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प्रीति-गीत
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ये मेरी ही जीत होगी, मैं जो खुद को हार जाऊँ।
तुम हृदय का दाँव खेलो, मैं तुम्ही से प्यार पाऊँ।।

सारे जग में तुम अनोखे,तुम दीवाने हो अकेले।
सारे जग को मैं तुम्हारी, इक ख़ुशी पर वार जाऊँ।।

संग जीने का सुखद अहसास, जीने का सबब हो।
अपने आँचल में समाया, प्रीति का संसार पाऊँ।।

मैं खिलाऊँ चाँद, अपनी गोद तारों से सजा कर।
मैं तुम्हारे प्रेम से बस, यह रुचिर उपहार पाऊँ।।

तुम जियो बस मुझ से मुझ तक, मैं रहूँ बस तुममें तुम तक।।
मैं तुम्हारी धडकनों में,यह नया अधिकार पाऊँ।।

तुम नयन के नीर में, उलझा हुआ हर मर्म पढ़ लो।
मैं समर्पण दे सजल, इस जन्म से उद्धार पाऊँ।।

हर छुअन निर्मल तुम्हारी, प्रीति-रस में है पगी सी।
देह-वीणा कर दे झंकृत,वह मदिर झंकार पाऊँ।।

मैं सदा नत हो करुँगी, देव की आराधना बस..
रक्त-मज्जा में निरंतर प्रेम का संचार पाऊँ।।

कर दिया सम्पूर्ण तुमने,संग अपना दे मुझे प्रिय।
लोक से परलोक तक मैं,जन्म का आधार पाऊँ।।

प्रेम-पूरित हर पहर, आकंठ मैं श्रृंगारमय हो।
संदली मन मैं सुसज्जित, प्रेम के मल्हार गाऊँ।।
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