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🙏🙏🙏 मेरे सभी भाइयों और बहनों को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ🙏🙏🙏

विवेकानन्दजी के संग में

स्थान - बेलुड़ - किराये का मठ

वर्ष - 1898 ईसवी ( फरवरी मास )

विषय - स्वामीजी की बाल्य व यौवन अवस्था की कुछ घटनाएँ तथा दर्शन - अमरीका में प्रकाशित विभूतियों का वर्णन - भीतर से मानों कोई वक्तृताराशि को बढ़ाता है ऐसी अनुभुति - अमरीका के स्त्रीपुरूषों का गुणावगुण - ईर्ष्या के मारे पादरियों के अत्याचार - जगत् में कोई महत्कार्य कपट से नहीं बनता - ईश्वर पर निर्भरता - नाग महाशय के विषय में कुछ कथन ।

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स्वामीजी मठ को बेलुड़ में, श्रीयुत् नीलाम्बर बाबू के बाग में ले आये हैं । आलमबाजार में से यहाँ आने पर अभी तक सभी वस्तुओं को ठीक से लगाया नहीं गया है । चारों ओर सब बिखरी पड़ी हैं । स्वामीजी नये भवन में आकर बड़े प्रसन्न हो रहे हैं । शिष्य के यहाँ उपस्थित होने पर बोले, "अहा! देखो कैसी गंगाजी हैं । कैसा भवन है ! ऐसे स्थान पर मठ न बनने से क्या कभी चित्त प्रसन्न होता ।" अब अपराह्न का समय था ।
सन्धया के पश्चात् दुमंजिले पर स्वामीजी से शिष्य का साक्षात् होने से अनेक प्रकार की चर्चा होने लगी । उस गृह में उस समय और कोई नहीं था । शिष्य बीच बीच में बात के सिलसिले में अनेक प्रकार के प्रश्न करने लगा । अन्त में उसने उनकी बाल्यावस्था के विषय में सुनने की अभिलाषा प्रकट की । स्वामीजी कहने लगे, "छोटी अवस्था से ही मैं बड़ा साहसी था । यदि ऐसा न होता तो निःसम्बल संसार में फिरना क्या मेरे लिए कभी सम्भव होता ?"
रामायण की कथा सुनने की इच्छा उन्हें बचपन से ही थी । पड़ोस में यहाँ भी रामायणगान होता था, वहीं स्वामीजी अपना खेलकूद छोड़कर पहुँच जाते थे । उन्होंने कहा कि कथा सुनते सुनते किसी दिन उसमें ऐसे लीन हो जाते थे कि अपना घरबार तक भूल जाते थे । 'रात बढ़ गयी है' या 'घर जाना है' इत्यादि विषयों का स्मरण ही नही रहता था । किसी दिन सुना कि हनुमानजी कदली बन में रहते हैं । सुनते ही उनके मन में इतना विश्वास हो गया कि वे कथा समाप्त होने पर उस दिन रात में घर नहीं लौटे और घर के निकट किसी एक उद्यान में केले के पेड़ के नीचे बहुत रात तक हनुमानजी की दर्शन पाने की इच्छा से बैठे रहे ।
रामायण के नायक नायिकाओं में से हनुमानजी पर स्वामीजी की अगाध भक्ति थी । संन्यासी होने पर भी कभी कभी महावीरजी के प्रसंग मे मतवाले हो जाते थे और अनेक बार मठ में महावीरजी की एक प्रस्तर मूर्ति रखने का संकल्प करते थे ।
छात्र जीवन में दिनभर अपने साथियों के साथ आमोदप्रमोद में ही रहते थे । रात को घर के द्वार बन्द कर अपना अध्ययन करते रहते थे । दूसरे किसी को यह नही जान पड़ता था कि वे कब अध्ययन कर लेते हैं।

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शिष्य ने पूछा, "महाराज, स्कूल में पढ़ते समय क्या आपको कभी दिव्यदर्शन ( Vision ) हुआ था ?"
स्वामीजी - स्कूल में पढ़ते समय एक दिन रात में द्वार बन्द कर ध्यान करते करते मन भलीभाँति तन्मय हो गया । कितनी देर तक ऐसे भाव से ध्यान किया था, यह कह नहीं सकता । ध्यान भंग हो गया । तब भी बैठा हूँ । इतने में देखता हूँ कि दक्षिण दीवाल को भेदकर एक ज्योतिर्मयी मूर्ति निकल आयी और मेरे सामने खड़ी हो गयी । उसके मुख पर एक अद्भुत ज्योति थी पर भाव मानों कोई भी न था - प्रशान्त संन्यासी मूर्ति । मस्तक मुण्डित था और हाथों में दण्ड-कमंडल था । मेरे उपर कुछ समय तक टकटकी लगाकर देखती रही । मानो मुझसे कुछ कहेगी । मैं भी अवाक् होकर उसकी ओर देखने लगा । तत्पश्चात् मन कुछ ऐसा भयभीत हो गया कि मैं शीघ्र ही द्वार खोलकर बाहर निकल आया । फिर मैं सोचने लगा क्यों मैं इस प्रकार मूर्ख के समान भाग आया, सम्भव था कि वह कुछ मुझसे कहती । परन्तु फिर कभी उस मूर्ति के दर्शन नहीं हुए । कितने ही दिन चिन्ता की कि यदि फिर उसके दर्शन मिलें तो उससे डरूँगा नही वार्तालाप करूँगा; किन्तु फिर दर्शन हुआ ही नहीं ।
शिष्य - फिर इस विषय पर आपने कुछ चिन्ता भी की ?
स्वामीजी - चिन्ता अवश्य की, किन्तु ओर-छोर नहीं मिला । अब ऐसा अनुमान होता है कि मैंने तब भगवान् बुद्धदेव को देखा था ।
कुछ देर बाद स्वामीजी बोले, "मन के शुद्ध होने पर अर्थात् मन से काम और कांचन की लालसा शान्त हो जाने पर, कितने ही दिव्य दर्शन होते हैं । वे दर्शन बड़े अद्भुत होते हैं, परन्तु उन पर ध्यान देना उचित नहीं है । रात दिन उनमें ही मन रहने से साधक और आगे नहीं बढ़ सकते हैं । तुमने भी तो सुना होगा कि श्रीगुरूदेव कहा करते थे, 'मेरे चिन्तामणि की ड्योढ़ी पर कितने ही मणि पड़े हुए हैं' । आत्मा का साक्षात्कार करना ही उचित है । उन सब पर ध्यान देने से क्या होगा ?"

जारी.........
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Sourav Ganguly brought passion into the gentleman’s game, he was confrontational, he would stand up to the umpires, coaches, and his opponents but the most importantly he was considered selfless and a complete team-man. #HappyBirthdayDada

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