मैकोले जो एक ब्रिटिश अधिकारी था। उसने १८३५ हमारे देश मे शिक्षा व्यवस्था की शुरुआत की।
क्या कोई अपने गुलाम को ऐसी शिक्षा देना चाहेगा कि वह बौद्धिक ,शारीरिक और आर्थिक रुप से मजबूत हो जाये? नहीं। उसकी पूरी कोशिश होगी कि वह बौद्धिक ,शारीरिक और आर्थिक रुप से कमजोर रहे। यहाँ तक की वह मानसिक रुप से भी गुलाम हो जाये। क्या हमारी शिक्षा ब्यवस्था मे इन्हीं गुणों का समावेश नहीं है ? बेरोजगारी देश के प्रति गद्दारी असमानता नैतिक ह्रास सम्प्रादायिकता,उप्भोकतावादी संस्कृति आदि उसी शिक्षा का परिणाम है ।

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सेवा, शक्तिवर्धन और सुधार

आज हम इस मिशन के दूसरे बिंदु 'शक्तिवर्धन' पर बात करेंगें।

भारत दुनियाँ का सबसे युवा देश है। 65% जनसंख्या 35 वर्ष के नीचे है। परंतु ये हैं कहाँ? सामान्यतः ये कहीं भी दिखते नहीं, न तो किसी विधानसभा में, न लोकसभा में, न ही किसी सरकारी-गैर सरकारी संस्थाओं के व्यवस्थापक मंडल में। तो क्या बस एक बड़ी भीड़ बन कर रह गए हैं? कड़वा है, पर सच है कि हमारी युवावर्ग को तेजहीन/सामर्थ्यहीन बना दिया गये है। उनके पास जोश है, जज़्बा है परंतु पंख नहीं है। वे बेहतर निर्णय ले सकते हैं, परंतु प्लेटफार्म नही है। वे थोड़े को कई गुना बड़ा कर, बड़ा बिज़नेस एम्पायर बना सकते हैं, परंतु प्राथमिक पूंजी नहीं है। वे नौकरियां पैदा करने वाले बन सकते हैं पर स्वंय नौकरी की भीख मांग रहे हैं।

अर्थात, आवश्यकता है- एक प्राथमिक 'शक्तिवर्धन' की। कैसे?

1. उपयोगी एवं गुणवत्तापूर्ण शिक्षा

2. व्यावसायिक, औद्यागिक एवं मालकियत प्रशिक्षण

3. रोजगार एवं स्वरोजगार की स्थापना हेतु ईमानदार मदद।

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आशा संगठान Aasha Shangathan
आम आवाज शक्तिवर्धन अभियान"(AASHA)
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"आम आवाज़ शक्तिवर्धन अभियान" (AASHA) नाम से एक सामाजिक-राजनैतिक सँगठन का निर्माण किया जा रहा है। जिसका उद्देश्य सामाजिक-राजनैतिक बुराइयों को समाप्त कर एक समतामूलक देश का निर्माण करना है। ताकि हर एक भारतीये को सामान अवसर एवम् सम्मान मिल सके। राजनीती में अयोग्य तथा अपराधी प्रवॄति के व्यक्तियों का प्रवेश रोकना भी है ताकि सच्चे देशभक्त, समाजसेवी और योग्य लोगों को राजनीती आकर्षित कर सके।
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आशा संगठान Aasha Shangathan
आम आवाज शक्तिवर्धन अभियान"(AASHA)
चलो आशा के साथ
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आप जानते हैं, हमारे देश ऐसे करोड़ो लोग, जिनको दोनों वक्त भोजन तक नहीं मिल पाता, मौसम के प्रहार से बचने के कपड़ें भी नही है, उनके लिये सामान्य दवाएं तथा चिकित्सक तक उपलब्ध नहीं है, इत्यादि। इनमें से कुछ लोग मजदूरी (अनियमित) करते हैं, कुछ लोग फुटपाथ पे, बसों-ट्रेनों आदि में कुछ बेचते हैं, रिक्सा-ठेला खिंचते हैं तथा कुछ तो भीख भी मांगते हैं। इन असहायों, अनाथों, विकलांगों, निःसंतानों आदि की संख्या 20 करोड़ से भी ज्यादा है।


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आप किसके साथ है?
नेताओं के मुद्दों के साथ या अपने मुद्दों के साथ?

यदि आप #धर्मनिरपेक्षता के साथ है तो कांग्रेस के साथ है। जबकि यदि आप राष्ट्रबादी है तो आप भाजपा के साथ है। समानता के पक्षधर है तो आप बामपंथी है। पिछड़े-दलितों के उत्थान के साथ है यानी सामाजिक न्याय के पक्षधर है तो आप #समाजबादियों के साथ है।

अब जरा इसके विपरीत सोचिये, यदि कोई पार्टी साम्प्रदायिक (किसी पंथ विशेष के तरफ झुकाव) है तो क्या उनका #राष्ट्रबाद सच्चा होगा? यदि किसी के लिये देश का स्थान उसके प्राथमिकता के सूची में नीचे कहीं है तो क्या वह सही मायने में धर्मनिरपेक्ष हो सकता है?

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आग लगा दो किताबों मे,जला दो विध्यालयों को।।
सन् 1835 में लार्ड मैकाले ने ब्रिटिश संसद में दिये गये बयान में कहा था। कि भारत की साक्षरता 87% से 97% है । PTR भी 1950 में 20 विध्यार्थियों पर एक शिक्षक था।
आज विश्व साक्षरता 86% , जब कि भारत की साक्षरता 76% है , जब कि स्नातको की संख्या 8.15% है । PTR , सरकार द्वारा 30:1 निर्धारित है और देश के 70% तक विद्यालय इस म‍ानक में असफल है ।
दुनिया के top 500 यूनीवर्सिटीज में भारत के सिर्फ़ 3 यूनीवर्सिटी है ,वो भी top 275 के बाद । 90 % IIT,IIM,AIIMS के छात्र विदेश चले जाते है क्यों कि इन संस्थाओं का संचालन परोक्ष रुप से अमेरिका होता है । अमेरिका फण्ड के बहाने अपनी आवश्यकतानुसार पाठ्यक्रम बनवाते है ,ऐसा पाठ्यक्रम जिसका भारत में 80% तक कोई उपयोग नहीं है ,मतलव हमारे ये top के संस्थान विदेशों के लिये प्रतिभा तैयार करने की फैक्ट्री है ।
क्यों शिक्षा पर पैसे खर्च नहीं किये जाते?
हमरी गवर्नमेंट ने शिक्षा का बजट 4.15% से घटाकर 3.85% कर दिया है क्यों ? और बातें देश को विश्वगुरु बनाने की, की जा रहीं है ।
प्रतीत होता है , इस देश मे पढ़ना - लिखना जैसे कोई अपर‍ाध हो। शिक्षित बेरोजगारों की संख्या , अशिक्षित से कई गुनाह ज्यादा है । एवं शिक्षित की आमदनी अनपढ़ से कम है । आखिर शिक्षा का क्या उद्देश्य है ? हमें क्या पढ़ाया जा रहा है ? क्यों पढ़ाया जा रहा है ?हमारी सरकार हमें कहाँ ले जाना चाहती है ? शिक्षा से इतना भय क्यों है सरकार को??
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सुनते तो है भारत दुनिया का सबसे #नौजवान #देश है । नौजवान किसी भी देश की दौलत होते है । इस देश के नौजवानों को ,सबसे काबिल कहने वाले नेताओं ने अपने कदमों में लाकर रख दिया है । सरकारें नहीं चाहती कि "भारत के युवाओं को #रोजगार मिले। अच्छी शिक्षा मिले। "
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" आम आवाज शक्तिवर्धन अभियान"(AASHA) नाम से एक सामाजिक- राजनैतिक संगठन का निर्माण हुआ है। जिसका उद्देश्य सामाजिक -राजनैतिक बुराइयों को समाप्त कर एक समतामूलक देश का निर्माण करना है।ताकि हर एक भारतीय को समान अवसर एवं सम्मान मिल सके।
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क्या आपने कभी सोचा है ?
क्या इस देश के नौजवान राजनीति के कूड़ेदान है ? हिन्दुस्तान की सरकारें नही चाहती कि किसी को अच्छी शिक्षा मिले ? किसी को रोजगार मिले?
ग्रामीण भारत में 54% बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते है जिन स्कूलों की देख – रेख हिन्दुस्तान के राजनेता (मुखिया ,विधायक, सांसद, मंत्री और प्रधानमंत्री ) करते है। फिर इस देश के राजनेताअपनें बच्चों (आश्रितों ) को उस स्कूल में क्यों नहीं पढ़ाते ? जिन स्कूलों की वोखुद देख – रेख करते है ? इस का मतलब जो शिक्षा आप दूसरों को देरहे हैऔर खुद नहीं ले रहे है। इस काम तलबवो शिक्षा खराब है।
यदि आपको लगता है यह सवाल सही है तो आप हम से जुड़ सकते है।
चलो आशा के साथ
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#हिन्दुस्तान मे पहली बार 15 दिसम्बर से शुरू हो रहा है । मालिक(जनता) #बनाम #नौकर( राजनेता )
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