे जाकर उत्सवविषयक स्वरचित एक संस्कृत स्तोत्र उनके हाथ में दिया । स्वामीजी भी उसे पढ़ते हुए पंचवटी की ओर चले । चलते-चलते शिष्य की ओर देखकर बोले, "अच्छा लिखा है, तुम और भी लिखना ।"
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9/12/18
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🚩🌞शुभ सकाळ 🌞🚩
👏☀प्रात: कर-दर्शनम☀

कराग्रे वसते लक्ष्मी करमध्ये सरस्वती।
करमूले तू गोविन्दः प्रभाते करदर्शनम॥

🌎पृथ्वी क्षमा प्रार्थना🌎

समुद्र वसने देवी पर्वत स्तन मंडिते।
विष्णु पत्नी नमस्तुभ्यं पाद स्पर्शं क्षमश्वमेव॥

🌎त्रिदेवों के साथ नवग्रह स्मरण🌏

ब्रह्मा मुरारिस्त्रिपुरान्तकारी भानु: शशी भूमिसुतो बुधश्च।
गुरुश्च शुक्र: शनिराहुकेतव: कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम्॥

💦स्नान मन्त्र💦

गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती।
नर्मदे सिन्धु कावेरी जले अस्मिन् सन्निधिम् कुरु॥

🌞सूर्यनमस्कार🌞

ॐ सूर्य आत्मा जगतस्तस्युषश्च
आदित्यस्य नमस्कारं ये कुर्वन्ति दिने दिने।
दीर्घमायुर्बलं वीर्यं व्याधि शोक विनाशनम्
सूर्य पादोदकं तीर्थ जठरे धारयाम्यहम्॥

ॐ मित्राय नम:
ॐ रवये नम:
ॐ सूर्याय नम:
ॐ भानवे नम:
ॐ खगाय नम:
ॐ पूष्णे नम:
ॐ हिरण्यगर्भाय नम:
ॐ मरीचये नम:
ॐ आदित्याय नम:
ॐ सवित्रे नम:
ॐ अर्काय नम:
ॐ भास्कराय नम:
ॐ श्री सवितृ सूर्यनारायणाय नम:

आदिदेव नमस्तुभ्यं प्रसीदमम् भास्कर।
दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोऽस्तु ते॥

♨दीप दर्शन♨

शुभं करोति कल्याणम् आरोग्यम् धनसंपदा।
शत्रुबुद्धिविनाशाय दीपकाय नमोऽस्तु ते॥

दीपो ज्योति परं ब्रह्म दीपो ज्योतिर्जनार्दनः।
दीपो हरतु मे पापं संध्यादीप नमोऽस्तु ते॥

🐘गणपति स्तोत्र

गणपति: विघ्नराजो लम्बतुन्ड़ो गजानन:।
द्वै मातुरश्च हेरम्ब एकदंतो गणाधिप:॥
विनायक: चारूकर्ण: पशुपालो भवात्मज:।
द्वादश एतानि नामानि प्रात: उत्थाय य: पठेत्॥
विश्वम तस्य भवेद् वश्यम् न च विघ्नम् भवेत् क्वचित्।

विघ्नेश्वराय वरदाय शुभप्रियाय।
लम्बोदराय विकटाय गजाननाय॥
नागाननाय श्रुतियज्ञविभूषिताय।
गौरीसुताय गणनाथ नमो नमस्ते॥

शुक्लाम्बरधरं देवं शशिवर्णं चतुर्भुजं।
प्रसन्नवदनं ध्यायेतसर्वविघ्नोपशान्तये॥

🐯आदिशक्ति वंदना🐯

सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥

🌙शिव स्तुति🌙

कर्पूर गौरम करुणावतारं,
संसार सारं भुजगेन्द्र हारं।
सदा वसंतं हृदयार विन्दे,
भवं भवानी सहितं नमामि॥

⛳विष्णु स्तुति⛳

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्ण शुभाङ्गम्।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यम्
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥

🐝श्री कृष्ण स्तुति🐝

कस्तुरी तिलकम ललाटपटले, वक्षस्थले कौस्तुभम।
नासाग्रे वरमौक्तिकम करतले, वेणु करे कंकणम॥
सर्वांगे हरिचन्दनम सुललितम, कंठे च मुक्तावलि।
गोपस्त्री परिवेश्तिथो विजयते, गोपाल चूडामणी॥

मूकं करोति वाचालं पंगुं लंघयते गिरिम्‌।
यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्द माधवम्‌॥

🌷श्रीराम वंदना🌷

लोकाभिरामं रणरंगधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम्।
कारुण्यरूपं करुणाकरं तं श्रीरामचन्द्रं शरणं प्रपद्ये॥

💫श्रीरामाष्टक💫

हे रामा पुरुषोत्तमा नरहरे नारायणा केशवा।
गोविन्दा गरुड़ध्वजा गुणनिधे दामोदरा माधवा॥
हे कृष्ण कमलापते यदुपते सीतापते श्रीपते।
बैकुण्ठाधिपते चराचरपते लक्ष्मीपते पाहिमाम्॥

👏एक श्लोकी रामायण👏

आदौ रामतपोवनादि गमनं हत्वा मृगं कांचनम्।
वैदेही हरणं जटायु मरणं सुग्रीवसम्भाषणम्॥
बालीनिर्दलनं समुद्रतरणं लंकापुरीदाहनम्।
पश्चाद्रावण कुम्भकर्णहननं एतद्घि श्री रामायणम्॥

🌿सरस्वती वंदना🌿

या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता।
या वींणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपदमासना॥
या ब्रह्माच्युतशङ्करप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता।
सा माम पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्याऽपहा॥

🙏🏽हनुमान वंदना🙏🏽

अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहम्‌।
दनुजवनकृषानुम् ज्ञानिनांग्रगणयम्‌।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशम्‌।
वातजातं नमामि॥

मनोजवं मारुततुल्यवेगम जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठं।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणम् प्रपद्ये॥

🌻स्वस्ति-वाचन🌻

ॐ स्वस्ति न इंद्रो वृद्धश्रवाः
स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्ट्टनेमिः
स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥

🌺शांति पाठ🌺

ऊँ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्‌ पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥

ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्ष (गुँ) शान्ति:,
पृथिवी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:।
वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति:,
सर्व (गुँ) शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति:, सा मा शान्तिरेधि॥

॥ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:॥
🙏🚩🔔🚩🙏
✋

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आज तक हम आध्यात्मिक ज्ञान से दूर रहें हमे सत भक्ती तक पता नहीं है ,अगर आप सच आद्यात्मिक ज्ञान जानना चाहते हैं तो जरूर देखें ,
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