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कमर दर्द(Lower Back Pain) से बचने के लिए- कुछ घरेलू उपचार* 1, एक चम्मच नींबू का रस,एक चम्मच लहसुन रस, दो चम्मच पानी सब मिलाकर दिन में दो बार पिये-Lower Back Pain ठीक होगा- 2, सरसों का तेल सौ ग्राम देशी कपूर बीस ग्राम दोनों मिलाकर शीशी में भर दें कपूर गलने पर उस तेल की मालिश करें- मेथी की सब्जी खाने से भी Lower Back Pain लाभ होता है- 3, अदरक के रस में घी मिलाकर पिये कमर दर्द(Lower Back Pain) ठीक होगा- 4, जायफल को पानी में पिसकर तिल के तेल के साथ अच्छी तरह गर्म करें- फिर सहता हुआ रख कर कमर की मालिश करें तीन-चार वर्ष पुराना मिर्च का आचार का तेल एक चम्मच कोई दूसरा तेल दस चम्मच मिलाकर किसी भी कमर दर्द(Lower Back Pain) वाले स्थान पर मालिश करें- मिट्टी के तेल से कमर पर रात को मालिश करें- Lower Back Pain ठीक होगा- 5, गेहूं की रोटी एक ओर से सेंक लें और एक से कच्ची रखें- कच्ची की ओर तिल का तेल लगाकर दर्द वाली जगह पर बांध लें- रात में 60 ग्राम गेहूं के दाने पानी में भिगो दें- सुबह गेहूं के भीगे हुए इन दानों के साथ 30 ग्राम खसखस तथा 30 ग्राम धनिये की मींगी मिलाकर बारीक पीस ले इस चटनी को दूध में पका लें और खीर बना लें-इस आवश्यकतानुसार 10 15 दिन तक खाने से कमर दर्द(Lower Back Pain) दूर होकर ताकत बढ़ती है इससे पाचन शक्ति की कमजोरी भी मिटती है- 6, खसखस और मिश्री दोनों बराबर मात्रा में लेकर कूट-पीसकर चूर्ण बना लें- 6 ग्राम पूर्ण प्रतिदिन सुबह-शाम खाएं और ऊपर से गर्म दूध पीएं- तारपीन के तेल की मालिश करें- चावल, मैदा आदि की बनी हुई और तली हुई चीजें न खाएं- गर्म पानी पीएं- यदि ठंडा पानी पीना हो तो उबलते हुए पानी में चार तुलसी के पत्ते अथवा एक बड़ी इलायची या दो छोटी इलायची पीसकर डाल दें फिर सुबह का उबाला हुआ पानी शाम तक पीएं और शाम का सुबह तक- 7, Lower Back Pain-कमर दर्द, घुटनों का दर्द और गठिया में हर रोज प्रात: खाली पेट तीन-चार अखरोट की गिरियों को अच्छी तरह चबाकर खाने से बहुत लाभ होता है और रक्त शुध्द होता है- लगातार दो सप्ताह तक खाएं- 8, दूध में सौठ का चूर्ण डालकर सुबह-शाम लेने से Lower Back Pain मिटता है- 9, अजवायन को किसी साफ वस्त्र में लेकर उसकी पोटली बनाकर तवे पर गर्म करें तथा कमर पर उसका सेंक दें- पानी में पिसा हुआ जीरा और शक्कर मिलाकर नियमित सेवन करने से कुछ ही दिनों में कमर का दर्द(Lower Back Pain) और प्रदर संबंधी रोग दूर हो जाते हैं- 10, एक किलो सरसों के तेल में 250 ग्राम लहसुन , 50 ग्राम अजवाइन , 20 ग्राम लौंग डालकर आग पर तब तक गर्म करें, जब तक कि सभी सामान जल न जाए-इस तेल को छानकर शीशी में भर लें और दिन में दो बार मालिश करें- 11. रोज सुबह सरसों या नारियल के तेल में लहसुन की तीन-चार कलियॉ डालकर (जब तक लहसुन की कलियां काली न हो जायें) गर्म कर लें। ठंडा होने पर इस तेल से कमर की मालिश करें. 12.नमक मिले गरम पानी में एक तौलिया डालकर निचोड़ लें। इसके बाद पेट के बल लेट जाएं। दर्द के स्थान पर तौलिये से भाप लें। कमर दर्द से राहत पहुंचाने का यह एक अचूक उपाय है। 1 3.कढ़ाई में दो-तीन चम्मच नमक डालकर इसे अच्छे से सेक लें। इस नमक को थोड़े मोटे सूती कपड़े में बांधकर पोटली बना लें। कमर पर इस पोटली से सेक करने से भी दर्द से आराम मिलता है 14.अजवाइन को तवे के पर थोड़ी धीमी आंच पर सेंक लें। ठंडा होने पर धीरे-धीरे चबाते हुए निगल जाएं। इसके नियमित सेवन से कमर दर्द में लाभ मिलता है कमर दर्द में भारी वजन उठाते समय या जमीन से किसी भी चीज को उठाते समय कमर के बल ना झुकें बल्कि पहले घुटने मोड़कर नीचे झुकें और जब हाथ नीचे वस्तु तक पहुंच जाए तो उसे उठाकर घुटने को सीधा करते हुए खड़े हो जाएं ऑफिस में काम करते समय कभी भी पीठ के सहारे न बैठें। अपनी पीठ को कुर्सी पर इस तरह टिकाएं कि यह हमेशा सीधी रहे। गर्दन को सीधा रखने के लिए कुर्सी में पीछे की ओर मोटा तौलिया मोड़ कर लगाया जा सकता
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शिवलिंगी खाये और सन्तान पाये,,,,,
येसे बहोत लोग है जिनको सन्तान नहीं है और परेशान है,
भारत के वनांचलों, खेत खलिहानों, आँगन के बाडों आदि में इसे प्रचुरता से उगता हुआ देखा जा सकता है। इसके बीजों को देखने से स्पष्ठरूप से शिवलिंग की रचना दिखाई देती है और इसी वजह से इसे शिवलिंगी कहते हैं। बाजार में अक्सर इसके बीजों को चमत्कारिक गुणों वाला बीज बोलकर बेचा जाता है। वैसे अनेक रोगों के निवारण के लिए महत्वपूर्ण मानी जाने वाली इस बूटी को आदिवासी मुख्यत: संतान प्राप्ति के लिए उपयोग में लाते हैं। शिवलिंगी का वानस्पतिक नाम ब्रयोनोप्सिस लेसिनियोसा होता है।
चलिए जानते हैं आदिवासी किस तरह से शिवलिंगी को हर्बल चिकित्सा के रूप में अपनाते हैं।पातालकोट के गोंड और भारिया जनजाति के लोग इस पौधे को पूजते है, इन आदिवासियों का मानना है कि संतानविहीन दंपत्ती के लिये ये पौधा एक वरदान है। पातालकोट के आदिवासी हर्बल जानकारों के अनुसार महिला को मासिक धर्म समाप्त होने के 4 दिन बाद प्रतिदिन सात दिनों तक संजीवनी के 5 बीज खिलाए जाए तो महिला के गर्भधारण की संभावनांए बढ जाती है।इन आदिवासीयों द्वारा शिवलिंगी के बीजों को तुलसी और गुड के साथ पीसकर संतानविहीन महिला को खिलाया जाता है, महिला को जल्द ही संतान सुख की प्राप्ति होती है।आदिवासी महिलाएं इसकी पत्तियों की चटनी बनाती है, इनके अनुसारे ये टॉनिक की तरह काम करती है। जिन महिलाओं को संतानोत्पत्ति के लिए इसके बीजों का सेवन कराया जाता है उन्हें विशेषरूप से इस चटनी का सेवन कराया जाता हैपत्तियों को बेसन के साथ मिलाकर सब्जी के रूप में भी खाया जाता है, आदिवासी भुमकाओं (हर्बल जानकार) के अनुसार इस सब्जी का सेवन गर्भवती महिलाओं को करना चाहिए जिससे होने वाली संतान तंदुरुस्त पैदा होती है।
इन आदिवासियों का भी मानना है कि शिवलिंगी न सिर्फ साधारण रोगों में उपयोग में लायी जाती है अपितु ये नर संतान प्राप्ति के लिये भी कारगर है, हलाँकि इस तरह के दावों को आधुनिक विज्ञान नकार सकता है लेकिन इन आदिवासी हर्बल जानकारों के दावों को एकदम नकारना ठीक नही।इन आदिवासियों का भी मानना है कि शिवलिंगी न सिर्फ साधारण रोगों में उपयोग में लायी जाती है अपितु ये नर संतान प्राप्ति के लिये भी कारगर है, हलाँकि इस तरह के दावों को आधुनिक विज्ञान नकार सकता है लेकिन इन आदिवासी हर्बल जानकारों के दावों को एकदम नकारना ठीक नही।
डाँग- गुजरात के आदिवासी शिवलिंगी के बीजों का उपयोग कर एक विशेष फार्मुला तैयार करते हैं ताकि जन्म लेने वाला बच्चा चुस्त, दुरुस्त और तेजवान हो। शिवलिंगी, पुत्रंजीवा, नागकेशर और पारस पीपल के बीजों की समान मात्रा लेकर चूर्ण बना लिया जाता है और इस चूर्ण का आधा चम्मच गाय के दूध में मिलाकर सात दिनों तक उस महिला को दिया जाता है जिसने गर्भधारण किया होता है।डाँगी आदिवासी इसके बीजों के चूर्ण को बुखार नियंत्रण और बेहतर सेहत के लिए उपयोग में लाते हैं। अनेक हिस्सों में इसके बीजों के चूर्ण को त्वचा रोगों को ठीक करने के लिए भी इस्तमाल किया जाता है।
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सत्यानाशी के अनमोल लाभ
वनस्पतियो के मूल नाम विशेषकर अंग्रेजी नाम अच्छे होते है पर स्थानीय नाम उनके असली गुणो (दुर्गुण कहे तो ज्यादा ठीक होगा) के बारे मे बता देते है। इसी प्रकार मार्निंग ग्लोरी के अंग्रेजी नाम से पहचाना जाने वाला पौधा अपने दुर्गुणो के कारण बेशरम या बेहया के स्थानीय नाम से जाना जाता है।
सु-बबूल की भी यही कहानी है। यह अपने तेजी से फैलने और फिर स्थापित होकर समस्या पैदा करने के अवगुण के कारण कु-बबूल के रुप मे जाना जाता था।वैज्ञानिको को पता नही कैसे यह जँच गया। उन्होने इसका नाम बदलकर सु-बबूल रख दिया और किसानो के लिये इसे उपयोगी बताते हुये वे इसका प्रचार-प्रसार करने मे जुट गये। कुछ किसान उनके चक्कर मे आ गये। जब उन्होने इसे लगाया तो जल्दी ही वे समझ गये कि इसका नाम कु-बबूल क्यो रखा गया था। अब लोग फिर से इसे कु-बबूल के रुप मे जानते है। वैसे अंग्रेजी नाम भी कई बार वनस्पतियो की पोल खोल देते है। जैसे बायोडीजल के रुप मे प्रचारित जैट्रोफा को ही ले। जिस तेल से बायोडीजल बनाया जाना है उसे ही ब्रिटेन मे हेल आइल (नरकीय तेल) का नाम मिला है। यूँ ही यह नाम नही रखा गया है। वहाँ के लोग लम्बे समय से जानते है कि इस तेल मे कैसर पैदा करने वाले रसायन होते है। इसलिये उन्होने इसे यह गन्दा नाम दे दिया है।
अब हम सत्यानाशी पर आते है। यह वनस्पति आम तौर पर बेकार जमीन मे उगती है। इसमे काँटे होते है और इसे अच्छी नजर से नही देखा जाता है। घर के आस-पास यदि यह दिख जाये तो लोग इसे उखाडना पसन्द करते है। गाँव के ओझा जब विशेष तरह का भूत उतारते है तो इसके काँटो से प्रभावित महिला की पिटाई की जाती है। बहुत बार इस पर लेटा कर भी प्रभावित की परीक्षा ली जाती है। तंत्र साधना मे भी इसका प्रयोग होता है। आम तौर पर ऐसी वनस्पतियो से लोग दूरी बनाये रखते है। सत्यानाशी से सम्बन्धित दसो किस्म के विश्वास और अन्ध-विश्वास देश के अलग-लग कोनो मे अलग-अलग रुपो मे उपस्थित है। आम लोग जहाँ इसे अशुभ मानते है वही चतुर व्यापारी इससे लाभ कमाते है-
सरसो के तेल मे मिलावट और इसके कारण होने वाले ड्राप्सी रोग के विषय मे तो समय-समय पर पढा ही होगा। दरअसल मिलावट तेल मे नही होती है। मिलावट होती है बीजो मे। और सरसो के साथ ऐसे बीज मिलाये जाते है जो बिल्कुल उसी की तरह दिखते हो। भारत मे सबसे अधिक मिलावट सत्यानाशी के बीजो की होती है। व्यापारी बडे भोलेपन से यह कह देते है कि यह मिलावट हम नही करते है। यह खेतो मे अपने-आप हो जाती है। सरसो के खेतो मे सत्यानाशी के पौधे बतौर खरप्तवार उगते है। दोनो ही एक ही समय पर पकते है। इस तरह खेत मे ही वे मिल जाते है। वे यह भी कहते है कि सरसो को उखाड कर जब खलिहान मे लाते है तो सत्यानाशी के पौधे भी साथ मे आ जाते है। यह एक सफेद झूठ है। सत्यानाशी का पौधा सरसो के खेतो मे नही उगता है। जबकि ये यह बेकार जमीन की वनस्पति है-
आज के सरसो तेल मे वो बात नही है तो आप खीझ उठते है। पर यह कटु सत्य है कि सरसो के तेल मे सत्यानाशी की मिलावट होती है जो कि आपको सीधे नुकसान करती है।व्यापारी लोग बताते है कि ऐसी मिलावट से सरसो के तेल की सनसनाहट बढ जाती है। आजकल लोग यही देखकर तेल खरीदते है। इसलिये इस तरह की मिलावट करनी होती है-
इसका वैज्ञानिक नाम आर्जिमोन मेक्सिकाना यह इशारा करे कि यह मेक्सिको का पौधा है पर प्राचीन भारतीय चिकित्सा ग्रंथो मे इसके औषधीय गुणो का विस्तार से वर्णन मिलता है। इसका संस्कृत नाम स्वर्णक्षीरी सत्यानाशी की तरह बिल्कुल भी नही डराता है। यह नाम तो स्वर्ग से उतरी किसी वनस्पति का लगता है। यह बडे की अचरज की बात है कि सत्यानाशी के बीज जिस रोग को पैदा करते है उसकी चिकित्सा सत्यानाशी की पत्तियो और जडो से की जाती है। आज भी देश के पारम्परिक चिकित्सक सत्यानाशी के बीजो के दुष्प्रभाव हो ऐसे ही उपचारित करते है-
जबकि आयुर्वेदिक ग्रंथ 'भावप्रकाश निघण्टु' में इस वनस्पति को स्वर्णक्षीरी या कटुपर्णी जैसे सुंदर नामों से सम्बोधित किया गया है। इसके विभिन्न भाषाओ में नाम है
संस्कृत स्वर्णक्षीरी, कटुपर्णी।
हिन्दी- सत्यानाशी, भड़भांड़, चोक।
मराठी- कांटेधोत्रा।
गुजराती- दारुड़ी।
बंगाली- चोक, शियालकांटा।
तेलुगू- इट्टूरि।
तमिल- कुडियोट्टि।
कन्नड़- दत्तूरि।
मलयालम- पोन्नुम्माट्टम।
इंग्लिश- मेक्सिकन पॉपी।
लैटिन- आर्जिमोन मेक्सिकाना।
यह कांटों से भरा हुआ, लगभग 2-3 फीट ऊंचा और वर्षाकाल तथा शीतकाल में पोखरों, तलैयों और खाइयों के किनारे लगा पाया जाने वाला पौधा होता है। इसका फूल पीला और पांच-सात पंखुड़ी वाला होता है। इसके बीज राई जैसे और संख्या में अनेक होते हैं। इसके पत्तों व फूलों से पीले रंग का दूध निकलता है, इसलिए इसे 'स्वर्णक्षीरी' यानी सुनहरे रंग के दूध वाली कहते हैं।
इसकी जड़, बीज, दूध और तेल को उपयोग में लिया जाता है। इसका प्रमुख योग 'स्वर्णक्षीरी तेल' के नाम से बनाया जाता है। यह तेल सत्यानाशी के पंचांग (सम्पूर्ण पौधे) से ही बनाया जाता है। इस तेल की यह विशेषता है कि यह किसी भी प्रकार के व्रण (घाव) को भरकर ठीक कर देता है।
व्रणकुठार तेल बनाये :-
निर्माण विधि :-
आप इस पौधे को सावधानीपूर्वक कांटों से बचाव करते हुए, जड़ समेत उखाड़ लाएं। इसे पानी में धोकर साफ करके कुचल कर इसका रस निकाल लें। फिर जितना रस हो, उससे चौथाई भाग अच्छा शुद्ध सरसों का तेल मिला लें और मंदी आंच पर रखकर पकाएं। जब रस जल जाए, सिर्फ तेल बचे तब उतारकर ठंडा कर लें और शीशी में भर लें। यह व्रणकुठार तेल है। जेसे अगर 200 ग्राम रस है तो 50 ग्राम ही शुद्ध घानी का सरसों का तेल डाले और पक के वापस 50 ग्राम तेल बचे तो रख ले
प्रयोग विधि : -
किसी भी प्रकार के जख्म (घाव) को नीम के पानी से धोकर साफ कर लें। साफ रूई को तेल में डुबोकर तेल घाव पर लगाएं। यदि घाव बड़ा हो, बहुत पुराना हो तो रूई को घाव पर रखकर पट्टी बांध दें। कुछ दिनों में घाव भर कर ठीक हो जाएगा।ये घाव ठीक करने की अचूक दवा है अगर पुराना नासूर है तो भी ये दवा उतनी ही कारगर है


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पपीता एक गुणकारी फल है किन्तु पपीते के पत्ते के भी है कई लाभकारी गुण

पपीता एक ऐसा फल है जिसको बहुत से लोग पसंद करते हैं और स्वास्थ्य में भी यह फल बहुत ज्यादा योगदान देता है पर क्या आप जानते हैं कि पपीते के पत्ते में भी बहुत से रोगों का निदान छुपा हुआ हैं, पपीते के पत्तों से कई प्रकार के रोगों का निदान संभव है जो की अपने में काफी घटक होते हैं। जानकारी के लिए आपको बता दें की डेंगू के इलाज के लिए भी पपीते के पत्तों का उपयोग बहुत ज्यादा लाभकारी रहता हैं यही कारण है की डेंगू के दौरान पपीते के पत्तो की मांग काफी बढ़ जाती है। साथ ही इसके पत्तों का रस पेट के कब्ज में भी बहुत ज्यादा लाभकारी होता है। ऐसे भी बहुत से फायदे पपीते के पत्तों के होते हैं जिनके बारे में आज हम आपको बता रहे हैं
#आइये जानते हैं पपीते के पत्तों के औषधीय लाभ#

1- ब्लड प्लेटलेट काउंट बढ़ाने में सहायक –
बहुत कम लोग ही इस बात को जानते हैं की पपीते के पत्तों का रस पीने से ब्लड प्लेटलेट काउंट और आर बी सी बढ़ता है, यह बात कई सारे रिसर्च में भी साबित हो चुकी हैं। पपीते के पत्तों का रस पीने से आपके ब्लड सर्कुलेशन में भी अच्छा सुधर होता है, यही कारण है की इनका उपयोग डेंगू के दौरान रोगी के लिए किया जाता है।

2- कैंसर की रोकथाम में सहायक-
असल में पपीते के पत्तों के अंदर में एंटी-ट्यूमर गुण होते हैं जो की रोगी के ट्यूमर को बढ़ने से रोकते हैं। इसके अलावा यह कैंसर के विभिन्न प्रकार जैसे इम्युनोसुप्पेर्सेंट रोगों या एलर्जी विकार आदि में भी ट्यूमर आदि को बढ़ने से रोकने में लाभदायक होते हैं।

3- इम्युनिटी सिस्टम मज़बूत करते हैं-
कई प्रकार की रिसर्च से पता लगा है की पपीते के पत्तों के अंदर में बड़ी मात्रा में एंटीऑक्सीडेंट होते हैं इसलिए यह ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को कम करने तथा किडनी और लिवर आदि को सही और स्वस्थ रखने में बहुत कारगर है।

4- कब्ज़ से बचाता है –
आपको बता दें की पपीते का रस एक लैक्सेटिव के रूप में भी जाना जाता है जो की आपके कब्ज की समस्या को दूर करता है और इसके रस का प्रयोग करने से आपको पेट से संबंधित समस्याओं से छुटकारा मिलता है।

5- प्रोस्टेट कैंसर के इलाज में सहायक –
असल में पपीते के पत्तो में एंटी कैंसर गुण पाये जाते हैं जिसके कारण ये प्रोस्टेट समस्याओं में बहुत ज्यादा उपयोगी होते हैं और प्रोस्टेट कैंसर की शुरुआत में देर करने के लिए भी जानें जाते हैं।

मित्रों इसे ज्यादा से ज्यादा शेयर करें जिससे और लोगों को इसके फायदे की जानकारी प्राप्त हो सके
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【कंजूसी न करें अगर सम्भव हो तो शेयर करे】
पपीते के पत्तो की चाय किसी भी स्टेज के कैंसर को सिर्फ 60 से 90 दिनों में कर देगी जड़ से खत्म,

पपीते के पत्ते 3rd और 4th स्टेज के कैंसर को सिर्फ 35 से 90 दिन में सही कर सकते हैं।

अभी तक हम लोगों ने सिर्फ पपीते के पत्तों को बहुत ही सीमित तरीके से उपयोग किया होगा, बहरहाल प्लेटलेट्स के कम हो जाने पर या त्वचा सम्बन्धी या कोई और छोटा मोटा प्रयोग, मगर आज जो हम आपको बताने जा रहें हैं, ये वाकई आपको चौंका देगा, आप सिर्फ 5 हफ्तों में कैंसर जैसी भयंकर रोग को जड़ से ख़त्म कर सकते हैं।

ये प्रकृति की शक्ति है और बलबीर सिंह शेखावत जी की स्टडी है जो वर्तमान में as a Govt. Pharmacist अपनी सेवाएँ सीकर जिले में दे रहें हैं।

आपके लिए नित नवीन जानकारी कई प्रकार के वैज्ञानिक शोधों से पता लगा है कि पपीता के सभी भागों जैसे फल, तना, बीज, पत्तिया, जड़ सभी के अन्दर कैंसर की कोशिका को नष्ट करने और उसके वृद्धि को रोकने की क्षमता पाई जाती है।

विशेषकर पपीता की पत्तियों के अन्दर कैंसर की कोशिका को नष्ट करने और उसकी वृद्धि को रोकने का गुण अत्याधिक पाया जाता है। तो आइये जानते हैं उन्ही से।

University of florida ( 2010) और International doctors and researchers from US and japan में हुए शोधो से पता चला है की पपीता के पत्तो में कैंसर कोशिका को नष्ट करने की क्षमता पाई जाती है।

Nam Dang MD, Phd जो कि एक शोधकर्ता है, के अनुसार पपीता की पत्तियां डायरेक्ट कैंसर को खत्म कर सकती है, उनके अनुसार पपीता कि पत्तिया लगभग 10 प्रकार के कैंसर को खत्म कर सकती है जिनमे मुख्य है।

breast cancer, lung cancer, liver cancer, pancreatic cancer, cervix cancer, इसमें जितनी ज्यादा मात्रा पपीता के पत्तियों की बढ़ाई गयी है, उतना ही अच्छा परिणाम मिला है, अगर पपीता की पत्तिया कैंसर को खत्म नहीं कर सकती है लेकिन कैंसर की प्रोग्रेस को जरुर रोक देती है।।

तो आइये जाने पपीता की पत्तिया कैंसर को कैसे खत्म करती है?

1. पपीता कैंसर रोधी अणु Th1 cytokines की उत्पादन को ब़ढाता है जो की इम्यून system को शक्ति प्रदान करता है जिससे कैंसर कोशिका को खत्म किया जाता है।

2. पपीता की पत्तियों में papain नमक एक प्रोटीन को तोड़ने (proteolytic) वाला एंजाइम पाया जाता है जो कैंसर कोशिका पर मौजूद प्रोटीन के आवरण को तोड़ देता है जिससे कैंसर कोशिका शरीर में बचा रहना मुश्किल हो जाता है।
Papain blood में जाकर macrophages को उतेजित करता है जो immune system को उतेजित करके कैंसर कोशिका को नष्ट करना शुरू करती है, chemotheraphy / radiotheraphy और पपीता की पत्तियों के द्वारा ट्रीटमेंट में ये फर्क है कि chemotheraphy में immune system को दबाया जाता है जबकि पपीता immune system को उतेजित करता है, chemotheraphy और radiotheraphy में नार्मल कोशिका भी प्रभावित होती है पपीता सोर्फ़ कैंसर कोशिका को नष्ट करता है।

सबसे बड़ी बात के कैंसर के इलाज में पपीता का कोई side effect भी नहीं है।।

कैंसर में पपीते के सेवन की विधि :
कैंसर में सबसे बढ़िया है पपीते की चाय। दिन में 3 से 4 बार पपीते की चाय बनायें, ये आपके लिए बहुत फायदेमंद होने वाली है। अब आइये जाने लेते हैं पपीते की चाय बनाने की विधि।

1. 5 से 7 पपीता के पत्तो को पहले धूप में अच्छी तरह सुखा ले फिर उसको छोटे छोटे टुकड़ों में तोड़ लो आप 500 ml पानी में कुछ पपीता के सूखे हुए पत्ते डाल कर अच्छी तरह उबालें।
इतना उबाले के ये आधा रह जाए। इसको आप 125 ml करके दिन में दो बार पिए। और अगर ज्यादा बनाया है तो इसको आप दिन में 3 से 4 बार पियें। बाकी बचे हुए लिक्विड को फ्रीज में स्टोर का दे जरुरत पड़ने पर इस्तेमाल कर ले। और ध्यान रहे के इसको दोबारा गर्म मत करें।

2. पपीते के 7 ताज़े पत्ते लें इनको अच्छे से हाथ से मसल लें। अभी इसको 1 Liter पानी में डालकर उबालें, जब यह 250 ml। रह जाए तो इसको छान कर 125 ml. करके दो बार में अर्थात सुबह और शाम को पी लें। यही प्रयोग आप दिन में 3 से 4 बार भी कर सकते हैं।

पपीते के पत्तों का जितना अधिक प्रयोग आप करेंगे उतना ही जल्दी आपको असर मिलेगा। और ये चाय पीने के आधे से एक घंटे तक आपको कुछ भी खाना पीना नहीं है।

कब तक करें ये प्रयोग वैसे तो ये प्रयोग आपको 5 हफ़्तों में अपना रिजल्ट दिखा देगा, फिर भी हम आपको इसे 3 महीने तक इस्तेमाल करने का निर्देश देंगे। और ये जिन लोगों का अनुभूत किया है उन लोगों ने उन लोगों को भी सही किया है, जिनकी कैंसर में तीसरी और चौथी स्टेज थी।

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● मंत्रो से आरोग्य ●
________________________ शब्दों की ध्वनि का अलग-अलग अंगों पर
एवं वातावरण पर असर होता है। कई शब्दों का
उच्चारण कुदरती रूप से होता है। आलस्य के समय
कुदरती आ... आ... होता है। रोग की पीड़ा के
समय ॐ.... ॐ.... का उच्चारण कुदरती ऊँह....
ऊँह.... के रूप में होता है। यदि कुछ अक्षरों का महत्त्व समझकर उच्चारण किया जाय तो बहुत
सारे रोगों से छुटकारा मिल सकता है। •'अ' उच्चारण से जननेन्द्रिय पर अच्छा
असर पड़ता है। •'आ' उच्चारण से जीवनशक्ति आदि पर
अच्छा प्रभाव पड़ता है। दमा और खाँसी के
रोग में आराम मिलता है, आलस्य दूर होता है। •'इ' उच्चारण से कफ, आँतों का विष और
मल दूर होता है। कब्ज, पेड़ू के दर्द, सिरदर्द और
हृदयरोग में भी बड़ा लाभ होता है।
उदासीनता और क्रोध मिटाने में भी यह अक्षर
बड़ा फायदा करता है। •'ओ' उच्चारण से ऊर्जाशक्ति का
विकास होता है। •'म' उच्चारण से मानसिक शक्तियाँ
विकसित होती हैं। शायद इसीलिए भारत के
ऋषियों ने जन्मदात्री के लिए 'माता' शब्द
पसंद किया होगा। •'ॐ' का उच्चारण करने से ऊर्जा प्राप्त
होती है और मानसिक शक्तियाँ विकसित
होती हैं। मस्तिष्क, पेट और सूक्ष्म इन्द्रियों पर
सात्त्विक असर होता है। •'ह्रीं' उच्चारण करने से पाचन-तंत्र, गले और
हृदय पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। •'ह्रं' उच्चारण करने से पेट, जिगर, तिल्ली,
आँतों और गर्भाशय पर अच्छा असर पड़ता है।
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काले चने
एक-दो मुट्ठी काले चने :
● एक सस्ता और आसान सा दिखने वाला चना हमारे सेहत के लिए कितना फायदेमंद है हम इस पोस्ट में जानने का प्रयास करेगे. काले चने भुने हुए हों, अंकुरित हों या इसकी सब्जी बनाई हो, यह हर तरीके से सेहत के लिए बहुत ही फायदेमंद होते हैं। इसमें भरपूर मात्रा में कार्बोहाइड्रेट्स, प्रोटीन्स, फाइबर, कैल्शियम, आयरन और विटामिन्स पाए जाते हैं।
● शरीर को सबसे ज्यादा फायदा अंकुरित काले चने खाने से होता है, क्योंकि अंकुरित चने क्लोरोफिल, विटामिन ए, बी, सी, डी और के, फॉस्फोरस, पोटैशियम, मैग्नीशियमऔर मिनरल्स का अच्छा स्रोत होते हैं। साथ ही इसे खाने के लिए किसी प्रकार की कोई खास तैयारी नहीं करती पड़ती। रातभर भिगोकर सुबह एक-दो मुट्ठी खाकर हेल्थ अच्छी हो सकती है।
-- चने ज्यादा महंगे भी नहीं होते और इसमें बीमारियों से लड़ने के गुण भी छिपा हुए हैं।
1) कब्ज से राहत मिलती हैचने में मौजूद फाइबर की मात्रा पाचन के लिए बहुत जरूरी होती है।* रातभर भिगोए हुए चने से पानी अलग कर उसमें नमक, अदरक और जीरा मिक्स कर खाने से कब्ज जैसी समस्या से राहत मिलती है। साथ ही जिस पानी में चने को भिगोया गया था, उस पानी को पीने से भी राहत मिलती है। लेकिन कब्ज दूर करने के लिए चने को छिलके सहित ही खाएं।
2) ये एनर्जी बढ़ाता है कहा तो यहाँ तक जाताहै इंस्टेंट एनर्जी चाहिए, तो रातभर भिगोए हुए या अंकुरित चने में हल्का सा नमक, नींबू, अदरक के टुकड़े और काली मिर्च डालकर सुबह नाश्ते में खाएं, बहुत फायदेमंद होता है। आप चने का सत्तू भी खा सकते हैं। यह बहुत ही फायदेमंद होता है।गर्मियों में चने के सत्तू में नींबू और नमक मिलाकर पीने से शरीर को एनर्जी तो मिलती ही है, साथ ही भूख भी शांत होती है।
3) पथरी की प्रॉब्लम दूर करता हैदूषित पानी और खाने से आजकल किडनी और गॉल ब्लैडरमें पथरी की समस्या आम हो गई है। हर दूसरे-तीसरे आदमी के साथ स्टोन की समस्या हो रहीहै। इसके लिए रातभर भिगोए हुए काले चने में थोड़ी सी शहद की मात्रा मिलाकर खाएं। रोजाना इसके सेवन से स्टोन के होने की संभावना काफी कम हो जाती है और अगर स्टोन है तो आसानी से निकल जाता है। इसके अलावा चने के सत्तू और आटे से मिलकर बनी रोटी भी इस समस्या से राहत दिलाती है।
4) काला चना शरीर की गंदगी को पूरी तरह से बाहर भी निकालता है ।
● एनर्जी बढ़ाता है, डायबिटीज से छुटकारा मिलता है,एनीमिया की
समस्या दूर होती है, बुखार मेंपसीना आने की समस्या दूर होती है, पुरुषोंके लिए फायदेमंद, हिचकी में राहत दिलाता है, जुकाम में आराम मिलता है, मूत्र संबंधित रोग दूर होते हैं, त्वचा की रंगत निखारता है।
● डायबिटीज से छुटकारा दिलाता है चना ताकतवर होने के साथ ही शरीर में एक्स्ट्रा ग्लूकोज की मात्रा को कम करता है जो डायबिटीज के मरीजों के लिए कारगर होता है। लेकिन इसका सेवन सुबह-सुबह खालीपेट करनाचाहिए। चने का सत्तू डायबिटीज़ से बचाता है। एक से दो मुट्ठी ब्लड चने का सेवन ब्लड शुगर की मात्रा को भी नियंत्रित करने के साथ ही जल्द आराम पहुंचाता है।
● एनीमिया की समस्या दूर होती हैशरीर में आयरन की कमी से होने वाली एनीमिया की समस्या को रोजाना चने खाकर दूर किया जा सकता है। चने में शहद मिलाकर खाना जल्द असरकारक होता है। आयरन से भरपूर चना एनीमिया की समस्या को काफी हद तक कम कर देता है। चने में 27 फीसदी फॉस्फोरस और 28 फीसदी आयरन होता है जो न केवल नए बल्ड सेल्स को बनाता है, बल्कि हीमोग्लोबिन को भी बढ़ाता है।
● हिचकी में राहत दिलाएहिचकी की समस्या से ज्यादा परेशान हैं, तो चने के पौधे के सूखे पत्तों का धूम्रपान करने से हिचकी आनी बंद हो जाती है। साथ ही चना आंतों/इंटेस्टाइन की बीमारियों के लिए भी काफी फायदेमंद होता है।
● बुखार में पसीना आने परबुखार में ज्यादा पसीना आने पर भुने हुए चने को पीसकर, उसमें अजवायन मिलाएं। फिर इससे मालिश करें। ऐसा करने से पसीने की समस्या खत्म हो जाती है।
● मूत्र संबंधित रोग में आरामभुने हुए चने का सेवन करने से बार-बार पेशाब जाने की बीमारी दूर होती है। साथ ही गुड़ व चना खाने से यूरीन से संबंधित किसी भी प्रकार की समस्या में राहत मिलती है। रोजाना भुने हुए चनों के सेवन से बवासीर ठीक हो जाती है।
● पुरुषों के लिए फायदेमंदचीनी-मिट्टी के बर्तन में रातभर भिगोए हुए चने को चबा-चबाकर खाना पुरुषों के लिए बहुत फायदेमंद होता है। पुरुषों की कई प्रकार की कमजोरी की समस्या खत्म होती है। जल्द असर के लिए भीगे हुए चने के साथ दूध भी पिएं। भीगे हुए चने के पानी में शहद मिलाकर पीने से पौरुषत्व बढ़ता है।
● त्वचा की रंगत निखारता हैचना केवल हेल्थ के लिए ही नहीं, स्किन के लिए भी बहुत फायदेमंद है। चना खाकर चेहरे की रंगत को बढ़ाया जा सकता है।

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आयुर्वेद में चने की दाल और चने को शरीर के लिए स्वास्थवर्धक बताया गया है। चने के सेवने से कई रोग ठीक हो जाते हैं।
क्योंकि इसमें प्रोटीन, नमी, कार्बोहाइड्रेट, आयरन, कैल्शियम और विटामिन्स पाये जाते हैं। चना दूसरी दालों के मुकाबले सस्ता होता है और सेहत के लिए भी यह दूसरी दालों से पौष्टिक आहार है।
चना शरीर को बीमारियों से लड़ने में सक्षम बनाता है। साथ ही यह दिमाग को तेज और चेहरे को सुंदर बनाता है। चने के सबसे अधिक फायदे इन्हे अंकुरित करके खाने से होते है।
सुबह खाली पेट चने से मिलते है कई फायदे !!!
1. शरीर को सबसे ज्यादा पोषण काले चनों से मिलता है। काले चने अंकुरित होने चाहिए। क्योंकि इन अंकुरित चनों में सारे विटामिन्स और क्लोरोफिल के साथ फास्फोरस आदि मिनरल्स होते हैं जिन्हें खाने से शरीर को कोई बीमारी नहीं लगती है।
काले चनों को रातभर भिगोकर रख लें और हर दिन सुबह दो मुट्ठी खाएं। कुछ ही दिनों में र्फक दिखने लगेगा।
2. रातभर भिगे हुए चनों से पानी को अलग कर उसमें अदरक, जीरा और नमक को मिक्स कर खाने से कब्ज और पेट दर्द से राहत मिलती है।
3. शरीर की ताकत बढ़ाने के लिए अंकुरित चनों में नींबू, अदरक के टुकड़े, हल्का नमक और काली मिर्च डालकर सुबह नाश्ते में खाएं। आपको पूरे दिन की एनर्जी मिलेगी।
चने का सत्तू !!!!
चने का सत्तू भी सेहत के लिए बेहद फायदेमंद औषघि है। शरीर की क्षमता और ताकत को बढ़ाने के लिए गर्मीयों में आप चने के सत्तू में नींबू और नमक मिलकार पी सकते हैं। यह भूख को भी शांत रखता है।
पथरी की समस्या में चना !!!!
पथरी की समस्या अब आम हो गई है। दूषित पानी और दूषित खाना खाने से पथरी की समस्या बढ़ रही है। गाल ब्लैडर और किड़नी में पथरी की समस्या सबसे अधिक हो रही है। एैसे में रातभर भिगोए चनों में थोड़ा शहद मिलाकर रोज सेवन करें। नियमित इन चनों का सेवन करने से पथरी आसानी से निकल जाती है। इसके अलावा आप आटे और चने का सत्तू को मिलाकर बनी रोटियां भी खा सकते हो।
शरीर की गंदगी साफ करना !!!!
काला चना शरीर के अंदर की गंदगी को अच्छे से साफ करता है। जिससे डायबिटीज, एनीमिया आदि की परेशानियां दूर होती हैं। और यह बुखार आदि में भी राहत देता है।
डायबिटीज के मरीजों के लिए !!!!
चना ताकतवर होता है। यह शरीर में ज्यादा मात्रा में ग्लूकोज को कम करता है जिससे डायबिटीज के मरीजों को फायदा मिलता है। इसलिए अंकुरित चनों को सेवन डायबिटीज के रोगियों को सुबह-सुबह करना चाहिए।
मूत्र संबंधी रोग !!!!
मूत्र से संबंधित किसी भी रोग में भुने हुए चनों का सवेन करना चाहिए। इससे बार-बार पेशाब आने की दिक्कत दूर होती है। भुने हुए चनों में गुड मिलाकर खाने से यूरीन की किसी भी तरह समस्या में राहत मिलती है।
पुरूषों की कमजोरी दूर करना !!!!!
अधिक काम और तनाव की वजह से पुरूषों में कमजोरी होने लगती है। एैसे में अंकुरित चना किसी वरदान से कम नहीं है। पुरूषों को अंकुरित चनों को चबा-चबाकर खाने से कई फायदे मिलते हैं। इससे पुरूषों की कमजोरी दूर होती है। भीगे हुए चनों के पानी के साथ शहद मिलाकर पीने से पौरूषत्व बढ़ता है। और नपुंसकता दूर होती है।
पीलिया के रोग में !!!!
पीलिया की बीमारी में चने की 100 ग्राम दाल में दो गिलास पानी डालकर अच्छे से चनों को कुछ घंटों के लिए भिगो लें और दाल से पानी को अलग कर लें अब उस दाल में 100 ग्राम गुड़ मिलाकर 4 से 5 दिन तक रोगी को देते रहें। पीलिया से लाभ जरूरी मिलेगा।
त्वचा की समस्या में !!!!
चने के आटे का नियमित रूप से सेवन करने से थोड़े ही दिनों में खाज, खुजली और दाद जैसी त्वचा से संबंधित रोग ठीक हो जाते हैं। ये भी पढे-चेहरे को सुंदर बनाने के तरीके
कफ दूर करे !!!!
लंबे समय से चली आ रही कफ की परेशानी में भुने हुए चनों को रात में सोते समय अच्छे से चबाकर खाएं और इसके बाद दूध पी लें। यह कफ और सांस की नली से संबंधित रोगों को ठीक कर देता है।
चेहरे की चमक के लिए चना !!!!
चेहरे की रंगत को बढ़ाने के लिए नियमित अंकुरित चनों का सेवन करना चाहिए। साथ ही आप चने का फेस पैक भी घर पर बनाकर इस्तेमाल कर सकेत हो। चने के आटे में हल्दी मिलाकर चेहरे पर लगाने से त्वचा मुलायम होती है। महिलाओं को हफ्ते में कम से कम एक बार चना और गुड जरूर खाना चाहिए।
चने को आप खाने में जरूर इस्तेमाल करें। यह किसी दवा से कम नहीं है। चने खाने से एक नहीं कई फायदे मिलते हैं तो क्यों नहीं अंकुरित चनों का इस्तेमाल रोज किया जा सकता है।

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असमय आनेवाले वृद्धत्व को रोकने के लिए सरल उपाय
पहला प्रयोगः त्रिफला एवं मुलहठी के चूर्ण के समभाग मिश्रण में से 1 तोला चूर्ण दिन में दो बार खाने से असमय आनेवाला वृद्धत्व रुक जाता है।
दूसरा प्रयोगः आँवले एवं काले तिल को बराबर मात्रा में लेकर उसका 1 से 2 ग्राम बारीक चूर्ण घी या शहद के साथ लेने से असमय आने वाला बुढ़ापा दूर होता है एवं शक्ति आती है।

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आजीवन स्वस्थ रहने के लिए 19 घरेलु नुस्खे--
(1) खड़े -खड़े पानी पीने से घुटनों में दर्द की बीमारी होती है इसलिए खाना पीना बैठ कर करना चाहिए।
(2) नक्क्सीर आने पर तुरंत नाक में देशी घी लगाना चाहिए, नाक से खून आना तुरंत बंद हो जाता है
(3) बच्चों को पेशाब ना उतारे तो स्नान घर में ले जाकर टूटी खोल दें पानी गिराने की आवाज़ सुनकर बच्चे का पेशाब उतर जायेगा
(4) बस में उलटी आती हो तो सीट पर अखबार रखकर बैठने से, उलटी नहीं आती
(5) कद बढ़ाने के लिए अश्वगंधा व मिश्री बराबर मात्र में चूरन बना कर 1 चम्मच भोजन के बाद लें
(6) बाल गिरने लगें हों तो 100 ग्राम नारियल तेल में 10 ग्राम देशी कपूर मिलाकर जड़ों में लगायें
(7) सर में खोरा हो, शरीर पर सूखी खुजली हो तो भी इसी तेल को लगाने से लाभ मिलता है
(8) दिन में दो बार खाना, तो दो बार शौच भी जाना चाहिए, क्योंकि "रुकावट" ही रोग होता है
(9) आधा सर दर्द होने पर, दर्द होने वाली साईड की नाक में 2-3 बूँद सरसों का तेल जोर से सूंघ लें
(10) जुकाम होने पर सुहागे का फूला 1 चम्मच, गर्म पानी में घोल कर पी लें
15 मिनट में जुकाम गायब
(11) चहरे को सुन्दर बनाने के लिए 1 चम्म्च दही में 2 बूंद शहद मिला कर लगायें 10 मिनट बाद धो लें
(12) इसी नुसखे को पैरो की बिवाईयों में भी प्रयोग कर सकतें हैं, लाभ होगा
(13) हाई बी.पी. ठीक करने के लिए 1 चम्मच प्याज़ का रस में 1 चम्मच शहद मिलाकर चाटें (सुगर के रोगी भी ले सकतें हैं)
(14) लो बी.पी.ठीक करने के लिए 32 दाने किसमिस के रात को कांच के गिलास में भिगो दें सुबह 1-1 दाना चबा-चबा कर खाएं (रोज़ 32 दाने खाने हैं 32 दिनों तक)
(15) कब्ज़ ठीक करने के लिए अमलताश की फली (2 इंच) का काढ़ा बनाकर शाम को भोजन के बाद पियें
(16) कमर में दर्द होने पर 100 ग्राम खसखस में 100 ग्राम मिश्री मिला कर चूर्ण बनायें, भोजन के बाद 1 चम्मच गर्म दूध से लें
(17) सर चक्कर आने पर 1 चम्मच धनियाँ चूर्ण में 1 चम्मच आंवला चूर्ण मिलाकर ठन्डे पानी से लें
(18) दांतों में दर्द होने पर 1 चुटकी हल्दी, 1 चुटकी काला नमक, 5 बूंद सरसों तेल मिलाकर लगायें
(1 9) टौंसिल होने पर अमलताश की फली के काढ़े से गरारे करें, ठीक हो जायेगें।
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