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Ek baar jarur dekhe live

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अंडमान_निकोबार भारत का हिस्सा बना ----
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जबकि वो मलेशिया, थाईलैंड, इंडोनेशिया, और म्यांमार के ज्यादा नज़दीक है। वैसे तो हिन्दुस्तान 1947 में आज़ाद हुआ, लेकिन उसका एक क्षेत्र ऐसा भी है जो उस से भी पहले स्वतंत्र हो गया था। और वो भी एक ऐसी खूबसूरत जगह जो आज देश की सबसे बड़ी #टूरिस्ट डेस्टिनेशनस में से एक है। हम बात कर रहे हैं अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह की।
लेकिन क्या आपने कभी सोचा कि कई दूसरे देशों के नज़दीक होते हुए भी अंडमान निकोबार भारत का ही हिसा क्यों बना? जैसे ये काफी कम लोग जानते हैं कि अंडमान और निकोबार बाकी सारे देश से पहले स्वतंत्र हो गया था, वैसे ही इस द्वीपसमूह के भारत के हिस्सा बनने का कारण भी सबको पता नहीं है|
अंग्रेजों के चंगुल से छूटने वाला पहला भारत का पहला टुकड़ा था अंडमान और निकोबार, और श्रेय जाता है #नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को।
भारत की आज़ाद होने वाली सबसे पहली ज़मीन थी अंडमान-निकोबार। और ऐसा मुमकिन हो पाया था नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के जज्बे की वजह से। द्वितीय विश्व युद्ध के शुरू होते ही नेताजी जर्मनी से सिंगापुर आये। और उसके बाद उन्होंने भारतीयों से ये वादा किया कि सन 1943 आते आते वे अपनी धरती पर अपना झंडा जरूर फहराएंगे।
और इसी दौरान अंडमान पर जापानी नवल फ़ोर्स का कब्ज़ा हो गया था। क्योंकि ब्रिटिशों ने बिना लड़े ही मैदान छोड़ दिया था। सभी राजनीतिक कैदियों को कालापानी जेल से निकाला गया और ब्रिटिश अफसरों और सैनिकों को बंदी बनाकर बर्मा भेज दिया गया।
और इसके बाद #आज़ाद_हिन्द_फौज जापानी सेना को इस बात पर मनाने में कामयाब रही कि वो अंडमान और निकोबार को आज़ाद हिन्द सरकार को सौंप दे। 1943 में नेताजी पोर्ट ब्लेयर में उतरे और वहां जापानी मिलिट्री कमांडर से मिले। और फिर नेताजी ने भारतीयों से किया वादा निभाया और 30 दिसम्बर 1943 को अंडमान और निकोबार में तिरंगा फहराया गया।
जगत-प्रसिद्द #सेलुलर_जेल या #कालापानी की जेल अंडमान और निकोबार में ही थी। और ब्रिटिश अपने कैदियों को इसी जेल में सजा देकर भेजा करते थे। और हमारे सबसे बड़े क्रान्तिकारियों और स्वतंत्रता सेनानियों को भी इसी जेल में भेजा गया था।
यहाँ भेजे गये भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों में प्रमुख नाम थे विनायक दामोदर सावरकर, योगेन्द्र शुक्ल, बटुकेश्वर दत्त, मौलवी लियाकत अली, नन्द गोपाल, भाई परमानन्द, और वामन राव जोशी आदि।
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एक और भिंडरावाले तैयार करने का खतरनाक कांग्रेसी खेल शुरू हो चुका है।
इसी वर्ष सितम्बर में एक वीडियो वाइरल हुआ था। उस वीडियो में पाकिस्तानी आतंकवादी गोपाल सिंह चावला एक हाथ में AK-47 राइफल तथा दूसरे हाथ में पाकिस्तानी झंडा थाम कर हिन्दूस्तान का नामोनिशान मिटा देने की धमकी दे रहा था। उसी गोपाल सिंह चावला को इमरान खान ने कल करतारपुर में हुए सरकारी समारोह में राजकीय अतिथि का दर्जा देकर पहली पंक्ति में बैठाया था।
लेकिन नवजोत सिंह सिद्धू को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ा था। कल उसी समारोह में इमरान खान और पाकिस्तानी आर्मी चीफ बाज़वा की मुक्त कंठ से चरण वंदना के साथ ही साथ नवजोत सिंह सिद्धू ने उस गोपाल सिंह चावला से लाहौर के गवर्नर हाऊस में लम्बी मुलाकात की फिर कमरे से बाहर आकर उसके साथ शान से फोटो भी खिंचवाई। गोपाल सिंह चावला ने भी सिद्धू को अपना भाई बताया। पाकिस्तानी आर्मी चीफ बाज़वा का खुला समर्थन/आशीर्वाद सिद्धू पहले ही ले चुका है।
ध्यान रहे कि 1980 में भी आतंकवादी जरनैल सिंह भिंडरावाले को भी तत्कालीन पाकिस्तानी राष्ट्रपति/आर्मी चीफ जियाउल हक ने खुलकर समर्थन और सहयोग दिया था।
सिद्धू के इस देशघाती कुकर्म के ख़िलाफ़ केवल पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह की चीखें देश सुन रहा है लेकिन नवजोत सिंह सिद्धू के इस देशघाती देशद्रोही कुकर्म पर राहुल गांधी/सोनिया गांधी की जोड़ी शातिर मौन साधे है। ऐसे मौन को ही मौन समर्थन कहा जाता है।
यह परिस्थितियां संकेत रही हैं कि... कांग्रेस ने एकबार फिर अपने उस खतरनाक खेल की शुरुआत कर दी है जो खतरनाक खेल उसने आज से लगभग 38 बरस पहले खेला था और उसके उस खेल की आग में डेढ़ दशक तक देश और पंजाब बुरी तरह जला था। खुद इंदिरा गांधी भी उसी आग में जलकर खत्म हुईं थीं।
कुलदीप नैयर सरीखे परम चरम सेक्युलर और कट्टर भाजपा विरोधी नामी गिरामी पत्रकार रहे कुलदीप नैयर की किताब पढ़िए या दशकों तक भारत में BBC के ब्यूरो चीफ रहे मार्क टुली/सतीश जैकब की किताब पढ़िये या फिर खुशवंत सिंह समेत दर्जन भर और पत्रकारों की किताबें पढ़िए। 80 व 90 के दशक में लिखी इन किताबों में बहुत साफ शब्दों में बहुत विस्तार से वह पूरा घटनाक्रम लिखा गया है कि कांग्रेस हाईकमान ने किस तरह कुख्यात आतंकवादी जरनैल सिंह भिंडरावाले को पैदा किया, पाला पोसा और बढ़ाया था। इन किताबों में इसके 2 मुख्य कारण बताए गए हैं। पहला यह कि पंजाब में तेज़ी से लोकप्रिय एवं राजनीतिक रूप से सशक्त हो रहे अपनी ही सरकार के तत्कालीन मुख्यमंत्री दरबारा सिंह के लिए मुसीबतें खड़ी कर के उन्हें कमजोर करना था। दूसरा कारण अपने राजनीतिक विरोधी अकाली दल का प्रतिद्वंदी खड़ा करना था। कांग्रेसी आस्तीन में पले उस सांप ने देश के साथ ही साथ इंदिरा गांधी को भी डसा था।
आज भी परिस्थितियां कुछ उसी मोड़ पर खड़ी हैं। पंजाब में तेज़ी से लोकप्रिय हो रहे मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह की स्वाभिमानी भावभंगिमाएं राजनीतिक गुलाम पालने की लती मां-बेटे की जोड़ी को रास नहीं आ रही। अकाली-भाजपा का खात्मा तो इस जोड़ी का मुख्य उद्देश्य है ही।
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दुखद....1971 में पाकिस्तान को धूल चटाने वाले ब्रिगेडियर कुलदीप सिंह चाँदपुरि हमारे बीच नही रहे....फ़िल्म बॉर्डर में सनी देवल ने उनका किरदार निभाया था..
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महान गुरु गोबिंद सिंह जी 
उनके महान पिता तेगबहादुर सिंह जी, महान माता गुजरी देवी जी व उनके महान अमर शहीद बेटे अजित सिंह, झुजार सिंह, बाबा जोरावर सिंह व बाबा फतह सिंह
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सिक्खों के दसवे गुरु गोबिंद सिंह जी (Guru Gobind Singh) एक महान योद्धा, कवि और विचारक थे। गोबिंद सिंह ने 1699 में खालसा पन्थ के स्थापना की थी। उन्होंने मुगल बादशाह के साथ कई युद्ध किये और  ज्यादातर में में विजय हासिल की। उनके पिता सिक्ख धर्म के नौवे गुरु तेगबहादुर और माता गुजरी देवी थी। उन्होंने 1699 को बैसाखी वाले दिन आनन्दपुर साहिब में एक बड़ी सभा का आयोजन कर खालसा पंथ की स्थापना की थी। त्याग की भावना से पूर्ण वह संस्कृत, फारसी, पंजाबी और अरबी भाषा के जानकार थे। वे कवि भी थे, जिन्होंने पंजाबी भाषा में तो सिर्फ एक रचना “चंडी दीवार ” लिखी व शेष कई रचनाये उन्होंने हिन्दी भाषा में रची। उनकी महत्वपूर्ण रचनाये जफरनामा और विचित्र नाटक है। इन्होने जीवन में अनेक लड़ाईया लड़ी, इनमे भंगानी का युद्ध, चमकौर, मुक्तसर का युद्ध और आनन्द साहिब का युद्ध प्रसिद्ध है। चमकौर युद्ध में गुरूजी के 40 सिखों की फ़ौज ने मुगल शाही सेना के दस लाख सैनिको से दिलेरी के साथ टक्कर ली थी। इसमें दोनों बड़े पुत्र अजीत सिंह और झुजार सिंह शहीद हो गये थे। बाद में मौका मिलने पर दुश्मनों ने उनके दो और पुत्रो बाबा जोरावर सिंह व बाबा फ़तह सिंह को भी दीवार में जिन्दा चुनवा दिया था। इसी सदमे व दुःख के दौरान माता गुजरी देवी का भी देहांत हो गया।

नौ वर्ष की उम्र में सम्भाली गद्दी
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श्री गुरु गोबिंद सिंह जी (Guru Gobind Singh) का जन्म 22 दिसम्बर 666 ईस्वी में पटना साहिब में श्री तेगबहादुर जी जे घर माता गुजरी जी की कोख से हुआ। श्री तेगबहादुर जी उस समय सिखी के प्रचार के लिए देश का भ्रमण कर रहे थे। उन्होंने अपने परिवार को पटना साहिब में ठहराया तथा स्वयं असम की ओर चले गये। गुरु जी जब बांग्लादेश पहुचे तो तो उनको गुरु गोबिंद सिंह जी जन्म की सुचना मिली। श्री गुरु गोबिंद सिंह जी की कम उम्र ही थी जब श्री तेगबहादुर जी ने श्री आनन्दपुर साहिब आकर परिवार को बुला लिया।

जिस समय उनका जन्म हुआ तब यहा मुगल बादशाह औरंगजेब का शासन था। उसकी शाही सेना भारतीय जनता पर बहुत जुल्म किया करती थी और उसने देश भर में अपने सभी गर्वनरो को आदेश जारी कर दिया कि हिन्दुओ के मन्दिर गिरा दे। कश्मीर का गर्वनर इफ्तिखार खान था जिसने बादशाह के आदेशो को लागू करने की ठान ली। कश्मीर में मन्दिर गिरने लगे और हिन्दुओ को मुसलमान बनाया जाने लगा।

ऐसी नाजुक स्थिति में जब कश्मीरी पंडितो के एक दल ने इनके पिता गुरु तेग बहादुर से सहायता की याचना की तो पुत्र गोबिंद ने पिता से कहा “पिताजी धर्म की रक्षा के लिए आपसे बड़ा महापुरुष कौन हो सकता है ”। इस तरह हिंदुस्तान में हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए श्री गोविन्द सिंह जी ने बाल उम्र में ही अपने पिताजी को दिल्ली की तरफ चलाया। औरंगजेब के आदेश पर श्री तेगबहादुर जी को शहीद कर दिया गया।

गुरु जी की शहीदी उपरान्त श्री गुरु गोविन्द सिंह जी (Guru Gobind Singh) ने अपने सभी सिखों को शस्त्रधारण करने तथा बढिया घोड़े रखने के लिए उसी तरह आदेश जारी कर दिया , जिस तरह श्री अर्जुन देव जी की शहीदी के बाद श्री गुरु हरगोविन्द साहिब जी ने किया था। पिता गुरु तेगबहादुर की शहादत के बाद गोबिंद राय को नौ वर्ष की आयु में 11 नवम्बर 1675 को विधिवत रूप से गद्दी पर बैठाया गया। इसके बाद सबसे पहले गोबिंद राय ने अपने नाम के साथ सिंह जोड़ा और समस्त सिखों को अपने नाम के साथ सिंह जोड़ने को कहा।

खालसा पन्थ की स्थापना
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गुरु गोबिंद सिंह (Guru Gobind Singh) द्वारा 1699 में खालसा पन्थ की स्थापना की गयी। खालसा शब्द शुद्धता का पर्याय है अर्थात जो मन ,वचन और कर्म से शुद्द हो और समाज के प्रति समपर्ण का भाव रखता हो, वही खालसा पन्थ को स्वीकार कर सकता है। उन्होंने पंज प्यारे की नई बात कही। पंज प्यारे देश के विभिन्न भागो से आये समाज के अलग अलग जाति और सम्प्रदाय के पांच बहादुर लोग थे जिन्हें एक हे कटोरे से प्रसाद पिलाकर सिखों के बीच समानता और आत्मसम्मान की भावना को जागृत किया और उन्हें एकता के सूत्र में बाधने की कोशिश की। उन्होंने कहा “मनुष्य की जाति सभी एक है “।

श्री आनन्दपुर साहिब में रहते हुए पहाडी राजाओ ने गुरूजी से लड़ाई जारी रखी पर जीत हमेशा गुरूजी की होती रही। 1704 ईस्वी में जब गुरूजी ने श्री आनन्दपुर साहिब का किला छोड़ दिया जिस कारण गुरूजी का सारा परिवार बिछड़ गया। चमकौर साहिब की एक कच्ची गली में गुरूजी ने अपने 40 सिंहो सहित 10 लाख मुगल सेना का सामना किया। यहा गुरूजी के दो बड़े साहिबजादे बाबा अजीत सिंह तथा बाबा झुजार सिंह शहीद हुए।

गुरुजी के छोटे साहिबजादो बाबा जोरावर सिंह तथा बाबा फतेह सिंह सिंह जी को सरहिंद के वजीर खान के आदेश से जिन्दा ही दीवारों में चुनवा दिया बाद में बाबा चंदा सिंह ने नांदेड से पंजाब आकर साहिबजादो की शहीदी का बदला लिया। गुरूजी ने साबो की तलवंडी में श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी का पुन: सम्पादन किया तथा अपने पिता श्री तेग बहादुर जी की वाणी को अलग अलग रागों में दर्ज किया।

गुरु गोबिंद सिंह के अंतिम दिन
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1707 ईस्वी में करीब गोबिंद सिंह (Guru Gobind Singh) महाराष्ट्र के नांदेड चले गये जहा उन्होंने माधो दास वैरागी को अमृत संचार कर बाबा बन्दा सिंह बहादुर बनाया तथा जुल्म का सामना करने के लिए पंजाब की तरफ भेजा। नांदेड में 2 विश्वासघाती पठानों ने गुरूजी पर छुरे से वार कर दिया। गुरूजी ने अपनी तलवार से एक पठान को तो मौके पर ही मार दिया जबकि दूसरा सिखों के हाथो मारा गया। गोबिंद सिंह जी (Guru Gobind Singh) के जख्म काफी गहरे थे तथा 7 अक्टूबर 1708 ईस्वी को ज्योत ज्योत समा गये तथा श्री गुरु ग्रन्थ साहिब की को गुरुगद्दी दे गये।

मर्यादित आचरण की दी सीख
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गुरूजी की प्रतिभा, साहस से औरंगजेब तथा अन्य सूबेदार सदैव आतंकित रहते थे। मौका पाकर गुरु गोबिंद सिंह को सरहिंद के नवाब वजीरशाह ने धिखे से मरवा डाला। महज 41 वर्ष की उम्र में जब उन्हें अनुमान हो गया था कि उनका अंतिम समय आ गया है तो उन्होंने सिख संगत को बुलाया और साथ में गुरु ग्रन्थ साहिब (सिक्खों की धार्मिक पुस्तक) लाने को कहा। फिर खालसा पन्थ के लोगो को सदा मर्यादित आचरण करने ,देशप्रेम करने और दीं दुखियो की सहायता करने की सीख दी। उन्होंने कहा “संतो  मेरे बाद अब कोई भी जीवित व्यक्ति इस गुरु की गद्दी पर विराजमान नही होगा , इस गुरु गद्दी पर गुरु गन्थ साहिब विराजमान रहेंगे , अब आप लोग उन्ही से अपना मार्गदर्शन करना और उन्ही से आदेश प्राप्त करना ”

उदार हृदय के व्यक्ति
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शक्ति सम्पन्न व्यक्ति आमतौर पर अभिमानी हो जाता है लेकिन गुरु गोबिंद सिंह जी (Guru Gobind Singh) वीर होने के साथ ही उदार हृदय के व्यक्ति थे। सहृदयता इनमे बचपन से ही मौजूद था। इनके बचपन की एक रोचक घटना है जो गुरु गोविन्द सिंह की उदारता और दया को प्रदर्शित करता है। एक निसंतान बुढी औरत थी। बालक गोबिंद हर दिन बुढी औरत की सूत कातने के लिए रखी पुनिया बिखेर देते थे। इससे दुखी होकर वह गोबिंद सिंह जी की माता गुजरी के पास शिकायत लेकर पहुच जाती। माता गुजरी पैसे देकर उसे खुश कर देती। माता गुजरी ने गोबिंद सिंह से पूछा “तुम बुढी स्त्री को परेशान क्यों करते हो ?” जवाब में गोबिंद सिंह जी ने कहा उसकी गरीबी दूर करने के लिए अगर मै उसे परेशान नही करूंगा तो तुम उसे पैसे कैसे दोगी ”। गोबिंद सिंह जी की यही उदारता बड़े होने पर भी बनी रही। मुगलों से युद्ध के दौरान इन्हें अपनी सन्तान को खोना पड़ा। इसके बावजूद भी अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर को दिल्ली के तख्त पर बैठाने में इन्होने सहायता की।

जन्मस्थान पर बना गुरुद्वारा
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बचपन से ही बालक गोबिंद राय अन्य सभी बालको से अलग स्वभाव के थे। वे धनुष बाण , कृपाण, कटार, भाला, तलवार आदि हथियारों को खिलौना समझते थे और कम उम्र में ही उन्होंने इसे चलाने में दक्षता प्राप्त कर ली थी। वे जिस हवेली में रहते थे इसमें एक कुंवा था। इस पर आसपास की औरते पानी भरने के लिए घड़े लेकर आती थी। बालक गोबिंद ने उन्हें तंग करने में बहुत मजा आता था। वे अक्सर उनके घड़े फोड़ दिया करते थे।

गुरु गोबिंद सिंह के बचपन का शुरुवाती हिस्सा इनके ननिहाल पटना में गुजरा। पटना में उनके जन्म स्थान पर गुरुद्वारा का निर्माण किया गया है। यह तख्त श्री हरमिंदर साहिब ,पटना साहिब के नाम से मशहूर है सिक्खों के दसवे गुरु के जन्म स्थान के दर्शन करने के लिए पुरी देश दुनिया से श्रुधालू यहा आते है। इस गुरुद्वारा का निर्माण सिख राजवंश के पहले महाराजा रणजीत सिंह ने करवाया था। पहली बार इसका निर्माण 18वी शताब्दी में किया गया था।

शत-शत नमन करूँ मैं आप सभी को .......
.................. विजेता मलिक

via MyNt
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क्या आप जानते हैं विश्व की सबसे मंहंगी ज़मीन सरहिंद, जिला फतेहगढ़ साहब (पंजाब) में है, जो मात्र 4 स्क्वेयर मीटर है।*

क्यों हुई ये छोटी सी ज़मीन सबसे महंगी? जरूर जानिये - रोंगटे खड़े कर देनें वाली ऐतिहासिक घटना।

यहां पर श्री गुरु गोविंद सिंह जी क दोे छोटे साहिबजादों का अंतिम संस्कार किया गया था।

सेठ दीवान टोडर मल ने यह ज़मीन 78000 सोने की मोहरें (सिक्के) दे कर मुस्लिम बादशाह से खरीदी थी। सोने की कीमत के मुताबिक इस 4 स्कवेयर मीटर जमीन की कीमत 2500000000 (दो अरब पचास करोड़)💰💰💰 बनती है।

दुनिया की सबसे मंहंगी जगह खरीदने का रिकॉर्ड विश्व मे कहीं नहीं है ! आजतक दुनिया के इतिहास में इतनी मंहंगी जगह कहीं नही खरीदी गयी।

और....दुनिया के इतिहास में ऐसा युद्ध ना कभी किसी ने पढ़ा होगा ना ही सोचा होगा, जिसमे 10 लाख की फ़ौज का सामना महज 42 लोगों के साथ हुआ था और जीत किसकी होती है..??
उन 42 सूरमो की !

यह युद्ध 'चमकौर युद्ध' (Battle of Chamkaur) के नाम से भी जाना जाता है जो कि मुग़ल योद्धा वज़ीर खान की अगवाई में 10 लाख की फ़ौज का सामना सिर्फ 42 सिखों से, 6 दिसम्बर 1704 को हुआ जो कि गुरु गोबिंद सिंह जी की आज्ञा से तैयार हुए थे !

नतीजा यह निकलता है की उन 42 शूरवीरों की जीत होती है और हिंदुस्तान में मुग़ल हुकूमत की नींव, जो बाबर ने रखी थी, उसे जड़ से उखाड़ दिया गया।

औरंगज़ेब ने भी उस वक़्त गुरु गोविंद सिंह जी का लोहा माना और घुटने टेक दिए और ऐसे मुग़ल साम्राज्य का अंत हुआ।

औरंगजेब की तरफ से एक प्रश्न किया गया गुरु गोविंद सिंह जी से, कि यह कैसी फ़ौज तैयार की आपने जिसने 10 लाख की फ़ौज को उखाड़ फेंका?

गुरु गोविंद सिंह जी ने जवाब दिया,

"चिड़ियों 🐥से मैं बाज 🦅 लडाऊ,
गीदड़ों 🐺को मैं शेर 🦁 बनाऊं
सवा लाख से एक लडाऊं,
तभी गोविंद सिंह नाम कहाउँ !!" 🙏

गुरु गोविंद सिंह जी ने जो कहा वो किया और जिन्हें आज हर कोई शीश झुकता है। यह है हमारे भारत की अनमोल विरासत जिसे कभी पढ़ाया ही नहीं जाता!

अगर आपको यकीन नहीं होता तो एक बार जरूर Google में लिखे 'बैटल ऑफ़ चमकौर' और सच आपको स्वयं पता लग जाएगा।

आपको अगर ये लेख थोड़ा सा भी अच्छा लगा हो और आपको भारतीय होने पर गर्वान्वित करता हो तो ज़रूर इसे आगे शेयर करें जिससे हमारे देश के गौरवशाली इतिहास के बारे में दुनिया को पता लगे !

*कुछ आगे *

चमकौर साहिब की जमीन, आगे चलकर, एक समृद्ध सिख ने खरीदी। उस को इसके इतिहास का कुछ पता नहीं था। जब पता चला कि यहाँ गुरु गोविंद सिंह जी के दो बेटे शहीद हुए थे, तो उन्होंने यह ज़मीन गुरु महाराज जी के बेटों की यादगार ( गुरुद्वारा साहिब) के लिए देने का मन बनाया।

जब अरदास करने के समय उस सिख से पूछा गया कि अरदास में उनके लिए गुरु साहिब से क्या विनती करनी है ....तो उस सिख ने कहा के गुरु जी से विनती करनी है कि मेरे घर कोई औलाद ना हो ताकि मेरे वंश में कोई भी यह कहने वाला ना हो कि यह ज़मीन मेरे बाप दादा ने दी है।
वाहेगुरु... 🙏

और यही अरदास हुई और बिलकुल ऐसा ही हुआ कि उन सिख के घर कोई औलाद नहीं हुई।

अब हम अपने बारे में सोचें
*50....100 रु. दे कर क्या क्या माँगते हैं _ 🙏🌹
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14 नवंबर #बाल_दिवस
वीर फतेह सिंह व जोरावर सिंह ने धर्म की रक्षा में हंसते हंसते खुद को दीवार में चिनवा लिया था।
नमन_/\_ वन्दे मातरम
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बलिदान दिवस पर पूज्य मतिदास जी को शत शत नमन
भाई मतिदास तथा उनके छोटे भाई सती दास और भाई दयाल दास नवें गुरु तेगबहादुर के साथ शहीद हुए थे। उनको औरंगजेब के आदेश से दिल्ली के चांदनी चौक में 09 नवम्बर 1675 को आरे से चीर दिया गया था। उन्हें मृत्यु स्वीकार थी, परंतु धर्म परिवर्तन नहीं। भाई मतिदास गुरु तेगबहादुर के प्रधानमंत्री थे। ‘भाई’ का सम्मान स्वयं गुरु गोबिंद सिंह ने इस परिवार को दिया था
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