भाषा साहित्य और हिंदी भाषा
मानव के विकास मे भाषा का स्थान सर्बोत्म रहा है। जनमानस को सुसंगठित करने का माध्यम समाज मे यदि कुछ रहा है तो वह केवल भाषा ही।उपनिषद युग का साहित्य काब्य, नाटक तथा कथा विन्यास की दृष्टि से हालाकि आलोचना के योग्य है फिर भी इस युग की गद्यात्मक शैली,भाषा के लौकिक रूपो के स्वीकरन केपरिप्रेक्ष्य मे दृढतापुर्वक यह कहा जा सकता है कि इस युग की भाषा कमनीय कल्पनाओ तथा मनोरम अभिब्यक्ति का वाहिका होने से पूर्णत:समर्थ हो चुकी थी। भाषा-अभिब्यक्ति के माध्यम के साथ-साथविचारो की प्रक्रिया को भी प्रभावित और नियंत्रित करती है। प्रत्येक भाषा का अपना एक क्रम होता है क्रमयुक्त उच्चारित ध्वन्यात्मक प्रतीक ही भाषा का नाम प्राप्त करते है अर्थात मुख से उच्चारित ध्वनि प्रतीको का सुव्यवस्थित प्रकटीकरन ही भाषा है। भाषा कोमल,कमनीय, रोचक,शिक्षा देने वाला ,विश्वास के लायक और सिल सिलेवार होना चाहिए जिसको बहुतायत जनमानस प्रेमपूर्वक आत्मसात कर सके।यद्यपि हिंदी भाषा,संस्कृत साहित्य अन्य भाषाओ की तुलना मे अधिक कलात्मक एवं वैग्यानिकहै। उपनिषद काल मे ॠगवेद, यजुर्बेद एवं सामबेद को आध्यात्मिक रूप से भी प्रस्तुत किया गया है कथ्यहै कि इन तीनो वेदो मे शरण प्राप्त करने का विराट कोशोपनमे-ॠगवेद,यजुर्वेदऔर सामवेद को मधु विद्या के विवेचन मे पुस्प तथा मधुकर भी कहा गया है।-एक पदी,द्विपदी सा चतुष्पदी अर्थात वाक तत्व के एक दो और चार विभालजन किये गये हैं। आगेवाक तत्व के आठ विभाजन किये गये हैं।-- धीती वा य अनयन वाचो अग्रम । अर्थात विद्वान चिन्तक के द्वारा वाक तत्व के मूल तक पहुचते हैं। शास्तो मे पऔराणिककाल, वैदिककाल,आधुनिककाल एवंपरिवर्ती वाकाटक काल का वर्णन भी मिलता है। जहां नागवंश का जिक्र आता है वहां यह स्वीकार करना ही पडेगाकि नागों ने प्राक्रृत भाषा का तिरस्कार नहीं किया है। नागवंश अपने सिक्को पर प्राकृत भाषा का ब्यवहार करते थे।कुशनो के आने से पहले भी प्राकृत ही राज भाषा थी और उसके वाद भी वही बनी रही। राजनीतिक क्षेत्र मे वे प्रजातंत्रवादी थे। भाषा के संबंध मे भी वे प्रजा के बहुमत का ध्यान रकते थे । विद्वान राजशेखर ने लिखा-टक्क लोग अपभ्रश भाषाओं का व्यवहार करते थे। वेदों में वाक तत्व को विराट कहा गया हैसाथ ही इसके तीन बडॅ विभाग बताये गये हैंयथा- परा,पश्यन्ती और मध्यमा। अपभ्रन्श या प्राकृत भाषा हिंदी मे रचना होने का पता हमे विक्रम की सातवीं सदी मे मिलता है।इस दिशा मे सर्ब प्रथम क्रान्तिकारी कदम डा।रामकुमार वर्मा ने उठाया उन्होनें हिन्दी साहित्य का प्रारंभ ७००ई।के आसपास माना और संवत ७५० से १२०० तक की अवधि को हिंदी का आदिकाल मानकर उसका नामकरण संधिकाल किया। भारतवर्ष के बोलने की भाषा मे बडॅ- बडॅ परिवर्तन हुये हैं।वैदिक काल मे ॠग्वेद की संसकृत थी ऐतिहासिक काल में ब्राह्मणों की संसकत,दार्शनिक काल और बौद्ध कालों में पाली थी,पौराणिक काल में प्राकृत और दशवींशाताब्दी मेंराजपूतों के उदय के समय से वह हिंदी भाषा रही है। वहीको हिंदी मे संसकृत वेदो का अनुबाद स्वामी दयानन्द सरस्वती ने करके हिन्दी को ऊंचाई प्रदान किया। प्रसिद्ध भाषाविद् जे वान्दिरे का कथन है - भाषा जीवन का स्वाभाविक परिणाम है और सृष्टि के पश्चात् जीवन से ही इसका पोषण होता है । संसकृत के प्रसिद्ध आचार्य दण्डीजी का कञन है- यदि शब्द(भाषा) के आलोक से यह संसार प्रकाशित न होता तो सारे जगत में धोर अंधकार व्याप्त हो जाता । दा श्यामसुंदर दास ने कहा है- मनुष्य और मनुषय के बीच वस्तुओं के विषय में अपनी इच्छा और मति का जो व्यवहार होता है उसे भाषा कहते हैं । पं किशोरीदास वाजपेयी जी- पहले मै अवधी, राजस्थानी,कुर्मांचली आदि भाषाओं को स्वतंत्र भाषा न मानकर हिंदी की बोलियां मानता था। हिंदी शब्दानुशासन में भी यथासंभव सा ही लिखा है परन्तु भारतीय भाषा विग्यान लिखते समय जब भाषा की परिभाषा की तो मत बदल गया र निश्चय हुआ कि अवधी,पांचाली, राजस्थानी आदि स्वतंत्र भाषाएं हैं ।इन सबके स्वतंत्र नियम और विधि विधान हैं । डा 0 बाबूराम सक्सेना का मानना है कि- जिन ध्वनि चिन्हों द्वारा मनुष्य परस्पर विचार विनिमय करता है उसे भाषा कहते हैं ।विचारों की स्पष्ट अभिव्यक्ति के लिए भाषा ॠग्वेद के सबसे सादे और सुंदर सूत्रों में रच्छित है । ऐतिहासिक काल की भाषा गद्य व्राह्मणों और आरण्यकों में तच्छित है।(सभ्यता का इतिहास) । जिस भाषामें गौतम,ईसा के पहले छठी शताब्दी में शिच्छादेते थे वह अधिक सीधी और चंचल थी । दार्शनिक काल की भाषा पाली पूर्णृरूप थी जिसे माधवी इत्यादि नाम से पुकारते हैं । बौद्ध काल में यह भिन्न-भिन्न रूपों में बोली जाती थी । वैदिक काल में शिष्ट समाज की भाषा संस्कृत थी। परन्तु जनसाधारणइस समय भी एक प्रकार की साधारण भाषा बोलते थे जो प्राकृतिक(प्राकृत) कहलाता था । पौराणिक काल में पाली भाषा में बहुत अधिक अंतर हो गया उसमें एक दूसरीभाषा प्राकृत भाषा बन गई जो इस काल के नाटकों में मिलतीहै। पौराणिक काल के समाप्त होने पर प्राकृत भाषा और बिगड़ गई वह उत्तरी भारत में लगभग एक हजार ई 0 तक हिंदी हो गई। हिंदी साहित्य में काल विभाजन- आदिकाल-सातवीं शती के मध्य से चौदहवीं शती के मध्य। भक्तिकाल-चौदहवीं शती के मध्य से सत्रहवीं शती के मध्य। रीतिकाल- सत्रहवीं शती के मध्य से उन्नीसवीं शती । आधुनिककाल- उन्नीसवीं शती के मध्य से अब तक । अधिकांश विद्वान हिंदी का प्रथम कवि सरहपा को मानते हैं। इनका रचनाकाल 763ई0 से आरंभ होता है। भारत में 80प्रतिशत जनता हिंदी जानती और बोलती है। देश के कुछ महापुरुष विद्वानों ने हिंदी पर विचार प्रकट किए- सर्वश्री चक्रवर्ती राजगोपालाचारी- सबको हिंदी सीखनीं चाहिएइसके द्वारा भाषा विनिमय से सारे भारत को सुविधा होगी। आचार्यविनोवा भावे-मेरे देश में हिंदी की इज्जत न हो, यह मैं नही सह सकता। सरदार पटेल- राष्ट्रभाषा किसी व्यक्ति या प्रांत की सम्पत्ति नहीं है इसपर सारे देश का अधिकार है। डा0 जाकिर हुसेन- हिंदी की प्रगति से देश की सभी भाषाओं की प्रगति होगी। पूर्व प्रधानमंत्रीश्रीमती इन्दिरा गांधी-देश को किसी सम्पर्क कीआवश्यकता होती है और वह(भारत में) हिंदी ही हो सकती है। डा0 भीमराव अम्बेडकर- चूकि भारतीय एक होकरएक समन्वित संस्कृति का विकास करना चाहते हैंइस लिए सभी भारतियों का परम कर्तव्य हो जाता है कि वे हिंदी को अपनी भाषा समझ कर अपनाएं। महात्मा गांधी-रास्ट्रीय व्वहार में हिंदीको काम में लाना देश की शीघ्रउन्नति के लिए आवश्यक है। कोई भी देश सच्चे अर्थों में तब तक स्वतंत्र नहींहै जब तक वह अपनी भाषा में नहीं बोलता। पंडित जवाहर लाल नेहरू-राष्ट्र भाषा के रूप में हिंदी सारे देश को एकता में सबसे अधिक सहायक सिद्धहोगी।हिंदी एक जानदार भाषा है। वहजितना बढेगी देश को उतना ही लाभ होगा। नेताजी सुभाष चंन्द्र वोष-प्रांतीय ईर्षा द्वेष दूर करने में जितनी सहायता हिदी प्रचार से मिलेगी उतनी दूसरे चीज से नहीं। आचार्य केशवचंद्र सेन- एक भाषा के बिना भारत की एकता नहीं हो सकती और वह भाषा हिंदी है । भारतेन्दु हरिश्चंद्र जी- निज भाषा उन्नति अहै,सब उन्नति को मूल । जब कि पंजाबी भाषा अन्य भाषाओं की अपेક્ષા संस्कृत से अधिक मिलती है। इसमे स, श, ष, भी होते हैं तथा उनके रूप संस्कृत के रूपों से अधिक मिलते हैं। उज्जयनी भाषा में रऔर व दोनों होते हैं परंतु माधवी भाषा में र के स्थान पर ल बोला जाता है यथा-राजा दशरथ की जगह लाजा दशलथ बोला, लिखा जाता है। एवं राजा रामचन्द्र की जगह लाजा लामचन्द्र आदि। पुरातत्ववेत्ताओं ने इन तीनों भाषाओं को पाली कहा है । वर्नाक और लेटन साहब अपने एसे सरल पाली लेख में लिखते हैं कि पाली भाषा संस्कृत की विदाई की सीढी के पहले कदम पर है और वह उन भाषाओं में पहली है जिन्होंने इस पूर्ण और उपजाउ भाषा को नष्ट कर दिया । साहित्यकार सैनिकों से अधिक गंभीर और घातक होता है वह महान धीर और अगाध गंभीर हो लड़ सकता है। हिंदीकी जो वर्तमान दशा है उससे वह संतुष्ट नहीं है उसमें असंतोष झलकता है।उसे साहित्य जगत की चिंता जितनी मात्रा में है उतनी ही हिंदी की भी होनी चाहिए।कारण स्पष्ट है कि आजबहुतायत संस्थान हिंदी कीस्मिता पर चोट पहुचाना चाहते हैं। विकृत हिंदी गढने से बाज नहीं आ रहे हैं। भारत के ही नहीं अपितुसभी हिंदी साहित्यकार प्रेमियों से विनम्र निवेदन है कि अब समय रहते और अधिक चूकने से बचें अन्यथा पछतावा ही हाथ लगेगा यानी कि विकृत हिंदी गढने वालों को रोकने की जरूरत है। जितनी आज है संभवत: इससे पहले कभी भी महसूस करने की आवश्यकता न रही हो शायद आप की सुलेखनी विकाश के दौड की एक सजग प्रहरी का कार्य सतर्क हो करे। यद्यपि हिंदी में अनेक भाषा पहले से ही समाहित है। आज इसमें लगभग 4लाख शब्दावली मोजूद हैऔर निर्मित वैજ્ઞાनिक तकनीक विधि शब्दावली को मिलाकर 8लाख हो जायेगी जो भारत ही नहीं विश्व की भाषाओं में मान्य है। आज हिंदी के प्रचार-प्रसार की और व्यापका की आवश्यकता महसूस की जा रही है। यद्यपि कम्प्यूटर, मीडिया, मोबाइल नें धूम मचा रखी है फिर भी सामान्य लोग जानें क्यों हिंदी से दूर हो रहे हैं।अपने बच्चो को हिंगलिश की शिક્ષાदे रहे हैं।इसमें सतर्कता की आवश्यकता भी जरूरी है। हमें हिंदी का पूर्ण જ્ઞાन सीख जान कर ही हिंगलिशसे बचना होगा। भारत के लिए राष्ट्रभाषा क्या हो उत्तर में एक गौरवपूर्ण स्थान हिंदी के अतिरिक्त किसी भी और भाषा को नहीं मिल सकता।यद्यपि उर्दू या अन्य किसीभाषा को दूसरा स्थान प्रदान किया जा सकता है(22)|उदाहरण24मार्च 1979 नागालैंड विधान सभा का एक मत नयी दिल्ली25मार्च1979 हिंदी के माध्यम से हम आधुनिक જ્ઞાन प्राप्त कर सकते हैं। कार्यालयी भाषा कमीशन 1956 पृष्ठ22 में अंकित देवनागरी लिपि में हिंदी को राजभाषा के रूप में अपनाया गया है(24)। सांस्कृतिक हलचल भाषा में अवस्थित हो इसके लिए नये प्रयोगों नये शब्दों की खोज उतनी ही आवश्यक है जितनी कि भाषा के मूल में विकृति से बचना।विभिन्न भाषागत शब्दों को लेने में परहेज नहीं परंन्तु शब्दों को ज्यो का त्यों रखना न भूलें। भारतीय भाषा में मुख्यत: वैજ્ઞાनिक कथा साहित्य आना चाहिए। नव रीति के शब्द,मुहावरे,लोकोक्तियां,आधुनिक विचार और नये भाव का प्रयोग व्यावहारिकता प्रदान करता है। व्यावहारिकता ही भाषा का प्राणतत्व है। हिंदी में संस्कृत, अपभ्रंश, प्राकृत, पाली, बंगाली, मराठी, गुजराती, कन्नण, तेलगु, मलयालम, चीनी, जापानी, इंडोनेशियाई, मलेशियाई,उर्दू, अरबी, फारसी, डच, रूसी, चेक, अफ्रीकी, पुर्तगालीआदि देशों की भाषा समाहित है(25)।(सम्पूर्ण लेख देखने हेतु नागरीप्रचारिणी पत्रिका त्रैमासिक सौर संवत 1953 सन् 1896 से प्रकाशित संयुक्तांक के सौर संवत2064 - अक्टूबर2007,अंक 3 सेसौर संवत2066 दिसंबर 2009,अंक3 तक केपृष्ठ संख्या 96 से100 तक देखें)-सुखमंगल सिंह

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मन बावला है, मन बावला है
सोचे ये कुछ भी अजब मामला है।।
मुझको ख़बर है कि
ख़्वाहिश हुई है
कुछ तो मोहब्बत सी
साज़िश हुई है
कोई है गुम-सुम
ख़्यालों मे ख़ुद के
लगता है चाहत की
बारिश हुई है..
मन बावला है।।
मन बावला है।।
omjaijagdeesh.blogspot.com

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पैरों पे मुझको खड़ा करके, कांधे पर मेरे चले गयें.।
जिम्मेदारी का एक और सबक, जाते जाते दे गयें..॥© RRKS.॥ #Love #Life #Responsibility #Desolation #Lesson #Parents #Identity #India #World #RRKS
http://rakeshrksingh.blogspot.in/2016/02/blog-post.html?m=1

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