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कृपया संस्कृत वाक्यों का अभ्यास करते रहें, रुकें नहीं, आप अवश्य ही संस्कृत में बातचीत करना सीख जाएंगे |

संस्कृत वाक्य अभ्यासः


आह्वयति = बुलाता है / बुलाती है

सः आह्वयति = वह बुलाता है |

सा आह्वयति = वह बुलाती है |

एषः आह्वयति = यह बुलाता है |

एषा आह्वयति = यह बुलाती है

कः आह्वयति ? = कौन बुलाता है ?

पिता आह्वयति |

पिता कम् आह्वयति ?

पिता किसको बुलाता है ?
पिता पुत्रम् आह्वयति |

पिता पुत्र को बुलाता है |

का आह्वयति ? = कौन बुलाती है ?

माता आह्वयति = माँ बुलाती है

माता काम् आह्वयति ?

माँ किसको बुलाती है ?
माता पुत्रीम् आह्वयति |

माँ पुत्री को बुलाती है |
अहं आह्वयामि = मैं बुलाता हूँ / बुलाती हूँ |

(अब चलो बुलाते हैं सबको प्यारे सुसंस्कृत नामों से)
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लखनऊ : संस्कृत भाषा को बढावा देने के लिए यहां संस्कृत भाषा में ब‍िकती हैं सब्ज‍ियां !

लखनऊ : यहां न‍िशातगंज में एक ऐसी सब्जी मंडी है, जहां संस्कृत भाषा में सब्ज‍ियां ब‍िक रही हैं। सभी सब्ज‍ियों के नाम संस्कृत में ल‍िखे हैं। इसके ल‍िए मंडी में हर जगह बोर्ड भी लगाए गए हैं। यही नहीं, दुकानदार भी हमेशा सब्ज‍ियों के नाम संस्कृत में ही लेते हैं।

न‍िशांतगंज गली नंबर-५ में सब्जी बेचनेवाले सुनील ने बताया, संस्कृत भाषा को बढावा देने के लिए मंडी के लोगों ने संस्कृत में सब्जी बेचना शुरू किया है ! संस्कृत हमारी मुख्य भाषा है। सरकार इस भाषा के साथ पक्षपात और अनदेखा कर रही है !

ये पूछने पर कि, जिन लोगों को संस्कृत समझ नहीं आती वो कैसे समझेंगे ? इस पर दुकानदारों ने कहा, उन्हें समझाने के लिए ही ये प्रयास किया गया है। इस मार्केट में रोजाना सब्जी खरीदनेवाले अब संस्कृत में सब्जी के भाव पूछते हैं और खरीदकर ले जाते हैं !

वहीं, इस मार्केट में सब्जी बेचनेवाली सुशीला देवी कहती हैं, जब हमारे जैसे कम पढे-ल‍िखे लोगों को ये भाषा समझ आ सकती है तो बुद्धि‍जीवी लोग तो आसानी से समझ सकते हैं ! यहां आनेवाले अब हर ग्राहक संस्कृत में मरिचिक (मिर्ची), रक्त्वृन्त्कम (टमाटर), भिन्दिक (भिन्डी), आद्रकम (अदरक), पटोल (परवल), कर्कटी (खीरा), पलांडू (प्याज) और निम्बुकम (निम्बू) आद‍ि मांगते हैं !

छायाचित्र देखें - https://www.hindujagruti.org/hindi/news/108464.html

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रक्षासूत्रमयो बन्धो, सर्वलोकोपकारकः ।
बध्नातु समभावे योऽखिलमामकबान्धवान्
मातृपितृवरं सेव्यं पूज्यगुरुजनाग्रजान्।
सर्वफलप्रदातॄन् वै नौमीह शुभपर्वणि।।
🌹श्रावणीपूर्णिमातिथौ अद्य रक्षाबंधनपर्वस्य , अंतिमपंचमशिवसोमवासरस्य तथा च🌹 "संस्कृतदिवसस्य "🌹 कोटिशः हृदयतलत: शुभकामना: । मत्पक्षत: मत्परिवारपक्षत: भवतां सर्वेषाम् कृते शुभकामना:। 🌹
🙏🏻सर्वम् शुभम् भूयात् ।🙏🏻
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मनुष्यलोके सकलं मनसः परिवर्त्य वस्तुनः क्षितिमण्डले अर्थात यह संसार असार की शूली काम क्रोध से भरी भरी बिन सत्संगति बिन सद्गुरु राह न पावै गुरु चरनन में तरी तरी। कहने का तात्पर्य यह है कि, मनुष्य शरीर में मनुष्य का एक बार जन्म होता है। पर सद्गुरु की ज्ञाना 🔥 में तप कर मनुष्य नश्वरता से ऊपर उठ कर शाश्वत सत्य की ओर निकालने के लिए तैयार रहना चाहिए सदा और ऐसे मुमुक्षु जिज्ञासा व्यक्ति का हकीकत में दूसरा जनम होगा जो यह सद्गुरु ज्ञाना 🔥 को पार कर लेगा और शरीर के मरणा धर्म को पारकर शाश्वत्तममे प्रविष्ट हो जाएगा। ऐसे हरेक व्यक्ति को संवेदनशील रहकर इंसानियत इंसाफ़ पाने के लिए हर दिन मर मर जीने से अच्छा गुरु ज्ञाना 🔥 में तपकर नये जन्म मे जरुर जाना चाहेंगे।
पर यह बात क़ुदरत कभी भी पूरी नहीं कर सकती आपके लिए। एक बार जन्म में आपको दुबारा जन्म हो जो बिलकुल ही शाश्वत सत्य में मनुष्य प्रविष्ट हो जाए। यह हरेक व्यक्ति कि पर्सनल अर्थात् व्यक्तिगत जिम्मेदारी यां जिम्मेवारी है। जीसका शाश्वत सत्य कारण इतना ही है के, ईश्वर के अंश जीव अविनाशिता के जड शरीर अनेकानेक और अजन्मा अनादि अगम अगोचर अनंत ईश्वर एक ही है। ॐ सत्यं शाश्वतं ब्रह्म सनातनपराक्रमःसद्गुरुवर नम:
सत्य आत्मा कि पहचान है ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि समासतः कार्त्स्न्येन कर्तुं समर्थः भवति इति।
अर्थात हमे ओऽम् शोऽम् जी की कोपी टु कोपी न करकर अपनी चाल ढाल पर चलना शीखना होगा, तो ही जान पाएंगे मै कया हूँ कौन हुं क्यो हुं इस पृथ्वी रुपी मरुभूमि पर। बाकी जो समर्थ गुरु है वे तो पा लिए शाश्वत सत्य को और उनके लिए आत्म कल्याणकारी जैसे शंकराचार्य जी की लीखी शिव मानस पूजा ही आराधना ईश्वर में आस्था है। जो भी करे वह सब शिव आराधना है और ईश्वर भक्ति है।

https://m.facebook.com/1048738685148113/photos/a.1048750915146890.1073741828.1048738685148113/1518438448178132/?type=3&fs=1

https://www.youtube.com/watch?v=EzQd3LnGSAA&sns=tw via @youtube

https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=1518419491513361&substory_index=0&id=1048738685148113

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बॉलीवुड के गीतों की सूची जिनका संस्कृत मे अनुवाद हो चुका हैं |

१ ) आजा सनम मधुर चाँदनी में हम . . .
https://www.youtube.com/watch?v=ZbhOfpGoJMk

२ ) एक प्यार का नगमा हैं . . .
https://www.youtube.com/watch?v=jNhtc9n76QE

३ ) दो दिल मिल रहे हैं चुपके चुपके . . .
https://www.youtube.com/watch?v=tBn7oiYSfGM

४ ) रहे न रहे हम . . .
https://www.youtube.com/watch?v=IpzDn0nQzHs

५ ) मुसाफिर हूँ यारों न घर हैं न ठिकाना . . .
https://www.youtube.com/watch?v=HQ41xmPmlPY

६ ) ए ज़िंदगी गले लगा ले . . .
https://www.youtube.com/watch?v=HXce1Tjk2gw

७ ) सनम रे सनम रे . . .
https://www.youtube.com/watch?v=VdYcAeSA_K4

८ ) वादा कर ले साजना . . .
https://www.youtube.com/watch?v=V0D_MVeH_j8

९ ) सोचेंगे तुम्हें प्यार करें की नहीं . . .
https://www.youtube.com/watch?v=BzETXiaTxDE

१० ) ज़िंदगी प्यार का गीत हैं . . .
https://www.youtube.com/watch?v=ZjyL09n5WLw

११ ) अभी न जाओ छोड़कर . . .
https://www.youtube.com/watch?v=14LeKWl67Wc

१२ ) दिल हुम हुम करें . . .
https://www.youtube.com/watch?v=YjiZU5qeEFc

१३ ) धीरे धीरे से मेरी ज़िंदगी में आना . . .
https://www.youtube.com/watch?v=SEK0LpfFadY

१४ ) ये जीवन हैं इस जीवन का . . .
https://www.youtube.com/watch?v=mm6pU-IZHAc

१५ ) क्यों की तुम मेरे हो . . .
https://www.youtube.com/watch?v=J0cyuWKlOEw

१६ ) आजा माही आजा माही ओ सोनिए वे . . .
https://www.youtube.com/watch?v=gHnsa4upa9I

ऐसे और भी बहुत से गीत हैं | आप भी ऐसे गीतो का निर्माण कर सकते हैं |

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जरा सोचें
हिंदुत्व ही विश्व कल्याण की बात करता है


इस्लाम का कल्याण हो-इस्लाम सिखाता है

इसाईयों का कल्याण हो-इसाईयत सिखाती है

विश्व का कल्याण हो-ये सिर्फ हिंदुत्व सिखाता है।

जय श्री राम

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मेरे परदादा संस्कृत और हिंदी जानते थे
माथे पे तिलक और सर पर पगड़ी बाँधते थे
फिर मेरे दादा जी का दौर आया
उन्होंने पगड़ी उतारी पर जनेऊ बचाया
मेरे दादा जी, अंग्रेजी बिलकुल नहीं जानते थे
जानना तो दूर, अंग्रेजी के नाम से ही कन्नी काटते थे
मेरे पिताजी को अंग्रेजी थोड़ी थोड़ी समझ में आई
कुछ खुद समझे कुछ अर्थचक्र ने समझाई
फिर भी वो अंग्रेजी का प्रयोग मज़बूरी में करते थे
यानि सभी सरकारी फार्म हिन्दी में ही भरते थे
जनेऊ उनका भी अक्षुण्य था
पर संस्कृत का प्रयोग नगण्य था
वही दौर था जब संस्कृत के साथ संस्कृति खो रही थी
इसीलिए संस्कृत मृत भाषा घोषित हो रही थी
धीरे धीरे समय बदला और नया दौर आया
मैंने अंग्रेजी को पढ़ा ही नहीं, अच्छे से चबाया
मैंने खुद को हिन्दी से अंग्रेजी में लिफ्ट किया
साथ ही जनेऊ को पूजाघर में शिफ्ट किया
अब मै बेवजह ही दो चार वाक्य अंग्रेजी में झाड जाता हूँ
शायद इसीलिए समाज में पढ़ा लिखा कहलाता हूँ
और तो और , मैंने बदल लिए कई रिश्ते नाते हैं
मामा, चाचा, फूफा अब अंकल नाम से जाने जाते हैं
अब मै टोन बदल कर वेद को वेदा और राम को रामा कहता हूँ
और अपनी इस तथाकतित सफलता पर गर्वित रहता हूँ
मेरे बच्चे और भी आगे जा रहे हैं
मैंने संस्कार चबाया था वो अंग्रेजी में पचा रहे हैं
यानि उन्हें दादी का मतलब ग्रैनी बताया जाता है
“रामा वाज अ हिन्दू गॉड” गर्व से सिखाया जाता है
जब श्रीमती जी उन्हें पानी मतलब वाटर बताती हैं
और अपनी इस प्रगति पर मंद मंद मुस्काती हैं
जाने क्यों मेरे पूजाघर की जीर्ण जनेऊ चिल्लाती है
और मंद मंद कुछ मन्त्र यूँ ही बुदबुदाती है
कहती है, विकास भारत को कहाँ ले जा रहा है
संस्कार तो गल गए अब भाषा को भी पचा रहा है
संस्कृत की तरह हिन्दी भी एक दिन मृत घोषित हो जाएगी
शायद यद उस दिन भारत भूमि पूर्ण विकसित हो जाएगी
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सुप्रभात।

परमात्मा ने तो पु लिंग स्त्री लिंग दो जड शरीर भी ऐसे बनाए जींस से जड शरीर से होते हुए मनुष्य को मनुष्य के चित्त में प्रसन्नता और दो जीवों के मिलन की प्रेम की अनुभूति हो,
पर मनुष्य उस निश्वार्थ चित्त के प्रेम की अनुभूति को छोड़ जींस से प्रेम हुवा उस जड शरीर के इर्दगिर्द घूमते रहता है। अब वे परमात्मा निश्वार्थ प्रेम के अधिपति है। वे परमात्मा मस्तिष्क के सबसे उपले छोर पर अपनी जगह स्थित अचलायमान स्थित प्रज्ञ है। वे तूम्हारे पास नहीं आयेंगे, तूम्हें हि जाना होगा उनके पास। जीव का स्वयं निर्गुण निराकार और "न कर्ता न भोक्ता है" वह स्वयं ही परब्रह्म परमात्मा ईश्वर है। धन्यवाद। और इस तरह की अनुभूति को जीव ऐसे ही बिना जड शरीर आधार अनुभव करले तो, जिन्हें हूई ईश्वर अनुभूति वह फिर जड शरीर को छोड़ बस ईश्वर शरण मे ही रहता है। ईश्वर के स्वरूप चेतन अमल का हि चित्तात्मामे अलौकिक आनंद अनुभव करते रहता है। जीवन भले कितना अपमान, दु:ख, तकलीफ, परेशानी हो उसे भगवान प्रसाद समझते समझते हसते हसते झेलता है पर फिर भी उफ़ तक नहीं करता क्यों के उसे पता है यह सब जड शरीर अनुभव है जीससे मेरा कोई लेनदेन नहीं। एक दिन जलना दफनाना यां नाश निश्चित है। पर चित्त में हूई अनुभूति के लिए प्रयत्नशील रहें तो ईश्वर कृपा से जरुर जीवन ऊर्ध्व गति की ओर निकल कर ईश्वर साक्षात्कार से ईश्वर समर्पण में जरूर लिन हो ही जाता है।
।।शुभ प्रभात।। Very Great fulfill for this post Thank you very much.
वृक्ष के नीचे पानी डालने से सबसे
ऊंचे पत्ते पर भी पहुँच जाता है ,
उसी प्रकार मनुष्य मस्तिष्क में मनुष्य का मूल है।
रोज प्राणायाम ध्यान योग करने से मनुष्य,
उसी प्रकार प्रेम पूर्वक की हुई स्तुति
परमात्मा को पहुंच जाती है।
सेवा सभी की करिये मगर,
आशा किसी से भी ना रखिये.
क्योंकि सेवा का सही मूल्य
भगवान् ही दे सकते हैं इंसान नहीl

असीम साधना के लिऐ मन का विचारमुक्त होना जरूरी है
और साधना करके श्वास को रोककर पकड़ पकड़ कर कुंभक अभ्यास से इन्द्रीयों से पर हूवा जाता है। आखिर मस्तिष्क के मन के पार हो कर ही यह अभ्यास संपूर्ण फायदा होता है।
केवल स्वयं का अनुभव करें.. यही अनुभव अपने आप में आत्मा है जो इंद्रिया की संगति मे अहंकार के रूप में सृजन व संहार का कार्य सिद्ध करती है. आत्मबोध में स्थापित होकर पापकर्म व पुण्यकर्म केवल दैहिक जिम्मेदारी के अंतर्गत होते है और स्वयं ही स्वयं को जगत के प्रपंचो से अछूता रखते हुऐ प्रत्येक कृत्य का स्वयं ही साक्षी होता है.
------------------------------sufi.

उम्दा सर जी
👌👌👌👌
देह प्रिय लोगों को देह को पालकर ही अपने होने का आभास रहता है । लेकिन वास्तव में असल जीवन के रूहानी रंगों से अनभिज्ञ रहते है । लेकिन रूहानी रंग ही असल जीवन का परमात्मा रूपी मूलमंत्र है ।
रिज्वान भाई..जिस प्रकार स्वर्ण अँगूठी पर नजर पड़ते ही हम अँगूठी की आकृति पर नजर टिकाये अँगूठी के स्वर्ण को कुछ देर भुला बैठते है वैसे ही हमारा ध्यान संसार के बाहरी स्वरूप में उलझकर संसार की गुणवत्ता से हटा रहता है.. संसार परमात्मा की गुणवत्ता है जो विभिन्न आकृतियों में फैलकर अंहकार के रूझान का विषय हो जाता है.. शुक्रिया.

Gud More Innings for Forever
केवल स्वयं का अनुभव करें.. यही अनुभव अपने आप में आत्मा है जो इंद्रिया की संगति मे अहंकार के रूप में सृजन व संहार का कार्य सिद्ध करती है. आत्मबोध में स्थापित होकर पापकर्म व पुण्यकर्म केवल दैहिक जिम्मेदारी के अंतर्गत होते है और स्वयं ही स्वयं को जगत के प्रपंचो से अछूता रखते हुऐ प्रत्येक कृत्य का स्वयं ही साक्षी होता है.
------------------------------sufi.
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