॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥ ॥ ऊँ श्री राधाकृष्णाभ्यां नमः॥

कस्तुरी तिलकम ललाटपटले, वक्षस्थले कौस्तुभम्। नासाग्रे वरमौक्तिकम् करतले, वेणु करे कंकण। सर्वांगे हरिचन्दनम्, सुललितम्, कंठे च मुक्तावलि। गोपस्त्री परिवेश्तिथो विजयते, गोपाल चूडामणी॥

आपको सपरिवार " श्री कृष्ण जन्माष्टमी " की ढेर सारी शुभकामनाएं

Happy Shri Krishna Janma Ashtami,
भगवान श्री कृष्ण आपकी हर मनोकामना पूर्ण करें! आपको जीवन में सफलता, खुशी, यष, कीर्ति, स्वास्थ्य, लाभ, सुमति, सुख, संतोष, धैर्य,सुबुद्धि, सम्पत्ति, धर्म व सत्य प्राप्त हो !
इन्हीं शुभकामनाओं के साथ पुनः

श्री कृष्ण जन्माष्टमी की ढेर सारी हार्दिक शुभकामनाएं🙏🙏🙏🙏

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राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री निमिष पण्ड्या का संदेश

विषय :- वेदपठन गतिविधि

समस्त प्रियजन,

साईराम,

भगवान बाबा के अवतार कार्य मे वेद एवं वैदिक धर्म को प्रचलित कर उनकी मूल गरिमा पुनः प्रस्थापित करना समाहित है। वेद सर्व समावेशक है, अतः स्वामी ने यह उपदेश दिया की वेदों के कंपन सर्वत्र फैलाने के उद्देश्य से, जाति, धर्म और पंथ का भेद न मानकर, सभी ने वेदाध्ययन करना चाहिए।
भगवान बाबा की कृपा से, वेदोद्धरण एवं वेदपोषण हेतु श्री सत्य साई सेवा संगठन कटिबद्ध है। समूचे देश मे वेद पाठियों का एक विशाल समूह खड़ा करने की दृष्टि से संगठन एक मंच बनेगा जहां पोषक वातावरण मे वेद पढ़ाने और सीखने को प्रोत्साहन दिया जाएगा।
वेदपठन के लिए निम्नलिखित मार्गदर्शक तत्व एतद् द्वारा जारी किए जाते है जिनका अनुपालन सभी पदाधिकारी एवं वेदपाठी करेंगे और हमारे संगठन का अनोखापन बनाए रखेंगे।

1. वैदिक मन्त्रों का पठन अनिवार्य रूप से केवल पुट्टपर्ती के स्तर का तथा कृष्ण यजुर्वेद शैली से किया जाएगा। इसके अंतर्गत सारे देश मे श्री सत्य साई सेवा संगठन द्वारा समान रूप से वेद मन्त्रों का आरंभ और समापन सामिल है।

2. उच्च कोटि के दैवी नाद से भरे कंपनों द्वारा व्यक्तिगत तथा पर्यावरणीय रूपांतरण हेतु वेद मन्त्रों के सही पठन, स्वर, उच्चारण, काल, सुसुत्र गति तथा स्वर और व्यंजनों पर बल का साई संगठन समर्थन करती है। स्पष्ट है की इनमे धार्मिक विधि का समावेश नही किया गया है क्योंकि साई संगठन सभी के लिए ऐसा एकमात्र मंच प्रदान करता है जहां सही पठन द्वारा दैवी कंपनों की निर्मिति से व्यक्ति का आत्मपरिवर्तन होता है। सभी पाठकों को धार्मिक विधि पर नही बल्कि सही वेद पठन पर ध्यान केंद्रित करना होगा।

3. अतः श्री सत्य साई सेवा संगठन के तत्वाधान मे, आंतरिक अथवा बाह्य, किसी भी वेद पठन मे धार्मिक विधि की अनुमति नही होगी। भगवान बाबा की कृपा से, राष्ट्रीय स्तर पर कार्यवाही सम्बन्धी जो फैसला लिया गया है उसे सभी राज्यों मे हर समय, पूर्व सूचना देकर लागू किया जाएगा। किसी भी अन्य प्रेरणा को कहीं भी लागू नही किया जाएगा और वेद पठन स्वामी के चरणों मे समर्पित करने के लिए भगवान बाबा के व्यतिरिक्त कोई और तस्वीर वेदी पर नही रखी जाएगी।

4. सभी धर्मों के प्रति समान आदर की भावना श्री सत्य साई संगठन की विशेषता है और इस सन्तुलन को बनाए रखने के लिए किसी भी रूप मे धार्मिक विधि का समावेश नही किया जाएगा।

5. एक साधना मानकर पठन मे निरन्तर सुधार यह एकमेव लक्ष्य सभी वेदपाठी, साधक और वेद सिखानेवालों का होगा।

सभी से निवेदन है की भगवान बाबा द्वारा मानव जाति के परिवर्तन हेतु प्रस्थापित इस संगठन की गरिमा के अनुरूप उपरोक्त सूचनाओं का कड़ाई के साथ पालन करें।

प्रेमपूर्वक साईराम

निमिष पण्ड्या
राष्ट्रीय अध्यक्ष,
श्री सत्य साई सेवा संगठन, भारत

विश्व परिवर्तन हेतु आत्म परिवर्तन
www.ssssoindia.org
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╲\╭┓
╭ 🌹 ╯👏🌹श्रद्धा सबुरी🌹👏
🌋🕉🌋🕉🌋🕉🌋🕉🌋🕉🌋
🙏🏻 ¸.•*""*•.¸ 🌷 ¸.•*""*•.¸ 🙏🏻
✳🙏 🕉 श्री साईंनाथाय नम: 🙏✳
┗╯\╲☆ ● ════════❥
🕉🌺🕉 साईं 🕉 🌺 🕉 साईं 🕉🌺🕉
♥️💕♥️💕♥️💕♥️💕♥️
🌸‼🌸 अनंत कोटी ब्रह्मंडनायक महाराजाधीराज योगिराज परब्रम्ह श्री सच्चिदानंद सद्गुरू साईनाथ महाराज की जय 🌸 ‼🌸
🌹══════ღೋ♡✿♡ღೋ═══════🌹
🏵सांई बाबा जी,🏵
🌺करता हूँ फ़रियाद “साईं”
🌺बस इतनी रहमत कर देना,
🌺जो भी पुकारे तुझको बाबा,
🌺खुशियों से उसकी झोली भर देना…
🌼🍀🌹🌸🕉 सांई राम जी 🌸🌹🌼🍀
🌹🌿🌹🌿🌹🌿🌹🌿🌹🌿🌹
श्री साँई बाबा जी की कृपा सभी पर निरंतर बनी रहे......!!!🎋✌🍏
बाबा आपके श्री 👣चरणों👣 में हमारा बार बार प्रणाम 🙏
🌱🌹🌱 मंगलमय दिन के लिए हार्दिक शुभकामनाएँ
🍫🍬🍏🍎🍌🍊🍇🍍
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The 5 mukhi Rudraksha holds a lot of significance because it is believed that this Rudraksha type is blessed by Lord Shiva Himself in the form of Lord Kalagni Rudra. When a wearer wears this Rudraksha with a lot of devotion and sincerity, all his/her sins are washed away. Controlled by the planet Jupiter, this Rudraksha is often addressed as Devguru, Guru of all Devas.

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सत्यनारायण व्रत कथा का पूरा सन्दर्भ यह है कि पुराकालमें शौनकादिऋषि नैमिषारण्य स्थित महर्षि सूत के आश्रम पर पहुंचे। ऋषिगण महर्षि सूत से प्रश्न करते हैं कि लौकिक कष्टमुक्ति, सांसारिक सुख समृद्धि एवं पारलौकिक लक्ष्य की सिद्धि के लिए सरल उपाय क्या है? महर्षि सूत शौनकादिऋषियों को बताते हैं कि ऐसा ही प्रश्न नारद जी ने भगवान विष्णु से किया था। भगवान विष्णु ने नारद जी को बताया कि लौकिक क्लेशमुक्ति, सांसारिक सुखसमृद्धि एवं पारलौकिक लक्ष्य सिद्धि के लिए एक ही राजमार्ग है, वह है सत्यनारायण व्रत। सत्यनारायण का अर्थ है सत्याचरण, सत्याग्रह, सत्यनिष्ठा। संसार में सुखसमृद्धि की प्राप्ति सत्याचरणद्वारा ही संभव है। सत्य ही ईश्वर है। सत्याचरणका अर्थ है ईश्वराराधन, भगवत्पूजा।

कथा का प्रारंभ सूत जी द्वारा कथा सुनाने से होता है। नारद जी भगवान श्रीविष्णु के पास जाकर उनकी स्तुति करते हैं। स्तुति सुनने के अनन्तर भगवान श्रीविष्णु जी ने नारद जी से कहा- महाभाग! आप किस प्रयोजन से यहां आये हैं, आपके मन में क्या है? कहिये, वह सब कुछ मैं आपको बताउंगा।

नारद जी बोले - भगवन! मृत्युलोक में अपने पापकर्मों के द्वारा विभिन्न योनियों में उत्पन्न सभी लोग बहुत प्रकार के क्लेशों से दुखी हो रहे हैं। हे नाथ! किस लघु उपाय से उनके कष्टों का निवारण हो सकेगा, यदि आपकी मेरे ऊपर कृपा हो तो वह सब मैं सुनना चाहता हूं। उसे बतायें।

श्री भगवान ने कहा - हे वत्स! संसार के ऊपर अनुग्रह करने की इच्छा से आपने बहुत अच्छी बात पूछी है। जिस व्रत के करने से प्राणी मोह से मुक्त हो जाता है, उसे आपको बताता हूं, सुनें। हे वत्स! स्वर्ग और मृत्युलोक में दुर्लभ भगवान सत्यनारायण का एक महान पुण्यप्रद व्रत है। आपके स्नेह के कारण इस समय मैं उसे कह रहा हूं। अच्छी प्रकार विधि-विधान से भगवान सत्यनारायण व्रत करके मनुष्य शीघ्र ही सुख प्राप्त कर परलोक में मोक्ष प्राप्त कर सकता है।

भगवान की ऐसी वाणी सनुकर नारद मुनि ने कहा -प्रभो इस व्रत को करने का फल क्या है? इसका विधान क्या है? इस व्रत को किसने किया और इसे कब करना चाहिए? यह सब विस्तारपूर्वक बतलाइये।

श्री भगवान ने कहा - यह सत्यनारायण व्रत दुख-शोक आदि का शमन करने वाला, धन-धान्य की वृद्धि करने वाला, सौभाग्य और संतान देने वाला तथा सर्वत्र विजय प्रदान करने वाला है। जिस-किसी भी दिन भक्ति और श्रद्धा से समन्वित होकर मनुष्य ब्राह्मणों और बन्धुबान्धवों के साथ धर्म में तत्पर होकर सायंकाल भगवान सत्यनारायण की पूजा करे। नैवेद्य के रूप में उत्तम कोटि के भोजनीय पदार्थ को सवाया मात्रा में भक्तिपूर्वक अर्पित करना चाहिए। केले के फल, घी, दूध, गेहूं का चूर्ण अथवा गेहूं के चूर्ण के अभाव में साठी चावल का चूर्ण, शक्कर या गुड़ - यह सब भक्ष्य सामग्री सवाया मात्रा में एकत्र कर निवेदित करनी चाहिए।

बन्धु-बान्धवों के साथ श्री सत्यनारायण भगवान की कथा सुनकर ब्राह्मणों को दक्षिणा देनी चाहिए। तदनन्तर बन्धु-बान्धवों के साथ ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए। भक्तिपूर्वक प्रसाद ग्रहण करके नृत्य-गीत आदि का आयोजन करना चाहिए। तदनन्तर भगवान सत्यनारायण का स्मरण करते हुए अपने घर जाना चाहिए। ऐसा करने से मनुष्यों की अभिलाषा अवश्य पूर्ण होती है। विशेष रूप से कलियुग में, पृथ्वीलोक में यह सबसे छोटा सा उपाय है।

दूसरा अध्याय

श्रीसूतजी बोले - हे द्विजों! अब मैं पुनः पूर्वकाल में जिसने इस सत्यनारायण व्रत को किया था, उसे भलीभांति विस्तारपूर्वक कहूंगा। रमणीय काशी नामक नगर में कोई अत्यन्त निर्धन ब्राह्मण रहता था। भूख और प्यास से व्याकुल होकर वह प्रतिदिन पृथ्वी पर भटकता रहता था। ब्राह्मण प्रिय भगवान ने उस दुखी ब्राह्मण को देखकर वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण करके उस द्विज से आदरपूर्वक पूछा - हे विप्र! प्रतिदिन अत्यन्त दुखी होकर तुम किसलिए पृथ्वीपर भ्रमण करते रहते हो। हे द्विजश्रेष्ठ! यह सब बतलाओ, मैं सुनना चाहता हूं।

ब्राह्मण बोला - प्रभो! मैं अत्यन्त दरिद्र ब्राह्मण हूं और भिक्षा के लिए ही पृथ्वी पर घूमा करता हूं। यदि मेरी इस दरिद्रता को दूर करने का आप कोई उपाय जानते हों तो कृपापूर्वक बतलाइये।

वृद्ध ब्राह्मण बोला - हे ब्राह्मणदेव! सत्यनारायण भगवान् विष्णु अभीष्ट फल को देने वाले हैं। हे विप्र! तुम उनका उत्तम व्रत करो, जिसे करने से मनुष्य सभी दुखों से मुक्त हो जाता है।

व्रत के विधान को भी ब्राह्मण से यत्नपूर्वक कहकर वृद्ध ब्राह्मणरूपधारी भगवान् विष्णु वहीं पर अन्तर्धान हो गये। ‘वृद्ध ब्राह्मण ने जैसा कहा है, उस व्रत को अच्छी प्रकार से वैसे ही करूंगा’ - यह सोचते हुए उस ब्राह्मण को रात में नींद नहीं आयी।

अगले दिन प्रातःकाल उठकर ‘सत्यनारायण का व्रत करूंगा’ ऐसा संकल्प करके वह ब्राह्मण भिक्षा के लिए चल पड़ा। उस दिन ब्राह्मण को भिक्षा में बहुत सा धन प्राप्त हुआ। उसी धन से उसने बन्धु-बान्धवों के साथ भगवान सत्यनारायण का व्रत किया। इस व्रत के प्रभाव से वह श्रेष्ठ ब्राह्मण सभी दुखों से मुक्त होकर समस्त सम्पत्तियों से सम्पन्न हो गया। उस दिन से लेकर प्रत्येक महीने उसने यह व्रत किया। इस प्रकार भगवान् सत्यनारायण के इस व्रत को करके वह श्रेष्ठ ब्राह्मण सभी पापों से मुक्त हो गया और उसने दुर्लभ मोक्षपद को प्राप्त किया।

हे विप्र! पृथ्वी पर जब भी कोई मनुष्य श्री सत्यनारायण का व्रत करेगा, उसी समय उसके समस्त दुख नष्ट हो जायेंगे। हे ब्राह्मणों! इस प्रकार भगवान नारायण ने महात्मा नारदजी से जो कुछ कहा, मैंने वह सब आप लोगों से कह दिया, आगे अब और क्या कहूं?

हे मुने! इस पृथ्वी पर उस ब्राह्मण से सुने हुए इस व्रत को किसने किया? हम वह सब सुनना चाहते हैं, उस व्रत पर हमारी श्रद्धा हो रही है।

श्री सूत जी बोले - मुनियों! पृथ्वी पर जिसने यह व्रत किया, उसे आप लोग सुनें। एक बार वह द्विजश्रेष्ठ अपनी धन-सम्पत्ति के अनुसार बन्धु-बान्धवों तथा परिवारजनों के साथ व्रत करने के लिए उद्यत हुआ। इसी बीच एक लकड़हारा वहां आया और लकड़ी बाहर रखकर उस ब्राह्मण के घर गया। प्यास से व्याकुल वह उस ब्राह्मण को व्रत करता हुआ देख प्रणाम करके उससे बोला - प्रभो! आप यह क्या कर रहे हैं, इसके करने से किस फल की प्राप्ति होती है, विस्तारपूर्वक मुझसे कहिये।

विप्र ने कहा - यह सत्यनारायण का व्रत है, जो सभी मनोरथों को प्रदान करने वाला है। उसी के प्रभाव से मुझे यह सब महान धन-धान्य आदि प्राप्त हुआ है। जल पीकर तथा प्रसाद ग्रहण करके वह नगर चला गया। सत्यनारायण देव के लिए मन से ऐसा सोचने लगा कि ‘आज लकड़ी बेचने से जो धन प्राप्त होगा, उसी धन से भगवान सत्यनारायण का श्रेष्ठ व्रत करूंगा।’ इस प्रकार मन से चिन्तन करता हुआ लकड़ी को मस्तक पर रख कर उस सुन्दर नगर में गया, जहां धन-सम्पन्न लोग रहते थे। उस दिन उसने लकड़ी का दुगुना मूल्य प्राप्त किया।

इसके बाद प्रसन्न हृदय होकर वह पके हुए केले का फल, शर्करा, घी, दूध और गेहूं का चूर्ण सवाया मात्रा में लेकर अपने घर आया। तत्पश्चात उसने अपने बान्धवों को बुलाकर विधि-विधान से भगवान श्री सत्यनारायण का व्रत किया। उस व्रत के प्रभाव से वह धन-पुत्र से सम्पन्न हो गया और इस लोक में अनेक सुखों का उपभोग कर अन्त में सत्यपुर अर्थात् बैकुण्ठलोक चला गया।

तीसरा अध्याय

श्री सूतजी बोले - श्रेष्ठ मुनियों! अब मैं पुनः आगे की कथा कहूंगा, आप लोग सुनें। प्राचीन काल में उल्कामुख नाम का एक राजा था। वह जितेन्द्रिय, सत्यवादी तथा अत्यन्त बुद्धिमान था। वह विद्वान राजा प्रतिदिन देवालय जाता और ब्राह्मणों को धन देकर सन्तुष्ट करता था। कमल के समान मुख वाली उसकी धर्मपत्नी शील, विनय एवं सौन्दर्य आदि गुणों से सम्पन्न तथा पतिपरायणा थी। राजा एक दिन अपनी धर्मपत्नी के साथ भद्रशीला नदी के तट पर श्रीसत्यनारायण का व्रत कर रहा था। उसी समय व्यापार के लिए अनेक प्रकार की पुष्कल धनराशि से सम्पन्न एक साधु नाम का बनिया वहां आया। भद्रशीला नदी के तट पर नाव को स्थापित कर वह राजा के समीप गया और राजा को उस व्रत में दीक्षित देखकर विनयपूर्वक पूछने लगा।

साधु ने कहा - राजन्! आप भक्तियुक्त चित्त से यह क्या कर रहे हैं? कृपया वह सब बताइये, इस समय मैं सुनना चाहता हूं।

राजा बोले - हे साधो! पुत्र आदि की प्राप्ति की कामना से अपने बन्धु-बान्धवों के साथ मैं अतुल तेज सम्पन्न भगवान् विष्णु का व्रत एवं पूजन कर रहा हूं।

राजा की बात सुनकर साधु ने आदरपूर्वक कहा - राजन् ! इस विषय में आप मुझे सब कुछ विस्तार से बतलाइये, आपके कथनानुसार मैं व्रत एवं पूजन करूंगा। मुझे भी संतति नहीं है। ‘इससे अवश्य ही संतति प्राप्त होगी।’ ऐसा विचार कर वह व्यापार से निवृत्त हो आनन्दपूर्वक अपने घर आया। उसने अपनी भार्या से संतति प्रदान करने वाले इस सत्यव्रत को विस्तार पूर्वक बताया तथा - ‘जब मुझे संतति प्राप्त होगी तब मैं इस व्रत को करूंगा’ - इस प्रकार उस साधु ने अपनी भार्या लीलावती से कहा।

एक दिन उसकी लीलावती नाम की सती-साध्वी भार्या पति के साथ आनन्द चित्त से ऋतुकालीन धर्माचरण में प्रवृत्त हुई और भगवान् श्रीसत्यनारायण की कृपा से उसकी वह भार्या गर्भिणी हुई। दसवें महीने में उससे कन्यारत्न की उत्पत्ति हुई और वह शुक्लपक्ष के चन्द्रम की भांति दिन-प्रतिदिन बढ़ने लगी। उस कन्या का ‘कलावती’ यह नाम रखा गया। इसके बाद एक दिन लीलावती ने अपने स्वामी से मधुर वाणी में कहा - आप पूर्व में संकल्पित श्री सत्यनारायण के व्रत को क्यों नहीं कर रहे हैं?

साधु बोला - ‘प्रिये! इसके विवाह के समय व्रत करूंगा।’ इस प्रकार अपनी पत्नी को भली-भांति आश्वस्त कर वह व्यापार करने के लिए नगर की ओर चला गया। इधर कन्या कलावती पिता के घर में बढ़ने लगी। तदनन्तर धर्मज्ञ साधु ने नगर में सखियों के साथ क्रीड़ा करती हुई अपनी कन्या को विवाह योग्य देखकर आपस में मन्त्रणा करके ‘कन्या विवाह के लिए श्रेष्ठ वर का अन्वेषण करो’ - ऐसा दूत से कहकर शीघ्र ही उसे भेज दिया। उसकी आज्ञा प्राप्त करके दूत कांचन नामक नगर में गया और वहां से एक वणिक का पुत्र लेकर आया। उस साधु ने उस वणिक के पुत्र को सुन्दर और गुणों से सम्पन्न देखकर अपनी जाति के लोगों तथा बन्धु-बान्धवों के साथ संतुष्टचित्त हो विधि-विधान से वणिकपुत्र के हाथ में कन्या का दान कर दिया।

उस समय वह साधु बनिया दुर्भाग्यवश भगवान् का वह उत्तम व्रत भूल गया। पूर्व संकल्प के अनुसार विवाह के समय में व्रत न करने के कारण भगवान उस पर रुष्ट हो गये। कुछ समय के पश्चात अपने व्यापारकर्म में कुशल वह साधु बनिया काल की प्रेरणा से अपने दामाद के साथ व्यापार करने के लिए समुद्र के समीप स्थित रत्नसारपुर नामक सुन्दर नगर में गया और पअने श्रीसम्पन्न दामाद के साथ वहां व्यापार करने लगा। उसके बाद वे दोों राजा चन्द्रकेतु के रमणीय उस नगर में गये। उसी समय भगवान् श्रीसत्यनारायण ने उसे भ्रष्टप्रतिज्ञ देखकर ‘इसे दारुण, कठिन और महान् दुख प्राप्त होगा’ - यह शाप दे दिया।

एक दिन एक चोर राजा चन्द्रकेतु के धन को चुराकर वहीं आया, जहां दोनों वणिक स्थित थे। वह अपने पीछे दौड़ते हुए दूतों को देखकर भयभीतचित्त से धन वहीं छोड़कर शीघ्र ही छिप गया। इसके बाद राजा के दूत वहां आ गये जहां वह साधु वणिक था। वहां राजा के धन को देखकर वे दूत उन दोनों वणिकपुत्रों को बांधकर ले आये और हर्षपूर्वक दौड़ते हुए राजा से बोले - ‘प्रभो! हम दो चोर पकड़ लाए हैं, इन्हें देखकर आप आज्ञा दें’। राजा की आज्ञा से दोनों शीघ्र ही दृढ़तापूर्वक बांधकर बिना विचार किये महान कारागार में डाल दिये गये। भगवान् सत्यदेव की माया से किसी ने उन दोनों की बात नहीं सुनी और राजा चन्द्रकेतु ने उन दोनों का धन भी ले लिया।

भगवान के शाप से वणिक के घर में उसकी भार्या भी अत्यन्त दुखित हो गयी और उनके घर में सारा-का-सारा जो धन था, वह चोर ने चुरा लिया। लीलावती शारीरिक तथा मानसिक पीड़ाओं से युक्त, भूख और प्यास से दुखी हो अन्न की चिन्ता से दर-दर भटकने लगी। कलावती कन्या भी भोजन के लिए इधर-उधर प्रतिदिन घूमने लगी। एक दिन भूख से पीडि़त कलावती एक ब्राह्मण के घर गयी। वहां जाकर उसने श्रीसत्यनारायण के व्रत-पूजन को देखा। वहां बैठकर उसने कथा सुनी और वरदान मांगा। उसके बाद प्रसाद ग्रहण करके वह कुछ रात होने पर घर गयी।

माता ने कलावती कन्या से प्रेमपूर्वक पूछा - पुत्री ! रात में तू कहां रुक गयी थी? तुम्हारे मन में क्या है? कलावती कन्या ने तुरन्त माता से कहा - मां! मैंने एक ब्राह्मण के घर में मनोरथ प्रदान करने वाला व्रत देखा है। कन्या की उस बात को सुनकर वह वणिक की भार्या व्रत करने को उद्यत हुई और प्रसन्न मन से उस साध्वी ने बन्धु-बान्धवों के साथ भगवान् श्रीसत्यनारायण का व्रत किया तथा इस प्रकार प्रार्थना की - ‘भगवन! आप हमारे पति एवं जामाता के अपराध को क्षमा करें। वे दोनों अपने घर शीघ्र आ जायं।’ इस व्रत से भगवान सत्यनारायण पुनः संतुष्ट हो गये तथा उन्होंने नृपश्रेष्ठ चन्द्रकेतु को स्वप्न दिखाया और स्वप्न में कहा - ‘नृपश्रेष्ठ! प्रातः काल दोनों वणिकों को छोड़ दो और वह सारा धन भी दे दो, जो तुमने उनसे इस समय ले लिया है, अन्यथा राज्य, धन एवं पुत्रसहित तुम्हारा सर्वनाश कर दूंगा।’

राजा से स्वप्न में ऐसा कहकर भगवान सत्यनारायण अन्तर्धान हो गये। इसके बाद प्रातः काल राजा ने अपने सभासदों के साथ सभा में बैठकर अपना स्वप्न लोगों को बताया और कहा - ‘दोनों बंदी वणिकपुत्रों को शीघ्र ही मुक्त कर दो।’ राजा की ऐसी बात सुनकर वे राजपुरुष दोनों महाजनों को बन्धनमुक्त करके राजा के सामने लाकर विनयपूर्वक बोले - ‘महाराज! बेड़ी-बन्धन से मुक्त करके दोनों वणिक पुत्र लाये गये हैं। इसके बाद दोनों महाजन नृपश्रेष्ठ चन्द्रकेतु को प्रणाम करके अपने पूर्व-वृतान्त का स्मरण करते हुए भयविह्वन हो गये और कुछ बोल न सके।

राजा ने वणिक पुत्रों को देखकर आदरपूर्वक कहा -‘आप लोगों को प्रारब्धवश यह महान दुख प्राप्त हुआ है, इस समय अब कोई भय नहीं है।’, ऐसा कहकर उनकी बेड़ी खुलवाकर क्षौरकर्म आदि कराया। राजा ने वस्त्र, अलंकार देकर उन दोनों वणिकपुत्रों को संतुष्ट किया तथा सामने बुलाकर वाणी द्वारा अत्यधिक आनन्दित किया। पहले जो धन लिया था, उसे दूना करके दिया, उसके बाद राजा ने पुनः उनसे कहा - ‘साधो! अब आप अपने घर को जायं।’ राजा को प्रणाम करके ‘आप की कृपा से हम जा रहे हैं।’ - ऐसा कहकर उन दोनों महावैश्यों ने अपने घर की ओर प्रस्थान किया।

चौथा अध्याय

श्रीसूत जी बोले - साधु बनिया मंगलाचरण कर और ब्राह्मणों को धन देकर अपने नगर के लिए चल पड़ा। साधु के कुछ दूर जाने पर भगवान सत्यनारायण की उसकी सत्यता की परीक्षा के विषय में जिज्ञासा हुई - ‘साधो! तुम्हारी नाव में क्या भरा है?’ तब धन के मद में चूर दोनों महाजनों ने अवहेलनापूर्वक हंसते हुए कहा - ‘दण्डिन! क्यों पूछ रहे हो? क्या कुछ द्रव्य लेने की इच्छा है? हमारी नाव में तो लता और पत्ते आदि भरे हैं।’ ऐसी निष्ठुर वाणी सुनकर - ‘तुम्हारी बात सच हो जाय’ - ऐसा कहकर दण्डी संन्यासी को रूप धारण किये हुए भगवान कुछ दूर जाकर समुद्र के समीप बैठ गये।

दण्डी के चले जाने पर नित्यक्रिया करने के पश्चात उतराई हुई अर्थात जल में उपर की ओर उठी हुई नौका को देखकर साधु अत्यन्त आश्चर्य में पड़ गया और नाव में लता और पत्ते आदि देखकर मुर्छित हो पृथ्वी पर गिर पड़ा। सचेत होने पर वणिकपुत्र चिन्तित हो गया। तब उसके दामाद ने इस प्रकार कहा - ‘आप शोक क्यों करते हैं? दण्डी ने शाप दे दिया है, इस स्थिति में वे ही चाहें तो सब कुछ कर सकते हैं, इसमें संशय नहीं। अतः उन्हीं की शरण में हम चलें, वहीं मन की इच्छा पूर्ण होगी।’ दामाद की बात सुनकर वह साधु बनिया उनके पास गया और वहां दण्डी को देखकर उसने भक्तिपूर्वक उन्हें प्रणाम किया तथा आदरपूर्वक कहने लगा - आपके सम्मुख मैंने जो कुछ कहा है, असत्यभाषण रूप अपराध किया है, आप मेरे उस अपराध को क्षमा करें - ऐसा कहकर बारम्बार प्रणाम करके वह महान शोक से आकुल हो गया।

दण्डी ने उसे रोता हुआ देखकर कहा - ‘हे मूर्ख! रोओ मत, मेरी बात सुनो। मेरी पूजा से उदासीन होने के कारण तथा मेरी आज्ञा से ही तुमने बारम्बार दुख प्राप्त किया है।’ भगवान की ऐसी वाणी सुनकर वह उनकी स्तुति करने लगा।

साधु ने कहा - ‘हे प्रभो! यह आश्चर्य की बात है कि आपकी माया से मोहित होने के कारण ब्रह्मा आदि देवता भी आपके गुणों और रूपों को यथावत रूप से नहीं जान पाते, फिर मैं मूर्ख आपकी माया से मोहित होने के कारण कैसे जान सकता हूं! आप प्रसन्न हों। मैं अपनी धन-सम्पत्ति के अनुसार आपकी पूजा करूंगा। मैं आपकी शरण में आया हूं। मेरा जो नौका में स्थित पुराा धन था, उसकी तथा मेरी रक्षा करें।’ उस बनिया की भक्तियुक्त वाणी सुनकर भगवान जनार्दन संतुष्ट हो गये।

भगवान हरि उसे अभीष्ट वर प्रदान करके वहीं अन्तर्धान हो गये। उसके बाद वह साधु अपनी नौका में चढ़ा और उसे धन-धान्य से परिपूर्ण देखकर ‘भगवान सत्यदेव की कृपा से हमारा मनोरथ सफल हो गया’ - ऐसा कहकर स्वजनों के साथ उसने भगवान की विधिवत पूजा की। भगवान श्री सत्यनारायण की कृपा से वह आनन्द से परिपूर्ण हो गया और नाव को प्रयत्नपूर्वक संभालकर उसने अपने देश के लिए प्रस्थान किया। साधु बनिया ने अपने दामाद से कहा - ‘वह देखो मेरी रत्नपुरी नगरी दिखायी दे रही है’। इसके बाद उसने अपने धन के रक्षक दूत कोअपने आगमन का समाचार देने के लिए अपनी नगरी में भेजा।

उसके बाद उस दूत ने नगर में जाकर साधु की भार्या को देख हाथ जोड़कर प्रणाम किया तथा उसके लिए अभीष्ट बात कही -‘सेठ जी अपने दामाद तथा बन्धुवर्गों के साथ बहुत सारे धन-धान्य से सम्पन्न होकर नगर के निकट पधार गये हैं।’ दूत के मुख से यह बात सुनकर वह महान आनन्द से विह्वल हो गयी और उस साध्वी ने श्री सत्यनारायण की पूजा करके अपनी पुत्री से कहा -‘मैं साधु के दर्शन के लिए जा रही हूं, तुम शीघ्र आओ।’ माता का ऐसा वचन सुनकर व्रत को समाप्त करके प्रसाद का परित्याग कर वह कलावती भी अपने पति का दर्शन करने के लिए चल पड़ी। इससे भगवान सत्यनारायण रुष्ट हो गये और उन्होंने उसके पति को तथा नौका को धन के साथ हरण करके जल में डुबो दिया।

इसके बाद कलावती कन्या अपने पति को न देख महान शोक से रुदन करती हुई पृथ्वी पर गिर पड़ी। नाव का अदर्शन तथा कन्या को अत्यन्त दुखी देख भयभीत मन से साधु बनिया से सोचा - यह क्या आश्चर्य हो गया? नाव का संचालन करने वाले भी सभी चिन्तित हो गये। तदनन्तर वह लीलावती भी कन्या को देखकर विह्वल हो गयी और अत्यन्त दुख से विलाप करती हुई अपने पति से इस प्रकार बोली -‘ अभी-अभी नौका के साथ वह कैसे अलक्षित हो गया, न जाने किस देवता की उपेक्षा से वह नौका हरण कर ली गयी अथवा श्रीसत्यनारायण का माहात्म्य कौन जान सकता है!’ ऐसा कहकर वह स्वजनों के साथ विलाप करने लगी और कलावती कन्या को गोद में लेकर रोने लगी।

कलावती कन्या भी अपने पति के नष्ट हो जाने पर दुखी हो गयी और पति की पादुका लेकर उनका अनुगमन करने के लिए उसने मन में निश्चय किया। कन्या के इस प्रकार के आचरण को देख भार्यासहित वह धर्मज्ञ साधु बनिया अत्यन्त शोक-संतप्त हो गया और सोचने लगा - या तो भगवान सत्यनारायण ने यह अपहरण किया है अथवा हम सभी भगवान सत्यदेव की माया से मोहित हो गये हैं। अपनी धन शक्ति के अनुसार मैं भगवान श्री सत्यनारायण की पूजा करूंगा। सभी को बुलाकर इस प्रकार कहकर उसने अपने मन की इच्छा प्रकट की और बारम्बार भगवान सत्यदेव को दण्डवत प्रणाम किया। इससे दीनों के परिपालक भगवान सत्यदेव प्रसन्न हो गये। भक्तवत्सल भगवान ने कृपापूर्वक कहा - ‘तुम्हारी कन्या प्रसाद छोड़कर अपने पति को देखने चली आयी है, निश्चय ही इसी कारण उसका पति अदृश्य हो गया है। यदि घर जाकर प्रसाद ग्रहण करके वह पुनः आये तो हे साधु बनिया तुम्हारी पुत्री पति को प्राप्त करेगी, इसमें संशय नहीं।

कन्या कलावती भी आकाशमण्डल से ऐसी वाणी सुनकर शीघ्र ही घर गयी और उसने प्रसाद ग्रहण किया। पुनः आकर स्वजनों तथा अपने पति को देखा। तब कलावती कन्या ने अपने पिता से कहा - ‘अब तो घर चलें, विलम्ब क्यों कर रहे हैं?’ कन्या की वह बात सुनकर वणिकपुत्र संतुष्ट हो गया और विधि-विधान से भगवान सत्यनारायण का पूजन करके धन तथा बन्धु-बान्धवों के साथ अपने घर गया। तदनन्तर पूर्णिमा तथा संक्रान्ति पर्वों पर भगवान सत्यनारायण का पूजन करते हुए इस लोक में सुख भोगकर अन्त में वह सत्यपुर बैकुण्ठलोक में चला गया।

पांचवा अध्याय

श्रीसूत जी बोले - श्रेष्ठ मुनियों! अब इसके बाद मैं दूसरी कथा कहूंगा, आप लोग सुनें। अपनी प्रजा का पालन करने में तत्पर तुंगध्वज नामक एक राजा था। उसने सत्यदेव के प्रसाद का परित्याग करके दुख प्राप्त किया। एक बाद वह वन में जाकर और वहां बहुत से पशुओं को मारकर वटवृक्ष के नीचे आया। वहां उसने देखा कि गोपगण बन्धु-बान्धवों के साथ संतुष्ट होकर भक्तिपूर्वक भगवान सत्यदेव की पूजा कर रहे हैं। राजा यह देखकर भी अहंकारवश न तो वहां गया और न उसे भगवान सत्यनारायण को प्रणाम ही किया। पूजन के बाद सभी गोपगण भगवान का प्रसाद राजा के समीप रखकर वहां से लौट आये और इच्छानुसार उन सभी ने भगवान का प्रसाद ग्रहण किया। इधर राजा को प्रसाद का परित्याग करने से बहुत दुख हुआ।

उसका सम्पूर्ण धन-धान्य एवं सभी सौ पुत्र नष्ट हो गये। राजा ने मन में यह निश्चय किया कि अवश्य ही भगवान सत्यनारायण ने हमारा नाश कर दिया है। इसलिए मुझे वहां जाना चाहिए जहां श्री सत्यनारायण का पूजन हो रहा था। ऐसा मन में निश्चय करके वह राजा गोपगणों के समीप गया और उसने गोपगणों के साथ भक्ति-श्रद्धा से युक्त होकर विधिपूर्वक भगवान सत्यदेव की पूजा की। भगवान सत्यदेव की कृपा से वह पुनः धन और पुत्रों से सम्पन्न हो गया तथा इस लोक में सभी सुखों का उपभोग कर अन्त में सत्यपुर वैकुण्ठलोक को प्राप्त हुआ।

श्रीसूत जी कहते हैं - जो व्यक्ति इस परम दुर्लभ श्री सत्यनारायण के व्रत को करता है और पुण्यमयी तथा फलप्रदायिनी भगवान की कथा को भक्तियुक्त होकर सुनता है, उसे भगवान सत्यनारायण की कृपा से धन-धान्य आदि की प्राप्ति होती है। दरिद्र धनवान हो जाता है, बन्धन में पड़ा हुआ बन्धन से मुक्त हो जाता है, डरा हुआ व्यक्ति भय मुक्त हो जाता है - यह सत्य बात है, इसमें संशय नहीं। इस लोक में वह सभी ईप्सित फलों का भोग प्राप्त करके अन्त में सत्यपुर वैकुण्ठलोक को जाता है। हे ब्राह्मणों! इस प्रकार मैंने आप लोगों से भगवान सत्यनारायण के व्रत को कहा, जिसे करके मनुष्य सभी दुखों से मुक्त हो जाता है।

कलियुग में तो भगवान सत्यदेव की पूजा विशेष फल प्रदान करने वाली है। भगवान विष्णु को ही कुछ लोग काल, कुछ लोग सत्य, कोई ईश और कोई सत्यदेव तथा दूसरे लोग सत्यनारायण नाम से कहेंगे। अनेक रूप धारण करके भगवान सत्यनारायण सभी का मनोरथ सिद्ध करते हैं। कलियुग में सनातन भगवान विष्णु ही सत्यव्रत रूप धारण करके सभी का मनोरथ पूर्ण करने वाले होंगे। हे श्रेष्ठ मुनियों! जो व्यक्ति नित्य भगवान सत्यनारायण की इस व्रत-कथा को पढ़ता है, सुनता है, भगवान सत्यारायण की कृपा से उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। हे मुनीश्वरों! पूर्वकाल में जिन लोगों ने भगवान सत्यनारायण का व्रत किया था, उसके अगले जन्म का वृतान्त कहता हूं, आप लोग सुनें।

महान प्रज्ञासम्पन्न शतानन्द नाम के ब्राह्मण सत्यनारायण व्रत करने के प्रभाव से दूसे जन्म में सुदामा नामक ब्राह्मण हुए और उस जन्म में भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान करके उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया। लकड़हारा भिल्ल गुहों का राजा हुआ और अगले जन्म में उसने भगवान श्रीराम की सेवा करके मोक्ष प्राप्त किया। महाराज उल्कामुख दूसरे जन्म में राजा दशरथ हुए, जिन्होंने श्रीरंगनाथजी की पूजा करके अन्त में वैकुण्ठ प्राप्त किया। इसी प्रकार धार्मिक और सत्यव्रती साधु पिछले जन्म के सत्यव्रत के प्रभाव से दूसरे जन्म में मोरध्वज नामक राजा हुआ। उसने आरे सेचीरकर अपने पुत्र की आधी देह भगवान विष्णु को अर्पित कर मोक्ष प्राप्त किया। महाराजा तुंगध्वज जन्मान्तर में स्वायम्भुव मनु हुए और भगवत्सम्बन्धी सम्पूर्ण कार्यों का अनुष्ठान करके वैकुण्ठलोक को प्राप्त हुए। जो गोपगण थे, वे सब जन्मान्तर में व्रजमण्डल में निवास करने वाले गोप हुए और सभी राक्षसों का संहार करके उन्होंने भी भगवान का शाश्वत धाम गोलोक प्राप्त किया।

इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराण के अन्तर्गत रेवाखण्ड में श्रीसत्यनारायणव्रत कथा का यह पांचवां अध्याय पूर्ण हुआ।
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||.: * ψ ૐ 卐 ૐ ψ *.||
गुरु कृपाही केवलं शिष्य परम मंगलं
ॐ जय अर्धनारी नटेश्वर..
ll दिगंबरा दिगंबरा श्रीपादवल्लभ दिंगबरा ll *...
(सत्यं शिवं सुन्दरम्)*
*||*ॐ *मंगलम ओमकार मंगलम.*||
|| *ॐll 卐 ।।**ૐ।।
।।जय भगवती*।।
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1. Aum Sri Bhagawan Sathya Sai Babaya Namah
I Bow to Lord Sathya Sai Baba: Who is Divine Mother and Father

2. Aum Sri Sathya Swarupaya Namah
Who is Embodiment of Truth

3. Aum Sri Sai Sathya Dharma Parayanaya Namah
Who is Devoted to Truth and Righteousness

4. Aum Sri Sai Varadaya Namah
Who is Giver of Boons

5. Aum Sri Sai Satpurushaya Namah
Who is eternal existing Truth

6. Aum Sri Sai Gunatmane Namah
Who is embodiment of virtues

7. Aum Sri Sai Sadhu Vardhanaya Namah
Who spreads goodness all around

8. Aum Sri Sai Sadhu Jana Poshane
Who sustains and shelter virtuous persons

9. Aum Sri Sai Sarva Jnaya Namah
Who is omniscient

10. Aum Sri Sai Sarva Jana Priyaya Namah
Who is loved by all

11. Aum Sri Sai Sarva Shakti Murtaye Namah
Who is embodiment of all powers

12. Aum Sri Sai Sarveshay Namah
Who is Lord of all

13. Aum Sri Sai Sarva Sanga Parithyagine Namah
Who is One without any attachment

14. Aum Sri Sai Sarva Antharyaminey Namah
Who checks and regulates feelings of everyone

15. Aum Sri Sai Mahimatmane Namah
Who is Supremest Lord

16. Aum Sri Sai Maheshwara Swarupaya Namah
Who is embodiment of Lord Shiva

17. Aum Sri Sai Parthi Gramodbhavaya Namah
Who is born in Parthi village

18. Aum Sri Sai Parthi Kshetra Vivasine Namah
Who is Resident of Parthi

19. Aum sri Sai Yashakaya Shirdi Vasine Namah
Who was worshipped in the previous Incarnation as the Residant of Shirdi

20. Aum Sri Sai Jodi Aadi Palli Somappaya Namah
Who assumed the form of 'somappaya'

21. Aum Sri Sai Bhardwaja Rishi Gothraya Namah
Who is descendant of Sage Bhaaradwaja

22. Aum Sri Sai Bhakta Vatsalaya Namah
Who is affectionate towards devotees

23. Aum Sri Sai Apantaratmay Namah
Who is indweller of all beings

24. Aum Sri Sai Avatar Murtaye Namah
Who is embodiment of Incarnation

25. Aum Sri Sai Sarva Bhaya Nivarine Namah
Who removes all fears

26. Aum Sri Sai Apastambha Sutray Namah
Who is born in Sage Apastambha lineage

27. Aum Sri Sai Abhaya Pradaya Namah
Who grants fearlessness

28. Aum Sri Sai Ratnakara Vanshod Bhavaya Namah
Who is born in ratnakar dynasty

29. Aum Sri Sai Shirdi Abheda Shaktyavataraya Namah
Whose Glory is not different from that of Shirdi incarnation

30. Aum Sri Sai Shankaraya Namah
Who is Lord Shiva

31. Aum Sri Sai Shirdi Sai Muryaye Namah
Who is Incarnation of Shirdi Sai

32. Aum Sri Sai Dwarakamayi Vasine Namah
Who is residant of Dwarakamayi (Name of a mosque in Shirdi)

33. Aum Sri Sai Chitravathi Tat Puttaparthi Viharine Namah
Who moves about on the bank of the Chitravathi river in Puttaparthi

34. Aum Sri Sai Sakti Pradya Namah
Who bestows strength and vigor

35. Aum Sri Sai Sharanagat Tranaya Namah
Who saves those who surrender

36. Aum Sri Sai Anandaya Namah
Who is bliss

37. Aum Sri Sai Ananda Daya Namah
Who grants bliss

38. Aum Sri Sai Aartha Tran Parayanaya Namah
Who is Saviour of affiliced

39. Aum Sri Sai Anatha Nathaya Namah
Who is Lord of those destitutes

40. Aum Sri Sai Asahaya Sahayaya Namah
Who is Saviour of helpless

41. Aum Sri Sai Loka Bhandhavaya Namah
Who is kith and kin to all

42. Aum Sri Sai Loka Seva Parayanaya Namah
Who is serving and helping all

43. Aum Sri Sai Loka Nathaya Namah
Who is Lord of all

44. Aum Sri Sai Deenjana Poshanaya Namah
Who nourishes and sustains afflicted

45. Aum Sri Sai Murti Traya Swarupaya Namah
Who is Trinity: Brahama; Vishni and Maheshwara

46. Aum Sri Sai Mukti Pradaya Namah
Who grants liberation

47. Aum Sri Sai Kalusha Viduaya Namah
Who is the remover of defects and faults

48. Aum Sri Sai Karuna Karay Namah
Who is compassionate

49. Aum Sri Sai Sarva Adharaya Namah
Who is the Support of all

50. Aum Sri Sai Sarva Hrudaya Vasine Namah
Who is indweller of everyone's heart

51. Aum Sri Sai Punya Phala Pradaya Namah
Who is Giver of fruits of meirtorious

52. Aum Sri Sai Sarva Papa Kshaya Karaya Namah
Who is remover of all sins

53. Aum Sri Sai Sarva Roga Nivarine Namah
Who is remover of all diseases - destroyer of the cycle of birth and death

54. Aum Sri Sai Sarva Badha Haraya Namah
Who is destroyer of all sufferings

55. Aum Sri Sai Anant Nuta Kartanaya Namah 
Who is creator and Who is praised endlessly

56. Aum Sri Sai Adi Purushaya Namah
Who is beginningless Lord

57. Aum Sri Sai Adi Sakthye Namah
Who is infinate power

58. Aum Sri Sai Aparupa Shaktine Namah
Who has delightful and wonderful powers

59. Aum Sri Sai Avyaktha Roopine Namah
Who is formless

60. Aum Sri Sai Kam Krodha Dhwamsine Namah
Who destroys desire and anger

61. Aum Sri Sai Kanak Ambar Dharine Namah
Who wears golden coloured dress

62. Aum Sri Sai Adbhuta Charyaya Namah
Who does astonishing activities not seen anywhere

63. Aum Sri Sai Apad Bhandhavaya Namah
Who helps as a brother in times of calamities

64. Aum Sri Sai Prematmane Namah
Who is Supremest Love

65. Aum Sri Sai Prema Moortaya Namah
Who is embodiment of Love

66. Aum Sri Sai Prema Pradaya Namah
Who grants love

67. Aum Sri Sai Priyaya Namah
Who is loved by all

68. Aum Sri Sai Bhakta Priyaya Namah
Who is loved by Detotees

69. Aum Sri Sai Bhakta Mandaraya Namah
Who confers happiness of Heaven to devotees

70. Aum Sri Sai Bhakta Jana Hridaya Viharaya Namah
Whose play-ground is the heart of devotees

71. Aum Sri Sai Bhakta Jana HrudayaLayaya Namah
Who dewlls in the heart of devotees

72. Aum Sri Sai Bhakta Paradhinaya Namah
Who is bound to devotees by their devotion

73. Aum Sri Sai Bhakti Jnana Pradipaya Namah
Who ignites the light of devotion and spiritual knowledge

74. Aum Sri Sai Bhakti Pradaya Namah
Who shows the path of devotion and through devotion to knowledge to all aspirants

75. Aum Sri Sai Sujanana Marg Darshakaya Namah
Who shows the path of attaining right knowledge

76. Aum Sri Sai Jnana Swarupaya Namah
Who is embodiment of knowledge

77. Aum Sri Sai Gita Bodhakaya Namah
Who is giver and teacher of Gita

78. Aum Sri Sai Jnana Siddhi Daya Namah
Who is grants the attainments of wisdom and success

79. Aum Sri Sai Sundar Rupay Namah
Who has charming form

80. Aum Sri Sai Punya Purushaya Namah
Who is embodiment of purity

81. Aum Sri Sai Phala Pradaya Namah
Who grants the fruits of our actions

82. Aum Sri Sai Purushottamaya Namah
Who is supremest among all

83. Aum Sri Sai Purana Purushaya Namah
Who is the Ever Existent Perpetual Being

84. Aum Sri Sai Atitaya Namah
Whose Glory transcends the Three Worlds

85. Aum Sri Sai Kaalatitaya Namah
Who is beyond time

86. Aum Sri Sai Siddhi Rupaya Namah
Who is embodiment of all success and accomplishments

87. Aum Sri Sai Siddha Sankalpaya Namah
Whose power of Will is instant success

88. Aum Sri Sai Aarogya Pradaya Namah
Who grants good health

89. Aum Sri Sai Anna Vastra Daya Namah
Who is sustainer of all Beings, by providing food; shelter and clothing

90. Aum Sri Sai Samsara Dukha Kshaya Karaya Namah
Who is the destroyer of sorrows and sufferings of Samsaar (the objective world)

91. Aum Sri Sai Sarva Bhista Pradaya Namah
Who grants all desirable objects

92. Aum Sri Sai Kalyana Gunaya Namah
Who has agreeable attributes

93. Aum Sri Sai Karma Dhwansine Namah
Who destroys evil effect or reactions or bad actions

94. Aum Sri Sai Sadhu Manas Shobitaya Namah
Who shines in the mind of good persons as brilliance knowledge

95.Aum Sri Sai Sarva Mata Sammantaya Namah
Who represents all faiths

96.Aum Sri Sai Sadhi Manas Parishodhakaya Namah
Who helps purify the mind of spiritual aspirants

97.Aum Sri Sai Sadhak Anugraha Vat Vriksha Prathisthapakaya Namah
Who has planted a tree as a boon to spiritual aspirants

98.Aum Sri Sai Sakala Samsaya Haraya Namah
Who destroys all doubts

99.Aum Sri Sai Sakala Tatwa Bodhakaya Namah
Who grants essence of all spirtitual knowledge

100.Aum Sri Sai Yogi Swaraya Namah
Who is Lord of all yogis

101.Aum Sri Sai Yogindra Vanditaya Namah
Who is revered by Masters of Yogas

102.Aum Sri Sai Sarva Mangal Karaya Namah
Who is grantor of auspiciousness and prosperity

103.Aum Sri Sai Sarva Siddhi Pradaya Namah
Who grants all accomplishments and skills

104.Aum Sri Sai Aapanivarine Namah
Who removes calamities

105.Aum Sri Sai Aarathi Haraya Namah
Who destroys bodily and mental distress

106.Aum Sri Sai Shanta Murtaye Namah
Who is embodiment of peace

107.Aum Sri Sai Sulabha Prasannaya Namah
Who is easily pleased

108.Aum Sri Sai Bhagwan Sri Sathya Sai Babaya Namah
I bow to Lord Sathya Sai Baba: Who is Divine Mother and Father
 

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