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इंद्रधनुष आसमान में ही नहीं उगता
यह उगता है एक स्त्री के जीवन में भी 
हर शाम खून के लाल-लाल आंसू  टपक पड़ते है 
उसकी आँखों से; 
जब खरीदकर अनचाहे ही
 बिठा दी जाती कोठे पर बार बार
 बिकने के लिए.

इंद्रधनुष का नीला रंग 
जब-तब कौंध जाता है 
जब प्रकट करती है वह अपनी इच्छा 
और बदले में मिलते हैं क्रोध के उपहार,

कहते हैं बैगनी रंग औरतों की आज़ादी का प्रतीक है 
देखिये कभी उसकी आँखों के नीचे उभरे हुए स्याह दाग 
आज़ादी के मायने उसकी हर तड़प में सिमटे हुए मिलते हैं,

इन्द्रधनुष का हरा रंग 
उसकी कोख में तोड़ता है दम,
सूख जाती है हरियाली,
पता चलते ही भ्रूण मादा है नर नहीं 
और......... बहा दिया जाता है बेवजह रक्त के साथ

हर ताने के बाद बुझ जाता है उसके जीवन से 
उल्लास का नारंगी रंग,
समाज मीच लेता हैं आँख और औरत; 
व्योम के आसमानी रंग सी 
विस्तार पा जाती है अपनी कुर्बानियों में.

बारिश के बाद
आसमान में उगता है इन्द्रधनुष 
और......... 
ज़िंदगी से मिट जाते हैं इन्द्रधनुष के रंग 
कि...... औरत को औरत होने की सज़ा मिलती है.

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अच्छे बच्चे रोते नहीं 

न ही करते हैं जिद 

भूख लगने पर माँगते नहीं खाना 

ललचाई हुयी नज़रों से देखते नहीं भरी हुयी थाली। 

अच्छे बच्चे कहना मानते हैं माँ-बाप का 

फटे कम्बल में सो जाते हैं

 ठिठुरते हुए पैर मोड़ कर.....  

पार्टियों की पत्तलों से खोज लेते हैं अपना हिस्सा 

छोटे भाई बहनों को खिलाते हैं पहले। 

अच्छे बच्चे स्कूल नहीं जाते 

भोर अँधेरे काम पर जाते हैं 

कमाकर भरते हैं पेट परिवार का 

खेलने की उम्र में सीख जाते हैं दुनियादारी। 

अच्छे बच्चे बचपन में ही ओढ़ लेते हैं बुढ़ापा 

खिलखिलाते नहीं, रोते नहीं, उड़ते नहीं 

अच्छे बच्चे जन्म से ही बड़े हो जाते हैं 

बन जाते हैं आदमी 

अच्छे या बुरे 

दुनिया जानती है!

अच्छे बच्चे
अच्छे बच्चे
bolsakheere.blogspot.com

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जोहता हूँ बाट

आहट की,

रुनझुन का राग कब से गायब है 

पर्दे के उस पार तुम्हारी उँगलियों का स्पर्श ताज़ा है अब भी 

तुम लापता हो अपनी तस्वीर से 

ये जो माला टंगीहै न 

कहती है तुम्हारी अनुपस्थिति की कथा 

पर कमबख्त कान.......  सुनते ही नहीं

बस एक बार आकर कह दो 

कि तुम नहीं हो आस-पास 

मान लूंगा मै.

बस इतनी सी गुज़ारिश है 

झटक दो मेरा हाँथ अपनी स्मृतियों से...... 

समेट लो अपनी ध्वनि तरंगे इस कोलाहल से 

जो मेरे अन्दर बेचैन है

तुम्हारा होना ही जिंदा है 

न होना;

जाने कब का मर गया!

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उसके साथ आलिंगनबद्ध होने पर भी,
खींच ही लाती हैं मेरी टहनियां तुम्हे
और वो तकती है मेरी राह
कि कब पंहुचेगे मेरे हाथ उसके तने तक
जानती नहीं वो
परजीवी हूँ मै
जीती हूं तुम्हारा ही रस पीकर
तुम्ही से है मेराअस्तित्व
और वो!
धरा है
तुम्हारा आधार
छोड़ नहीं सकते उसे
और मुझे भी
तुम उससे जीते हो
और मै तुमसे.

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गलियों में घूमते हुए
बरबस ही खींचती है गरम - गरम भात की महक,
दरवाजा खुला ही रहता है हमेशा
यहाँ बंद नहीं होते कपाट
चोर आकर क्या ले जायेंगे.
जिस घर चाहूं घुस जाऊं
तुरत परोसी जायेगी थाली
माड़ - भात, प्याज, मिर्च के साथ
हो सकता है रख दे हाँथ पर गुड़ कोइ
और झट से भाग जाए झोपडी के उस पार.
यंहा भूखे को प्यार परोसा जाता है
भर- भर मुट्ठी उड़ेला जाता है आशीर्वाद.
फसल काटने के बाद
नाचते है लोग
घूमते हैं मेला
प्रेमी युगल आज़ादी से चुनते हैं अपना हमसफ़र
दीवारें नहीं होती यंहा
मज़हब और जाति की
जब तक घर में धान है
हर घर है अमीर
धान ख़तम, अमीरी ख़तम
फिर वही फ़ाकामस्ती
वही दर्द , वही दवा
इनकी ज़िंदगी खदबदाती है खौलते पानी में,
पानी ठंढा हुआ जीवन आसान
पानी के तापमान के साथ
घटता- बढ़ता है सुख-दुःख
पानी जैसे ही बहता है जीवन
पानी जैसा मन
जिस बर्तन डालो
उस जैसा तन.

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आम आदमी की पीड़ा का बड़ा ही कारुणिक चित्रण है अनुपम निशांत के इस गीत में
https://youtu.be/be7vt7ph3PE
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