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# _एक प्याली चाय
Written By-Manish Pandey'Rudra'

"अरे बहू मेरा चश्मा कहाँ है?"
बड़े से मकान के बाहर लाॅन में रखी गद्दीदार आरामकुर्सी पर बैठे धूप सेंकते गोपाल बाबू ने रोज की तरह जोरदार और रूखे स्वर में चिल्ला कर पूछा और फिर हमेशा की तरह बड़बड़ाने लगे।
''ये आजकल की नई जनरेशन अपने आप को पता नहीं क्या समझती है।एक हमारे बाप-दादा का वक्त था जब उनकी बहुएं उनकी सेवा करने के लिए एक टांग पर खड़ी रहती थीं और एक हमारी बहू है कि जबतक चार बार चिल्ला कर न बताओ तब तक कोई काम सुनती ही नहीं है!''
मध्यमवर्गीय परिवार के मुखिया गोपाल बाबू जो कभी टेलीफोन एक्सचेंज में नौकरी करते थे परन्तु आज पिछले दस सालों से रिटायर होकर पेंशन पर गुजर-बसर कर रहे थी।चार साल पहले पत्नी सुभद्रा देवी के गुजर जाने के बाद से न जाने क्यों पर गोपाल बाबू स्वाभाव से बेहद चिड़चिड़े हो गए थे।हमेशा खुशमिजाज और मिलनसार रहने वाले गोपाल बाबू इन दिनों हमेशा उखड़े-उखडे़ ए रहते थे और वक्त के साथ-साथ और भी तुनकमिजा़ज हो चले थे।
अभी वे बड़बड़ाने में लगे ही थे उनकी बहू चाय की ट्रे के साथ न्यूज़ पेपर और उनका चश्मा लेकर आई।
और सबकुछ आरामकुर्सी पर बैठे गोपाल बाबू के सामने मेज पर रखने के बाद उसने उनके पैर छूकर आशीर्वाद लिये।स्वाभाव के साथ-साथ घरेलु कामकाज में भी गोपाल बाबू की बहू का कोई जोड़ नहीं था।और अपनी सास के गुजर जाने के बाद उसने घर का बोझ अपने कंधों पर ले लिया जिसे आज तक वह बखूबी निभाती चली आ रही थी।
"बस!बस!खुश रहो!"
गोपाल बाबू ने दबी हुई मुस्कान के साथ कहा और साथ ही गौर वर्ण के हल्के झुर्रियों वाले उनके चेहरे पर सजी मोटी-मोटी भूरी मूँछें गरिमापूर्ण अंदाज़ में फड़कने लगीं।
"बाबूजी आप चश्मा स्नानघर में ही भूल आये थे!"
उनकी बहू ने मुस्कराते हुए कहा और फिर अंदर चली गई।
''भूल गया था!और जैसे कि ये याद दिलाने की जरूरत थी इस नई जनरेशन के बच्चों को तो बस बुजुर्गों का अपमान करने का जरा सा मौका भर मिल जाये और जरा सा भी नहीं चूकते हैं।''
उन्होंने एकबार फिर बड़बड़ाना शुरू कर दिया और फिर चश्मा आँखों पर चढ़ाने के बाद न्यूज़ पेपर पढ़ने लगे।
''ये लो फिर वही ट्रंप और किम जोंग की खबर जैसे मेरा घर उन्हीं की वजह से चलता है!इन बेवकूफ़ अखबार वालों की बुद्धि को न जाने आजकल क्या हो गया है।''
खुशबूदार चाय की हल्की चुस्की लेकर उन्हेंने पन्ना पलट दिया और अगले पन्ने की खबर पढ़ने लगे।
और तभी उनकी नजर एक ऐसी खबर पर पड़ी जिससे उनको बड़बड़ाने का एक और मुद्दा मिल गया।
"ये क्या खबर छपी है... गत रात्रि डालीगंज निवासी मायाराम चौधरी उर्फ ननकू जी को उनके ही बहू-बेटे ने घर से बाहर निकाल दिया।"
खबर पढ़ने के बाद उन्होंने सिर हिलाया और एक बार फिर लोगों को कोसने लगे।
"भगवान का शुक्र है कि मैं अभी पेंशन पर हूँ वरना क्या पता मेरे बेटे और बहू भी मुझे घर से बाहर निकाल देते।क्या हो गया है इस दुनिया को सब अपने-अपने बारे में ही सोंचते हैं दूसरों के साथ क्या होता है इसकी किसी को परवाह ही नहीं है।"
अभी गोपाल बाबू लोगों को कोसने में व्यस्त थे कि तभी अंदर मुख्य दरवाजे पर किसी दस्तक दी और आवाज सुनकर थोड़ी देर बाद गोपाल बाबू की बहू ने दरवाजा खोला।जबकि भीतर बैठे गोपाल बाबू ने अंदाजा लगा लिया था कि दरवाजे पर कौन होगा और उनके पड़ोसी बंशीधर बाबू कि आवाज ने उनके कयास की पुष्टि कर दी।
"लो आ गया ये भी एक तो इसके खुद के बच्चे इसको छोड़कर विदेश में सेटल हो गए हैं पर ये है कि रोज सुबह इसी वक्त एक कप चाय पीने आ धमकता है और चाय तो ठीक है लेकिन आते ही मेरे हाथ से न्यूज़ पेपर भी छीन लेगा!"
अभी गोपाल बाबू बड़बड़ा ही रहे थे कि तभी बाल्कनी का दरवाज़ा खोलकर बूढ़े मगर रौबदार चेहरे वाले हट्टे-कट्टे बंसीधर बाबू आ धमके और आते ही पास रखी आरामकुर्सी खींच कर उसी पर पसर गए।
“और बताईये गोपाल बाबू क्या हाल-चाल हैं?”
बसींधर बाबू ने आरामकुर्सी पर कमर सीधी करते हुए पूछा।
“अजी हाल-चाल क्या पूछना एक दिन में कौन सा पहाड़ टूट पड़ेगा!”
गोपाल बाबू ने भड़कते हुए जवाब दिया और न्यूज़ पेपर अपने पीछे छिपाने की कोशिश करने लगे लेकिन तब तक देर हो चुकी थी।बंसीधर बाबू ने उछल कर उनके हाथ से न्यूज़ पेपर छीन लिया।
“अहा!एक प्याली गर्म चाय और ये न्यूज़ पेपर जिंदगी तो बस इसी पर टिकी है!”
उन्होंने हँसते हुए कहा जब गोपाल बाबू की बहू ने एक ट्रे में चाय की प्याली और टोस्ट उनके सामने रख दिया।
“जी चाचाजी!”
जिस तरह बंसीधर बाबू अपने बहू-बेटे के विदेश सेटल हो जाने के बाद गोपाल बाबू के बेटे और बहू को अपने बच्चों की तरह मानते थे उसी तरह गोपाल बाबू के बच्चे भी पिता की तरह उनका आदर और सम्मान करते थे हालांकि गोपाल बाबू को इससे बहुत चिढ़ होती थी कि वे रोज सुबह एक ही वक्त पर उनके यहाँ चाय पीने आ जाते थे और गोपाल बाबू को इसी बात से बहुत चिढ़ महसूस होती थी और वे हमेशा हिसाब लगाते रहते थे कि कम से कम अब तक तो हजारों कप चाय बंसीधर बाबू उनके यहाँ पी ही गये होंगे।
लेकिन जिस दिन किसी कारणवश वे नहीं आते थे उस दिन गोपाल बाबू भी पूरे समय छटपटाते रहते थे और बार-बार अपनी बहू से उनके न आने की वजह पूछते रहते थे।वैसे तो बंसीधर बाबू सरकारी बैंक के रिटायर्ड कर्मचारी थे लेकिन फिर भी उनका घर काफी बड़ा था लेकिन अपना ज्यादातर वक्त वे या तो गोपाल बाबू के साथ उनके ही घर पर बिताते थे या फिर उनके पोते के साथ खेलते हुए बिताते थे।
“पुनीत स्कूल गया है क्या?”
बसींधर बाबू ने चाय की चुस्कियां लेते हुए गोपाल बाबू की बहू से पूछा.... For Full Story Please Visit on my blog

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Read the story of this young Writer-Author, Neel Preet who published his first Book, VOICE FROM THE EAST at the age of 21 and also happens to be the youngest recipient of the "IJIP Best Performer Award"!


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एक खूबसूरत लव स्टोरी
# _चाँदनी
Written By-Manish Pandey'Rudra'

जाने क्यों मैं हर बार उसे देखते ही बस उसकी ओर खिंचा चला जाता था।ऐसी कौन सी कशिश थी उसकी भूरी आँखों में ये आज तक समझ नहीं पाया था मैं।काफी भागदौड़ और उथल-पुथल करने के बाद किसी तरह दोस्तों से मिन्नतें करते और उन्हें बंशी काका के दुकान की चाय पिलाने के बाद आखिरकार मुझे उसका नाम पता चल ही गया।
चाँदनी!
जैसा कि उसका नाम था चाँदनी और ठीक उसी प्रकार उसका चेहरा चाँद के उजले किरण की तरह ही हमेशा चमक-दमक से भरा और खिला-खिला रहता था।दूधिया रंगत के उसके चमकदार चेहरे पर आँखों के आगे से झाँकती उसकी लटें बस दिल चीर जाती थीं मेरा।
जबकि मैं दुबला पतला सा मगर सामान्य कद वाला असामान्य लड़का था।हमेशा की तरह आज भी मैंने बडी़ और बिना फिटिंग वाली सर्ट और सूती के कपड़े की पैंट पहन रखी थी।मैं बालों में ढे़र सारा तेल और पानी लगाकर हमेशा बालों को गीला और चिपका कर रखता था जो कि कईयों को बेहद बकवास लगता था सिवाय मेरे जिगरी दोस्त ऊँकार के जो लगभग मेरी तरह ही दिखता था बस उसकी कद काठी मुझसे ज्यादा बेहतर थी।
"यार पांडेय तू उससे बात क्यों नहीं कर लेता?"
मेरे अजीज दोस्त ऊँकार ने हर रोज कि तरह आज फिर मुझे उकसाने की कोशिश की।
"प.... प... पागल ह... है क... क्या?"
मेरे अंदर एक बहुत बड़ी कमी थी और यही सबसे बड़ी वजह थी जिसके कारण मैंने कभी उससे बात करने की कोशिश नहीं की और ये था मेरा हकलाना।
मुझे ये कोचिंग जाॅइन किये हुए करीब एक हफ्ते से ज्यादा हो गया था और तब से कोई मुझे हकला, कोई छुकछुक गाड़ी तो कोई ढक्कन बुलाता था और उन सबका मुँह तोड़ने का मन करता था लेकिन अपना डेढ़ पसली का शरीर और उनका एक फुट ऊँचा कद देखकर मैं शांत रह जाता था।
"क्यों क्या दिक्कत है?"
ऊँकार ने एकबार फिर सवाल किया।
"क.... क.... क..... कोई दिक्कत.... न.... नहीं है।"
मैंनें उसकी बात काटते हुए कहा पर असल में मैं भीतर से दहक रहा था और ऐसा लग रहा था जैसे मेरे भीतर कोई ज्वालामुखी दहक रहा हो।
"यार ये अंग्रेजी अपने पल्ले नहीं पड़ती।"
जोरों से काॅपी पटकते हुए ऊँकार ने खहा और जम्हाई लेते हुए बेंच पर सिर रखकर लुढ़क गया।
"इसीलिए तो अंग्रेजी भाषा की कोचिंग पढ़ने आते हैं।"
मैंने कटुता से जवाब दिया और वह प्रैराग्राफ अनुवाद करने लगा जो कविता मैडम ने करने को कहा था।और आखिरी लाइन का अनुवाद पूरा करते ही मैं झट से खड़ा हो गया।
"ह.... ह....!" 
मैंनें बोलने की कोशिश की पर जाने क्यों मैं बोल नहीं पाया और ज्यादातर लड़के-लड़कियाँ मुझ पर हँस रहे थे सिवाय कविता मैम और ऊंकार को छोड़कर।
"ओये ह.... ह.... हकले जल्दी बोल वरना कोचिंग का टाइम निकल जायेगा।"
आनंद ने फिर आज मेरा मजाक उड़ाया पर अब मुझे इसकी आदत हो चुकी थी लेकिन हाँ, बुरा तो अब भी लगता था।इसलिए मैंनें सोंचा मेरा वापस अपनी जगह पर बैठ जाना ही ठीक होगा।
"हो गया मैम हम दोनों का।"
इससे पहले कि मैं बैठता एक मधुर आवाज मेरे कानों में घुलती चली गई।और हालांकि मैंने उसकी ओर देखा पर उससे पहले ही मेरे दिल ने मुझे बता दिया था कि यह आवाज उसी की थी चाँदनी की।
मैं बस हैरान इस बात पर था कि उस वक्त मेरी ओर देखते समय उसके होंठों पर मुस्कान तो थी मगर मेरा मजाक उड़ा रही हँसी उन भूरी आँखों में कहीं भी नहीं थी।
"आओ!"
कविता मैम ने हमें पास बुलाया और एक साथ हम अपनी-अपनी नोटबुक लेकर आगे बढ़े।मैं अपने दिल को बार-बार उसकी ओर देखने से रोक रहा था पर कम्बख्त ऐसा लग रहा था जैसा मेरा दिल किसी और की जी हजूरी करने लगा हो।कविता मैम के पास पहुंचने के बाद मैंनें पहले उसे मौका दिया ताकि वह अपने जवाब की जाँच पहले करा सके।हालाँकि मेरा ऐसा करने के पीछे यही कारण था कि मैं कम से कम कुछ देर ज्यादा उसके पास खड़ा रह सकूं।
कविता मैम उसकी काॅपी में लिखा जवाब चेक कर रही थीं जबकि मेरी नजर उसकी हैंडराइटिंग पर जमी हुई थी।
"वाह क्या खूबसूरत राइटिंग है इस लड़की की।" 
मैंनें मन ही मन कहा कि और धीरे-धीरे डरते हुए अपनी नजरें उसके चेहपर घुमाई।और ठीक उसी वक्त उसने अपना चेहरा मेरी ओर घुमाया और उसने मुस्कुरा दिया पर और मेरा चेहरा फौरन शर्म के मारे लाल हो गया।और जल्दी से मैंनें अपनी नजरें उस पर से हटा लीं ओर नीचे अपने पैरों की ओर देखने लगा।
"क्या कर रही हो चाँदनी बेटा यहाँ एन नहीं द का प्रयोग करना था।"
कविता मैम ने उसे समझाते हुए कहा।
"साॅरी मैम!"
एक बार फिर कानों में मिश्री घोलने जैसी उसकी आवाज़ सुनाई दी और मेरा दिल जोरों से धड़कने लगा।
"कोई बात नहीं बाकी सब सही है।"
कहने के साथ ही कविता मैडम ने उसकी काॅपी उसकी ओर बढ़ा दी।
इसके बाद वो वापस मुडी़ और हिरनी जैसी चाल चलते हुए अपनी बेंच पर जाकर बैठ गई।
"और अविनाश बेटा घर पे सब कैसे हैं?"
कविता मैम ने मेरी काॅपी चेक करते हुए मुझसे पूछा।
"ठ... ठीक हैं।"
मैनें आराम से जवाब दिया खैर इसके बाद कविता मैम ने एक-दो सवाल और पूछे और फिर उन्होंने मेरी काॅपी मेरी तरफ बढ़ा दी।
"लो एकदम सही है कोई गलती नहीं।"
उन्होंने गर्व से कहा और वापस अपनी बेंच की ओर लौटते वक्त मैं फूल कर कुप्पा हो रहा था।
खैर इसके बाद कोचिंग खत्म होते ही सारे लड़के-लड़कियाँ एक-एक करके बाहर निकलने लगे।
"तू चल मैं फीस क्लियर करके आता हूँ।"
बोलकर ऊँकार ने जबरदस्ती मुझे बाहर निकाल दिया और मैं बाहर निकल कर ये सोंचते हुए उसका इंतजार करने लगा कि आखिर जब हम दोनों ने कोचिंग एक साथ स्टार्ट किया था और इस महीने की फीस पिछले हफ्ते ही हमने एक साथ भर दिया था तो वह अब कौन सा फीस क्लियर करने गया था।
"अच्छा काम किया।"
अभी मैं इसी उधेड़बुन में लगा हुआ था कि अचानक चांदनी की आवाज़ सुनकर मुझे झटका सा लगा.... For Full Story Please Visit on my blog

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#_Cricket & #_Valentin Special....
अधूरे_पन्ने@जिंदगी
अध्याय-पाँच
प्यार का इजहार
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