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हमारी संसद मे #juvenile_justice_bill भले ही, 3
साल तक लटका रहे पर.. सांसदो का वेतन
बढ़वाने वाला बिल पास होने मे, जरा भी समय
नही लगेगा !

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Today i m not feeling good becoz Nirbhaya case me ek ko aaj saja mukt kar deya gaya. Aur reality dekhe to sab se bada doshi wahi hai. Usi ne rod daal ke Nirbhaya ki sare aant bahat nikal di thi. Mj aaj gussa aa rha hai apne desh india ke law par. Gussa aa rha police par.

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मूलाधार चक्र कैसे सिद्ध करें ? , मूलाधार चक्र के बारे मे विस्तार से जानें ।

इस चक्र का स्थान मेरु दंड के सबसे निचले स्थिति होता है ,इसका मूल मंत्र “लं ” है
व्यक्ति को पहले प्राणायाम कर के मूलाधार चक्र पर अपना ध्यान केंद्रित कर मंत्र का उच्चारण करना चाहिए। धीरे धीरे चक्र जागृत होता है | इससे लाभ यह मिलता है की व्यक्ति के जीवन में लालच नाम की चीज खत्म हो जाता है और एक आत्मिक ज्ञान प्राप्त होता है व्यक्ति अच्छा ज्ञान प्राप्त करता है और जिंदगी में बड़ी से बड़ी जिम्मेवारी लेने की क्षमता बढ़ जाता है। हौसला मजबूत होता है शारीरिक ऊर्जा बढ़ता है |

शरीर के अन्दर जिस दिव्य ऊर्जा शक्ति की बात की गई है, उस ऊर्जा शक्ति को कुण्डलिनी शक्ति कहते हैं। यह कुण्डलिनी शक्ति शरीर में जहां सोई हुई अवस्था में रहती है उसे मूलाधार चक्र कहते हैं। मूलाधार चक्र जननेन्द्रिय और गुदा के बीच स्थित है। मनुष्य के अन्दर इस ऊर्जा शक्ति की तुलना ब्रह्माण्ड की निर्माण शक्ति से की जाती है। यही चक्र पूरे विश्व का मूल है। यह शक्ति जीवन की उत्पत्ति, पालन और नाश का कारण है। इसका रंग लाल होता है तथा इसमें 4 पंखुड़ियों वाले कमल का अनुभव होता है जो पृथ्वी तत्व का बोधक है। मनुष्य के अन्दर पृथ्वी के सभी तत्व मौजूद है।
चतुर्भुज का भौतिक जीवन में बड़ा महत्व है, चक्र में स्थित यह 4 पंखुड़ियां वाला कमल पृथ्वी की चार दिशाओं की ओर संकेत करता है। मूलाधार चक्र का आकार 4 पंखुड़ियों वाला है अर्थात इस पर स्थित 4 नाड़ियां आपस में मिलकर इसके आकार की रचना करती है। यहां 4 प्रकार की ध्वनियां- वं, शं, शं, सं जैसी होती रहती है। यह आवाज (ध्वनि) मस्तिष्क एवं हृदय के भागों को कंपित करती रहती है। शरीर का स्वास्थ्य इन्ही ध्वनियों पर निर्भर करता है। मूलाधार चक्र रस, रूप, गन्ध, स्पर्श, भावों व शब्दों का मेल है। यह अपान वायु का स्थान है तथा मल, मूत्र, वीर्य, प्रसव आदि इसी के अधीन है। मूलाधार चक्र कुण्डलिनी शक्ति, परमचैतन्य शक्ति तथा जीवन शक्ति का पीठ स्थान है। यह मनुष्य की दिव्य शक्ति का विकास, मानसिक शक्ति का विकास और चैतन्यता का मूल है।

मूलाधारचक्र पृथ्वी तत्व का प्रतीक है! पृथ्वी तत्व का अर्थ गंध है! संप्रज्ञात का अर्थ मुझे परमात्मा के दर्शन लभ्य होगे या नही होगे ऐसा संदेह होना! इस चक्र मे ध्यान साधक को इच्छा शक्ति की प्राप्ति कराता है! ध्यान फल को साधक को अपने पास नही रखना चाहिये, इसी कारण ‘’ध्यानफल श्री विघ्नेश्वरार्पणमस्तु’’ कहके उस चक्र के अधिदेवता को अर्पित करना चाहिये! मूलाधारचक्र मे आरोग्यवान यानि साधारण व्यक्ति को 24 घंटे 96 मिनटों मे 600 हंस होते है!

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Har har mahadev
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कल्कि पुराण के अनुसार कृष्ण जन्म के समान ही भगवान कल्कि जन्म लेंगे।


कल्कि पुराण के अनुसार कृष्ण जन्म के समान ही भगवान कल्कि जन्म लेंगे। उनका जन्म शम्भल ग्राम में होगा। इस रूप में कल्किजी के चार हाथ होंगे, लेकिन ब्रह्माजी उसी समय वायु देव के जरिए कल्कि भगवान को यह संदेश भिजावाएंगे कि उन्हें मनुष्य रूप में रहना है।

ब्रह्माजी का संदेश पाकर कल्कि भगवान मनुष्य रूप में प्रकट होंगे। यह लीला जब उनके माता-पिता देखेंगे तो वो हैरान हो जाएंगे। उन्हें ऐसा लगेगा कि किसी भ्रम स्वरूप उन्होंने अपने पुत्र को चार भुजा में देखा था। जिस दिन से शम्भल ग्राम में प्रभु जन्म लेंगे, उसी दिन से वहां सब कुछ सुखमय हो जाएगा।

भगवान का यह अवतार 'निष्कलंक भगवान' के नाम से भी जाना जाएगा। श्रीमद्भागवतमहापुराण में विष्णु के अवतारों की कथाएं विस्तार से वर्णित है। इसके बारहवें स्कन्ध के द्वितीय अध्याय में भगवान के कल्कि अवतार की कथा विस्तार से दी गई है जिसमें यह कहा गया है कि 'सम्भल ग्राम में विष्णुयश नामक श्रेष्ठ ब्राह्मण के पुत्र के रूप में भगवान कल्कि का जन्म होगा। वह देवदत्त नाम के घोड़े पर सवार होकर अपनी कराल करवाल (तलवार) से दुष्टों का संहार करेंगे तभी सतयुग का प्रारम्भ होगा।'

भगवान कल्कि के शिशु रूप के दर्शन के लिए परशुराम, कृपाचार्य, वेदव्यास और द्रोणाचार्य जी के पुत्र अश्वत्थामा भिक्षुक के वेश में आएंगे। भगवान कल्कि के तीन भाई होंगे। जो उनके जन्म के पहले जन्म ले चुके होंगे।

उनके नाम क्रमश: कवि, प्राज्ञ और सुमन्त्रक होंगे। भगवान कल्कि के अनुगामी साधु स्वभाव वाले गार्ग्य, भर्ग्य और विशाल आदि भगवान कल्कि के जन्म से पहले ही उनके वंश में जन्म ले चुके होंगे।

कल्कि जी की प्रारंभिक शिक्षा घर पर ही उनके पिता द्वारा होगी। गुरुकुल में जब वह आगे की शिक्षा प्राप्त करने जाएंगे। तब महेंद्र पर्वत निवासी परशुराम उन्हें अपने आश्रम में ले जाएंगे। वहां पहुंच कर परशुराम अपना परिचय देंगे।

वह कहेंगे कि, 'मैं भृगु वंश में उत्पन्न महर्षि जमदग्नि का पुत्र, वेद वेदांग के तत्व को जानने वाला हूं। मैं धनुर्वेद विद्या विशारद परशुराम हूं। मैने बहुत समय पहले इस पृथ्वी को क्षत्रिय विहीन किया था। अब तुम मुझे धर्म पूर्वक गुरु मानो, मैं तुमको भिक्षा दूंगा।'

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