ओलम्पियन पैदा करता दिल्ली का छत्रसाल अखाड़ा
यहां मोबाइल रखना मना, शाकाहारी भोजन जरूरी
अगर आपने लंदन ओलम्पिक-2012 में कुश्ती के मुकाबलों को देखा होगा तो भारतीय पहलवानों द्वारा आजमाए गए कुछ खास दांवों पर आपकी नजर जरूर पड़ी होगी। मसलन, सुशील कुमार ने ईरानी दांव लगाया, जिसमें टांग को मोड़कर प्रतिद्वंद्वी के घुटनों पर दबाव डाला जाता है और उसकी गर्दन को मजबूती से हाथ से पकड़ लिया जाता है। योगेश्वर दत्त ने  फीटल दांव लगाया, जिसमें प्रतिद्वंद्वी के पैरों को क्रॉस करके उन्हें अपनी बाहों में लॉक कर लिया जाता है, फिर प्रतिद्वंद्वी को बार-बार घुमाया जाता है। इसी प्रकार अमित कुमार दहिया ने निकल दांव लगाया, जिसमें प्रतिद्वंद्वी के पीछे आकर उसको बगलों से पकड़ लिया जाता है और आसानी से पटक  दिया जाता है। इन पहलवानों ने ये दांव कोच सतपाल से छत्रसाल अखाड़े में सीखे हैं, जोकि उत्तर दिल्ली की रिंग रोड पर मॉडल टाउन इलाके में स्थित है। यह अखाड़ा इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि इसके पहलवा सुशील कुमार ओलम्पिक में दो बार पदक जीत चुके हैं व दूसरे पहलवान योगेश्वर दत्त ने भी ओलम्पिक में कांस्य पदक जीता है। गुरु सतपाल भी एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीत चुके हैं। बहरहाल, जब गुरु सतपाल के दामाद सुशील कुमार ने राष्ट्रकुल खेलों और बीजिंग व लंदन ओलम्पिक में पदक जीते तो छत्रसाल अखाड़ा इतनी चर्चा में आ गया कि अब सैकड़ों की तादाद में बच्चे यहां पर कुश्ती के दांव-पेच सीख रहे हैं ताकि जवान होकर पहलवान बनें और सुशील कुमार की तरह देश का नाम रोशन करें। फिलहाल छत्रसाल अखाड़े में जो लगभग 300 बच्चे कुश्ती सीख रहे हैं, उनमें से अधिकतर दिल्ली व आसपास के गांवों से सम्बन्धित हैं। अखाड़े के नियम बहुत सख्त हैं। कुश्ती सीखने वाले छात्रों को ब्रह्मचर्य का पालन करना पड़ता है व ऐसे आहार का सेवन करना पड़ता है जिसमें मांस, अंडा, मछली नहीं है। लेकिन सबसे बड़ी बात अनुशासन का पालन करना है।
छात्रों की ट्रेनिंग पौ फटते ही आरम्भ हो जाती है जब उन्हें दौड़ लगानी पड़ती है। वर्कआउट में वेट ट्रेनिंग, रस्सी चढ़ना व गदा चलाना शामिल है। इस गुरु-शिष्य परम्परा में मोबाइल फोन का प्रयोग वर्जित है और सजा के तौर पर प्रशिक्षु पहलवान की पिटाई सामान्य बात है। ज्यादातर ट्रेनी अखाड़े के निकट स्थित स्कूलों में पढ़ने जाते हैं, लेकिन ऐसे ट्रेनियों की कमी नहीं है जो स्कूल जाते ही नहीं हैं। इन भविष्य के पहलवानों का एकमात्र उद्देश्य ग्लोबल मंच पर चैम्पियन पहलवान बनना है, इसलिए औसत पढ़ाई से भी इनका काम चल जाता है। दरअसल, जो पहलवानी में ज्यादा सफल नहीं भी हो पाते उन्हें भी स्पोर्ट्स के आधार पर जॉब मिल जाता है। हालांकि छत्रसाल अखाड़े में यह ट्रेनी पहलवान इतनी जल्दी अपनी कमीज उतार देते हैं कि आप एक था टाइगर पूरी तरह से कह भी नहीं पाते, लेकिन इनका हीरो स्क्रीन पर शर्ट उतारने वाला सलमान खान नहीं है बल्कि लंदन ओलम्पिक में रजत पदक जीतने वाला सुशील कुमार है।
छत्रसाल अखाड़े के ये लगभग 300 प्रशिक्षु पहलवान सुबह पांच बजे अपनी ट्रेनिंग आरम्भ करते हैं जो रात दस बजे तक जारी रहती है। इन पहलवानों को मोबाइल फोन, इंटरनेट, मॉल आदि से दूर रखा जाता है। इनके मनोरंजन का एकमात्र साधन मिट्टी के अखाड़े में कुश्ती लड़ना, शरीर पर तेल मलना, फर्श को समतल करने के लिए लकड़ी खींचना, बादाम तोड़ना और नामवर पहलवानों की कुश्ती देखना है। हालांकि इन छात्रों का हीरो सुशील कुमार व गुरु सतपाल दोनों ही विवाहित हैं, लेकिन इनको विवाह की कोई परवाह नहीं है। इनका कहना है कि शादी इंतजार कर सकती है, सब कुछ अपने समय पर हो जाता है, इसलिए जल्दबाजी की कोई जरूरत नहीं है। असल मकसद पहलवानी में नाम कमाना है। यह प्रशिक्षु पहलवान बहुत मामूली परिवारों से आते हैं। इनके पास नाम व धन कमाने का एक ही रास्ता है कि कुश्ती के मैदान में सफलता हासिल करें। मसलन, ओलम्पिक में हिस्सा लेने वाले 19 वर्षीय अमित कुमार दहिया एक दोधी के बेटे हैं। सोनीपत में नहारी गांव से सम्बन्धित इस पहलवान के लिए सबसे यादगार लम्हा वह है जब लंदन के एक्सल एरिना में भारतीय प्रशंसकों ने उसका जबरदस्त स्वागत किया था। दहिया का कहना है, मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे मैं अपने गांव में अपने सगे सम्बन्धियों के बीच मौजूद हूं।
दहिया को दांव-पेच के बारे में इतना अधिक ज्ञान है कि सभी खिलाड़ी व कोच उसका सम्मान करते हैं। अब वह रियो ओलम्पिक में ज्यादा तैयारी के साथ जाना चाहता है। लंदन में असफलता का उसे कोई अफसोस नहीं है। उसका कहना है कि अपने पहले ओलम्पिक में तो सुशील भाई ने भी कोई पदक नहीं जीता था। अब अखाड़े के हर पहलवान को लगता है कि अगर दहिया ओलम्पिक में जा सकता है तो वह भी जा सकते हैं। अखाड़े में इन पहलवानों के लिए रहने के कमरे बने हुए हैं। इन्हीं कमरों में से जो चौथा कमरा है उसमें सुशील कुमार ने ओलम्पिक में पदक हासिल करने का सपना देखा था। अखाड़े में सुशील  को हर कोई पहलवान जी कहकर पुकारता है। पहलवान जी प्रशिक्षु पहलवानों के लिए बड़े भाई जैसे हैं। लम्बे समय तक सुशील कुमार के रूममेट रहे प्रदीप कुमार का कहना है कि पहलवान जी का देहाती आकर्षण आज भी 15 साल पहले जैसा ही है, उसमें कोई परिवर्तन नहीं आया है। आज भी वह अपने साथियों से पहले की तरह ही मिलते हैं, उनमें कोई घमंड नहीं है। हालांकि संसार के ज्यादातर पहलवान मांसाहारी हैं। लेकिन छत्रसाल अखाड़े में शुद्ध शाकाहारी भोजन का सेवन किया जाता है।  सुशील कुमार का इस सिलसिले में कहना है कि शाकाहारी रहते हुए इस अखाड़े के पहलवान ओलम्पिक में तीन पदक जीत चुके हैं, इसलिए मांसाहारी होने की जरूरत कहां है। बात बिल्कुल सही है कि गुरु सतपाल अपने सिद्धांतों के बल पर ही अपने शाकाहारी शिष्यों से ही विश्व चैम्पियन पहलवान निकाल देंगे।
सारिम अन्ना

क्रिकेट की पट्टी पर फिसले पट्ठे
साल 2012 भारतीय क्रिकेटरों के लिए कुछ खास नहीं रहा। क्रिकेट की पट्टी पर साल भर हमारे पट्ठे फिसलते रहे। विदेशी पट्टियों पर हमारे पट्ठों को जहां तेज गेंदें डराती रहीं वहीं अपनी पट्टियों पर हम स्पिन गेंदबाजों के सामने पनाह मांगते नजर आये। भारतीय टीम ने 2 अप्रैल, 2011 को वनडे का विश्व खिताब जीता था। इसके बाद माना जाने लगा कि टीम इण्डिया क्रिकेट की दुनिया में आने वाले समय में पूरी तरह राज करेगी और छा जायेगी पर हुआ ठीक इसके विपरीत। सच मानें तो टीम इण्डिया के पतन की शुरूआत विश्व कप जीतने के बाद ही शुरू हो गई। क्रिकेट के भगवान सचिन तेंदुलकर जहां एक-एक रन को तरसते रहे वहीं भरोसेमंद राहुल द्रविड़ व वेरी-वेरी स्पेशल वीवीएस लक्ष्मण ने क्रिकेट प्रेमियों के हो-हल्ले के बाद अपने बल्ले खूंटी पर टांग दिये। इस साल कुछ नये खिलाड़ियों को भी मौका दिया गया लेकिन चेतेश्वर पुजारा को छोड़ दें तो बाकी ने निराश ही किया। टीम इण्डिया के कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी का भाग्य भी उनसे रूठा रहा। जहां उनको पराजय दर पराजय से दो-चार होना पड़ा वहीं खास मौकों पर उनका बल्ला भी दगा दे गया। कहते हैं जब किस्मत खराब हो तो ऊंट पर बैठे को भी कुत्ता काट लेता है। कुछ यही स्थिति भारतीय टीम की भी रही। 2012 खत्म होते-होते टीम इण्डिया क्रिकेट के हर फॉर्मेट में धूल चाटती नजर आई। इस साल भारत ने 10 टेस्ट मैच खेले जिसमें उसे तीन में जीत मिली तो छह में उसे पराजय का हलाहल पीना पड़ा। एक टेस्ट ड्रॉ रहा। युवाओं से सजी टीम इण्डिया टी-20 फॉर्मेट में भी पानी मांगती नजर आई। एशियाई जमीं (श्रीलंका) पर हुए टी-20 विश्व कप में यह टीम सेमीफाइनल तक नहीं पहुंच पाई। जहां तक वनडे की बात है तो इस फॉर्मेट में यह टीम केवल संतोषजनक प्रदर्शन ही कर पाई। भारतीय टीम ने इस साल 16 वनडे मैच खेले जहां उसे नौ में ही जीत नसीब हुई। लगातार पराजयों से आहत-मर्माहत क्रिकेट मुरीदों ने आखिरकार धोनी की धुकधुकी बढ़ा दी है। चारों तरफ से धोनी को कप्तानी से हटाने की आवाजें आने लगी हैं। शायद आप भी कुछ ऐसा ही चाहते होंगे पर सवाल यह उठता है कि किसे कप्तान बनाया जाये आखिर किसने इस साल क्रिकेट में हिन्दुस्तान का नाम रोशन किया है?
टेस्ट में पस्त
2011 तक टेस्ट में बेस्ट रही टीम इंडिया ने 2012 में बंटाधार कर दिया। जनवरी में आॅस्ट्रेलिया दौरे में शुरू हुआ शर्मनाक हार का सिलसिला दिसम्बर तक घरेलू मैदान पर इंग्लैंड के खिलाफ भी जारी रहा। आॅस्ट्रेलिया दौरे पर चार टेस्ट मैचों की सीरीज में टीम इंडिया का 4-0 से सुपड़ा साफ हुआ तो दीवार द्रविड़ बार-बार अपनी गिल्लियां बिखरवाकर अपनी खिल्ली उड़वाते रहे। यही वजह रही कि आॅस्ट्रेलिया से आते ही राहुल द्रविड़ ने संन्यास की घोषणा कर दी। अगस्त में न्यूजीलैंड के खिलाफ हुई घरेलू सीरीज से ठीक पहले वीवीएस लक्ष्मण ने भी संन्यास की घोषणा कर दी। हालांकि इस सीरीज में टीम इण्डिया ने लाज बचा ली और दो मैचों की सीरीज में न्यूजीलैण्ड का क्लीन स्वीप किया। न्यूजीलैण्ड पर फतह हासिल करने के बाद तो मानों भारतीयों को सांप ही सूंघ गया और वे अपना खेल ही भूल गये। साल के आखिर में भारत दौरे पर आए अंग्रेजों ने भारतीय मजबूत बल्लेबाजी की पोल खोल दी। इंग्लैंड ने 28 साल बाद भारतीय सरजमीं पर टेस्ट सीरीज 2-1 से अपने नाम कर क्रिकेट विशेषज्ञों को भी हैरान कर दिया। बेइज्जती की इंतहा तो तब हो गई जब कप्तान धोनी की मनमाफिक पट्टियों पर इंग्लैंड ने भारतीय पट्ठों को खेल के हर क्षेत्र में मात दे दी। देखा जाये तो वीरेंद्र सहवाग, सचिन तेंदुलकर, गौतम गंभीर, वीवीएस लक्ष्मण, राहुल द्रविड़, एमएस धोनी जैसे कई दिग्गज टेस्ट मैचों में बड़ी पारियों को खूब तरसे दिखे। हालांकि बुरे प्रदर्शनों के बीच चेतेश्वर पुजारा और विराट कोहली ने अपने प्रदर्शन से भविष्य की आस तो जगाई पर सचिन जिस तरह आउट हो रहे हैं उससे लग रहा है कि वे भी अब कभी भी अपना बल्ला टांग सकते हैं।
वनडे में भी रहे ठण्डे
आॅस्ट्रेलिया दौरे से 2012 की शुरूआत करने वाली भारतीय टीम साल के पहली त्रिकोणीय सीरीज के फाइनल में भी जगह नहीं बना पाई। इस सीरीज में भारत, आॅस्ट्रेलिया के अलावा श्रीलंका की टीम थी। भारत ने फाइनल में पहुंचने के लिए काफी मेहनत की लेकिन रन रेट के आधार पर वो पिछड़ते हुए सीरीज से बाहर हो गई। आॅस्ट्रेलिया दौरे से लौटने के बाद धोनी के धुरंधरों ने बांग्लादेश में एशिया कप में हिस्सा लिया। इस सीरीज में भारत को पहले मैच में बांग्लादेश के खिलाफ पांच विकेट से करारी हार मिली बावजूद भारत ने पाकिस्तान को छह विकेट से हराकर फाइनल में प्रवेश कर लिया। भारत ने 2012 में श्रीलंका के खिलाफ ही वनडे सीरीज जीती। भारतीय टीम ने जुलाई में श्रीलंका का दौरा किया जहां उसने पांच एकदिनी मुकाबले खेले। भारतीय टीम ने इस सीरीज में श्रीलंका को उसी की सरजमीं पर 4-1 से हराकर अपनी प्रतिष्ठा बचाई। इस साल भारतीय टीम को 16 एकदिनी मुकाबलों में नौ में जीत तो सात में पराजय नसीब हुई।
तमाशा क्रिकेट में बोलती रही बंद
2011 में वनडे फॉर्मेट का विश्व खिताब हासिल करने वाली भारतीय टीम ने 2012 के टी-20 विश्व कप में अपने मुरीदों को काफी निराश किया। प्रतियोगिता के शुरूआती पांच मुकाबलों में से चार में जीत दर्ज करने के बावजूद टीम इंडिया सेमीफाइनल तक नहीं पहुंच सकी। टीम के दिग्गज बल्लेबाजों ने काफी धीमी गति से रन बनाए, जिसका खामियाजा भारत को टूर्नामेंट से बाहर होकर चुकाना पड़ा। भारतीय टीम पांच मैचों में केवल एक बार 160 से अधिक रन बना पाई। टूर्नामेंट के अपने पहले मैच में अफगानिस्तान जैसी कमजोर टीम के खिलाफ भारतीय बल्लेबाज मुश्किल से रन बनाते दिखे। एमएस धोनी, गौतम गंभीर, वीरेंद्र सहवाग, युवराज सिंह, रोहित शर्मा आदि बल्लेबाजों का रन रेट काफी खराब रहा। विराट कोहली ने भारत की तरफ से दो पचासे जमाए और सर्वाधिक 185 रन बनाए। इस विश्व कप के सेमीफाइनल में श्रीलंका, पाकिस्तान, वेस्टइंडीज और आॅस्ट्रेलिया की टीमें पहुंचीं। वेस्टइंडीज और आॅस्ट्रेलिया के बीच फाइनल भिड़ंत हुई। आखिरकार वेस्टइंडीज ने टी-20 विश्व कप जीता।  वेस्टइंडीज के मर्लोन सैमुअल्स को मैन आॅफ द सीरीज चुना गया। अब भारत को यदि अपनी खोई प्रतिष्ठा को चार चांद लगाना है तो उसे अंग्रेजों को हर हाल में हराना होगा।
आईपीएल में छाए और बौराये
भारतीय टीम के लगभग सभी सितारे आईपीएल की मुख्य टीमों का हिस्सा रहे। 2012 में हुए आईपीएल के सेमीफाइनल में दिल्ली, कोलकाता, मुंबई और चेन्नई ने अपना स्थान पक्का किया। पिछली दो बार (2010, 2011) की चैम्पियन टीम चेन्नई सुपर किंग्स की टीम बमुश्किल फाइनल में जगह बनाने में कामयाब हुई। फाइनल में चेन्नई का मुकाबला शाहरुख खान की टीम कोलकाता नाइट राइडर्स से हुआ। फाइनल में चेन्नई ने पहले खेलते हुए कोलकाता को 191 रनों का लक्ष्य दिया। जवाब में कोलकाता ने पांच विकेट के नुकसान पर दो गेंद शेष रहते ही जीत दर्ज कर पहली बार आईपीएल का खिताब अपने नाम किया। इस सीरीज में गौतम गंभीर और वीरेंद्र सहवाग छाए रहे। गंभीर ने इस सीरीज में (590) जबकि सहवाग ने (495) रन बनाए। गेंदबाजी में उमेश यादव, विनय कुमार ने 19-19 विकेट लिए। हालांकि इसके बाद से ही दोनों फिटनेस की समस्या से जूझ रहे हैं। लूले-लंगड़े गेंदबाज भारतीय क्रिकेट के लिये अभिशाप बनते जा रहे हैं।

हॉकी में बदलाव की बयार
पिछले लगभग एक दशक से लगातार खराब प्रदर्शन करने वाली भारतीय हॉकी टीम अब फिर से अपनी लय पकड़ती नजर आ रही है। हॉकी प्रीमियर लीग इस खेल में सोने पर सुहागा कर सकती है। भारतीय हॉकी के सबसे बुरे दौर की बात करें तो वह 2008 रहा जब टीम ओलम्पिक के लिए भी क्वालीफाई नहीं कर पायी थी। इसके अलावा भी जो टूर्नामेंट भारत ने खेले उनमें उसका प्रदर्शन निराशाजनक ही रहा। इस साल लंदन ओलम्पिक में भाग लेने वाली यह टीम बेल्जियम और दक्षिण अफ्रीका जैसी दोयमदर्जे की टीमों से हारने के बाद 12 टीमों में अंतिम स्थान पर रही थी। पांच लीग मैचों में इसने मात्र छह गोल किए और 18 खाए थे। इस समय जबकि इस टीम से खेलप्रेमियों को कोई आस नहीं थी, उसने चैम्पियंस ट्राफी के सेमीफाइनल में  प्रवेश कर सबको चौंका दिया। अगस्त के महीने में खेले गये ओलम्पिक में न्यूजीलैंड से 1-3 से पिटी इस टीम ने मेलबोर्न में खेले गये चैम्पियंस ट्राफी के अपने दूसरे मैच में उसे 4-2 से हराकर पिछली पराजय का बदला चुका दिया। इससे पूर्व वह इंग्लैंड को 3-1 से हरा चुकी थी। इतना ही नहीं नॉक आउट स्टेज पर भारत ने बेल्जियम को भी 1-0 से परास्त कर सेमीफाइनल में जगह बना ली। ओलम्पिक में भारत इसी बेल्जियम से 0-3 से हारा था।
कई दशकों के बाद यह अवसर था जब भारत और पाकिस्तान दोनों किसी बड़े टूर्नामेंट के सेमीफाइनल में खेलते नजर आए। यह सही है कि सेमीफाइनल में ये दोनों ही टीमें क्रमश: आस्ट्रेलिया और नीदरलैंड के आगे नहीं टिक पार्इं और भारत 0-3 और पाकिस्तान 2-5 से हार गया। फिर कांस्य पदक के लिए हुए मैच में पाकिस्तान ने बेहतर हॉकी खेलते हुए भारत को 3-2 से हराकर तीसरा स्थान पाया। भारत आठ टीमों में चौथे स्थान पर रहा। यदि चैम्पियंस ट्राफी का इतिहास देखें तो भारत का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन 1982 में रहा जब इसने कांस्य पदक जीता था। उसके बाद 2002, 2003, 2004 में लगातार तीन बार सेमीफाइनल में पहुंचने के बाद भी भारत आगे नहीं बढ़ पाया। उधर आस्ट्रेलिया ने गोल्डन गोल की बदौलत नीदरलैंड को 2-1 से हराकर लगातार पांचवीं बार यह खिताब जीत लिया। यह गोल्डन गोल किरायन गॉवर्स ने किया। कुल मिलाकर इस टूर्नामेंंट में आस्ट्रेलिया का यह 13वां खिताब है। भारत को इस प्रदर्शन से निश्चित ही लाभ मिलेगा। अब देखने वाली बात यह है कि आखिर अगस्त और दिसंबर के बीच ऐसा क्या हुआ जो भारत के प्रदर्शन में यह सुधार की प्रक्रिया देखने को मिली। इस बार कोच (माइकल नोब्स) को नहीं हटाया गया। फेडरेशन ने उस पर विश्वास रखा और विदेशी टीमों के दमखम का जवाब देने के लिए टीम में युवा खिलाड़ी डाले गए।
पिछले कई साल से यह महसूस किया जा रहा था कि स्किल व तकनीक में यूरोपीय टीमों से 21 रहने के बावजूद भारत मैच हारता जा रहा था। कारण था गति व दमखम का अभाव। भारत के जवाबी हमले इतने धीमे होते हैं कि विपक्षी टीम को अपनी सुरक्षा मजबूत करने का अवसर मिल जाता है। इसके अलावा भारतीय खिलाड़ियों के दिए गए पास पहले से अंदाजा लगाए जा सकते हैं, उनमें हैरान कर देने वाली बात नहीं होती। उदाहरण के तौर पर यदि हमला दाएं फ्लैंक से है तो ज्यादातर मामलों में राइट आउट के स्थान पर खेल रहा खिलाड़ी गेंद को बिल्कुल कोने में फ्लैग के पास ले जाएगा और फिर वहां थोड़ी देर उसे इधर-उधर घुमाकर क्रास की कोशिश करेगा। इस सारी प्रक्रिया में विपक्ष को अपनी रक्षा पंक्ति को मजबूत करने का अवसर मिल जाता है। जबकि विदेशी खिलाड़ी तो कई बार 25 गज की रेखा के पीछे से ही 120 डिग्री का कोण बनाता शॉट भारतीय डी में पहुंचा देते हैं और डी के भीतर खड़ा उनका फारवर्ड उसे आसानी से गोल में डाल देता है। इस टूर्नामेंट में भारत ने अपने हमलों में थोड़ा सुधार किया। हालांकि जर्मनी, आस्ट्रेलिया, पाकिस्तान व बेल्जियम के खिलाफ उन्होंने हमलों में काफी गलतियां कीं।
इसके अलावा आॅफ बाल रनिंग (बिना गेंद के दौड़) में भी अभी भारत को बहुत कुछ सीखना है। खिलाड़ी यह अंदाजा नहीं लगा पाते कि उनका साथी उन्हें कहां पास देगा। इस कारण वे उस दिशा में पूरा भागते नहीं। आज की तेज हॉकी में पलक झपकते ही गेंद और खेल की दिशा बदल जाती है। इसके साथ ही टीम की सबसे बड़ी कमजोरी रही गेंद की गलत ट्रैपिंग। गेंद को सही स्थान पर सही तरीके से ट्रैप न कर पाने की बदौलत जहां भारत ने गोल करने के कई अवसर गंवाए वहीं कई गोल खा भी लिए। हालांकि बेल्जियम के खिलाफ भारत की 1-0 की जीत गोलकीपर टीआर पोटुनूरी, रूपिंदर पाल सिंह, हरबीर सिंह, रघुनाथ, सरदार सिंह, मनप्रीत सिंह व गुरमेल सिंह के मजबूत रक्षण के कारण ही हो पाई, क्योंकि फारवर्ड तो गेंद को अपने पास सम्हाल ही नहीं पा रहे थे, लेकिन ट्रैपिंग में कई बड़ी खामियां नजर आर्इं। रघुनाथ को रक्षण में खिलाना खतरनाक हो सकता था, उसकी ट्रैपिंग और टैकलिंग दोनों ही संदेह के घेरे में दिखीं।
यह एक युवा टीम है जिसमें सबसे अधिक आयु कप्तान सरदार सिंह की है। वह 26 साल का है। इसके अलावा युवा खिलाड़ियों में रूपिंदर पाल, हरबीर सिंह, गुरमेल सिंह, नितिन थमइया, धर्मवीर व अक्षदीप सिंह को विश्व स्तरीय खिलाड़ी बनाया जा सकता है। गोलकीपर टीआर पोटुनूरी में कहीं-कहीं देश के महान गोलरक्षक शंकर लक्ष्मण की झलक देखने को मिलती है। भारत के पास उत्साहित होने के कई कारण हैं। जितनी तादाद में युवा खिलाड़ी टीम में आए हैं, उनसे लगता है कि चंडीगढ़, जालंधर समेत विभिन्न हॉकी अकादमियां अच्छा काम कर रही हैं। उन्हें और प्रोत्साहन देने की जरूरत है। अब 20 दिसम्बर से एशियन चैम्पियन ट्राफी शुरू हो रही है। भारतीय टीम में कोई बदलाव नहीं किया गया है, बस संदीप सिंह और शिवेन्द्र को आरक्षित खिलाड़ियों में रख लिया गया है। यदि टीम में ट्रैपिंग और गलत पासिंग की कमजोरियों को दूर किया जा सके तो परिणाम अपेक्षा से कहीं बेहतर आ सकते हैं। वैसे भी भारत में होने जा रही हॉकी प्रीमियर लीग से आठ बार के ओलम्पिक चैम्पियन की किस्मत बदलने से इंकार नहीं किया जा सकता।


रणजी में दो तिहरे शतक लगाने वाले चौथे बल्लेबाज बने पुजारा
नयी दिल्ली। चेतेश्वर पुजारा रणजी ट्राफी में दो तिहरे शतक लगाने वाले चौथे तथा 350 रन की संख्या पार करने वाले छठे बल्लेबाज बन गये हैं। भारत की नयी रन मशीन पुजारा ने सौराष्ट्र की तरफ से कर्नाटक के खिलाफ आज 352 रन बनाये। यह उनके करियर का सर्वोच्च स्कोर है। इससे पहले उन्होेंने 2008-09 के सत्र में ओड़िशा के खिलाफ नाबाद 302 रन बनाये थे। पुजारा इस तरह से वीवीएस लक्ष्मण, वसीम जाफर और अपनी ही टीम के रविंदर जडेÞजा के क्लब में शामिल हो गये हैं जिन्होंने रणजी ट्राफी में दो तिहरे शतक लगाये हैं। जडेÞजा ने अपने दोनों तिहरे शतक इसी सत्र में लगाये। पुजारा के ओवरआल क्रिकेट करियर का यह पांचवां तिहरा शतक है। उन्होंने एक तिहरा शतक अंडर-14 और दो तिहरे शतक अंडर 22 टूर्नामेंट में लगाये हैं। यही नहीं वह रणजी ट्राफी में सबसे बड़ी पारी खेलने वाले बल्लेबाजों की सूची में छठे स्थान पर काबिज जो गये हैं। रणजी में एक पारी में सर्वाधिक रन बनाने का रिकार्ड बीबी निम्बालकर के नाम पर है जिन्होंने 1948-49 में पुणे में महाराष्ट्र की तरफ से काठियावाड़ के खिलाफ नाबाद 443 रन बनाये थे। निम्बालकर का पिछले साल निधन हुआ था। रणजी में सर्वाधिक व्यक्तिगत पारी खेलने वाले बल्लेबाजों में निम्बालकर के बाद संजय मांजरेकर (377), एमवी श्रीधर  (366), विजय मर्चेंट (नाबाद 359), वीवीएस लक्ष्मण (353), पुजारा (352), सुनील गावस्कर (340) और रविंदर जडेÞजा (331) का नम्बर आता है। उधर जमशेदपुर में आज ही पंजाब के बल्लेबाज तरुवर कोहली ने भी तिहरा शतक लगाया। इस तरह से रणजी ट्राफी में अब तक कुल 32 तिहरे शतक लग चुके हैं। पंकज धरमाणी और दिनेश मोंगिया के बाद तरुवर कोहली पंजाब के तीसरे बल्लेबाज हैं जिन्होंने रणजी में तिहरा शतक लगाया। रणजी ट्राफी के वर्तमान सत्र में अब तक पांच तिहरे शतक लग चुके हैं। जड़ेजा, पुजारा और कोहली के अलावा इस सत्र में महाराष्ट्र के केदार जाधव (327) ने भी तिहरा शतक लगाया है।

हरियाणा के छह खिलाड़ियों को मिला भीम अवार्ड
राज्य में अब तक 137 खिलाड़ियों को भीम पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है
चंडीगढ़। हरियाणा के राज्यपाल जगन्नाथ पहाड़िया ने कहा कि हरियाणा देश का ऐसा पहला राज्य है जहां ओलम्पिक एवं अन्य अंतरराष्ट्रीय क्षेत्रीय खेल प्रतियोगिताओं में पदक विजेता खिलाड़ियोें को सर्वाधिक नकद राशि से सम्मानित किया जाता है और खेलों में दिए जा रहे इन प्रोत्साहनों से अब खेल मात्र खेल नहीं रह गया है बल्कि सुनहरे भविष्य और उज्ज्वल कैरियर की गारंटी बन गया है। राज्यपाल श्री पहाड़िया ने हरियाणा राजभवन में राज्य के सर्वोच्च खेल पुरस्कार ‘भीम अवार्ड’ वितरण समारोह को सम्बोधित किया। समारोह की अध्यक्षता मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा ने की।   राज्यपाल ने बताया कि राज्य में अब तक 137 खिलाड़ियों को भीम पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। इस अवसर पर राज्यपाल ने छह खिलाड़ियों भिवानी के मुक्केबाज जितेन्द्र कुमार, करनाल की पहलवान निर्मला देवी, गुड़गांव के शॉटपुटर ओम प्रकाश, रोलर स्केटिंग (हॉकी) के खिलाड़ी फरीदाबाद के ध्रुव गौतम एवं सिरसा की यशदीप कौर तथा पैरालम्पिक एथलीट सोनीपत के राजेश कुमार को वर्ष  2010-2011 के लिए भीम पुरस्कार के अंतर्गत दो लाख रुपये नकद, भीम प्रतिमा, प्रशस्ति पत्र, ब्लैजर तथा टाई-स्कार्फ देकर सम्मानित किया। हरियाणा की खेल नीति की सराहना करते हुए श्री पहाड़िया ने कहा कि राज्य सरकार ने राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक विजेता खिलाड़ियों को सरकारी नौकरी दी है। हरियाणा राज्य परिवहन की बसों में राज्य एवं राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में भाग लेने वाले खिलाड़ियों को बस के किराये में 75 प्रतिशत छूट तथा अर्जुन पुरस्कार, ध्यानचंद पुरस्कार और भीम पुरस्कार से सम्मानित खिलाड़ियों एवं द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित खेल प्रशिक्षकों को राज्य परिवहन की बसों में नि:शुल्क यात्रा की सुविधा प्रदान की जा रही  है। राज्यपाल ने कहा कि राज्य सरकार द्वारा अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता के दौरान घायल होने वाले खिलाड़ियों को एक से तीन लाख रुपये की सहायता राशि तथा दुर्भाग्यवश मृत्यु होने पर खिलाड़ी के परिवार को पांच लाख रुपये की सहायता राशि देने का प्रावधान है। समारोह की अध्यक्षता करते हुए मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा ने कहा कि राज्य में खेलों का सबसे उच्चतम पुरस्कार भीम पुरस्कार भावी खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा है। राज्य सरकार द्वारा पैरालम्पिक खिलाड़ियोें को भी सामान्य खिलाड़ियों की भांति एक समान पुरस्कार एवं सम्मान दिया जा रहा है। श्री हुड्डा ने कहा कि बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए खेल अभिन्न अंग है। इसके बिना बच्चों का समग्र विकास नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार का लक्ष्य प्रदेश को ‘एजुकेशन हब’ और ‘स्पोर्ट्स पावर’ के रूप में विकसित करने का है जिसकी ओर प्रदेश तेजी से अग्रसर है। मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रदेश में खिलाड़ियों के लिए एक अनुकूल खेल वातावरण तैयार किया जा रहा है और राज्य की खेल नीति में तीन महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर ध्यान दिया गया है; जिसमें खेल इंफ्रास्ट्रक्चर (खेल अधोसंरचना), प्रतिभाओं की पहचान और खिलाड़ियों का सुरक्षित भविष्य शामिल है। श्री हुड्डा ने कहा कि ग्रामीण अंचल में कई खेल प्रतिभाएं नहीं उभर पातीं। इन प्रतिभाओं को उभारने के लिए राज्य सरकार ग्रामीण स्तर पर 200 से ज्यादा खेल स्टेडियम बना रही है और लगभग 600 प्रशिक्षकों को नियुक्त करने जा रही है।
रेलवे युवा खेल प्रतिभाओं को नौकरी देगी
कोझीकोड। रेल मंत्री पवन कुमार बंसल ने कहा कि देश में सार्वजनिक क्षेत्र की सबसे बड़ी नियोक्ता रेलवे अधिक से अधिक खिलाड़ियों की भर्ती कर युवा खेल प्रतिभाआें को बढ़ावा देगी। उन्होंने कोझीकोड रेलवे के 125वें सालाना समारोह में यहां कहा कि वह चाहते हैं कि रेलवे युवा खिलाड़ियों को नौकरी देने के लिए एक प्लेटफार्म के रूप में काम करे। बंसल ने पूर्व उड़नपरी पीटी ऊषा का जिक्र करते हुए कहा कि ऊषा यहां हमारे साथ हैं। वह आपके स्थान से हंै और वह भारतीय रेल में हैं। उन्होंने अपनी उपलब्धियों से देश और भारतीय रेल को गौरवान्वित किया है। ऊषा दक्षिण रेलवे के पलक्कड़ डिवीजन में आॅफिसर आॅन स्पेशल ड्यूटी (खेल) हैं।

सोचते हैं सीख लें हम भी बेरुखी करना मोहब्बत।
निभाते-निभाते आज हम अपनी ही कदर खो बैठे।।
बिना बात के तुम्हें रूठने की आदत है,
जैसे अपनों का साथ न देने की आदत है।
तुम खुश रहो सदा, मेरा क्या है...
मैं तो आईना हूं मुझे टूटने की आदत है।।
महरूम हो रही है फिजां में उसकी खुशबू।
हगता है मेरी याद में वो सांस ले रही है।।


क्रिकेट में हार पर फिर उठे सवाल
हमेशा की तरह एक बार फिर क्रिकेट में मिली करारी हार के बाद देश में देसी-विदेशी की रार छिड़ गई है। लोग तो यहां तक कह रहे हैं कि डंकन के चेलों का डंक खत्म हो चुका है और फुटबाल के साथ लगातार खेलते रहने से उनकी आंखों को क्रिकेट की छोटी गेंद नहीं भा रही। अलबत्ता खिलाड़ियों में भी मनमुटाव है।
 भारतीय क्रिकेट टीम के लगातार खराब प्रदर्शन विशेषकर पाकिस्तान से एक दिवसीय शृंखला हारने के बाद अनेक पूर्व खिलाड़ियों ने टीम के कोच पर ठीकरा फोड़ने का प्रयास किया है। पूर्व कप्तान बिशन सिंह बेदी सहित अनेक खिलाड़ियों ने कहा है कि भारतीय मानसिकता को एक भारतीय कोच ही बेहतर समझ सकता है, इसलिए किसी भारतीय को ही टीम का कोच नियुक्त करना चाहिए। इस बयान से मुल्क में विदेशी कोच बनाम देसी कोच का एक नया बखेड़ा खड़ा हो गया है।
फिलहाल वे डंकन फ्लेचर भारतीय क्रिकेट टीम के कोच हैं जिन्होंने इंग्लैंड की टीम को ताकतवर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। इसी खूबी के चलते ही उन्हें गैरी कर्स्टन के स्थान पर भारतीय क्रिकेट टीम का कोच बनाया गया था। डंकन जब से टीम इण्डिया से जुड़े हैं धोनी के धुरंधरों से खास प्रदर्शन देखने को नहीं मिला। टीम बाहर तो हारी ही अपनी पट्टियों पर भी पछाड़ खा बैठी। टीम की फजीहत के बाद अनुमान लगाया जा रहा है कि डंकन फ्लेचर का अनुबंध अब आगे नहीं बढ़ेगा। फ्लेचर का अनुबंध मार्च में समाप्त हो रहा है उससे पहले ही लामबंदी शुरू हो चुकी है। धोनी जहां कोच डंकन का बचाव करते नहीं अघा रहे वहीं टीम के कुछ सीनियर खिलाड़ी अपने कप्तान और देश को शर्मसार करने का कोई मौका जाया नहीं करना चाहते।
जो भी हो इंग्लैण्ड और पाकिस्तान से मिली शिकस्त के बाद से ही  किसी पूर्व भारतीय खिलाड़ी को टीम इण्डिया का कोच बनाने की महत्वाकांक्षाएं परवान चढ़ने लगी हैं। दलीलें लाख दी जा रही हों पर देश में किसी एक नाम पर एकराय नहीं है। क्रिकेट में अगर विदेशी कोच की बात करें तो न्यूजीलैंड के जॉन राइट व दक्षिण अफ्रीका के गैरी कर्स्टन ने भारतीय क्रिकेट को नई बुलंदियों तक पहुंचाने में मदद की है। जॉन राइट ने दिखाया कि भारतीय टीम विदेशी मैदानों पर भी प्रभावी प्रदर्शन करके जीत दर्ज कर सकती है तो गैरी कर्स्टन ने टीम में जीत का जज्बा भरा। गैरी के नेतृत्व में भारतीय क्रिकेट ने अपना स्वर्णिम दौर भी देखा। उनके कार्यकाल में टीम ने न केवल टेस्ट रैंकिंग में पहला स्थान प्राप्त किया बल्कि 2011 में एकदिवसीय विश्व कप भी अपने नाम किया।
विदेशी कोचों के रूप में आॅस्ट्रेलिया के ग्रेग चैपल और जिम्बाब्वे के डंकन फ्लेचर की बात करें तो ये दोनों जब से आए टीम इण्डिया न सिर्फ मैदान पर खराब प्रदर्शन करती दिखाई दी बल्कि मैदान के बाहर भी उसका विवादों ने साथ नहीं छोड़ा। चैपल फिजिकल फिटनेस पर अधिक ध्यान देते थे, जिससे उनकी यह कहकर आलोचना की गई कि वह खिलाड़ियों की सारी ताकत तो मैच से पहले ही निकाल देते हैं, उन्हें इस बात का भी ख्याल नहीं कि भारतीयों की शारीरिक क्षमता आस्ट्रेलिया के खिलाड़ियों से कमतर है। दूसरी ओर डंकन फ्लेचर के बारे में कहा जा रहा है कि उनके कारण अब भारतीय क्रिकेट खिलाड़ी क्रिकेट के कम व फुटबॉल के ज्यादा अच्छे खिलाड़ी हो गए हैं। यह संदर्भ इसको लेकर है कि फ्लेचर फिजिकल ट्रेनिंग में फुटबॉल को प्राथमिकता देते हैं।
इसी प्रकार के मिले-जुले नतीजे भारतीय क्रिकेट टीम को देसी कोचों के नेतृत्व में भी देखने को मिले हैं। मसलन अजीत वाडेकर व अंशुमन गायकवाड़ जब टीम के कोच-मैनेजर थे तो टीम ने अच्छी सफलताएं दर्ज कीं लेकिन बिशन सिंह बेदी, संदीप पाटिल आदि बतौर कोच जबरदस्त फ्लॉप रहे। इसलिए यह कहना कठिन है कि भारतीय क्रिकेट टीम के लिए विदेशी कोच बेहतर रहेगा या फिर कोई देसी कोच। दरअसल, बात देसी या विदेशी की नहीं है बल्कि इस बात की है कि कोई व्यक्ति कोच के रूप में कितना अच्छा है और वह टीम से कितना बेहतर तालमेल स्थापित कर पाता है। गैरी कर्स्टन व जॉन राइट न सिर्फ अच्छे कोच थे बल्कि टीम से उन्होंने तालमेल भी अच्छा बनाया हुआ था, यही उनकी सफलता का राज भी है।
गौरतलब है कि जॉन राइट जब अपने देश न्यूजीलैण्ड के कोच बने तो वह अच्छे कोच होने के बावजूद कोई चमत्कार नहीं कर सके क्योंकि वह टीम में अच्छा तालमेल स्थापित करने में नाकाम रहे। यही बात डंकन फ्लेचर के बारे में भी कही जा सकती है। निश्चित रूप से फ्लेचर एक अच्छे कोच हैं लेकिन भारतीय टीम से वह इस प्रकार नहीं घुल-मिल सके जिस तरह अंग्रेज खिलाड़ियों से उनके सम्बन्ध स्थापित हो गये थे। मेल-मिलाप से इतर इस बात पर भी नजर डालनी होगी कि किस कोच को कैसी फौज मिली। गैरी कर्स्टन के समय बल्लेबाजी में वीरेन्द्र सहवाग, सचिन तेंदुलकर, राहुल द्रविड़, वीवीएस लक्ष्मण व सौरव गांगुली और गेंदबाजी में जहीर खान, अनिल कुम्बले व हरभजन सिंह शबाब पर थे, लिहाजा कोच का काम आसान था। डंकन फ्लेचर के जुड़ते ही कुछ खिलाड़ी संन्यासी हो गये तो कुछ की चमक ही नदारद हो गई। सच कहें तो टीम इण्डिया बदलाव के दौर से गुजर रही है ऐसी स्थिति में टीम को नए सिरे से एकजुट करने की जरूरत है, जिसमें समय लगेगा। फ्लेचर ही नहीं कोई भी प्रशिक्षक क्यों न हो जिस तरह हमारे खिलाड़ी झुके कंधों के साथ मैदान में उतर रहे हैं उनमें जीत का जज्बा कोई नहीं भर सकता। आज गैरी कर्स्टन दक्षिण अफ्रीकी कोच के रूप में इसलिये सफल हैं क्योंकि यह टीम बल्लेबाजी व गेंदबाजी में संतुलित होने के साथ ही छह-सात विश्वस्तरीय खिलाड़ियों से सुसज्जित है। एक अच्छे कोच की पहचान होती है कि वह टीम में मौजूद व्यक्तिगत सुपरस्टारों को एक इकाई के रूप में बांधने में कामयाब हो जाए। यह काम जॉन राइट ने बखूबी किया था और इसे गैरी कर्स्टन ने भी शानदार तरीके से आगे बढ़ाया।
पूर्व क्रिकेटर बिशन सिंह बेदी और मोहिंदर अमरनाथ का तर्क है कि एक देसी कोच ही भारतीय टीम को बेहतर तरीके से समझ कर गाइड कर सकता है क्योंकि व्यक्ति को समझने में संस्कृति की जानकारी का भी महत्व होता है। इन खिलाड़ियों ने लम्बे समय तक अच्छी क्रिकेट खेली है, इसलिए इनके दृष्टिकोण को भी महत्व दिया जाना चाहिए। एक कोच की बुनियादी भूमिका तकनीकी सलाह देना नहीं है क्योंकि राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचने के बाद खिलाड़ियों में प्रतिभा तो मौजूद होती ही है और वे अपनी अधिकतर समस्याओं का भी स्वयं समाधान कर लेते हैं। एक कोच के लिए असल मुद्दा व्यक्ति प्रबंधन व टीम का फोकस बनाए रखने में होता है। बेदी व अमरनाथ के अनुसार यह काम क्योंकि संस्कृति व मानसिकता से जुड़ा है, इसलिए इसमें देसी कोच ज्यादा कामयाब हो सकता है पर इतिहास बताता है कि इस काम को भी जॉन राइट व गैरी कर्स्टन ने ज्यादा सफलतापूर्वक करके दिखाया, जोकि दोनों ही विदेशी थे। बेदी और अमरनाथ जो कह रहे हैं वह अपनी जगह तो ठीक है पर देश को क्रिकेट ही क्या हॉकी सहित अन्य खेलों में विदेशी गुरु इसलिए चाहिये ताकि खेलनहारों को कोई बेहतर सलाह न दे और उनकी मनमानी चलती रहे। चूंकि विदेशी प्रशिक्षक पैसे के लिये आते हैं लिहाजा वे भले-बुरे पर भी कभी अपनी जुबान नहीं खोलते।

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