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देशवासियों को हिन्दी में भारतीय और English में Bhartiya कहा जाये।

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Oxford Dictionary के पृष्ठ नं० 789 पर लिखा है Indian, जिसका अर्थ लिखा है... old-fashioned & criminal peoples अर्थात् पिछड़े और घिसे-पिटे विचारों वाले अपराधी लोग। अत: इण्डिया (India) का अर्थ हुआ पिछड़े हुए और अपराधी लोगों का देश।

भारत माता तथा भारतीयों का अपमान करने के लिए गोरों ने यह नाम रखा था। क्यों ना हमारे देश को हिन्दी में भारत और English में Bharat कहा जाये।

सुप्रीम कोर्ट ने भी एक जनहित याचिका पर केंद्र और सभी राज्य सरकारों को नोटिस जारी किया था। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एच एल दत्तू और जस्टिस अरुण मिश्रा की खंडपीठ ने देश का नाम 'भारत' करने को लेकर दायर जनहित याचिका पर संज्ञान लेते हुए केंद्र व राज्य सरकारों को निर्देश दिया था कि वह सभी सरकारी और गैर-सरकारी कार्यों के लिए 'भारत' शब्द का इस्तेमाल करें, इस पर कोर्ट ने केंद्र और राज्यों से जवाब मांगा।

विदेशी लोगों के मन में जिज्ञासा होती है कि हिन्दुस्तान और भारत एक ही देश का नाम है लेकिन इसका नाम इंडिया किसने और क्यों रखा? आइए, इतिहास के कुछ छुपे पहलुओं से पर्दा उठाने की कोशिश करते हैं।

संविधान के अनुच्छेद एक में 'इंडिया' का उल्लेख एक संदर्भ के तौर पर ही था। ताकि भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 को संविधान के अनुच्छेद 395 से बदला जा सके। इसीलिए देश का उल्लेख 'इंडिया' के तौर पर किया गया।

जनहित याचिका में कहा गया है कि संविधान सभा में देश का नाम रखने के लिए ‘भारत, हिंदुस्तान, हिंद और भारतभूमि या भारतवर्ष और उस तरह का नाम’ रखने के प्रमुख सुझाव आए थे। यह याचिका महाराष्ट्र के सामाजिक कार्यकर्ता निरंजन भटवाल ने दायर की थी।

अमेरिका को English में भी America, जापान को Japan, भूटान को Bhutan, श्रीलंका को Sri Lanka, बांग्लादेश को Bangladesh और नेपाल को Nepal ही कहते हैं। यहाँ तक कि हमारे सबसे बड़े और नजदीकी प्रतिद्वन्द्वी पाकिस्तान को English में भी Pakistan ही कहते हैं। भारत को ही English में India क्यों कहते हैं?

आज सभी गैर-सरकारी संगठनों, कॉरपोरेट्स और सरकारी विभागों में 'इंडिया' शब्द के इस्तेमाल का ही प्रचलन है। हम ही अपने ही देश के बारे में जो ऊटपटांग India कहते हैं, वह विदेश में रहने वाले भारतीयों को बहुत बुरा और अपमानजनक लगता है।

अप्रवासी भारतीयों के विचार में अपराध हर देश में होते हैं और भारत से अधिक होते हैं, पर यहाँ के लोगों की तरह वे ढोल पीट-पीट कर Indian जिसका अर्थ लिखा है... old-fashioned & criminal peoples अर्थात् पिछड़े और घिसे-पिटे विचारों वाले अपराधी लोग, कह कर अपने देश को बदनाम नहीं करते।

अप्रवासी भारतीयों दूर बैठे अपने देश से अत्यंत जुड़ाव महसूस करते हैं तो इस दिशा में अपने देशवासियों को भी विचार करना चाहिए तथा इसके लिए भी आवाज़ उठाई जाए कि भारत देश का हिन्दी और इंग्लिश और हर भाषा में एक ही नाम हो, भारत।

हमें इस बात के लिए आवाज़ उठानी चाहिए। और जिस डिक्शनरी में India शब्द का अर्थ इतना घृणित हो, उसका बहिष्कार किया जाए। कुछ बदलना है तो आक्सफोर्ड डिक्शनरी का वह अपमानजनक पृष्ठ बदला जाना चाहिए।

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Oxford Dictionary के Online संस्करण पर Indian का अर्थ सुधारा लेकिन कब यह प्रश्न है ? जानकारी शेयर होनी चाहिए !

भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 को संविधान के अनुच्छेद 395 से बदलने के लिए India का प्रयोग किया गया था कि नही !

संविधान सभा में देश का नाम रखने के लिए ‘भारत, हिंदुस्तान, हिंद और भारतभूमि या भारतवर्ष और उस तरह का नाम’ रखने के प्रमुख सुझाव आए थे कि नही !

सन 1947 के Oxford Dictionary के पृष्ठ नं० 789 पर Indian का अर्थ ... old-fashioned & criminal peoples अर्थात् पिछड़े और घिसे-पिटे विचारों वाले अपराधी लोग लिखा है कि नही !

Oxford Dictionary किसके कहने पर Indian का अर्थ कब सुधारा है, यह लिखा जाय, यह आनलाईन सुधरा है लेकिन प्रिन्टेड मे क्या है ? कभी कभी शब्दो का अर्थ बदलने के बाद भी शब्द पुराने अर्थो से जाना-पहचाना जाता है|

देशवासियों को हिन्दी में भारतीय और English में Bhartiya कहा जाये कि नही !

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संवैधानिक पदो पर बैठे लोगो ने
किसानों और खेती से किया है - धोखा

क्या संविधान ने
70 सालो मे रोका ?

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2008 में सरकारी टीचर का वेत्तन 30000 रुपये
2016 में वेतन 50000 रुपये

2008 में किसान के गेहूँ की कीमत 1300 रुपये 2016 में 1500 रुपये

2008 में कपास 3500 रुपये
2016 में 4500 रुपये

विधायक का वेतन
2008 में 60000 रुपये
2016 में 125000 रुपये

2008 में मक्का 1000 रुपये
2016 में 1200 रुपये

ज्वार 2008 मे 1200 रुपये
2016 में 1400 रुपये

दूसरी ओर कीटनाशकों के दाम डबल

डी ए पी
2008 में 450 रुपये
2016 में 1250 रुपये

पोटाश
2008 में 400 रुपये से 900 रूपये
सुपर
2008 में 150 रुपये से 2016 में 300 रुपये

किसानों की आय डबल क्यों नही????

संवैधानिक पदो पर बैठे लोगो ने
अपने लिए किया अच्छा-अच्छा
अपने हितो का किया
चाक चौबंद सुरक्षा

सात वेतन आयोग
बना दिये हैं अब तक।
खेती किसानी
हाशिए पर कब तक

संविधान के तीनो स्तम्भ
का देखो,
अकड़, वैभव और दंभ

ऐश करता है ए0 सी0 मे
किसान गूजार देता है
जिन्दगी वेबसी मे

संवैधानिक पदो पर बैठे
लोगो के बच्चे हौते है ऐठे

जनता के पैसो पर
बच्चे भी रहते है मौज मे
किसान खेत में मरता है और
किसान का बेटा फौज में,

😊😢🙈🙉🙊😥😣

��यदि किसानों ने खेती
करना छोड़ दिया तो
*संवैधानिक पदो पर बैठे लोगो का संविथान
और संविथान की शपथ*
उद्योगपतियों के कारखाने
नेताओं के भाषण🎤
और देश का विकास
*सब धरे के धरे रह जाएंगे*।।

😊😢🙈🙉🙊😥😣
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संविधान V/S मनुवाद

😀😀😀😀😁

संविधान से अच्छी व्यवस्था थी - मनुवाद मे सामाज को जोड़ने की| लेकिन जिस प्रकार समाज के अलग अलग तपको ने संविधान को हाशिए पर रख, स्वार्थ सिध्द करने मे लगे है, कुछ ऐसा ही मनुवादी व्यवस्था मे हुआ, निम्न का अवलोकन करे :-

मै मनुवाद का बहुत सम्मान करता हूँ इसलिए इस पोस्ट को शेर करने से अपने आप को रोक नहीं पाया।

मनुवाद ने समाज को तोड़ा नही अपितु जोडा है।

🤷‍♂🤝मनुवाद ने विवाह के समय समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े दलित को जोड़ते हुये अनिवार्य किया कि दलित स्त्री द्वारा बनाये गये चुल्हे पर ही सभी शुभाशुभ कार्य होगें। इस तरह सबसे पहले दलित को जोडा गया .....

🤷‍♂🤝 धोबन*के द्वारा दिये गये जल से से ही कन्या सुहागन रहेगी इस तरह धोबी को जोड़ा...

🤷‍♂🤝 कुम्हार द्वारा दिये गये मिट्टी के कलश पर ही देवताओ के पुजन होगें यह कहते हुये कुम्हार को जोड़ा...

🤷‍♂🤝 मुसहर जाति जो वृक्ष के पत्तों से पत्तल/दोनिया बनाते है यह कहते हुये जोड़ा कि इन्हीं के बनाए गये पत्तल/दोनीयों से देवताओं का पुजन सम्पन्न होगे...

🤷‍♂🤝 कहार जो जल भरते थे यह कहते हुए जोड़ा कि इन्हीं के द्वारा दिये गये जल से देवताओं के पुजन होगें...

🤷‍♂🤝 बिश्वकर्मा जो लकड़ी के कार्य करते थे यह कहते हुये जोड़ा कि इनके द्वारा बनाये गये आसन/चौकी पर ही बैठकर वर-वधू देवताओं का पुजन करेंगे ...

🤷‍♂🤝 फिर वह हिन्दु जो किन्हीं कारणों से *मुसलमान*बन गये थे उन्हें जोड़ते हुये कहा गया कि इनके द्वारा सिले हुये वस्त्रों (जामे-जोड़े) को ही पहनकर विवाह सम्पन्न होगें...

🤷‍♂🤝फिर उस हिन्दु से मुस्लिम बनीं औरतों को यह कहते हुये जोड़ा गया कि इनके द्वारा पहनाई गयी चूडियां ही बधू को सौभाग्यवती बनायेगी...

🤷‍♂🤝 धारीकार जो डाल और मौरी को दुल्हे के सर पर रख कर द्वारचार कराया जाता है,को यह कहते हुये जोड़ा गया कि इनके द्वारा बनाये गये उपहारों के बिना देवताओं का आशीर्वाद नहीं मिल सकता....

🤷‍♂🤝 डोम जो गंदगी साफ और मैला ढोने का काम किया करते थे उन्हें यह कहकर जोड़ा गया कि मरणोंपरांत इनके द्वारा ही प्रथम मुखाग्नि दिया जायेगा....

👉इस तरह समाज के सभी वर्ग जब आते थे तो घर कि महिलायें मंगल गीत का गायन करते हुये उनका स्वागत करती है। और पुरस्कार सहित दक्षिणा देकर बिदा करती थी...,

मनुवाद का दोष कहाँ है?...हाँ ब्राह्मणों का दोष है कि इन्होंने अपने सुविधानुसार स्वार्थ की सिध्द करने की परिकाष्ठा की, शोषण किया, जिस वजह से मनुवाद के ऊपर निराधार आरोपों लगाये गये, ब्राह्मणों ने कभी खंडन नहीं किया, जो मनुवाद के अपमान का कारण बन गया।

इस तरह जब समाज के हर वर्ग की उपस्थिति हो जाने के बाद ब्राह्मण नाई से पुछता था कि क्या सभी वर्गो कि उपस्थिति हो गयी है...?

🤙 नाई के हाँ कहने के बाद ही ब्राह्मण मंगल-पाठ प्रारम्भ किया करते हैं।

मनुवाद द्वारा समाज जोड़ने कि क्रिया को आगे बढाया गया लेकिन ब्राह्मण लोगों ने अपने कर्मो का दोष मनुवाद पर लगा दिया।

संविधान की वर्तमान स्थिती मनुवाद से भिन्न नही है, संविधान के ब्राह्मण न्यायपालिका और न्यायधीश है, यह सुविधानुसार स्वार्थ की सिध्द के लिए स्वंय को स्वंयभु घोषीत कर दिया है| जिस प्रकार ब्राह्मण के घर मे जन्मा ही ब्राह्मण होता था. ठीक इसी प्रकार न्यायपालिका मे कार्य कर रहे - न्यायधीश और वकील ही न्यायधीश बन सकता है, इसमे संविधान का दोष कहाँ है?... न्यायधीश और वकील जो संवैधानिक व्यवस्था के ब्राह्मण है, दोष इनका है*?... लेकिन जिस प्रकार ब्राह्मणों के वजह से मनुवाद का हुआ, हमे डर है कि भविष्य मे संविधान के साथ भी ऐसा न हो |


🙏 देश में फैले हुये समाज विरोधी *साधुओं और मनुवाद विरोधी ताकतों का विरोध करना होगा जो अपनी अज्ञानता को छिपाने के लिये वेद और मनुवाद कि निन्दा करतेे हुये पूर्ण भौतिकता का आनन्द ले रहे हैं।......

💪याद रखो मनुवाद के मायने वो पण्डे नहीं जो मंदिर को दुकान बनाते हैं, ये ज्ञान का भण्डार हैं जिनसे इस श्रृष्टि की रचना हुई।.....

🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻

✍हमारा उद्देश्य अपनी पुरातन संस्कृति के अच्छे स्वरूप और सही अवधारणा के प्रस्तुतिकरण भर है ।

🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻
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भारतीय संविधान की विशेषता और संवैधानिक कारनामे

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आज विद्यालय में बहुत चहल पहल है।

सब कुछ साफ - सुथरा, एक दम सलीके से ।

सुना है निरीक्षण को कोई साहब आने वाले हैं।

पूरा विद्यालय चका-चक ।

नियत समय पर साहब विद्यालय पहुंचे ।
.
ठिगना कद, रौबदार चेहरा और आँखें तो जैसे जीते जी पोस्टमार्टम कर दें ।

पूरे परिसर के निरीक्षण के बाद उनहोंने कक्षाओं का रुख किया ।

कक्षा पांच के एक विद्यार्थी को उठा कर पूछा, बताओ देश का प्रधान मंत्री कौन है ?

बच्चा बोला - जी राम लाल ।

साहब बोले - बेटा प्रधान मंत्री ?

बच्चा - रामलाल ।

अब साहब गुस्साए - अबे तुझे पांच में किसने पहुंचाया ? पता है मैं तेरा नाम काट सकता हूँ ।

बच्चा - कैसे काटोगे ? मेरा तो नाम ही नहीं लिखा है।

मैं तो बाहर बकरी चरा रहा था । इस मास्टर ने कहा कक्षा में बैठ
जा दस रूपये मिलेंगे ।

तू तो ये बता रूपये तू देगा या मास्टर ?

साहब भुनभुनाते हुवे, मास्टर जी के पास गए, कड़क आवाज में पूछा - क्या मजाक बना रखा है । फर्जी बच्चे बैठा रखे हैं । पता है मैं तुम्हे नौकरी से बर्खास्त कर सकता हूँ।

गुरूजी - कर दे भाई । मैं कौन सा यहाँ का मास्टर हूँ ।

मास्टर तो मेरा पड़ोसी दुकानदार है । वो दुकान का सामान लेने शहर गया है। कह रहा था एक खूसट साहब आएगा, झेल लेना ।

अब तो साहब का गुस्सा सातवें आसमान पर । पैर पटकते हुए प्रधानाध्यापक के सामने जा पहुंचे।

चिल्लाकर बोले, "क्या अंधेरगर्दी है, शर्म नहीं आती । क्या इसी के लिए तुम्हारे स्कूल को सरकारी मदद मिलती है।

पता है, मैं तुम्हारे स्कूल की मान्यता समाप्त कर सकता हूँ, जवाब दो प्रिंसिपल साहब ।

प्रिंसिपल ने दराज से एक सौ की गड्डी निकाल कर मेज पर रखी और बोला - मैं कौन सा प्रिंसिपल हूँ, प्रिंसिपल तो मेरे चाचा हैं, प्रॉपर्टी डीलिंग भी करते हैं, आज एक सौदे का बयाना लेने
शहर गए हैं । कह रहे थे, एक कमबख्त निरीक्षण को आएगा, उसके मुंह पे ये गड्डी मारना और दफा करना ।
.
साहब ने मुस्कराते हुए गड्डी जेब के हवाले की और बोले - आज बच गये तुम सब । अगर आज मामाजी को सड़क के ठेके के
चक्कर में शहर ना जाना होता, और अपनी जगह वो मुझे
ना भेजते तो तुम में से एक की भी नौकरी ना बचती ।

😂😜😂😂😂😂😂😂😂
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😂😂😂

न्यायपालिका और कार्यपालिका की ब्लैकमेलिंग

😁😁😁

संवैधानिक ढांचे मे विधायिका को न्यायपालिका और कार्यपालिका ब्लैकमेलिंग करती है| न्यायपालिका संवैधानिक ढांचे तथा जनहित के नाम पर यह काम पुरे शान-बाण के साथ करती है| जबकि कार्यपालिका नियम कानून और अधिकारो के नाम पर यह काम करती है|

अधिकांश न्यायधीश / जज और प्रशासनिक पदाधिकारी / कर्मचारी नौकरी पाते समय ही भारी रकम देकर नौकरी पाते हैं। बहुत कम ऐसे होते हैं जो बिना पैसे या सिफारिश के नौकरी पा जायें। स्वाभाविक है कि उनसे इमानदारी या चरित्र की उम्मीद नहीं की जा सकती। जो व्यक्ति घर के बर्तन या जमीन बेचकर एक नौकरी पाता है वह भ्रष्टाचार भी करेगा और ब्लैकमेलिंग भी करेगा। यदि नहीं करेगा तो परिवार से भी तिरस्कृत होगा और अन्य न्यायधीश / जज और प्रशासनिक पदाधिकारी / कर्मचारी मे भी मूर्ख ही माना जायेगा। ऐसी विकट परिस्थिति आज सम्पूर्ण भारत की है।

चाहे केन्द्र सरकार के कर्मचारी हों या प्रदेश सरकार के। चाहे सर्वोच्चय या उच्च न्यायालय के न्यायधीश / जज सबकी स्थिति एक समान है। चाहे हवाई जहाज के पायलट हो या बैंक कर्मचारी या कोई चपरासी। चाहे दस हजार रूपया मासिक वाला छोटा कर्मचारी हो या लाख दो लाख रूपया मासिक वाला सुविधा सम्पन्न न्यायधीश / जज और प्रशासनिक पदाधिकारी / कर्मचारी। सबकी मानसिकता एक समान है, सबकी एक जुटता एक समान है, सब स्वयं को तंत्र का हिस्सा मानते हैं। लोक को गुलाम बनाकर रखने में भी सब एक दूसरे के सहभागी हैं और लोक को नंगा करने में भी कभी किसी को कोई दया नहीं आती।

न्यायधीश / जज और प्रशासनिक पदाधिकारी / कर्मचारी की ब्लैकमेलिंग से बचने के लिये सरकार / नेता मार्ग निकालते हैं तो तू डाल डाल मैं पात पात की तर्ज पर न्यायधीश / जज और प्रशासनिक पदाधिकारी / कर्मचारी भी किसी न किसी रूप में इन तरीकों की काट खोजते रहते हैं। और यदि विशेष समय में दब भी जावे तो चुनावी वर्ष में तो वह अपना सारा बकाया सूद ब्याज समेत वसूल कर ही लेता है।

अभी कुछ प्रदेशो और केन्द्र के चुनाव होने वाले हैं, न्यायधीश / जज और प्रशासनिक पदाधिकारी / कर्मचारी लंगोट कसकर चुनावों की प्रतीक्षा कर रहे है। चुनावों से एक वर्ष पूर्व ही न्यायपालिका के न्यायधीश / जज का सरकार विरोधी आदेश यह बताने लगता है, वह संतुष्ट नही है, उसको कुछ नही बहुत कुछ चाहिए| कार्यपालिका के प्रशासनिक पदाधिकारी / कर्मचारी सांकेतिक हड़ताल और अन्य कई प्रकार के नाटक शुरू कर देते है| प्रारंभ में सरकार दबाने का नाटक करती है| कुछ लोगों का निलम्बन और कुछ की बर्खास्तगी भी होती है| समझौता वार्ता भी चलता है और अन्त में न्यायधीश / जज और प्रशासनिक पदाधिकारी / कर्मचारी की कुछ मांगे मान कर आंदोलन समाप्त हो जाता है।

प्रशासनिक पदाधिकारी / कर्मचारी की हड़ताल अवधि में की गई सारी प्रशासनिक कार्यवाही वापस हो जाती है क्योंकि सरकार और सभी नेता जानते हैं कि प्रशासनिक पदाधिकारी / कर्मचारी चुनावों में जिसे चाहें उसे जिता या हरा सकते हैं। वही न्यायधीश / जज के प्रतिकुल आदेश से सरकार की छवी बनती बीगडती रहती है| इसलिए जिसे चाहें उसे जिता या हरा सकते हैं। यद्यपि न्यायधीश / जज और प्रशासनिक पदाधिकारी / कर्मचारी की कुल संख्या मतदाताओं की तीन से छह प्रतिशत के आस पास ही होती है किन्तु उनके परिवार के गांव-गांव तक फैलाव और उनके एकजुट प्रयत्नों को मिलाकर यह अन्तर सात आठ दस प्रतिशत तक माना जाता है। आम तौर पर शायद ही कोई नेता हो जो इतना अधिक लोकप्रिय हो कि इतना बड़ा फर्क झेल सके अन्यथा दो तीन प्रतिशत का फर्क ही हार जीत के लिये निर्णायक हो सकता है।

नेता को हर पांच वर्ष में जनता का समर्थन आवश्यक होता है, जबकि न्यायपालिका और सरकारी कर्मचारी को किसी प्रकार के जनसमर्थन की जरूरत नहीं। चुनावों के समय नेताओं के दो-तीन गुट बनने आवश्यक हैं जबकि ऐसे मामलों में सभी न्यायधीश / जज और प्रशासनिक पदाधिकारी / कर्मचारी एकजुट हो जाते हैं। फिर उपर से यह भी कि न्यायधीश / जज और प्रशासनिक पदाधिकारी / कर्मचारी को सुविधा देने से नेता को न व्यक्तिगत हानि है न सरकारी क्योंकि अन्ततोगत्वा सारा प्रभाव तो जनता को झेलना है और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि नेता स्वयं अपनी सब प्रकार की सुख सुविधाएॅं बढ़ाता जाता है तो उसका नैतिक पक्ष भी मजबूत नहीं रहता। यही कारण है कि न्यायधीश / जज और प्रशासनिक पदाधिकारी / कर्मचारी का पक्ष जनविरोधी, अनैतिक ब्लैकमेलिंग का होते हुए भी नेता झुककर उनसे समझौता करने को मजबूर हो जाता है।

कोई भी सरकार चाहे कितना भी जोर लगा दे, चुनाव के समय उसे न्यायधीश / जज और प्रशासनिक पदाधिकारी / कर्मचारी के समक्ष झुकना ही पडेगा । 130 करोड की आबादी मे 127 करोड लोक के लोग है तो 3 करोड तंत्र से जुडे। इसमे भी नेताओ की कुल संख्या कुछ लाख तक सीमित है। ये ढाई करोड न्यायधीश / जज और प्रशासनिक पदाधिकारी / कर्मचारी तो परिस्थिति अनुसार एक जुट हो जाते है किन्तु पचास लाख राजनेता चुनावो के समय दो गुटो मे बट जाते है। इस समय उन्हे न देश दिखता है न समाज। इस समय उन्हे न न्याय दिखता है न व्यवस्था। उन्हे दिखता है सिर्फ चुनाव और किसी भी परिस्थिति मे वे मुठठी भर संगठित न्यायधीश / जज और प्रशासनिक पदाधिकारी / कर्मचारी का समर्थन आवश्यक समझते है। यही कारण है कि 127 करोड का "लोक - सरकार / नेता", न्यायधीश / जज और प्रशासनिक पदाधिकारी / कर्मचारी के चक्रव्यूह से अपने को कभी बचा नही पाता है। ब्लैकमेल होता है।

विचारणीय प्रश्न यह है कि जनता स्थिति से निकलने का मार्ग क्या है? सरकार / नेता चाहता है कि जनता न्यायधीश / जज और प्रशासनिक पदाधिकारी / कर्मचारी के खिलाफ खड़ी हो। लेकिन यह संभव नहीं क्योंकि जनता ने तो नेता को चुना है और नेता द्वारा बनाई गई व्यवस्था द्वारा न्यायधीश / जज और प्रशासनिक पदाधिकारी / कर्मचारी नियुक्त होते हैं।

न्यायधीश / जज और प्रशासनिक पदाधिकारी / कर्मचारी की नियुक्ति में जनता का कोई रोल नहीं होता। जनता जब चाहे न्यायधीश / जज और प्रशासनिक पदाधिकारी / कर्मचारी के विरूद्ध कुछ नहीं कर सकती जब तक उसका काम नियम विरूद्ध न हो। दूसरी ओर नेता को जो शक्ति प्राप्त है वह जनता की अमानत है। जनता चाहे तो नेता को बिना कारण हटा सकती है। ऐसी स्थिति में न्यायधीश / जज और प्रशासनिक पदाधिकारी / कर्मचारी के विरूद्ध जन आक्रोश का कोई परिणाम संभव नहीं। उचित तो यही है कि इस विकट स्थिति से निकलने की शुरूआत नेता को ही करनी पड़ेगी। यदि न्यायधीश / जज और प्रशासनिक पदाधिकारी / कर्मचारी ब्लैकमेल करता है तो उसका सारा दोष नेता का है। नेता ही समाज के प्रति उत्तरदायी है। यही मानकर आगे की दिशा तय होनी चाहिये।

यह स्पष्ट है कि न्यायधीश / जज और प्रशासनिक पदाधिकारी / कर्मचारी का गठबंधन टूटना चाहिये लेकिन अनवरत काल तक कभी टूटेगा नही। यदि नेता चाहे भी तो टूट नही सकेगा। इसका सबसे अच्छा समाधान सिर्फ निजीकरण है। अनावश्यक विभाग समाप्त हो राज्य सुरक्षा और न्याय तक सीमित हो कर्मचारियो की संख्या अपने आप कम हो जायेगी।

राज्य, रोजगार और नौकरी की अबतक चली आ रही परिभाषाओ को बदले। राज्य का काम रोजगार के अवसर पैदा करना होता है न कि नौकरी के माध्यम से रोजगार देना। यह तो गुलामी काल की परिभाषा थी जिसे अबतक बढाया जा रहा है। मौलिक परिवर्तन की आवश्यकता है और इसके लिये जनजागरण करना होगा।

कोई भी न्यायधीश / जज और प्रशासनिक पदाधिकारी / कर्मचारी जान दे देगा किन्तु निजीकरण नही होने देगा। कोई भी नेता भले ही निजीकरण की बात करे किन्तु घुम फिर कर निजी विभागो पर अनावश्यक नियंत्रण करके उन्हे परेशान करेगा जिससे वे तंत्र के चंगुल मे बने रहे। समस्या विकट है समाधान करना होगा और इसके लिये जनजागरण ही एक मात्र मार्ग है।

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महान संविधान और कानूनी व्यवस्था मे मां पर इल्जाम

पत्नी बार बार मां पर इल्जाम लगाए जा रही थी और पति बार बार उसको अपनी हद में रहने की कह रहा था लेकिन पत्नी चुप होने का नाम ही नही ले रही थी व् जोर जोर से चीख-चीखकर कह रही थी कि

"उसने अंगूठी टेबल पर ही रखी थी और तुम्हारे और मेरे अलावा इस कमरें मे कोई नही आया अंगूठी हो ना हो मां जी ने ही उठाई है।।

बात जब पति की बर्दाश्त के बाहर हो गई तो उसने पत्नी के गाल पर एक जोरदार तमाचा दे मारा, अभी तीन महीने पहले ही तो शादी हुई थी ।

पत्नी से तमाचा सहन नही हुआ वह घर छोड़कर जाने लगी और जाते-जाते पति से एक सवाल पूछा कि तुमको अपनी मां पर इतना विश्वास क्यूं है..??

तब पति ने जो जवाब दिया, उस जवाब को सुनकर दरवाजे के पीछे खड़ी, मां ने सुना तो उसका मन भर आया पति ने पत्नी को बताया कि

"जब वह छोटा था तब उसके पिताजी गुजर गए, मां मोहल्ले के घरों मे झाडू पोछा लगाकर जो कमा पाती थी, उससे एक वक्त का खाना आता था,

मां एक थाली में मुझे परोसा देती थी और खाली डिब्बे को ढककर रख देती थी और कहती थी, मेरी रोटियां इस डिब्बे में है बेटा तू खा ले,

मैं भी हमेशा आधी रोटी खाकर कह देता था कि मां मेरा पेट भर गया है मुझे और नही खाना है

मां ने मुझे मेरी जूठी आधी रोटी खाकर मुझे पाला पोसा और बड़ा किया है

आज मैं दो रोटी कमाने लायक हो गया हूं लेकिन यह कैसे भूल सकता हूं कि मां ने उम्र के उस पड़ाव पर अपनी इच्छाओं को मारा है,

वह मां आज उम्र के इस पड़ाव पर किसी अंगूठी की भूखी होगी .... यह मैं सोच भी नही सकता

तुम तो तीन महीने से मेरे साथ हो, मैंने तो मां की तपस्या को पिछले पच्चीस वर्षों से देखा है...

यह सुनकर मां की आंखे छलक उठे

वह समझ नही पा रही थी कि बेटा उसकी आधी रोटी का कर्ज चुका रहा है या

वह बेटे की आधी रोटी का कर्ज...चुका रही है, लेकिन आगे क्या हुआ ?

पत्नी पुलिस मे चली गई, घरेलु हिसा, दहेज उत्पिडन का केस दर्ज हो गया, महान संविधान और कानूनी व्यवस्था के अन्तर्गत बेटे को जेल भैज दिया गया|

मां की आंखे फिर छलक उठी, वह दौड कर बहु - बेटे के पत्नी के पास गई, पत्नी ने कहा पुलिस कौ कहो, अंगूठी आपने चुरायी है, तभी आपका बेटा जेल से छुटेगा, मां ने ऐसा किया|

ऐसा करके मां ने महानता का कार्य कर दिया लेकिन चोरी के आरोप मे बदनाम, गुमनाम और बौझ सी जिन्दगी जीया,

👌👌👌

"माँ" के बेटा कहकर "दम,तौडने बाद से अब तक बेटा सोच रहा है, कि

"दवाई, इतनी भी "महंगी,, न थी के मैं ला ना सका । 😭

बुढापे का "सहारा,, हूँ "अहसास" दिला न सका

वो "भूखी, सो गई "बहू, के "डर, से एकबार मांगकर

मैं "सुकुन,, के "दो, निवाले उसे खिला न सका ।😭

वो "दर्द, सहती रही में खटिया पर तिलमिला न सका । 😔

पेट पर सुलाने वाली को "मखमल, पर सुला न सका । 😭

जो जीवनभर" "ममता, के रंग पहनाती रही मुझे

उसे "दिवाली पर दो "जोड़ी, कपडे सिला न सका । 😭

"खर्च के डर से उसे बड़े अस्पताल, ले जा न सका । 😔

नजरें उन "बुढी, "आंखों से कभी मिला न सका ।


👌👌👌

महान संविधान और कानूनी व्यवस्था मे पत्नी की जीत और नारी का सशक्तिकरन को ज़रूर पढे, अच्छा लगे तो अपने मित्रो को फॉरवर्ड करे।

👌👌👌

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तार्किक मन्तव्य एवम् विश्लेषण

👌👌👌

"दुविधा मे दोनो गये, माया मिला, न राम"

👌👌👌

हिंदुवादी नेता ही जब विश्वासघाती हों तो किसी अन्य को दोष देने का क्या लाभ!

जिन्नाहवादी तो जिन्नाहवाद के प्रति कट्टर हैं लेकिन विश्वासघात तो हिंदू नेता ही हिंदुओं के साथ कर रहे हैं!

हर संप्रदाय के नेता अपने संप्रदाय के प्रति निष्ठावान एवं कट्टर हैं परंतु हिंदुओं के नेता हिंदू धर्म के प्रति धोखेबाज एवं ढुलमूल हैं!

मोदजी को क्या फिक्र है, हिंदुओं की ?

क्या सरकारी सहायता मिलेगी हिंदुओं को - मुसलमानों की तरह!

मोदीजी जिस तरह आपने अल्पसंख्यकों के लिए स्कॉलरशिप की व्यवस्था की है उसी तरह यदि हिंदुओं
के लिए भी स्कॉलरशिप की व्यवस्था आप कर दिए होते तो उपचुनाव में आप की शर्मनाक पराजय नहीं होती,

सभी हिंदुओं ने देख लिया है, उसको अपनी हिफाजत खुद को करनी है

तो फिर

बीजेपी और सत्ता के दलालों की क्या आवश्यकता है!

सत्ता मिली है खूब मलाई खाओ,

राम मंदिर बन चुका,

उठ चुकी धारा 370,

लागू हो चुका यूनिफॉर्म लॉ,

मौज करो, लेकिन हिंदुओं के हिमायती क्यों बनते हो!

हिन्दू जब-जब एक होता है तो सत्ता पक्की है लेकिन वह अन्याय बर्दास्त नहीं कर सकता,

उसके सामने कसाई गाय का कत्ल के लिए ले जा रहा हो तो वह खुद को रोक नहीं पाता,

उसीको प्रधानमंत्री गुंडों की फौज बता देवें तो फिर कैसे हिन्दू आजादी से बेईमानों से लड़ेगा!

इसीलिए वह निराश और उदास होकर घर बैठ गया है!

"मैं सोया नहीं हूँ, सुलाया गया हूँ

मैं खोया नहीं हूँ, भुलाया गया हूँ

सूर्य ढलता नहीं, कोई ढंक लेता है

मैं हँसता सदा, पर रुलाया गया हूँ

👌👌👌

टमाटर महंगा तो ग्राहक की हाय-हाय

टमाटर सस्ता तो किसान की हाय-हाय

हाय-हाय तो पक्की है

👌👌👌

वोट का मतलब है 20 - 22 घन्टे की बिजली लेकिन बिल 6 घन्टे का,

सैलरी सातवें वेतन आयोग की लेकिन पेट्रोल 1990 के दाम पर,

सड़कें 6 लेन लेकिन चलना फ्री ही होना चाहिए,

ट्रैन तो बुलेट चाहिए लेकिन टिकट लेने की बात नहीं होनी चाहिये,

बैंक से कर्ज तो लेना है लेकिन चुकाने के समय बैंक-सरकार को कर्ज माफ करना चाहिए,

उसके बाद कहते हैं विकास नहीं हो रहा,

कभी होगा भी नहीं भइया। यह देश नहीं तबेला है भइया, संववैधानिक संस्था विधायिका, कायपालिका. न्यायपालिका को अपने वेतन और भत्ते के लिए जनता का पैसा चाहिए, यहां जनता को घास नहीं मिलती लेकिन संववैधानिक गधों को च्वनप्राश ही चाहिए।

👌👌👌

जिन हिन्दू के कारण मोदीजी को सत्ता मिली उनको बलि का बकरा समझा,

सबका साथ - सबका विकास किए,

मस्जिद से आवाज आई - मोदी को रोको !

चर्च से आवाज आई - मोदी को रोको!!

ना मुस्लमान, ना ईसाई ने बोट दिया,

ढाक के तीन पात,

👌👌👌

"दुविधा मे दोनो गये,

माया मिला, न राम"

👌👌👌
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Magazine “न्यायालय में भटकता न्याय” “ राज्य स्थापना दिवस विशेषांक Published On 15 नवम्बर 2017 से

संवैधानिक संस्थाओं की स्थिति

झडोतोलन हुआ राष्ट्रगान हुआ, देश की प्रगति पर बाते हुई, एकता और समानता के लिए जन-जन से अपील भी किया गया। अगले ही पल मंच पर बैठे गनमान्य व्यक्तियों व अतिथियों को मिठाई की पैकेट दी जाने लगी - बच्चे भी लेने का प्रयास करते देखे गये लेकिन यह क्या बच्चों को एक-एक लड्डु देना शुरू किया और कुछ ही देर बाद दो-दो चाकलेट और फिर घर जाने को कह दिया गया। एकता समानता तथा एकसमान अवसर की सच्ची हकीकत को सक्षात देश के भविष्य - बच्चों के सामने रख दिया गया। क्या गनमान्य व्यक्तियों व अतिथियों का आदर-सत्यकार एक-एक लड्डु व दो-दो चैकलेट देकर नहीं हो सकता। कम से कम इतना त्याग तो किया ही जा सकता है। लेकिन इस देश में ऐसा होता नहीं है। देश का संविधान भी इस पर मौन है। इसलिए संवैधानिक संस्थाओं के अन्तर्गत कार्य करने वाले कर्मियों के सुख-सुविधाओं तथा वेतन-भत्तों में समय-समय पर बढ़ोतरी होता रहा है। लेकिन मनरेगा - सरकारी योजनाओं के अन्तर्गत कार्य करने वाले मजदुर के सुख-सुविधा, मजदुरी-भत्ता और न्युनतम जरूरत भी हाशिये पर है।

संविधान के तीनों स्तम्भ यथा विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका ने अपने वेतन-भत्ते को लगातार बढ़ाया है। सांसदो का वेतन-भत्ता तथा सुख सुविधा बढ़ा है। झारखंड सरकार ने बीते ढाई साल में दूसरी बार विधायकों, मंत्रियों, विधानसभा अध्यक्ष व मुख्यमंत्री का वेतन बढ़ा दिया है। विधायको के वेतन में वृद्धि लगभग सभी सरकारो ने किया है। देश की कार्यपालिका के लिए 7वें वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करने का फैसला किया गया है। सूत्रों के अनुसार, सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों से नौकरशाहों को 23 फीसदी से अधिक की वेतन वृद्धि मिल रही है। ठीक इसी तरह न्यायपालिका, शीर्ष अदालत ने सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट जजों के वेतन-भत्तों में इजाफे का प्रस्ताव दिया, जिसे सरकार ने मंजूरी दे दी। अब नए वेतन नियमों के अनुसार, भारत के प्रधान न्यायधीश को भत्तों के अलावा 2.8 लाख रुपये मासिक वेतन मिलेगा। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों के वेतन में हर 10 साल में संसोधन किया जाता है। सभी सरकारी वक्तव्य में कहा गया कि रोजमर्रा के जरूरी वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी को देखते हुए - वेतन बढ़ाया गया है।

क्या केवल सवैधानिक संस्थाओं के लोगों के लिए रोजमर्रा के जरूरी वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी हुई हैं? ऐसा नहीं है! असंगठीत क्षेत्र के कामगारों एवं मजदुरों को कीमतों में बढ़ोतरी ज्यादा प्रभावित करता है। लेकिन न तो संविधान में इसकी चिंता है और न ही संवैधानिक संस्थायें चिंता करने को तैयार है। इसलिए संवैधानिक संस्थाओं को संविधान को ताकत देने के लिए संवैधानिक संस्थायें अपने साथ ही, अपने जैसा असंगठीत क्षेत्र के कामगारों एवं मजदुरों का वेतन व भत्ता में बढ़ोतरी करना चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। मनरेगा जैसे रोजगार गारंटी योजना में मजदुरी केवल एक रूपया का बढ़ाया गया है। जिसको देखकर कहा जा सकता है कि संवैधानिक संस्थाओ का रवैया ‘‘अपना काम बनता तो भाड़ में जाये - जनता‘‘ वाले कहावत को चरितार्थ कर रहें हैं।

(आलेख - प्रवीण कुमार (केसरी) B.Com., L. L. B., MARD (Advocate) जिला संयोजक, झारखण्ड आन्दोलनकारी मंच, गढ़वा)

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वार्षिक पत्रिका “न्यायालय में भटकता न्याय” “ राज्य स्थापना दिवस विशेषांक Published On 15 नवम्बर 2017 से

संविधान की प्रस्तावना

संविधान प्रस्तावना से ही प्रारम्भ होता है। और प्रस्तावना को संविधान की आत्मा कहा गया है। जैसे दुविधा मे अंर्तआत्मा की आवाज सुनने को कहा जाता है वैसे ही जब संविधानिक पक्ष के व्याख्या (निर्वचन Interpretation) को लेकर असमंजस्ता की स्थिती हो तो प्रस्तावना को आधार बनाया जाता है। क्योंकि प्रस्तावना संवैधानिक पक्ष का आईना है। संविधान के प्रस्तावना (मूल भावना) के व्याख्या का अधिकार माननीय सर्वोच्च न्यायालय को है। संविधान की ही आड़ लेकर संविधान को ही किनारे करने का प्रसंग समाने आया है।

वैसे बड़े बड़े बुद्धिजीवी, अनुभवी कानूनविद्, बढी हुई सफेद दाढी व लंबे सफेद बाल वाले चिंतक और वृद्ध प्रस्तावना को उतना ही मान्यता देते है जितने से इनको सहजता हो। दोहरे चरित्र वाले लोग प्रस्तावना की आड़ मे अपना ऐजैंडा चलाते है। और इस बात के लिए ललायित रहते है कि समाज उन्हे उदार बुद्धिजीवी के तौर पर जाने और कुछ पुरुस्कारो की दोड़ मे आ जाए, चाहे उनका कार्यक्षैत्र कुछ भी हो। ऐसा बुद्धिजीवीवाद देश के लिए बाहरी खतरो से भी ज्यादा खतरनाक है।

संविधान ऐसी आजादी को स्वीकृत नही करता है। खोखली तार्किकता के लिए संविधान की गलत व्याख्या करने से गलत संवैधानिक संदेश जाता है। यह सिर्फ अराजकता को जन्म देता है। देश को कोसने वाले छदम् विद्वान मानवाधिकार की आड़ मे विरोधस्वरुप सड़क पर उतर आते हैं। सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँच जाते हैं। लेकिन देश की आन-बान-शान पर गुमनामी के अंधेरे में खो जाते हैं। ऐसे लोग सत्ता पक्ष से खुश ना हो तो वो अक्सर मिथ्या आलोचना व विरोधी स्वभाव मे समा जाते है। हैरानी और क्षोभ तब और ज्यादा होता है जब संविधान की व्याख्या का अधिकार रखने वाला उच्चतम न्यायालय इस संदर्भ मे मौन रहता है।

संविधान का उद्देशय जनभावना की स्वीकृति है। उच्चतम न्यायालय इनको तवज्जो ना दें। इसमें ही संविधान, नागरिको और देश का हित है।

(आलेख - प्रवीण कुमार (केसरी) B.Com., L. L. B., MARD (Advocate) जिला संयोजक, झारखण्ड आन्दोलनकारी मंच, गढ़वा)
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वार्षिक पत्रिका “न्यायालय में भटकता न्याय” “ राज्य स्थापना दिवस विशेषांक Published On 15 नवम्बर 2017 से

संवैधानिक संस्थाओं का सत्य

कौन नही जानता कि हमे सत्य बोलना चाहिए पर कौन बोलता है! खुद सत्य बोलने की बात छोड़िये बल्कि आज समाज सत्य बोलने वाले को मुर्ख समझता है। आज सत्य सिखाने के लिए बच्चे को स्कूल नही भेजा जाता बल्कि झूठ सिखाने के लिए भेजा जाता है। क्यूकिं बिना झूठ सीखे तो वो ‘आधुनिक समाज’ मे सरवाईव ही नही कर पाएगा। कौन सी धारणा है ये, कैसी शिक्षा है ये ? सत्य नही बोल सकते ! कम से कम सत्य बोलने वाले का आदर तो करना चाहिए। लेकिन ऐसा हो रहा है, यह दावा के साथ कहा नहीं जा सकता है। ऐसी शिक्षा और धारणा से तैयार व्यक्तित्व क्या कभी विवेकी हो सकता है? कदापि नही, भले ही उसके पास उपाधियो का पूरा पुलिंदा क्यूं ना हो। देश में संवैधानिक पदो पर कार्य कर रहे, पढे लिखे लोग ही सबसे ज्यादा गलत काम करते है, कार्यपालिका और न्यायपालिका में “सत्य मेव जयते” जरूर लिख दिया जाता है। लेकिन यहाँ सत्य को दिखाया-सिखाया नही जाता है। यहाँ का सत्य हर व्यक्ति जानता है। सत्य का ध्यान आंख मूंदने से नही बल्कि सत्य का आचरण करने से होता है। संविधान का पहला स्तम्भ विधायिका बहुमत से ही चलता है, निर्णय बहुमत से लिए जाते है, यह “लोकतंत्र” की वैश्विक धारणा है। जहाँ तक राजनीतिक जमात की बात है, संवैधानिक मार्यादाओं की उपेक्षा मे इनका शामिल होना स्वाभाविक है। क्योंकि लोकतंत्र का आधार बहुमत है तो फिर आप ‘बहुमत’ की भावनाओ से कैसे खिलवाड़ कर सकते है? यह कहने की आवश्यकता नही है। ऐसे मे संवैधानिक पदो पर बैठे लोगों के आचरण से संविधान कलंकित होता है।

संविधान का उद्देशय जनभावना की स्वीकृति है। इसलिए विधायिका चुनाव की घोषणा होते ही श्वेत-धवल, सूती-रेशमी, खादी का कुर्ता-पजामा-धोती, भगवा-लाल-हरा-नीला गमछा-पगड़ी-टोपी तथा गाँधी टोपी पहन कर, पुनः हाथ जोड़े जनसेवक कहलाना शुरू कर देते हैं। लेकिन कार्यपालिका और न्यायपालिका का जनभावना और जनमत से सीधा संबध नहीं है। इसलिए कार्यपालिका और न्यायपालिका हाथ जोड़ना तो दूर कार्यालय के सरकारी कुर्सी पर बैठने पर भी आपति कर सकता है। कभी डाट-डपट कर तो कभी बेइज्जत करके, गेट-आउट कह देता है। कार्यपालिका मदमस्त होकर अपनी चाल चलता है। जबकि न्यायपालिका, संविधान की मनमाफिक व्याख्या अपने हिसाब से कर रहा है। विधायिका इनके नाज-नखरों से दो चार होते-होते दिशा भ्रम की स्थिति में आ खड़ी हुई है। संविधान ऐसी आजादी को स्वीकृत नही करता है। संवैधानिक संस्थाओं में ही विश्वास का संकट दिखाई पड़ रहा है| ऐसे में समाज हो या सरकार, सपने रहते नहीं, सिद्धांतों से किसी को मतलब रहता नहीं, फिर संकल्प कहाँ होगा ? समाज हो या सरकार आगे तभी बढ़ सकती हैं, जब उनके पास सपने हों, सिद्धांतों कि कसौटी पर कसे हुए हो और सपनों को यथार्थ में बदलने का संकल्प हो| सौभाग्य से जब पत्रीका को सिद्धांत के तराजु पर तौलते हैं, तो सपने बोलते हैं, जो नई संकल्प नया राह खोलते हैं|

प्रवीण कुमार (केसरी)
B.Com., L. L. B., MARD (Advocate)
जिला संयोजक
झारखण्ड आन्दोलनकारी मंच, गढ़वा
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