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लोग ब्रह्माण्ड को खोजने में दिन रात लगे हैं। हमारे मनीषियों ने तो सदियों पहले उससे भी अनन्त आगे का अन्वेषण किया और ब्रह्माण्ड ही नही अपितु उसके आलम्बन तक खोजने में सफल रहे। उपनिषद इसी के गीत गा रहे है। क्या है वह?? जानिए।।

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आप ईश्वर को किस प्रकार परिभाषित करते हैं।
कृपया वीडियो देखने से पहले अपने विचार कॉमेंट बॉक्स में दें।
https://youtu.be/pi0DYJPxFkQ

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जो केवल अपने लिए धन कमाता है, उसकी अपने भी प्रशंसा नही करते; किन्तु जो कल्याणमार्ग पर उद्यमशील रहता है, देवता भी उसकी प्रशंसा करके स्वयं की जिह्वा के भाग्य पर इठलाते हैं।

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श्रेय और प्रेय को अच्छी प्रकार समझने वाला बुद्धिमान व्यक्ति अपने जीवन मे क्या अपनाएगा? श्रेय या प्रेय??
https://youtu.be/lfnmWXhKIcM

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यमराज से नचिकेता तीसरा वर ऐसा मांग लेते हैं कि यमराज भी चकित रह जाते हैं। उसके बाद...

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यदि आप हिन्दू धर्म अर्थात सनातन संस्कृति को लेकर संशय में हैं या इसके विषय मे गहराई से जानने के इच्छुक जिज्ञासु हैं तो फौरन इस you tube चैनल को सब्सक्राइब करिये।

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जो गूढ़ रहस्य हमारे भीतर है अरे! वह तो ज्ञान है। सम्पूर्ण ज्ञान हमारे ही भीतर है। झाँककर तो देखिए अपने ही भीतर!!

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आप क्या करते हैं, किसके साथ आते जाते हैं, किसके पास बैठते है, इन सब बातों का आपके घर में बड़े बुजुर्गों को पता होना चाहिए और यदि वें आपके संगियों के बारे में कोई परामर्श दें तो उसका अनुशरण करना चाहिए।

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अतिथि कौन हो इसका निर्धारण और उनके प्रति गृहस्थ के कर्तव्य को यम की पत्नी और यम के संवाद के रूप में सुंदर ढंग से समझाया गया है।

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न्याय दर्शन के प्रणेता श्री अक्षपाद गौतम ने सत्य तक पहुँचने के लिये चार प्रमाण माने हैं। प्रमा का अर्थ है सत्य ज्ञान और क्योंकि ब्रह्म ही एकमेव सत्य है तो हम कह सकते है कि ब्रह्मज्ञान। उस सत्य(प्रमा) तक पहुँचने के लिए जिस मार्ग से चला जाता है उसे प्रमाण कहते हैं। चार प्रमाण हैं- प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और आगम या शब्द । शब्द प्रमाण अर्थात श्रुति या किसी आप्तपुरुष के मुख से निःसृत शब्द।हमारे उपनिषद गुरु- शिष्य परम्परा से है जहाँ गुरु विभिन्न उदाहरणों से और कहनियों के माध्यम से शिष्यों को सत्य का ज्ञान कराते है। शब्द प्रमाण का सबसे बड़ा उदाहरण उपनिषद हैं। अतः हम इनकी सच्चाई को झुठला नही सकते। कठ उपनिषद में आप्तपुरुष सद्गुरु ने नचिकेता और यम के संवाद के माध्यम से सत्यज्ञान उपलब्ध कराया है। प्रस्तुत है कठ का प्रथम भाग।
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