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........Mumma..😔😔😔😔😔😔
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कुछ कुछ रूठे से, लगते हो,
शायद अंदर तक टूटे लगते हो ॥

बिखरे टुकड़ो की आहट सुनी है मैंने
ये किसके हाथों से छूटे लगते हो ॥

नम आँखें सब बयाँ, कर रही है,
अपनों के हाथों से लूटे लगते हो ॥

जोड़ दूँ ज़रा क़रीब आओ तुम मेरे
तुम जहाँ जहाँ से, टूटे लगते हो ॥

मुस्कुराकर ग़म अपना छुपा रहे हो
मेरी तरह तुम भी झूठे लगते हो ॥

आओ तुम्हें इक नाम मैं दे दूँ,
तुम गुलमोहर के बूटे लगते हो ॥

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Good evening dear friends 😊
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जो भी दुनिया में मुहब्बत पे जाँ निसार करे
ऐसे दीवाने से आखिर क्यूँ कोई प्यार करे

रेत प्यासा सा तड़पता है हर साहिल पे
कितनी सदियों से वो लहरों का इंतजार करे

बाँटते रहते हैं वफा वो कई किश्तों में
बेवफाई का यहाँ जो भी कारोबार करे

चाहता हूँ, तेरे दामन का किनारा तो मिले
दिल भी आख़िर ये फरियाद कितनी बार करे


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कुतुबुद्दीन घोड़े से गिर कर मरा, यह तो सब जानते हैं, लेकिन कैसे?

यह आज हम आपको बताएंगे..

वो वीर महाराणा प्रताप जी का 'चेतक' सबको याद है,
लेकिन 'शुभ्रक' नहीं!
तो मित्रो आज सुनिए कहानी 'शुभ्रक' की......

सूअर कुतुबुद्दीन ऐबक ने राजपूताना में जम कर कहर बरपाया, और उदयपुर के 'राजकुंवर कर्णसिंह' को बंदी बनाकर लाहौर ले गया।
कुंवर का 'शुभ्रक' नामक एक स्वामिभक्त घोड़ा था,
जो कुतुबुद्दीन को पसंद आ गया और वो उसे भी साथ ले गया।

एक दिन कैद से भागने के प्रयास में कुँवर सा को सजा-ए-मौत सुनाई गई.. और सजा देने के लिए 'जन्नत बाग' में लाया गया। यह तय हुआ कि राजकुंवर का सिर काटकर उससे 'पोलो' (उस समय उस खेल का नाम और खेलने का तरीका कुछ और ही था) खेला जाएगा..
.
कुतुबुद्दीन ख़ुद कुँवर सा के ही घोड़े 'शुभ्रक' पर सवार होकर अपनी खिलाड़ी टोली के साथ 'जन्नत बाग' में आया।

'शुभ्रक' ने जैसे ही कैदी अवस्था में राजकुंवर को देखा, उसकी आंखों से आंसू टपकने लगे। जैसे ही सिर कलम करने के लिए कुँवर सा की जंजीरों को खोला गया, तो 'शुभ्रक' से रहा नहीं गया.. उसने उछलकर कुतुबुद्दीन को घोड़े से गिरा दिया और उसकी छाती पर अपने मजबूत पैरों से कई वार किए, जिससे कुतुबुद्दीन के प्राण पखेरू उड़ गए! इस्लामिक सैनिक अचंभित होकर देखते रह गए..
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मौके का फायदा उठाकर कुंवर सा सैनिकों से छूटे और 'शुभ्रक' पर सवार हो गए। 'शुभ्रक' ने हवा से बाजी लगा दी.. लाहौर से उदयपुर बिना रुके दौडा और उदयपुर में महल के सामने आकर ही रुका!

राजकुंवर घोड़े से उतरे और अपने प्रिय अश्व को पुचकारने के लिए हाथ बढ़ाया, तो पाया कि वह तो प्रतिमा बना खडा था.. उसमें प्राण नहीं बचे थे।
सिर पर हाथ रखते ही 'शुभ्रक' का निष्प्राण शरीर लुढक गया..

भारत के इतिहास में यह तथ्य कहीं नहीं पढ़ाया जाता क्योंकि! ऐसी दुर्गति वाली मौत बताने से हिचकिचाते है। कई प्राचीन पुस्तकों में कुतुबुद्दीन की मौत इसी तरह लिखी बताई गई है।

नमन स्वामीभक्त 'शुभ्रक' को.. 🙏

पढ़कर सीना चौड़ा हुआ हो तो शेयर कर देना।
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Good morning dear friends
🌿🌼🌿Have a lovely day 🌿🌼🌿
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💕💗💕💗💕💗💕💗💕💗💕💗💕💗💕💗💕
💗यह तस्वीर आप की मुझे हरदम दिखाई देती है....

💕आपकी आवाज़ मुझे हरदम सुनाई देती है .....

💗मैं दूर हूँ ...आप से पर जुदा नहीं…

💕यह यादें आपकी, मुझे कभी ना रिहाई देगी...!

💗मोहब्बत अपने आप में एक दुनिया ही तो है..!!!

💕शायर का हर लफ्ज़,ग़ज़ल-इ-मोहब्बत को गहराई देगी…

💗मैं तो ज़मीन की तरह हूँ, मेरा आसमान हो आप…

💕ज़मीन आसमान को उम्र भर सिर्फ दुहाई देगी….

💗गुज़रते हुए वक़्त के साथ हर चीज़ बदलती हैं…

💕तेरे मीठे बोल,मेरी ज़िन्दगी को रंग-इ-आशनाई देगी…

💗मोहब्बत में दिल का हर एहसास बहुत अनमोल है…

💕कौन कहता है यह के मोहब्बत हमें, सिर्फ जुदाई देगी…..!!
💗💕💗💕💗💕💗💕💗💕💗💕💗💕💗💕💗💕

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शुभ प्रभात 🙏 मेरे समुदाय के प्यारे सदस्यों
आप सभी का दिन मंगलमय हो

प्रेम इस जीवन का मूल आधार होता है
निश्चल भावों का इसमें संचार होता है
इक मन दूजे मन को तब ही पढ़ पाता है
ईश्वर का जब हम पर यह उपकार होता है
दुनिया में जीना सुनो आसान नहीं होता
जीत लेगा निज मन, वही बस पार होता है
राहों पर असत्य की यहाँ जो भी है चलता
जीवन उसका तो हाँ केवल खार होता है
परवाह करे जो अपनों की जान से बढ़कर
जीतने हर बाजी वही तैयार होता है
कर लो तुम चाहे पूरी दुनिया का भ्रमण
चरणों में मात पिता के संसार होता।
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​दर्द कागज़ पर,​
​मेरा बिकता रहा,​

​मैं बैचैन था,​
​रातभर लिखता रहा..​

​छू रहे थे सब,​
​बुलंदियाँ आसमान की,​

​मैं सितारों के बीच,​
​चाँद की तरह छिपता रहा..​

​अकड होती तो,​
​कब का टूट गया होता,​

​मैं था नाज़ुक डाली,​
​जो सबके आगे झुकता रहा..​

​बदले यहाँ लोगों ने,​
​रंग अपने-अपने ढंग से,​

​रंग मेरा भी निखरा पर,​
​मैं मेहँदी की तरह पीसता रहा..​

​जिनको जल्दी थी,​
​वो बढ़ चले मंज़िल की ओर,​

​मैं समन्दर से राज,​
​गहराई के सीखता रहा..!!​

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