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सत्यम शिवम् सुन्दरम ! जय हिन्द, जय भारत ! वंदे मातरम ! 
          "विजयी विश्व तिरंगा प्यारा,  झंडा ऊंचा रहे हमारा"
प्रिय मित्रों व् बच्चों ! 
                 आप लोगों से मेरी विनती है कि मेरी किसी भी पोस्ट को केवल पढ़ने के पश्चात ही लाइक या शेयर करें। मुझे अफ़सोस है कि मेरी किसी भी पोस्ट में आपके मनोरंजन की कोई भी बातें नहीं होती, बल्कि इनमें केवल अपने देश और देशभक्ति से जुड़ी हुई बातें ही होती हैं, इसलिए यदि आपने किसी मनोरंजन की तलाश में मुझे गलती से अपने सर्किल में ऐड कर लिया हो, तो आपको मेरी सलाह है मेरी इस पोस्ट के मैसेज को आगे पढ़ने में भी अपना समय बिलकुल भी व्यर्थ बर्बाद न करें, बल्कि अपने इस समय का प्रयोग भी मुझे अपने सर्किल से तुरंत रिमूव करने में ही करें। लेकिन यदि आप इस देश से ज़रा सा भी प्रेम करते हैं और यह भी मानते हैं कि इस देश का एक जिम्मेदार नागरिक होने के नाते इस देश के प्रति आपके भी कुछ कर्तव्य हैं, तभी मेरे मैसेज को पूरा पढ़ने के बाद ही उस पर अपनी कोई प्रतिक्रिया देंI अन्यथा मेरा समय भी व्यर्थ बर्बाद न करें ! धन्यवाद।
प्रिय मित्रों एवं बच्चों ! 
                            ॐ नमः शिवाय ! हर हर महादेव ! भगवान शिव आपकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करें ! ईश्वर आपको सदा सही राह पर चलायें, जिससे आपका प्रत्येक दिन मंगलमय हो ! 
मित्रों व् बच्चों ! 
                         यदि आप हिन्दू हैं और यह बिलकुल नहीं चाहते कि आने वाले समय में कभी भी आपको या आपके बच्चों को जबरन मुसलमान बनना पड़े, तो मेरे इस मैसेज को खासकर इसके महत्वपूर्ण सन्देश वाले भाग को ऊपर से नीचे तक एक बार अवश्य पढ़ें। और हाँ अगर आपको मेरी बात में सच्चाई नज़र आये अथवा सही लगे, तो यह भी अवश्य ही बताएं कि इस खतरनाक आने वाले भविष्य से अपने सभी बंधु-बांधवों को भी सचेत करने के लिए क्या आप भी हमारे इस हिन्दू जन-जागृति अभियान का हिस्सा नहीं बनना चाहेंगे? अगर हाँ ! तो आप इस दिशा में क्या करेंगे? हो सकता है कि आपको मेरी यह भाषा कुछ अटपटी अवश्य लगे, लेकिन मेरी मज़बूरी है कि जिस प्रश्न ने कुछ अरसे से मेरी रातों की नींद को उड़ा रखा है, उस से हम सभी की जिंदगी के अलावा हमारी आने वाली पीढ़ियों की जिंदगी और भविष्य भी तो जुड़े हुए हैं। क्यूँकि मैं तो स्वयं ही उम्र के उस पड़ाव पर हूँ, जहाँ से उस दौर को देख पाने का मौका शायद ही मुझे मिले। इसलिए इस सन्देश को आपके अभी पढ़ने या न पढ़ने से मुझे तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा, लेकिन हमारी भावी पीढ़ियों का भविष्य तो फिर भी उससे जुड़ा हुआ है। वैसे भी आप मुझसे तो झूठ भी बोल सकते हैं, लेकिन क्या अपने आप से या अपनी अंतरात्मा से भी झूठ बोल पाएँगे? इसलिए इसे पढ़ने के बाद फैसला भले ही कुछ भी करें, लेकिन एक बार पूरा पढ़ें जरूर, क्यूँकि तब आप न तो किसी थोथी धर्मनिरपेक्षता के अँधेरे में जियेंगे और न ही किसी से यह कह सकेंगे कि आपको वस्तुस्थिति का ज्ञान ही नहीं था। आखिर को यह हम सभी के अस्तित्व का प्रश्न जो है?
                 कहा जाता है कि जब कोई बात पढ़कर अथवा बोलकर बार-बार दोहराई जाती है, तब वो बात हमारे अवचेतन मन में गहरे तक बैठ जाती है। तब क्यों न हम अपनी भारतीय संस्कृति की नीचे लिखी हुई कुछ अच्छी बातों को दोहराएं, जिससे हमारे व्यक्तित्व का उचित विकास हो और हम अपने राष्ट्र के सर्वांगीण विकास में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे सकें?
                 "श्रीमद भगवद्गीता में भगवान श्री कृष्ण ने स्पष्ट कहा है कि न्याय-अन्याय अथवा धर्म-अधर्म की लड़ाई में बीच का कोई मार्ग ही नहीं होता अर्थात कोई भी पक्ष जो न्याय का समर्थक है, तो उसे अन्याय के प्रतिकारस्वरूप पूरी तरह से न्याय के साथ खड़े होना चाहिए। इसी प्रकार जो कोई भी पक्ष धर्म या न्याय के पक्ष में नहीं है, तो उसे परोक्ष-अपरोक्ष रूप से अन्याय का समर्थन करने वाला ही मानना चाहिए। भगवान श्रीकृष्ण ने आगे इस बात को भी स्पष्ट किया है कि अधर्मियों से समाज एवं धर्म की रक्षा के लिए अधर्मियों के खिलाफ किये गए किसी भी प्रकार के छल-बल एवं हिंसा के प्रयोग को पाप की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। लेकिन उसका उद्देश्य केवल और केवल धर्म की स्थापना ही होना चाहिए।"
                "कोई भी धर्म राष्ट्र-धर्म अथवा देशभक्ति से बड़ा नहीं होता। किसी भी प्रकार के देशद्रोह की केवल एक ही सजा मृत्यु-दंड होनी चाहिए। जिस देश अथवा राज्य की अधिकांश जनता कायर हो, वहां विदेशी शक्तियों अपना आधिपत्य अधिक आसानी से जमा पाती हैं। अन्याय करने वाले से उस अन्याय को चुपचाप सहने वाला अधिक दोषी होता है, जिसके कारण समाज में कायरता बढ़ती है और अन्यायी को बल मिलता है। अतः अन्याय का प्रतिकार अवश्य करें व् अपने बच्चों एवं छोटे भाई-बहनों को भी अन्याय का प्रतिकार करने की ही शिक्षा दें।" 
                "जैसे काली से काली घटाएँ भी सूर्य के प्रकाश को बिखरने से अधिक समय तक रोक नहीं सकती, उसी प्रकार झूठ को कैसी भी चाशनी में लपेट कर परोसने या सत्य को सात तालों के भीतर कैद करने पर भी सत्य को छिपाया अथवा दबाया नहीं जा सकता। और झूठ के सारे अंधकार को चीर कर एक न एक दिन सच का सूरज निकलता जरूर है। सत्य एवं अहिंसा के पथ पर चलना कुछ कठिन भले ही हो, लेकिन केवल सत्य और अहिंसा का मार्ग ही सर्वश्रेष्ठ होता है, इसलिए सदा सत्य बोलने की कोशिश करें। सत्य को बोलने का सबसे बड़ा फायदा ये है कि आपको कोई भी बात याद नहीं रखनी पड़ती, जबकि एक झूठी बात को छिपाने के लिए कभी-कभी सैंकड़ों झूठ बोलने पड़ते हैं। लेकिन एक बात अवश्य याद रखें कि सत्य और अहिंसा कायरों के हथियार नहीं, अतः अपनी कायरता को छिपाने के लिए इनका सहारा लेकर अपने बच्चों एवं समाज को मूर्ख बनाना अपने आपको धोखा देने जैसा ही है।"
               "साफ़ दिल, नेक नियत और सही इरादे से किये जाने वाले हर काम में परमात्मा स्वयँ आपके साथ रहते हैं !" 
               "दूसरों के साथ वो व्यवहार कभी न करें, जो आप स्वयं अपने लिए नहीं चाहते !" 
               "याद रखें कि हमारा चरित्र उस भव्य इमारत की भांति होता है, जिसे बनाने में तो कभी-कभी बरसों लग जाते हैं, लेकिन गिराने में केवल कुछ पल की ही देरी लगती है। ठीक उसी प्रकार चरित्र निर्माण हिमालय पर चढ़ने के समान दुर्गम है, परंतु गिरने के लिए केवल हमारा एक गलत कदम ही पर्याप्त है !"
               "प्रकृति का यह नियम है कि संसार में जो कुछ भी हल्का है, वही ऊपर उठता है। इसलिए अपने उत्थान के लिए अपने अंदर के अहंकार को निकाल कर अपने आपको हल्का करें !" 
               "वैसे तो कुछ भी बोलकर अपने शब्द वापस लेना दोगले नेताओं का ही चलन है, फिर भी आप अपने लफ़्ज़ों को तोलकर बोलिए ! ताकि कभी वापस भी लेने पढ़ें तो वजन न लगे !"
               "इस देश में पैदा होने, यहाँ की आबो-हवा में खेल-कूद कर पले बढे होने के कारण इस देश के प्रति हमारे कुछ फ़र्ज़ व् क़र्ज़ होते हैं। यदि आप के मन में अपने इस देश के प्रति प्रेम और आदर की भावना न हो, यदि यहाँ का नागरिक होने के बावजूद आप अपने उन कर्तव्यों का पालन ठीक से नहीं करते, अपने माता-पिता, बुजुर्गों एवं गुरुजनों को यथोचित सम्मान नहीं देते व् केवल दूसरों में मीन-मेख निकालकर ही आप अपना जीवन व्यतीत करते हैं, तो निश्चय ही आप इस देश की धरती पर बोझ और इंसानियत के नाम पर कलंक हैं !"
               "Inactivity and idleness is the sign of a dead body ! if you have got any free time, don't waste it. You can utilize the same for the sake of the betterment of society, mankind and work for the national interests." 
               "निष्क्रियता और आलस्य एक मृत शरीर की पहचान है ! यदि आप के पास खाली समय है, तो इसे व्यर्थ बर्बाद मत करो। आप अपने खाली समय का सदुपयोग समाज, मानवता की बेहतरी और राष्ट्रीय हितों के लिए काम करके भी कर सकते हैं !" 
प्रिय मित्रों एवं बच्चों ! 
                आप सभी इस बात से भली भांति परिचित हैं कि नेताओं की बातों पर आँख मूँद कर विश्वास करने वालों का हश्र सदा बुरा ही होता है। सोचो कि भगवान ने हम सभी को बुद्धि और दिमाग किसलिए दिए हैं, यदि हम उनका इस्तेमाल ही न करें? और आप सब भी तो इस बात से सहमत हैं कि विश्व के समस्त नेताओं की प्रवृति तो गिरगिट जैसी होती है, पल-पल में ही बदल जाती है। इससे ज्यादा दुखद और क्या होगा कि भारतीय नेताओं के कारण तो बेचारे गिरगिटों को भी बहुत बड़ी मात्रा में आत्महत्या करनी पड़ रही है क्यूँकि उनका कहना है कि जितनी देर उन्हें ये सोचने में लगती है कि अपना अगला रंग क्या बदलूँ, उतनी देर में तो कुछ भारतीय नेता अपना बयान तीन बार बदल लेते हैं। 
                भारत एक हिन्दू बहुल देश होते हुए भी यहाँ कदम कदम पर हमारे हिन्दू धर्म को अपमानित होना पड़ता है, साथ ही कुव्यवस्था के कारण यह देश भी एक बार फिर से विनाश और विभाजन की ओर अग्रसर होता प्रतीत हो रहा है। इन सब बातों के अलावा कुछ मुस्लिम देशों में पिछले कुछ समय से हिन्दू व् गैर-मुस्लिम लोगों के साथ दुर्व्यवहार, सामूहिक जन-सँहार और जबरन धर्मान्तरण की अनगिनत घटनाओं के बाद इस देश को भी एक मुस्लिम देश बनाने की उठती मांग ने हमें सकते में डाल दिया है और सोचने पर मज़बूर कर दिया है कि नेहरू और गांधी की बेवकूफी और साज़िश के कारण क्या भारत और हिंदुत्व का अस्तित्व इस दुनिया से ही खत्म होने जा रहा है? 
                यह बात मात्र कपोल-कल्पना समझ कर सिर्फ लापरवाही में हंसी में ही उड़ा देने की नहीं है, अपितु इस पर ठन्डे दिमाग से बैठ कर मंथन करने की आवश्यकता है। क्यूँकि दुनिया का इतिहास इस बात का गवाह है कि दुनिया के नक़्शे में पहले जितने भी हिन्दू धर्म पर चलने वाले देश थे, भारत और नेपाल जैसे इक्का दुक्का देश के अलावा उन सभी का अस्तित्व आज खतम हो चूका है और वो सभी न सिर्फ आज कट्टर इस्लामिक में गिने जाते हैं, बल्कि जो देश हिन्दू जनसँख्या की बहुलता से हिन्दू देशो की श्रेणी में गिने जाते थे, आज वहाँ हिन्दू ढूंढने से भी नहीं मिलते, क्यूँकि वहां न सिर्फ हिन्दू सभ्यता और संस्कृति के प्रतीकों ही नष्ट किया गया, बल्कि वहाँ के मूल निवासी हिन्दुओं का अस्तित्व भी समाप्त कर दिया गया है। जो कुछ थोड़े बहुत अपनी जान बचाने में कामयाब भी हुए, उन्हें अपने अस्तित्व को बचाने के लिए अपने ही देश से अपनी समस्त चल-अचल संपत्ति को त्याग कर पलायन करना और संसार के विभिन्न हिस्सों में जा कर बसना पड़ा है। 
                  कांग्रेस और उसके सहयोगियों की कुनीतियों, मुस्लिम चाटुकारिता और दुर्व्यवस्था के कारण न सिर्फ मुस्लिम समाज के अपराधी प्रवृति के लोगों के हौसले बुलंद होते जा रहे हैं, जिसका सीधा असर हमारे हिन्दू समाज और उस की बहु-बेटियों की सामाजिक सुरक्षा पर पड़ रहा है। आये दिन देश में बढ़ते जा रहे सामूहिक बलात्कार के किस्से और थोड़े थोड़े अंतराल पर देश के विभिन्न भागों में होते दंगे इसके ज्वलंत उद्दाहरण हैं।
                                         महत्वपूर्ण सन्देश 
                 भारत का एक जल्द से जल्द एक हिन्दू राष्ट्र बनना जरुरी क्यों?
क्या आप नहीं जानते कि आज़ादी के बाद से आज तक भारत के छह करोड़ से भी अधिक हिन्दुओं को जोर-जबरदस्ती से या लालच देकर मुस्लिम अथवा क्रिश्चियन बनाया जा चूका है? 
                क्या कीजियेगा, आज से 20-30 साल बाद जब भारत भी एक इस्लामिक देश बन जायेगा? आप अपनी जान देंगे, विदेश चले जायेंगे या कि अपने बच्चों सहित मुस्लिम बन जायेंगे? लेकिन तब भी सुरक्षा की क्या गारंटी है, क्यूँकि जो सुन्नी मुस्लिम लोग आज अपने ही उस शिया समुदाय को भी ठिकाने लगाने पर तुले हुए हैं, जो उन्हीं के इस्लाम का सदियों पुराना हिस्सा है, फिर क्या भरोसा कि कल को वो धर्म परिवर्तन से अपनी जान बचाने वालों को भी जिन्दा छोड़ेंगे या नहीं? 
               क्या आप नहीं जानते कि हिन्दू बहुल भारत होते हुए भी झारखण्ड के पहले से नक्सली पीड़ित रहे ख़ास भाग में आतंकवादियों द्वारा वहाँ रहने वाले हिन्दुओं को इलाका खाली करने या जान माल से हाथ धोने की धमकी भरे सन्देश भेजे जा चुके हैं, जिसकी चर्चा न्यूज़ चैनल की भी सुर्खियां बनी?
               क्या कश्मीर को २५ साल पहले ही हिन्दुओं से खाली नहीं कराया जा चूका है? क्या आप नहीं जानते कि आज अरुणाचल और आसाम आदि राज्यों के कुछ मुस्लिम बहुल खास इलाकों में से भी लाखों की संख्या में हिन्दुओं का पलायन जारी है? 
               क्या आप पश्चिम बंगाल, केरल, अरुणाचल और आसाम के कुछ मुस्लिम बहुल खास इलाकों में रहने वाले हिन्दुओं की सैंकड़ों-हज़ारों की संख्या में आगजनी आदि से हुई जान माल की क्षति की अनगिनत बार की घटनाओं से वाकिफ नहीं, जिसके कारण आज केरल में हिन्दू नाममात्र ही बचे हैं?
               क्या आप नहीं जानते कि बांग्लादेश बनने अर्थात 1971 से भारत के बहुसंख्यक हिन्दू समुदाय को अल्प संख्या में लाने और बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठियों द्वारा यहाँ भारत में मुस्लिम जनसँख्या को बढ़ाने की एक सोची समझी साज़िश चल रही है, जिसके तहत बांग्लादेश बनने अर्थात 1971 से अब तक इसी साज़िश को अंजाम देने के लिए बांग्लादेश से सात करोड़ से भी अधिक मुसलमानों को अनाधिकृत रूप से भारत में प्रवेश कराया जा चूका है, जिसका साथ लालू,मुलायम और मायावती और ममता बैनर्जी के अलावा सम्पूर्ण कांग्रेस के नेता भी बखूबी दे रहें हैं। इसीलिए ये सभी अक्सर ही उन बांग्लादेशी घुसपैठियों को वापस बांग्लादेश भेजने के प्रश्न पर भड़क जाते हैं, क्यूँकि उनमें से अधिकांश को तो अपना वोट बैंक बढ़ाने की खातिर ये लोग पहले ही भारत की नागरिकता दे भी चुके हैं। यदि बांग्लादेशी घुसपैठियों की वापसी पर सख्ती से अमल होता है, तो इन सबकी ये साज़िश भी सामने आ जाएगी।
                क्या आप नहीं जानते कि बांग्लादेश में वहाँ रहने वाले बंगाली हिन्दुओं पर कैसे कैसे कहर ढाये जा रहे हैं, जिसके कारण वो लोग भी वहाँ से पलायन करने पर मज़बूर हैं?
                क्या आप नहीं जानते कि पाकिस्तान में अपनी चल-अचल धन-संपत्ति छोड़कर अपनी जान बचाने की खातिर वहाँ के हिन्दुओं को लाखों की संख्या में भारत के राजस्थान आदि में शरण लेनी पड़ी है, जो किसी भी कीमत पर वापस पाकिस्तान जाने को तैयार नहीं? उन लाखों हिन्दुओं को तो यहाँ के मूल निवासी होने पर भी आज तक भारत की नागरिकता नहीं दी गई है, जबकि इन लालू, मुलायम मायावती और ममता बैनर्जी आदि के शासनकाल में और कांग्रेस शासित प्रदेशों में कांग्रेस के इशारे पर करोड़ों की संख्या में बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठियों को यहाँ की नागरिकता दे दी गई है, आखिर क्यों? 
                आप चाहे लड़कें हों या लड़की हों, आदमी हों या औरत हों, जवान हों या बूढ़े हों, अमीर हों या गरीब हों, नेता हों या अभिनेता हों, कर्मचारी हों या व्यापारी हों, जज हों या वकील हों, भले ही हम लोग कितने भी पढ़े लिखे हों या बिलकुल अनपढ़ हों लेकिन यदि हम हिन्दू हैं तो क्या यह हमारा फ़र्ज़ नहीं बनता कि हम अपने अपने लेवल पर हम में से हर एक का यह कर्तव्य बनता है कि अपने से मिलने जुलने वाले हर एक व्यक्ति से संसार के सभी 56 हिन्दू देशों के इस्लामिक देश बनने और वहां के मुस्लिम्स के द्वारा वहां उन देशों में रहने वाले हिन्दुओं के ऊपर किये जा रहे जुल्मों-सितम व् अत्याचारों के बारे में बातचीत अवश्य करें, क्यूँकि यह न केवल आपके और आपकी ही बल्कि उन सभी की आने वाली पीढ़ियों की भी जिंदगी का प्रश्न है, जिनसे आप इस बारे में बातचीत करेंगे। 
                कभी यहाँ की भोली भाली जवान व् खूबसूरत लड़कियों की मासूमियत और नासमझी/अनभिज्ञता का लाभ उठाकर उन्हें लव-जेहाद जैसे हथकंडों में फंसाया जाता है, जिसमें कभी कभी तो अपने आपको जरुरत से ज्यादा मॉडर्न व् समझदार समझने वाली पढ़ी-लिखी मगर हकीकत में निहायत ही बेवकूफ किस्म की लड़कियां भी फंस जाती हैं, जिनका परिणाम अक्सर ही समाचार-पत्रों में चर्चा का विषय बन जाया करता है तो कभी कभी उनकी यह आधुनिकता भरी समझ उन्हें आत्महत्या की कगार तक भी पहुँचा देती है। 
                कभी इन लोगों के द्वारा कभी यहाँ हिन्दुओं के गरीब व् अनपढ़ तबके खासकर पिछड़ी जाति के लोगों को ऊँची जाति के लोगों के खिलाफ भड़काया जाता है। मुसीबत तो यह है कि इन तथाकथित पिछड़ी जातियों के पढ़े-लिखे लोग भी बिना कुछ सोचे समझे ही इन लोगो की हाँ में हाँ मिला देते हैं, जिसका परिणाम यह होता है कि उस समय वहाँ मौजूद अन्य गरीब व् अनपढ़ लोग उनकी बात को सही समझकर खुद अपने ही हिन्दू धर्म की जड़ें खोदने का काम शुरू कर देते हैं। 
                 कभी सोचा है कि ऐसा सिर्फ हिन्दू धर्म के लोगों के साथ ही क्यों किया जाता है? क्या आपको पता है कि समस्त संसार के अधिकांश देश या तो क्रिश्चियन हैं या इस्लामिक अथवा मुस्लिम देश। जबकि हमारा सनातन हिन्दू धर्म संसार में तीसरा सबसे अधिक माना जाने वाला धर्म होते हुए भी बहुसंख्यक हिन्दुओं का इकलौता देश यह भारत ही है या नाममात्र का छोटा सा गरीब देश नेपाल। इस्लाम व् क्रिश्चयन दोनों ही धर्म किसी भी प्रकार से समस्त संसार के ताकतवर देशो पर अपनी हुकूमत चाहते हैं, ताकि संसार के बाकी कमज़ोर देशों को अपनी आधीन कर सकें या इच्छानुसार चला सकें। और यही इच्छा इन दोनों धर्मों की भारत के बारे में भी है। 
                 इसलिए अभी से सोच लीजिये कि आपको भविष्य में हिन्दू बनना है या क्रिश्चियन। मुसलमान आपको मार-मार कर मुस्लिम बनाएंगे और क्रिश्चियन लालच देकर। लेकिन फायदा क्रिश्चियन बनने में है, क्यूँकि क्रिश्चियन देश लूटते भले ही हों, लेकिन वो किसी को जान से नहीं मारते। वो बात अलग है कि वो आपको लालच देकर क्रिश्चियन बनाने की कोशिश करेंगे। बन गए तो ठीक वर्ना मुसलमान आपको मुसलमान बना देंगे या मार देंगे। लेकिन भारत में रह कर हिन्दू आप किसी भी हालत में नहीं रहेंगे, क्यूंकि तब तक तो यह एक इस्लामिक देश बन चुका होगा। जिसका सबसे बड़ा सबूत संसार के सभी हिन्दू 56 देशों का पहले ही इस्लामिक देशों में तब्दील होना है और पिछले साल 15 अगस्त को भारत को एक इस्लामिक देश बनाने की मांग केरल में उठ भी चुकी है, जिसके फोटोज आप मेरी पुरानी पोस्ट्स में भी देख सकते हैं। 
                इनका केवल एक ही मकसद है कि किसी भी प्रकार से यहाँ के बहुसंख्यक हिन्दू आपस में लड़ें, कमज़ोर हों और उनका हिन्दू धर्म से मोह भंग हो सके और वो यहाँ के बहुसंख्यक हिन्दुओं को अल्प संख्यक बना सकें, ताकि अपनी सुविधानुसार जब जी चाहे इसे एक क्रिश्चियन या इस्लामिक देश में परिवर्तित किया जा सके। जबकि अमीर गरीब या ऊँच-नीच की ये जातिगत विसंगतियाँ किस धर्म में नहीं हैं?                   क्या क्रिश्चियन व् इस्लाम में नहीं हैं? क्या क्रिश्चियन धर्म में रोमन कैथोलिक व् प्रूटेस्टेंट नहीं होते? क्या उनमें आपस में शादियाँ आसानी से हो जाती हैं, फिर यह तोहमत केवल हिन्दू धर्म पर ही क्यों लगायी जाती है? क्या इस्लाम में शिया-सुन्नी नहीं होते, जिनमें संसार के सभी कोनों में अक्सर ही मुठभेड़ भी होती रहती हैं? 
                क्या उनमें विभिन्न जातियां नहीं होती? और तो और जो लोग धर्म परिवर्तन करके मुसलमान बन भी जाते हैं, उन्हें भी इस्लाम को शुरू में ही अपनाने वाले लोग भी दोयम दर्जे का मुसलमान यांनी मुहाजिर कहते हैं। मुस्लिम वर्ग के लोग दिल्ली तो इन मुठभेड़ों का खास गवाह रहा है, जब कुछ साल पहले तक भी मुहर्रम के अवसर पर इस्लाम के इन दोनों वर्गों के लोग ताजिये निकलते वक्त अक्सर ही भिड़ जाया करते थे। 
               क्रिश्चियन देशों में और मुस्लिम देशों में सबसे बड़ा अंतर यही है कि क्रिश्चियन धर्म वाले देश अन्य गरीब देशों के लोगों को अपरोक्ष रूप से लूट-लूट कर अमीर बनना चाहते हैं, तो मुस्लिम धर्मानुयायी अपराध के रस्ते दूसरे धर्मानुयायियों की धन-संपत्ति आदि को हड़प कर के अमीर बनना चाहते हैं, जिसका सबसे बड़ा उद्दाहरण कश्मीर, बांग्लादेश और पाकिस्तान सहित सभी मुस्लिम देशों में गैर-मुस्लिम लोगों खासकर हिन्दुओं को मार-पीट कर, उन्हें मारकर अथवा वहां से खदेड़ कर उनकी संपत्ति पर कब्ज़ा किया जाना है। 
                  भारत के कश्मीर से हिन्दू 25 साल पहले ही भगा दिए गए, जो आज तक देश के विभिन्न भागों में खानाबदोशों की जिंदगी बसर कर रहे हैं। केरल, आंध्र आदि में ओवैसी भाइयों की दादागिरी तो जगजाहिर है ही, इसके अलावा पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश व् महाराष्ट्र आदि राज्यों के बहुत बड़े भागों को आजकल वहाँ रहने वाले हिन्दुओं ने ही मिनी पाकिस्तान का नाम भी दे दिया है, क्यूँकि वहां केवल मुस्लिम्स की ही हुकूमत चलती है। 
                 कश्मीर पहले ही खाली करवा चुके हैं, झारखण्ड के बहुत बड़े भाग में तो ISIS के आतंकवादियों द्वारा हिन्दुओं को घर छोड़कर चले जाने की धमकी के पर्चे भी समाचारों में आ ही चुके हैं और अरुणाचल एवं आसाम आदि में से भी कश्मीर की तर्ज पर हिन्दुओं का पलायन लगातार जारी है। 
                 अब यह फैसला आपको करना है कि आप मुसलमान बनना चाहते हैं या क्रिश्चियन, क्यूँकि आपको जिन्दा रहने के लिए या तो आपको किसी क्रिश्चियन देश में जा कर बसना होगा या आपको इन दोनों में से एक को तो अवश्य ही चुनना होगा। वर्ना आने वाले 30 साल के बाद तो आपकी भावी पीढ़ी का अंत तय है। 
                 इस सबसे बचने का केवल एक ही मार्ग है कि न सिर्फ इस समस्या के बारे में अपने सभी जानकारों, मित्रों व् रिश्तेदारों आदि से अक्सर चर्चा ही करेंगे, बल्कि हम सभी आज से ही ये प्रण करें कि ये हालात काबू में आने और इस देश को हिन्दू राष्ट्र घोषित होने तक आज के बाद भारत के किसी भी हिस्से में होने वाले सभी प्रकार के स्थानीय निकायों, वहाँ की विधान सभाओं और केंद्र सरकार के लिए लोकसभा के सभी चुनावों में केवल अपने देशभक्त हिन्दू नेताओं और अपने हिन्दू संगठनों जैसे - भाजपा, शिव-सेना, विश्व हिन्दू परिषद, आरएसएस, बजरंगदल आदि के नेताओं को ही अपना वोट देकर चुनेंगे। ताकि हमारे इन हिन्दू संगठनो के हाथ मज़बूत हों और इनके ज़रिये हम इस देश को वो विषम एवं दुखदायी परिस्थितियां आने से पहले ही जल्दी से जल्दी भारत को एक हिन्दू राष्ट्र घोषित करवा सकें। 
                 इससे पहले कि मुस्लिम मैजोरिटी में आकर यहाँ उत्पात मचाएं और इस देश को एक इस्लामिक देश बना पाएं, उससे पहले ही हम सबकी यह कोशिश होनी चाहिए कि अपने सभी जानकारों को यह मैसेज और सन्देश देकर समस्त भारत में भाजपा की सरकार बनाकर इस देश को भाजपा के ज़रिये एक हिन्दू राष्ट्र में ही बदल दिया जाएँ, क्यूँकि इस बात को तो सभी जानते हैं कि भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने का सपना केवल भाजपा, आरएसएस और अन्य हिन्दू संगठन ही देखते हैं। 
                आप यह भी सोच सकते हैं कि कहीं मैं कोई भाजपा समर्थक तो नहीं? हकीकत तो यही है कि मैं कोई भाजपा समर्थक नहीं हूँ, लेकिन अगर होता भी उससे क्या फर्क पड़ जाता? अगर मैं मुस्लिम संगठनो को भी समर्थन करूँ, तो उससे भविष्य में हिन्दुओं और हिंदुस्तान पर आने वाला यह संकट क्या टल जायेगा? 
                हम आपको कोई आतंकवादी बनने के लिए तो नहीं कह रहे न? बल्कि हम तो आपको केवल इस बात का एहसास कराना चाहते हैं कि इस तथाकथित थोथी धर्मनिरपेक्षता की नीति में क्या रखा है? जबकि प्रथम तो धर्मनिरपेक्षता का अर्थ ही सभी धर्मों को एक समान अधिकार एवं एक समान न्याय देना ही होता है, लेकिन क्या भारत में कभी वास्तव में ऐसा होता भी है? 
                नहीं होता, उसके दो ही कारण हैँ - पहला कारण कि मुस्लिम खुद ही इसे कभी नहीं मानते और दूसरा कारण यह कि अपने आपको धर्मनिरपेक्ष कहने वाले कांग्रेस और उसके सभी सहयोगी दलों के मुस्लिमपरस्त नेताओं ने इस धर्मनिरपेक्षता की नीति को केवल मुस्लिम तुष्टिकरण और हिन्दुओं के अपमान का ही जरिया बनाकर छोड़ दिया है। 
                फिर क्या दिया है हमें इस धर्मनिरपेक्षता की नीति ने? केवल हम हिन्दुओं को अपने हिन्दू भाइयों से उन थोथे सिद्धांतों के लिए लड़कर अपने ही हिन्दू धर्म और अपने ही देश की जड़ें खोदना ही सिखाया है, वरना न तो यह देश कभी किसी का ग़ुलाम बनता और न ही ये विषम परिस्थितियां कभी हमारे व् हमारे बच्चों के सामने आती? 
                 हम आपसे कोई यह तो कह नहीं रहे कि आइये ! हम और आप सभी हिन्दू एकजुट होकर मुसलमानों का कत्लेआम करेंगे? हमारे हिन्दू धर्म और हमारे घर-परिवारों में यह नीचता या बर्बरता तो कभी भी सिखाई नहीं जाती। लेकिन कम से कम मौजूदा हालात में हम सभी एकजुट होकर ऊपर बताये हुए इस उपाय पर अमल करके इसके ज़रिये अपने देश में आने वाले संकट से तो निपट सकते हैं ना? 
                और हाँ एक बात यह भी याद रखियेगा कि अकेले मोदी जी भी इस विषय में कुछ खास नहीं कर पाएंगे, जब तक कि आप उन जैसे ही कुछ कट्टर देशभक्त और कट्टर हिन्दू नेताओं को उनका इस मुहीम में साथ देने के लिए नहीं चुनते। क्यूँकि हो सकता है कि भारत को एक हिन्दू देश बनाने की घोषणा होते ही मुसलमान सारे भारत में एक बार जोर-शोर से दंगा फैलाने की कोशिश करें? जिसको काबू करने के लिए सारे भारत में सशक्त भाजपा और कट्टर पंथी हिन्दू नेताओं के हाथ में वहां की सत्ता अवश्य होनी चाहिए, खासकर उन प्रदेशों में, जिनमें वहाँ के लोग बड़े भाग को मिनी पाकिस्तान का नाम पहले ही दे चुके हैं, ताकि किसी भी समुदाय के जान-माल की ज्यादा हानि न हो सके। 
                अपने मुस्लिम मित्रों को भी आप यह कहकर भारत को एक हिन्दू राष्ट्र बनाने की इस मुहीम में भाजपा का साथ देने के लिए संतुष्ट कर सकते हैं कि हमारा इतिहास भी इस बात का गवाह है कि प्राचीन काल से आज तक कभी किसी भी हिन्दू राजा ने गैर हिन्दुओं पर अत्याचार नहीं किये, वरना यहाँ कभी कोई दूसरा धर्म पनप ही नहीं पाता, जबकि बाबर, महमूद गजनवी, चंगेज़ खान, तैमूरलंग, मुहम्मद गौरी और औरंगज़ेब समेत न जाने कितने ही मुस्लिम बादशाहों के द्वारा हिन्दू मंदिरों को तोड़ने, उन्हें लूटने और यहाँ की हिन्दू प्रजा पर जुल्मो-सितम के किस्से तो इतिहास में भरे पड़े हैं। 
                उन्हें इस बात का भरोसा दिलाइये कि हिन्दू राष्ट्र बनने के बाद भी उनके साथ किसी किस्म का कोई भेदभाव नहीं किया जायेगा। अगर मेरी बात आपको ठीक से समझ में आ पायी हो, तो आप इसे आगे भी शेयर कर सकते हैं। आप मेरी किसी भी पोस्ट के व्यूज को देखकर सुनिश्चित कर सकते हैं, कि मेरी हर पोस्ट को हज़ारों लोग अवश्य देखते हैं। इसलिए अपने इस मैसेज को इस पोस्ट के ज़रिये हज़ारों लोगों को भेज कर अपने हिस्से का अपना काम मैं तो कर चुका हूँ। 
                आगे का काम आपका है कि यह मैसेज आप अपने आगे के हज़ारों लोगों को कैसे भेज पाते हैं अथवा उन्हें भी यह हकीकत कैसे समझा पाते हैं? चाहें तो इसके लिए आप इस मैसेज के हज़ारों प्रिंट छपवा कर भी यह काम आसानी से कर सकते हैं। लेकिन सावधान ! कांग्रेस व् अन्य राजनीतिक पार्टियों से जुड़े हुए लोगों और कट्टर मुसलमानों से बचकर, क्यूँकि इससे उनकी इस देश को मुस्लिम देश बनाने की साज़िश नाकाम जो हो सकती है, तो ज़ाहिर है कि मेरी तरह आप भी उनकी नज़रों में खटक सकते हैं। 
                क्या आप नहीं जानते कि भारत में भाजपा व् अन्य हिन्दू संगठनो के नेताओं को छोड़कर अन्य सभी नेता, मीडिया, अन्य वर्गों/धर्मों के लोग व् मुस्लिम समुदाय सहित समाज के सभी ताकतवर तबके न केवल कदम कदम पर हिन्दू धर्म के बारे में तरह तरह की उल-जुलूल बातें फैलाने की भरसक कोशिश ही करते हैं, बल्कि अक्सर यह भी देखने में आता है कि ये सभी लोग व् नेता जब कभी उन्हें हिन्दुओं को किसी भी बात पर नीचा दिखाने और अपमान करने का मौका मिलता है, तो उसमें अपनी तरफ से कोई कसर भी बाकी नहीं छोड़ते? इसका भी एक कारण है कि इनमें से अधिकाँश नेता व् मीडिया कर्मी या तो मुसलमान बन ही चुके हैं या बनने को तैयार बैठे हैं, जिसका खुलासा हम पहले की कई पोस्ट्स में भी कर चुके हैं। लेकिन फैसला तुरंत अवश्य करें, वरना देर होने पर तो पछताने का भी कोई फायदा नहीं होगा। 
                                                          - उमा शंकर पराशर 
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मित्रों ! बीच में मुझे एक बार यह शिकायत भी सुनने को मिली थी कि मेरे मैसेज में दिए गए सरफ़रोश देशभक्त के वेब एड्रेस पर क्लिक करने से कभी कभी 404 error भी शो कर देता है, उस अवस्था में आप मेरी प्रोफाइल को ओपन करके उसके अबाउट में लिंक में सरफ़रोश देशभक्त लिखे हुए पर क्लिक कर दें। जिससे वो कम्युनिटी अपने आप ओपन हो जाएगी।  
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प्रिय मित्रों एवं बच्चों ! 
                            ॐ नमः शिवाय ! हर हर महादेव ! भगवान शिव आपकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करें ! ईश्वर आपको सदा सही राह पर चलायें, जिससे आपका प्रत्येक दिन मंगलमय हो !
                            स्वतंत्रता और स्वाधीनता प्राणी मात्र का जन्मसिद्ध अधिकार है। इसी से आत्मसम्मान और आत्मउत्कर्ष का मार्ग प्रशस्त होता है। भारत को दीर्घावधि तक विदेशी शासन और परतंत्रता का दंश झेलने को मजबूर होना पडा था और जब क्रूरतम कृत्यों से भरी अपमानजनक स्थिति की चरम सीमा हो गई, तब जनमानस उद्वेलित हो उठा था।
                            यह आजादी हमें यूँ ही नहीं प्राप्त हुई, वरन् इसके पीछे शहादत का इतिहास है। लाल-बाल-पाल ने इस संग्राम को एक पहचान दी, तो महात्मा गाँधी ने इसे अपूर्व विस्तार दिया। भगत सिंह व आजाद जैसे क्रान्तिकारियों द्वारा पराधीनता के खिलाफ दिया गया इन्कलाब का अमोघ अस्त्र अँग्रेजों की हिंसा पर भारी पड़ा और अन्ततः १५ अगस्त १९४७ के सूर्योदय ने अपनी कोमल रश्मियों से एक नये स्वाधीन भारत का स्वागत किया। इतिहास अपनी गाथा खुद कहता है।                                   सिर्फ पन्नों पर ही नहीं बल्कि लोक मानस के कंठ में, गीतों और किंवदंतियों इत्यादि के माध्यम से यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रवाहित होता रहता है।भारत को कभी सोने की चिड़िया कहा जाता था। पर अँग्रेजी राज ने हमारी सभ्यता व संस्कृति पर घोर प्रहार किये और यहाँ की अर्थव्यवस्था को भी दयनीय अवस्था में पहुँचा दिया।
                            आजादी की सौगात भीख में नहीं मिलती बल्कि उसे छीनना पड़ता है। इसके लिये ज़रूरी है कि समाज में कुछ नायक आगे आयें और शेष समाज उनका अनुसरण करे। कोई भी क्रान्ति बिना खून की क़ुरबानी के पूरी नहीं होती, चाहे कितने ही बड़े दावे किये जायें। भारतीय स्वाधीनता संग्राम में एक ऐसा भी दौर आया, जब कुछ नौजवानों ने अँग्रेजी हुकूमत की चूल हिला दी, नतीजन अँग्रेजी सरकार उन्हें जेल में डालने के लिये तड़प उठी।
                             ११ अगस्त १९०८ को जब १५ वर्षीय क्रान्तिकारी खुदीराम बोस को अँग्रेज सरकार ने निर्ममता से फाँसी पर लटका दिया, तो मशहूर उपन्यासकार प्रेमचन्द के अन्दर का देशप्रेम भी हिलोरें मारने लगा और वे खुदीराम बोस की एक तस्वीर बाजार से खरीदकर अपने घर लाये तथा कमरे की दीवार पर टाँग दिया। खुदीराम बोस को फाँसी दिये जाने से एक वर्ष पूर्व ही उन्होंने ‘दुनिया का सबसे अनमोल रतन’ नामक अपनी प्रथम कहानी लिखी थी, जिसके अनुसार- ‘खून की वह आखिरी बूँद, जो देश की आजादी के लिये गिरे, वही दुनिया का सबसे अनमोल रतन है।’
                              निहत्थे लाला लाजपत राय पर बरसी लाठियों से भगत सिंह उद्देलित होकर बोल उठे "लालाजी के शरीर पर बरसी एक एक लाठी ब्रिटिश साम्राज्य के ताबूत में कील का काम करेगी।" 
                               सरदार भगत सिंह क्रान्तिकारी आन्दोलन के अगुवा थे, जिन्होंने हँसते-हँसते फासी के फन्दों को चूम लिया था। एक लोकगायक भगत सिंह के इस तरह जाने को बर्दाश्त नहीं कर पाता और गाता है- एक-एक क्षण बिलम्ब का मुझे यातना दे रहा है - तुम्हारा फंदा मेरे गरदन में छोटा क्यों पड़ रहा है। 
                                सुभाष चन्द्र बोस ने नारा दिया कि- “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा, फिर क्या था पुरूषों के साथ-साथ महिलाएँ भी उनकी फौज में शामिल होने के लिए बेकरार हो उठी थी। 
                                १८५७ की क्रान्ति में जिस मनोयोग से पुरुष नायकों ने भाग लिया, महिलायें भी उनसे पीछे न रहीं। लखनऊ में बेगम हज़रत महल तो झाँसी में रानी लक्ष्मीबाई ने इस क्रान्ति की अगुवाई की। 
                                 रानी लक्ष्मीबाई की शौर्य गाथा का वर्णन करना मुझ जैसे आम भारतीय के बूते से बाहर की बात है, फिर भी मैंने अपनी पूरी कोशिश की है कि उनके जीवन की  कड़ियों के कुछ ऐसे मोतियों को संजो पाऊँ, जिसे पढ़कर हमारी भावी पीढ़ी कुछ सीख सकें। 

           "बुन्देले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
                 खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थीं।।"

                रानी लक्ष्मी बाई (जन्म - 19 नवंबर, 1835; मृत्यु - 17 जून, 1858) मराठा शासित झाँसी राज्य की रानी और 1857 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की वीरांगना थीं। 
                भारतीय वसुंधरा को गौरवान्वित करने वाली झांसी की रानी वीरांगना लक्ष्मी बाई वास्तविक अर्थ में आदर्श वीरांगना थीं। सच्चा वीर कभी आपत्तियों से नहीं घबराता है। प्रलोभन उसे कर्तव्य पालन से विमुख नहीं कर सकते। उसका लक्ष्य उदार और उच्च होता है।
                उसका चरित्र अनुकरणीय होता है। अपने पवित्र उद्देश्य की प्राप्ति के लिए वह सदैव आत्मविश्वासी, कर्तव्य परायण, स्वाभिमानी और धर्मनिष्ठ होता है। ऐसी ही थीं वीरांगना लक्ष्मीबाई। 
                बलिदानों की धरती भारत में ऐसे-ऐसे वीरों ने जन्म लिया है, जिन्होंने अपने रक्त से देश प्रेम की अमिट गाथाएं लिखीं। यहाँ की ललनाएं भी इस कार्य में कभी किसी से पीछे नहीं रहीं, उन्हीं में से एक का नाम है- झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई।                  उन्होंने न केवल भारत की बल्कि विश्व की महिलाओं को गौरवान्वित किया। उनका जीवन स्वयं में वीरोचित गुणों से भरपूर, अमर देशभक्ति और बलिदान की एक अनुपम गाथा है।
                  रानी लक्ष्मीबाई मराठा शासित झांसी की रानी और भारत की स्वतंत्रता संग्राम की प्रथम वनिता थीं। भारत को दासता से मुक्त करने के लिए सन् 1857 में बहुत बड़ा प्रयास हुआ। यह प्रयास इतिहास में भारत का प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम या सिपाही स्वतंत्रता संग्राम कहलाता है।
                  अंग्रेज़ों के विरुद्ध रणयज्ञ में अपने प्राणों की आहुति देने वाले योद्धाओं में वीरांगना महारानी लक्ष्मी बाई का नाम सर्वोपरी माना जाता है। 1857 में उन्होंने भारत के स्वतंत्रता संग्राम का सूत्रपात किया था। अपने शौर्य से उन्होंने अंग्रेज़ों के दाँत खट्टे कर दिए थे। अंग्रेज़ों की शक्ति का सामना करने के लिए उन्होंने नये सिरे से सेना का संगठन किया और सुदृढ़ मोर्चाबंदी करके अपने सैन्य कौशल का परिचय दिया था।

उपनाम : मणिकर्णिका, मनु
जन्मस्थल : वाराणसी, उत्तर प्रदेश
मृत्युस्थल: ग्वालियर, मध्य प्रदेश
आन्दोलन: भारतीय स्वतंत्रता संग्राम

                     रानी लक्ष्मीबाई (जन्म: 19 नवम्बर 1835[1] – मृत्यु: 17 जून 1858) मराठा शासित झाँसी राज्य की रानी और 1857 के प्रथम भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम की वीरांगना थीं जिन्होंने मात्र 23 वर्ष की आयु में ब्रिटिश साम्राज्य की सेना से संग्राम किया और रणक्षेत्र में वीरगति प्राप्त की किन्तु जीते जी अंग्रेजों को अपनी झाँसी पर कब्जा नहीं करने दिया।

                     "मैं मेरी झांसी अंग्रेजों को नही दूंगी।" अंग्रेजो पर गरजी रानी लक्ष्मीबाई। आज रानी लक्ष्मीबाई बलिदान दिवस है | इस रणरागिनी को नमन |
 वीरांगना – रानी लक्ष्मीबाई (१९ नवंबर १८३५-१७जून १८५८)
                     भारत के स्वतन्त्रता संग्राम में केवल पुरुषों ने ही अपने जीवन का बलिदान नहीं किया, बल्कि यहाँ की वीरांगनाएँ भी घर से निकलकर साहस के साथ युद्ध-भूमि में शत्रुओं से लोहा लिया। उन वीरांगनाओं में अग्रणी थीं झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई।
                      समस्त विश्व को वीरता का र्माग दिखाने वाली। शौर्य, तेज, दया, करुणा और देशभक्ती का जज़बा जिसके रग-रग में भरा हुआ था। माँ की मनु, बाजीराव की छबीली, सुभद्रा कुमारी चौहान की खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।

                      पिता मोरोपन्त एक मराठी थे और मराठा बाजीराव की सेवा में थे। माता भागीरथी बाई एक रूपवती, सुशील, सुसंस्कृत, चतुर एवं धार्मिक महिला थीं। लक्ष्मीबाई का जन्म वाराणसी जिले के भदैनी नामक नगर में हुआ था।
                      मोरोपन्त जी की पत्नी भागीरथी बाई ने १९ नवंबर, १८३५ ई. के दिन एक पुत्री, हम सब की प्रेरणास्रोत और चहेती रानी लक्ष्मीबाई को जन्म दिया। पुत्री का बचपन का नाम‘ मणिकर्णिका’ रखा गया, परन्तु प्यार से मणिकर्णिका को ‘मनु’ पुकारा जाता था।  
                       माता भागीरथी देवी एवं पिता मोरोपंत के श्रेष्ठ संस्कारों से बालिका मनु का मन और ह्रदय विविध प्रकार के उच्च और महान उज्जवल गुणों से सिंचित हुआ था। बचपन में ही माँ से विविध प्रकार की धार्मिक, सांस्कृतिक और शौर्यपूर्ण गाथाएं सुनकर मनु के मन में स्वदेश प्रेम की भावना और वीरता की उच्छल तरंगे हिलोरे लेने लगीं थी।
                       एक बार बचपन में ही काशी के घाट की सीढीयों पर वो बैठी हुई थी, तभी कुछ अंग्रेज उस रास्ते से नीचे उतर रहे थे। मनु को रास्ते से हटने के लिये कहा, किन्तु वो वहीं दृणनिश्चयी की तरह बैठी रहीं, अंग्रेजों के प्रति उनके मन में रौष बचपन से ही था। अंग्रेज उन्हे बच्ची समझ कर दूसरी तरफ से निकल गये। उन्हे क्या पता था कि ये बच्ची उनके वजूद को मिटाने का दम रखती है।
                        लेकिन अल्प आयु में ही माँ का साथ मनु से छूट गया। मनु की अवस्था अभी लगभग चार-पाँच वर्ष ही थी कि उसकी माँ का देहान्त हो गया। अपनी माँ की मृत्यु हो जाने पर वह पिता के साथ बिठूर आ गई थीं। यहीं पर उन्होंने मल्लविद्या, घुड़सवारी और शस्त्रविद्याएँ सीखीं।
                         मनु के पिता मोरोपन्त तांबे, जो एक साधारण ब्राह्मण और अंतिम मराठा पेशवा बाजीराव द्वितीय की सेवा में थे। महारानी के पितामह बलवंत राव के बाजीराव पेशवा की सेना में सेनानायक होने के कारण मोरोपंत पर भी पेशवा की कृपा रहने लगी।
                         चूँकि घर में मनु की देखभाल के लिए कोई नहीं था, इसलिए मोरोपन्त मनु को अपने साथ बाजीराव के दरबार में ले जाते थे, जहाँ चंचल एवं सुन्दर मनु ने सबका मन मोह लिया था। बाजीराव मनु को प्यार से ‘छबीली’ बुलाते थे। उसके बाद सभी लोग उसे प्यार से "छबीली" बुलाने लगे।
                          मनु ने बचपन में शास्त्रों की शिक्षा के साथ शस्त्रों की शिक्षा भी ली। पेशवा बाजीराव के बच्चों को पढ़ाने के लिए शिक्षक आते थे। मनु भी उन्हीं बच्चों के साथ पढ़ने लगी।मनु ने पेशवा के बच्चों के साथ-साथ ही तीर-तलवार तथा बन्दूक से निशाना लगाना सीखा। यहीं पर मनु ने मल्लविद्या, घुड़सवारी और शस्त्रविद्याएँ सीखीं। अस्र-शस्र चलाना एवं घुड़सवारी करना मनु के प्रिय खेल थे।
                           इस प्रकार सात साल की उम्र में ही लक्ष्मीबाई ने घुड़सवारी सीखी। साथ ही तलवार चलाने में, धनुर्विद्या में निष्णात हुई। बालकों से भी अधिक सामर्थ्य दिखाया। बचपन में लक्ष्मीबाई ने अपने पिता से कुछ पौराणिक वीरगाथाएँ सुनीं। वीरों के लक्षणों व उदात्त गुणों को उसने अपने हृदय में संजोया। इस प्रकार मनु अल्पवय में ही अस्त्र-शस्त्र चलाने में पारंगत हो गई। 

"कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी,
नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी,
बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी।
वीर शिवाजी की गाथायें उसको याद ज़बानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।"

                           समय बीता और मनु विवाह योग्य हो गयी। इधर सन्‌ 1838 में गंगाधर राव को झांसी का राजा घोषित किया गया। सन् 1842 में झाँसी के राजा गंगाधर राव निवालकर के साथ बड़े ही धूम-धाम से मनु का विवाह सम्पन्न हुआ। विवाह के पश्चात् मनु का नाम लक्ष्मीबाई रखा गया।
                            इस प्रकार काशी की कन्या मनु झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई बन गई। रानी बनकर लक्ष्मीबाई को पर्दे में रहना पड़ता था।  स्वच्छन्द विचारों वाली रानी को यह रास नहीं आया।  उन्होंने किले के अन्दर ही एक व्यायामशाला बनवाई और शस्रादि चलाने तथा घुड़सवारी हेतु आवश्यक प्रबन्ध किए। उन्होंने स्रियों की एक सेना भी तैयार की। राजा गंगाधर राव अपनी पत्नी की योग्यता से अतीव प्रसन्न थे। 
                             रानी लक्ष्मीबाई अत्यन्त दयालु भी थीं। एक दिन जब कुलदेवी महालक्ष्मी की पूजा करके लौट रही थीं, कुछ निर्धन लोगों ने उन्हें घेर लिया। उन्हें देखकर महारानी का हृदय द्रवित हो उठा। उन्होंने नगर में घोषणा करवा कर एक निश्चित दिन गरीबों में वस्रादि का वितरण कराया।
                              कुछ समय पश्चात् 1851 में उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई, सम्पूर्ण झाँसी नगरी आनन्दित हो उठी एवं उत्सव मनाया गया, किन्तु यह आनन्द अल्पकालिक ही था।विधाता ने तो उन्हे किसी खास प्रयोजन से धरती पर भेजा था। पुत्र की खुशी वो ज्यादा दिन तक न मना सकीं, दुर्भाग्यवश कुछ ही महीने बाद बालक गम्भीर रुप से बीमार हुआ और चार महीने अवस्था में ही उसकी मृत्यु हो गयी। झाँसी शोक के सागर में डूब गई।

"उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजियाली छाई,
किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई,"

                                गंगाधर राव ये आघात सह न सके। शोकाकुल राजा गंगाधर राव भी बीमार रहने लगे एवं मृतप्राय हो गये। सन् 1853 में राजा गंगाधर राव का स्वास्थ्य बहुत अधिक बिगड़ जाने पर दरबारियों ने उन्हें दत्तक पुत्र गोद लेने की सलाह दी। लोगों के आग्रह पर उन्होने अपने ही परिवार के पाँच वर्ष के एक बालक को गोद ले लिया और उसे अपना दत्तक पुत्र बनाया, जिसका नाम दामोदर राव रक्खा गया। गोद लेने के दूसरे दिन ही 21 नवम्बर 1853 को राजा गंगाधर राव की दु:खद मृत्यु हो गयी।
                                  इसी के साथ रानी पर शोक का पहाड़ टूट पड़ा। झाँसी का प्रत्येक व्यक्ति रानी के दु:ख से शोकाकुल हो गया। रानी ने अब एक दत्तक पुत्र को लेकर राजकाज देखने का निश्चय किया, किन्तु कम्पनी शासन उनका राज्य छीन लेना चाहता था। यद्यपि महाराजा का निधन महारानी के लिए असहनीय था, लेकिन फिर भी वे घबराई नहीं, उन्होंने विवेक नहीं खोया।
                                  रानी ने जितने दिन भी शासन किया। वे अत्यधिक सूझबूझ के साथ प्रजा के लिए कल्याण कार्य करती रही। इसलिए वे अपनी प्रजा की स्नेह भाजन बन गईं थीं। 
"तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाई,
रानी विधवा हुई, हाय ! विधि को भी नहीं दया आई।"
                                   उस समय भारत के बड़े भू-भाग पर अंग्रेजों का शासन था। वे झाँसी को अपने अधीन करना चाहते थे। उन्हें यह एक उपयुक्त अवसर लगा। राजा गंगाधर राव ने अपने जीवनकाल में ही अपने परिवार के बालक दामोदर राव को दत्तक पुत्र मानकर अंगरेजी सरकार को सूचना दे दी थी। परंतु ईस्ट इंडिया कंपनी की सरकार ने दत्तक पुत्र को अस्वीकार कर दिया। 27 फरवरी 1854 को लार्ड डलहौजी ने गोद की नीति के अंतर्गत दत्तक पुत्र दामोदर राव की गोद अस्वीकृत कर दी और झांसी को अंगरेजी राज्य में मिलाने की घोषणा कर दी। गंगाधर की मृत्यु के पश्चात जनरल डलहौजी ने दामोदर राव को झांसी का उत्तराधिकारी मानने से इंकार कर दिया।
                                  उन्हें लगा रानी लक्ष्मी बाई महिला है और हमारा प्रतिरोध नहीं करेगी। उन्होंने रानी के दत्तक-पुत्र को राज्य का उत्तराधिकारी मानने से इंकार करते हुए रानी के पास पत्र लिख भेजा कि चूँकि राजा का कोई पुत्र नहीं है, इसीलिए झाँसी पर अब अंग्रेजों का अधिकार होगा। रानी लक्ष्मी बाई ये अन्याय कैसे सहन कर सकती थीं। पोलेटिकल एजेंट की सूचना पाते ही रानी क्रोध से भर उठीं एवं उन्होने अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध का बिगुल बजा दिया और घोषणा कर दी कि "मैं अपनी झांसी अंग्रेजों को नही दूंगी।"
                                  अंग्रेज तिलमिला उठे। डलहौजी की राज्य हड़प नीति के अन्तर्गत ब्रिटिश राज ने बालक दामोदर राव को झाँसी राज्य का उत्तराधिकारी मानने से इनकार कर दिया तथा झाँसी राज्य को ब्रितानी राज्य में मिलाने का निश्चय कर लिया। तब रानी लक्ष्मीबाई ने ब्रितानी वकील जान लैंग की सलाह ली और लंदन की अदालत में मुकदमा दायर कर दिया। यद्यपि मुकदमे में बहुत बहस हुई परन्तु इसे खारिज कर दिया गया।
                                  7 मार्च 1854 को झांसी पर अंगरेजों का अधिकार हुआ। झांसी की रानी ने पेंशन अस्वीकृत कर दी व नगर के राजमहल में निवास करने लगीं। ब्रितानी अधिकारियों ने राज्य का खजाना ज़ब्त कर लिया और उनके पति के कर्ज़ को रानी के सालाना खर्च में से काटने का फरमान जारी कर दिया।
                                 इसके परिणामस्वरूप रानी को झाँसी का किला छोड़ कर झाँसी के रानीमहल में जाना पड़ा। पर रानी लक्ष्मीबाई ने हिम्मत नहीं हारी और हर हाल में झाँसी राज्य की रक्षा करने का निश्चय किया। परिणाम स्वरुप अंग्रेजों ने झाँसी पर आक्रमण कर दिया।
                                  यहीं से भारत की प्रथम स्वाधीनता क्रांति का बीज प्रस्फुटित हुआ। अंगरेजों की राज्य लिप्सा की नीति से उत्तरी भारत के नवाब और राजे-महाराजे असंतुष्ट हो गए और सभी में विद्रोह की आग भभक उठी। रानी लक्ष्मी बाई ने इसको स्वर्णावसर माना और क्रांति की ज्वालाओं को अधिक सुलगाया तथा अंगरेजों के विरुद्ध विद्रोह करने की योजना बनाई। 
                                 नवाब वाजिद अली शाह की बेगम हजरत महल, अंतिम मुगल सम्राट की बेगम जीनत महल, स्वयं मुगल सम्राट बहादुर शाह, नाना साहब के वकील अजीमुल्ला शाहगढ़ के राजा, वानपुर के राजा मर्दनसिंह और तात्या टोपे आदि सभी महारानी के इस कार्य में सहयोग देने का प्रयत्न करने लगे।
                                 इस तरह सन् सत्तावन में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की शुरुआत रानीलक्ष्मी बाई के द्वारा हुई। स्वतंत्रता की ये आग पूरे देश में धधक उठी। रानी ने भी युद्ध की पूरी तैयारी की। रानी लक्ष्मीबाई ने झाँसी की सुरक्षा को सुदृढ़ करना शुरू कर दिया और एक स्वयंसेवक सेना का गठन प्रारम्भ किया। इस सेना में महिलाओं की भर्ती की गयी और उन्हें युद्ध का प्रशिक्षण दिया गया।
                                  मुन्दर और झलकारी सखियों ने भी साहस के साथ हर पल रानी का साथ दिया था। बहुत कम लोग जानते हैं कि झलकारी बाई झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई की प्रिय सहेलियों में से एक थी और झलकारी बाई ने समर्पित रुप में न सिर्फ रानी लक्ष्मीबाई का साथ दिया बल्कि झाँसी की रक्षा में अंग्रेजों का सामना भी किया। वीरांगना झलकारी बाई झांसी की रानी लक्ष्मी बाई की हमशकल थी और लक्ष्मीबाई की सेना में महिला सेना की सेनापति थी। 
                                  रानी ने क़िले की मज़बूत क़िलाबन्दी की। किले की प्राचीर पर तोपें रखवायीं। रानी ने अपने महल के सोने एवं चाँदी के सामान तोप के गोले बनाने के लिए दे दिया। झाँसी 1857 के संग्राम का एक प्रमुख केन्द्र बन गया जहाँ हिंसा भड़क उठी। साधारण जनता ने भी इस संग्राम में सहयोग दिया।
                                  1857 के सितम्बर तथा अक्टूबर माह में पड़ोसी राज्य ओरछा तथा दतिया के राजाओं ने झाँसी पर आक्रमण कर दिया। रानी ने सफलता पूर्वक इसे विफल कर दिया। 1858 के जनवरी माह में ब्रितानी सेना ने झाँसी की ओर बढ़ना शुरू कर दिया और मार्च के महीने में शहर को घेर लिया।
                                  रानी के किले की प्राचीर पर जो तोपें थीं उनमें कड़क बिजली, भवानी शंकर, घनगर्जन एवं नालदार तोपें प्रमुख थीं। रानी के कुशल एवं विश्वसनीय तोपची थे, गौस खाँ तथा खुदा बक्श। रानी ने किले की मजबूत किलाबन्दी की। रानी ने ईंट का जवाब पत्थर से देने के लिये युद्ध का शंखनाद किया, जिससे अंग्रेजों के पैर उखङने लगे। रानी के कौशल को देखकर अंग्रेज सेनापित ह्यूरोज भी चकित रह गया। अंग्रेजों ने किले को घेर कर चारों ओर से आक्रमण किया। 
                                 अंग्रेज आठ दिनों तक किले पर गोले बरसाते रहे, परन्तु किला न जीत सके। रानी एवं उनकी प्रजा ने प्रतिज्ञा कर ली थी कि अन्तिम श्वाँस तक किले की रक्षा करेंगे। अंग्रेज सेनापति ह्यूराज ने अनुभव किया कि सैन्य-बल से किला जीतना सम्भव नहीं है।  
                                 अत: उसने कूटनीति का प्रयोग किया और झाँसी के ही एक विश्वासघाती सरदार दूल्हा सिंह को मिला लिया जिसने किले का दक्षिणी द्वार खोल दिया। फिरंगी सेना किले में घुस गई और लूटपाट तथा हिंसा का पैशाचिक दृश्य उपस्थित कर दिया।
                                 घोड़े पर सवार, दाहिने हाथ में नंगी तलवार लिए, पीठ पर पुत्र को बाँधे हुए रानी ने रणचण्डी का रूप धारण कर लिया और शत्रु दल संहार करने लगीं। झाँसी के वीर सैनिक भी शत्रुओं पर टूट पड़े। जय भवानी और हर-हर महादेव के उद्घोष से रणभूमि गूँज उठी। दो हफ़्तों की लड़ाई के बाद ब्रितानी सेना ने शहर पर कब्जा कर लिया।
                                 किन्तु झाँसी की सेना अंग्रेज़ों की तुलना में छोटी थी। रानी अंग्रेजों से घिर गयीं। चूँकि वीरांगना झलकारी बाई रानी लक्ष्मी बाई की हमशक्ल थी, इसलिए सन् १८५७ के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में बड़ी सूझ बुझ स्वामिभक्ति और राष्ट्रीयता का परिचय दिया था। रानी लक्ष्मीबाई के अग्रेंजी सेना से घिर जाने पर झलकारी बाई ने निर्णायक समय में हम शक्ल होने का फायदा उठाते हुए झलकारी बाई ने स्वयं झांसी की रानी लक्ष्मीबाई बन कर असली रानी लक्ष्मी बाई को सकुशल झांसी की सीमा से बाहर निकाल दिया था और रानी झांसी के रूप में अग्रेंजी सेना से लड़ते - लड़ते शहीद हो गयी थी।  
                               झलकारी जैसे हजारों बलिदानी अब भी गुमनामी के अधेरे में खोये है, जिनकी खोजकर स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास की भी वृद्धि करने की पहली आवश्यकता है। वीरांगना झलकारी बाई झांसी की रानी लक्ष्मी बाई की सेना में महिला सेना की सेनापति थी, जिसकी शक्ल रानी लक्ष्मी बाई से मिलती थी। झलकारी को न महल चाहिए थे, न कीमती जेवर और न रेशमी कपड़े और न दुशाले। वह न तो रानी थी और न ही पटरानी। वह किसी सामन्त की बेटी भी नहीं थी तथा किसी जागीरदार की पत्नी भी नहीं।
                              वह तो २२ नवम्बर १८३० ई० को गाँव भोजला के एक साधारण कोरी परिवार में पैदा हुई थी और पूरन को ब्याही गयी थी। झलकारी के पति पूरनलाल रानी झांसी की सेना में तोपची थे। पिता भी आम परिवार से थे और पति भी, लेकिन देश और समाज के प्रति प्रेम और बलिदान ने उन्होंने इतिहास में खास जगह बनाई थी। परन्तु रानी दामोदर राव के साथ अंग्रेजों से बच कर भाग निकलने में सफल हो गयी। 
                             झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई, इस बात से बहुत कुपित थी कि 1853 ई. में उसके पति के मरने पर लॉर्ड डलहौज़ी ने ज़ब्ती का सिद्धांत लागू करके उसका राज्य हड़प लिया। अतएव सिपाही विद्रोह शुरू होने पर वह विद्रोहियों से मिल गई और सर ह्यूरोज के नेतृत्व में अंग्रेज़ी फ़ौज का डट कर वीरता पूर्वक मुक़ाबला किया। जब अंग्रेज़ी फ़ौज क़िले में घुस गई, तो कुछ विश्वास पात्रों की सलाह पर रानी कालपी की ओर बढ़ चलीं। 
                             रानी झाँसी से भाग कर कालपी पहुँची, तात्या टोपे से मिली और वहाँ से युद्ध जारी रखा। जब कालपी छिन गई तो रानी लक्ष्मीबाई ने तात्या टोपे के सहयोग से शिन्दे की राजधानी ग्वालियर पर हमला बोला, जो अपनी फ़ौज के साथ कम्पनी का वफ़ादार बना हुआ था। तात्या टोपे और रानी की संयुक्त सेनाओं ने ग्वालियर के विद्रोही सैनिकों की मदद से ग्वालियर के एक किले पर कब्जा कर लिया।
                             लक्ष्मी बाई के हमला करने पर वह अपने प्राणों की रक्षा करने के लिए आगरा भागा और वहाँ अंग्रेज़ों की शरण ली। लक्ष्मी बाई की वीरता देखकर शिन्दे की फ़ौज विद्रोहियों से मिल गई। रानी लक्ष्मी बाई तथा उसके सहयोगियों ने नाना साहब को पेशवा घोषित कर दिया और महाराष्ट्र की ओर धावा मारने का मनसूबा बाँधा, ताकि मराठों में भी विद्रोहाग्नि फैल जाए। इस संकटपूर्ण घड़ी में सर ह्यूरोज तथा उसकी फ़ौज ने रानी लक्ष्मी बाई को और अधिक सफलताएँ प्राप्त करने से रोकने के लिए जी तोड़ कोशिश की। उसने ग्वालियर फिर से लिया और मुरार तथा कोटा की दो लड़ाइयों में रानी की सेना को पराजित किया।
                                    दुर्भाग्य से एक गोली रानी के पैर में लगी और उनकी गति कुछ धीमी हुई। अंग्रेज सैनिक उनके समीप आ गए। रानी ने पुन: अपना घोड़ा दौड़ाया। दुर्भाग्य से मार्ग में एक नाला आ गया। घोड़ा नाला पार न कर सका। तभी अंग्रेज घुड़सवार वहां आ गए। एक ने पीछे से रानी के सिर पर प्रहार किया, जिससे उनके सिर का दाहिना भाग कट गया और उनकी एक आँख बाहर निकल आयी। उसी समय दूसरे गोरे सैनिक ने संगीन से उनके हृदय पर वार कर दिया। अत्यन्त घायल होने पर भी रानी अपनी तलवार चलाती रहीं और उन्होंने दोनों आक्रमण कारियों का वध कर डाला। फिर वे स्वयं भूमि पर गिर पड़ी।  पठान सरदार गौस खाँ अब भी रानी के साथ था। उसका रौद्र रुप देख कर गोरे भाग खड़े हुए।
                               स्वामिभक्त रामराव देशमुख अन्त तक रानी के साथ थे। उन्होंने रानी के रक्त रंजित शरीर को समीप ही बाबा गंगादास की कुटिया में पहुँचाया। रानी ने व्यथा से व्याकुल हो जल माँगा और बाबा गंगादास ने उन्हें जल पिलाया। वे अपने सम्मान के प्रति सदैव सजग रही, उन्होंने यही कामना की थी कि यदि वे रणभूमि में लड़ते-लड़ते मृत्यु को वरन करें, तब भी उनका शव अंग्रेजों के हाथ न लगे।
                                रानी को असह्य वेदना हो रही थी, परन्तु मुखमण्डल दिव्य कान्त से चमक रहा था।  उन्होंने एक बार अपने पुत्र को देखा और फिर वे तेजस्वी नेत्र सदा के लिए बन्द हो गए।  अदभुत और अद्मय साहस से अंतिम सांस तक युद्ध करने वाली विरांगना ने  अन्त में स्वतंत्रता की बली बेदी पर अपने प्रांण न्यौछावर कर दिये। वह १७ जून १८५८ का दिन था, जब क्रान्ति की यह ज्योति अमर हो गयी। बाबा गंगादास ने तुरंत कुटिया को ही चिता बनाकर उनका अंतिम संस्कार कर दिया, ताकि अंग्रेज उनको छू भी न सकें। उसी कुटिया में उनकी चिता लगायी गई, जिसे उनके पुत्र दामोदर राव ने मुखाग्नि दी।
                               ग्वालियर में आज भी रानी लक्ष्मीबाई की समाधी उनकी गौरवगाथा की याद दिलाती है। रानी का पार्थिव शरीर पंचमहाभूतों में विलीन हो गया और वे सदा के लिए अमर हो गयीं। रानी का पार्थिव शरीर पंचमहाभूतों में विलीन हो गया और वे सदा के लिए अमर हो गयीं। इनकी मृत्यु ग्वालियर में हुई थी। विद्रोही सिपाहियों के सैनिक नेताओं में रानी सबसे श्रेष्ठ और बहादुर थी और उसकी मृत्यु से मध्य भारत में विद्रोह की रीढ़ टूट गई।

“रानी गई सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,
मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,
अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी,
हमको जीवित करने आयी बन स्वतंत्रता-नारी थी,
दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी,”
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

                               देश के पहले स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली रानी लक्ष्मी बाई के अप्रतिम शौर्य से चकित अंग्रेजों ने भी उनकी प्रशंसा की थी। लड़ाई की रिपोर्ट में ब्रिटिश जनरल ह्यूरोज़ ने टिप्पणी की कि रानी लक्ष्मी बाई अपनी “सुंदरता, चालाकी और दृढ़ता के लिए उल्लेखनीय” और “विद्रोही नेताओं में सबसे खतरनाक” थीं।

सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी,
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।
चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

                             ऐसी विरांगना से आज भी राष्ट्र गर्वित एवं पुलकित है।उनकी देश भक्ती की ज्वाला को काल भी बुझा नही सकता। रानी लक्ष्मीबाई को शब्दों में बाँधा नही जा सकता वो तो पुरे विश्व में अद्मय साहस की परिचायक हैं। उनको शब्दो के माध्यम से याद करने का छोटा सा प्रयास है। भावपूर्ण शब्दाजंली से शत् शत् नमन करते हैं।

जाओ रानी याद रखेंगे ये कृतज्ञ भारतवासी,
यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनासी,
होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,
हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी।
तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

                         भारत माता की गुलामी की बेड़ियाँ काटने में असंख्य लोग शहीद हो गये, बस इस आस के साथ कि आने वाली पीढ़ियाँ स्वाधीनता की बेला में साँस ले सकें। इन शहीदों की तो अब बस यादें बची हैं और इनके चलते पीढ़ियाँ मुक्त जीवन के सपने देख रही हैं। देश आजाद हो गया, पर अँग्रेज इस देश की सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थिक व्यवस्था को छिन्न-भिन्न कर गये। एक तरफ आजादी की उमंग, दूसरी तरफ गुलामी की छायाओं का डर......
                        १८५७ से १९४७ तक की कहानी सिर्फ एक गाथा भर नहीं है बल्कि एक दास्तान है कि क्यों हम बेड़ियों में जकड़े, किस प्रकार की यातनायें हमने सहीं और शहीदों की किन कुर्बानियों के साथ हम आजाद हुए। यह ऐतिहासिक घटनाक्रम की मात्र एक शोभा यात्रा नहीं, अपितु भारतीय स्वाभिमान का संघर्ष, राजनैतिक दमन व आर्थिक शोषण के विरुद्ध लोक चेतना का प्रबुद्ध अभियान एवं सांस्कृतिक नवोन्मेष की दास्तान है।
                        आजादी का अर्थ सिर्फ राजनैतिक आजादी नहीं अपितु यह एक विस्तृत अवधारणा है, जिसमें व्यक्ति से लेकर राष्ट्र का हित व उसकी परम्परायें छुपी हुई हैं। जरूरत है हम अपनी कमजोरियों का विश्लेषण करें, तद्‌नुसार उनसे लड़ने की चुनौतियाँ स्वीकारें और नए परिवेश में नए जोश के साथ आजादी के नये अर्थों के साथ एक सुखी व समृद्ध भारत का निर्माण करें।

"शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, 
वतन पर मरने वालो का यही बाकी निशा होगा !!
                                   - Uma Shankar Parashar.
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प्रिय मित्रों व् बच्चों ! 
                 आप लोगों से मेरी विनती है कि मेरी किसी भी पोस्ट को केवल पढ़ने के पश्चात ही लाइक या शेयर करें। मुझे अफ़सोस है कि मेरी किसी भी पोस्ट में आपके मनोरंजन की कोई भी बातें नहीं होती, बल्कि इनमें केवल अपने देश और देशभक्ति से जुड़ी हुई बातें ही होती हैं, इसलिए यदि आपने किसी मनोरंजन की तलाश में मुझे गलती से अपने सर्किल में ऐड कर लिया हो, तो आपको मेरी सलाह है मेरी इस पोस्ट के मैसेज को आगे पढ़ने में भी अपना समय बिलकुल भी व्यर्थ बर्बाद न करें, बल्कि अपने इस समय का प्रयोग भी मुझे अपने सर्किल से तुरंत रिमूव करने में ही करें। लेकिन यदि आप इस देश से ज़रा सा भी प्रेम करते हैं और यह भी मानते हैं कि इस देश का एक जिम्मेदार नागरिक होने के नाते इस देश के प्रति आपके भी कुछ कर्तव्य हैं, तब भी मेरे मैसेज को पूरा पढ़ने के बाद ही उस पर अपनी कोई भी प्रतिक्रिया देंI अन्यथा मेरा समय भी व्यर्थ बर्बाद न करें ! धन्यवाद।

सत्यम शिवम् सुन्दरम ! जय हिन्द, जय भारत ! वंदे मातरम ! 
          "विजयी विश्व तिरंगा प्यारा,  झंडा ऊंचा रहे हमारा"

प्रिय मित्रों एवं बच्चों ! 
                            ॐ नमः शिवाय ! हर हर महादेव ! भगवान शिव आपकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करें ! ईश्वर आपको सदा सही राह पर चलायें, जिससे आपका प्रत्येक दिन मंगलमय हो ! 

मित्रों व् बच्चों ! 
                         यदि आप हिन्दू हैं और यह बिलकुल नहीं चाहते कि आने वाले समय में कभी भी आपको या आपके बच्चों को जबरन मुसलमान बनना पड़े, तो मेरे इस मैसेज को खासकर इसके महत्वपूर्ण सन्देश वाले भाग को एक बार ऊपर से नीचे तक अवश्य ही पढ़ें। और हाँ अगर आपको मेरी बात में सच्चाई नज़र आये अथवा सही लगे तो यह भी अवश्य ही बताएं कि इस खतरनाक आने वाले भविष्य से अपने सभी बंधु-बांधवों को भी सचेत करने के लिए क्या आप भी हमारे इस हिन्दू जन-जागृति अभियान का हिस्सा नहीं बनना चाहेंगे? अगर हाँ ! तो आप इस दिशा में क्या करेंगे? हो सकता है कि आपको मेरी यह भाषा कुछ अटपटी अवश्य लगे, लेकिन मेरी मज़बूरी है, इस प्रश्न ने (जिससे हम सभी की जिंदगी और हमारी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य जुड़े हुए हैं) पिछले कुछ अरसे से मेरी रातों की नींद को उड़ा रखा है। हालाँकि आपके इस सन्देश को पढ़ने या न पढ़ने से अभी मुझे तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा, क्यूँकि मैं तो स्वयं ही उम्र के उस पड़ाव पर हूँ, जहाँ से उस दौर को देख पाने का मौका शायद ही मिले। लेकिन हमारी भावी पीढ़ियों का भविष्य तो फिर भी उससे जुड़ा हुआ है। वैसे भी आप मुझसे तो झूठ भी बोल सकते हैं, लेकिन क्या अपने आप से या अपनी अंतरात्मा से भी झूठ बोल पाएँगे? इसलिए इसे पढ़ने के बाद भले ही फैसला कुछ भी करें, लेकिन एक बार पूरा जरूर पढ़ें, क्यूँकि तब आप न तो किसी थोथी धर्मनिरपेक्षता के अँधेरे में जियेंगे और न ही कभी किसी से कभी यह भी कह सकेंगे कि आपको वस्तुस्थिति का ज्ञान नहीं था। आखिर को यह हम सभी के अस्तित्व का प्रश्न जो है?
                 कहा जाता है कि जब कोई बात पढ़कर अथवा बोलकर बार-बार दोहराई जाती है, तब वो बात हमारे अवचेतन मन में गहरे तक बैठ जाती है। तब क्यों न हम अपनी भारतीय संस्कृति की नीचे लिखी हुई कुछ अच्छी बातों को दोहराएं, जिससे हमारे व्यक्तित्व का उचित विकास हो और हम अपने राष्ट्र के सर्वांगीण विकास में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे सकें?

                 "श्रीमद भगवद्गीता में भगवान श्री कृष्ण ने स्पष्ट कहा है कि न्याय-अन्याय अथवा धर्म-अधर्म की लड़ाई में बीच का कोई मार्ग ही नहीं होता अर्थात कोई भी पक्ष जो न्याय का समर्थक है, तो उसे अन्याय के प्रतिकारस्वरूप पूरी तरह से न्याय के साथ खड़े होना चाहिए। इसी प्रकार जो कोई भी पक्ष धर्म या न्याय के पक्ष में नहीं है, तो उसे परोक्ष-अपरोक्ष रूप से अन्याय का समर्थन करने वाला ही मानना चाहिए। भगवान श्रीकृष्ण ने आगे इस बात को भी स्पष्ट किया है कि अधर्मियों से समाज एवं धर्म की रक्षा के लिए अधर्मियों के खिलाफ किये गए किसी भी प्रकार के छल-बल एवं हिंसा के प्रयोग को पाप की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। लेकिन उसका उद्देश्य केवल और केवल धर्म की स्थापना ही होना चाहिए।"

                "कोई भी धर्म राष्ट्र-धर्म अथवा देशभक्ति से बड़ा नहीं होता। किसी भी प्रकार के देशद्रोह की केवल एक ही सजा मृत्यु-दंड होनी चाहिए। जिस देश अथवा राज्य की अधिकांश जनता कायर हो, वहां विदेशी शक्तियों अपना आधिपत्य अधिक आसानी से जमा पाती हैं। अन्याय करने वाले से उस अन्याय को चुपचाप सहने वाला अधिक दोषी होता है, जिसके कारण समाज में कायरता बढ़ती है और अन्यायी को बल मिलता है। अतः अन्याय का प्रतिकार अवश्य करें व् अपने बच्चों एवं छोटे भाई-बहनों को भी अन्याय का प्रतिकार करने की ही शिक्षा दें।" 

                "जैसे काली से काली घटाएँ भी सूर्य के प्रकाश को बिखरने से अधिक समय तक रोक नहीं सकती, उसी प्रकार झूठ को कैसी भी चाशनी में लपेट कर परोसने या सत्य को सात तालों के भीतर कैद करने पर भी सत्य को छिपाया अथवा दबाया नहीं जा सकता। और झूठ के सारे अंधकार को चीर कर एक न एक दिन सच का सूरज निकलता जरूर है। सत्य एवं अहिंसा के पथ पर चलना कुछ कठिन भले ही हो, लेकिन केवल सत्य और अहिंसा का मार्ग ही सर्वश्रेष्ठ होता है, इसलिए सदा सत्य बोलने की कोशिश करें। सत्य को बोलने का सबसे बड़ा फायदा ये है कि आपको कोई भी बात याद नहीं रखनी पड़ती, जबकि एक झूठी बात को छिपाने के लिए कभी-कभी सैंकड़ों झूठ बोलने पड़ते हैं। लेकिन एक बात अवश्य याद रखें कि सत्य और अहिंसा कायरों के हथियार नहीं, अतः अपनी कायरता को छिपाने के लिए इनका सहारा लेकर अपने बच्चों एवं समाज को मूर्ख बनाना अपने आपको धोखा देने जैसा ही है।"

               "साफ़ दिल, नेक नियत और सही इरादे से किये जाने वाले हर काम में परमात्मा स्वयँ आपके साथ रहते हैं !" 

               "दूसरों के साथ वो व्यवहार कभी न करें, जो आप स्वयं अपने लिए नहीं चाहते !" 

               "याद रखें कि हमारा चरित्र उस भव्य इमारत की भांति होता है, जिसे बनाने में तो कभी-कभी बरसों लग जाते हैं, लेकिन गिराने में केवल कुछ पल की ही देरी लगती है। ठीक उसी प्रकार चरित्र निर्माण हिमालय पर चढ़ने के समान दुर्गम है, परंतु गिरने के लिए केवल हमारा एक गलत कदम ही पर्याप्त है !"

               "प्रकृति का यह नियम है कि संसार में जो कुछ भी हल्का है, वही ऊपर उठता है। इसलिए अपने उत्थान के लिए अपने अंदर के अहंकार को निकाल कर अपने आपको हल्का करें !" 

               "वैसे तो कुछ भी बोलकर अपने शब्द वापस लेना दोगले नेताओं का ही चलन है, फिर भी आप अपने लफ़्ज़ों को तोलकर बोलिए ! ताकि कभी वापस भी लेने पढ़ें तो वजन न लगे !"

               "इस देश में पैदा होने, यहाँ की आबो-हवा में खेल-कूद कर पले बढे होने के कारण इस देश के प्रति हमारे कुछ फ़र्ज़ व् क़र्ज़ होते हैं। यदि आप के मन में अपने इस देश के प्रति प्रेम और आदर की भावना न हो, यदि यहाँ का नागरिक होने के बावजूद आप अपने उन कर्तव्यों का पालन ठीक से नहीं करते, अपने माता-पिता, बुजुर्गों एवं गुरुजनों को यथोचित सम्मान नहीं देते व् केवल दूसरों में मीन-मेख निकालकर ही आप अपना जीवन व्यतीत करते हैं, तो निश्चय ही आप इस देश की धरती पर बोझ और इंसानियत के नाम पर कलंक हैं !"

               "Inactivity and idleness is the sign of a dead body ! if you have got any free time, don't waste it. You can utilize the same for the sake of the betterment of society, mankind and work for the national interests." 
               "निष्क्रियता और आलस्य एक मृत शरीर की पहचान है ! यदि आप के पास खाली समय है, तो इसे व्यर्थ बर्बाद मत करो। आप अपने खाली समय का सदुपयोग समाज, मानवता की बेहतरी और राष्ट्रीय हितों के लिए काम करके भी कर सकते हैं !" 

प्रिय मित्रों एवं बच्चों ! 
                      आप सभी इस बात से भली भांति परिचित हैं कि नेताओं की बातों पर आँख मूँद कर विश्वास करने वालों का हश्र सदा बुरा ही होता है। सोचो कि भगवान ने हम सभी को बुद्धि और दिमाग किसलिए दिए हैं, यदि हम उनका इस्तेमाल ही न करें? और आप सब भी तो इस बात से सहमत हैं कि विश्व के समस्त नेताओं की प्रवृति तो गिरगिट जैसी होती है, पल-पल में ही बदल जाती है। इससे ज्यादा दुखद और क्या होगा कि भारतीय नेताओं के कारण तो बेचारे गिरगिटों को भी बहुत बड़ी मात्रा में आत्महत्या करनी पड़ रही है क्यूँकि उनका कहना है कि जितनी देर उन्हें ये सोचने में लगती है कि अपना अगला रंग क्या बदलूँ, उतनी देर में तो कुछ भारतीय नेता अपना बयान तीन बार बदल लेते हैं। 
                भारत एक हिन्दू बहुल देश होते हुए भी यहाँ कदम कदम पर हमारे हिन्दू धर्म को अपमानित होना पड़ता है, साथ ही कुव्यवस्था के कारण यह देश भी एक बार फिर से विनाश और विभाजन की ओर अग्रसर होता प्रतीत हो रहा है। इन सब बातों के अलावा कुछ मुस्लिम देशों में पिछले कुछ समय से हिन्दू व् गैर-मुस्लिम लोगों के साथ दुर्व्यवहार, सामूहिक जन-सँहार और जबरन धर्मान्तरण की अनगिनत घटनाओं के बाद इस देश को भी एक मुस्लिम देश बनाने की उठती मांग ने हमें सकते में डाल दिया है और सोचने पर मज़बूर कर दिया है कि नेहरू और गांधी की बेवकूफी और साज़िश के कारण क्या भारत और हिंदुत्व का अस्तित्व इस दुनिया से ही खत्म होने जा रहा है? 
                यह बात मात्र कपोल-कल्पना समझ कर सिर्फ लापरवाही में हंसी में ही उड़ा देने की नहीं है, अपितु इस पर ठन्डे दिमाग से बैठ कर मंथन करने की आवश्यकता है। क्यूँकि दुनिया का इतिहास इस बात का गवाह है कि दुनिया के नक़्शे में पहले जितने भी हिन्दू धर्म पर चलने वाले देश थे, भारत और नेपाल जैसे इक्का दुक्का देश के अलावा उन सभी का अस्तित्व आज खतम हो चूका है और वो सभी न सिर्फ आज कट्टर इस्लामिक में गिने जाते हैं, बल्कि जो देश हिन्दू जनसँख्या की बहुलता से हिन्दू देशो की श्रेणी में गिने जाते थे, आज वहाँ हिन्दू ढूंढने से भी नहीं मिलते, क्यूँकि वहां न सिर्फ हिन्दू सभ्यता और संस्कृति के प्रतीकों ही नष्ट किया गया, बल्कि वहाँ के मूल निवासी हिन्दुओं का अस्तित्व भी समाप्त कर दिया गया है। जो कुछ थोड़े बहुत अपनी जान बचाने में कामयाब भी हुए, उन्हें अपने अस्तित्व को बचाने के लिए अपने ही देश से अपनी समस्त चल-अचल संपत्ति को त्याग कर पलायन करना और संसार के विभिन्न हिस्सों में जा कर बसना पड़ा है। 
                  कांग्रेस और उसके सहयोगियों की कुनीतियों, मुस्लिम चाटुकारिता और दुर्व्यवस्था के कारण न सिर्फ मुस्लिम समाज के अपराधी प्रवृति के लोगों के हौसले बुलंद होते जा रहे हैं, जिसका सीधा असर हमारे हिन्दू समाज और उस की बहु-बेटियों की सामाजिक सुरक्षा पर पड़ रहा है। आये दिन देश में बढ़ते जा रहे सामूहिक बलात्कार के किस्से और थोड़े थोड़े अंतराल पर देश के विभिन्न भागों में होते दंगे इसके ज्वलंत उद्दाहरण हैं।


                                         महत्वपूर्ण सन्देश 

              भारत का एक जल्द से जल्द एक हिन्दू राष्ट्र बनना जरुरी क्यों?
क्या कीजियेगा, जब आज से 20-30 साल बाद भारत भी एक इस्लामिक देश बन जायेगा? आप अपनी जान देंगे, विदेश चले जायेंगे या कि अपने बच्चों सहित मुस्लिम बन जायेंगे? क्या आप नहीं जानते कि आज़ादी के बाद से आज तक भारत के छह करोड़ से भी अधिक हिन्दुओं को जोर-जबरदस्ती से या लालच देकर मुस्लिम अथवा क्रिश्चियन बनाया जा चूका है? लेकिन तब भी सुरक्षा की क्या गारंटी है, क्यूँकि जो सुन्नी मुस्लिम लोग आज अपने ही शिया समुदाय को ठिकाने लगाने पर तुले हुए हैं, जबकि शिया समुदाय तो उन्हीं के इस्लाम का सदियों पुराना हिस्सा है, फिर क्या भरोसा कि कल को वो धर्म परिवर्तन से अपनी जान बचाने वालों को भी जिन्दा छोड़ेंगे या नहीं? 
क्या आप नहीं जानते कि हिन्दू बहुल भारत होते हुए भी झारखण्ड के पहले से नक्सली पीड़ित रहे ख़ास भाग में आतंकवादियों द्वारा वहाँ रहने वाले हिन्दुओं को इलाका खाली करने या जान माल से हाथ धोने की धमकी भरे सन्देश भेजे जा चुके हैं, जिसकी चर्चा न्यूज़ चैनल की भी सुर्खियां बनी?
क्या कश्मीर को २५ साल पहले ही हिन्दुओं से खाली नहीं कराया जा चूका है? क्या आप नहीं जानते कि आज अरुणाचल और आसाम आदि राज्यों के कुछ मुस्लिम बहुल खास इलाकों में से भी लाखों की संख्या में हिन्दुओं का पलायन जारी है? 
क्या आप पश्चिम बंगाल, केरल, अरुणाचल और आसाम के कुछ मुस्लिम बहुल खास इलाकों में रहने वाले हिन्दुओं की सैंकड़ों-हज़ारों की संख्या में आगजनी आदि से हुई जान माल की क्षति की अनगिनत बार की घटनाओं से वाकिफ नहीं, जिसके कारण आज केरल में हिन्दू नाममात्र ही बचे हैं?
क्या आप नहीं जानते कि भारत के बहुसंख्यक हिन्दू समुदाय को अल्प संख्या में लाने और बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठियों द्वारा यहाँ भारत में मुस्लिम जनसँख्या को बढ़ाने की एक सोची समझी साज़िश चल रही है, जिसके तहत बांग्लादेश बनने अर्थात 1971 से अब तक इसी साज़िश को अंजाम देने के लिए बांग्लादेश से सात करोड़ से भी अधिक मुसलमानों को अनाधिकृत रूप से भारत में प्रवेश कराया जा चूका है, जिसका साथ लालू,मुलायम और मायावती और ममता बैनर्जी के अलावा सम्पूर्ण कांग्रेस के नेता भी बखूबी दे रहें हैं। इसीलिए ये सभी अक्सर ही उन बांग्लादेशी घुसपैठियों को वापस बांग्लादेश भेजने के प्रश्न पर भड़क जाते हैं, क्यूँकि उनमें से अधिकांश को तो अपना वोट बैंक बढ़ाने की खातिर ये लोग पहले ही भारत की नागरिकता दे भी चुके हैं। यदि बांग्लादेशी घुसपैठियों की वापसी पर सख्ती से अमल होता है, तो इन सबकी ये साज़िश भी सामने आ जाएगी।
क्या आप नहीं जानते कि बांग्लादेश में वहाँ रहने वाले बंगाली हिन्दुओं पर कैसे कैसे कहर ढाये जा रहे हैं, जिसके कारण वो लोग भी वहाँ से पलायन करने पर मज़बूर हैं?
क्या आप नहीं जानते कि पाकिस्तान में अपनी चल-अचल धन-संपत्ति छोड़कर अपनी जान बचाने की खातिर वहाँ के हिन्दुओं को लाखों की संख्या में भारत के राजस्थान आदि में शरण लेनी पड़ी है, जो किसी भी कीमत पर वापस पाकिस्तान जाने को तैयार नहीं? उन लाखों हिन्दुओं को तो यहाँ के मूल निवासी होने पर भी आज तक भारत की नागरिकता नहीं दी गई है, जबकि इन लालू, मुलायम मायावती और ममता बैनर्जी आदि के शासनकाल में और कांग्रेस शासित प्रदेशों में कांग्रेस के इशारे पर करोड़ों की संख्या में बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठियों को यहाँ की नागरिकता दे दी गई है, आखिर क्यों?  
         आप चाहे लड़कें हों या लड़की हों, आदमी हों या औरत हों, जवान हों या बूढ़े हों, अमीर हों या गरीब हों, नेता हों या अभिनेता हों, कर्मचारी हों या व्यापारी हों, जज हों या वकील हों, भले ही हम लोग कितने भी पढ़े लिखे हों या बिलकुल अनपढ़ हों लेकिन यदि हम हिन्दू हैं तो क्या यह हमारा फ़र्ज़ नहीं बनता कि हम अपने अपने लेवल पर हम में से हर एक का यह कर्तव्य बनता है कि अपने से मिलने जुलने वाले हर एक व्यक्ति से संसार के सभी 56 हिन्दू देशों के इस्लामिक देश बनने और वहां के मुस्लिम्स के  द्वारा वहां उन देशों में रहने वाले हिन्दुओं के ऊपर किये जा रहे जुल्मों-सितम व् अत्याचारों के बारे में अवश्य बातचीत अवश्य ही करें, क्यूँकि यह न केवल आपके और आपकी बल्कि उन सभी की आने वाली पीढ़ियों की भी जिंदगी का प्रश्न है,   जिनसे आप इस बारे में बातचीत करेंगे। कभी यहाँ की भोली भाली जवान व् खूबसूरत लड़कियों की मासूमियत और नासमझी/अनभिज्ञता का लाभ उठाकर उन्हें लव-जेहाद जैसे हथकंडों में फंसाया जाता है, जिसमें कभी कभी तो अपने आपको जरुरत से ज्यादा मॉडर्न व् समझदार समझने वाली पढ़ी-लिखी मगर हकीकत में निहायत ही बेवकूफ किस्म की लड़कियां भी फंस जाती हैं, जिनका परिणाम अक्सर ही समाचार-पत्रों में चर्चा का विषय बन जाया करता है तो कभी कभी उनकी यह आधुनिकता भरी समझ उन्हें आत्महत्या की कगार तक भी पहुँचा देती है। कभी इन लोगों के द्वारा कभी यहाँ हिन्दुओं के गरीब व् अनपढ़ तबके खासकर पिछड़ी जाति के लोगों को ऊँची जाति के लोगों के खिलाफ भड़काया जाता है। मुसीबत तो यह है कि इन तथाकथित पिछड़ी जातियों के पढ़े-लिखे लोग भी बिना कुछ सोचे समझे ही इन लोगो की हाँ में हाँ मिला देते हैं, जिसका परिणाम यह होता है कि उस समय वहाँ मौजूद अन्य गरीब व् अनपढ़ लोग उनकी बात को सही समझकर खुद अपने ही हिन्दू धर्म की जड़ें खोदने का काम शुरू कर देते हैं। कभी सोचा है कि ऐसा सिर्फ हिन्दू धर्म के लोगों के साथ ही क्यों किया जाता है?
  क्या आपको पता है कि समस्त संसार के अधिकांश देश या तो क्रिश्चियन हैं या इस्लामिक अथवा मुस्लिम देश। जबकि बहुसंख्यक हिन्दुओं का इकलौता देश यह भारत ही है या नाममात्र का छोटा सा गरीब देश नेपाल। इस्लाम व् क्रिश्चयन दोनों ही धर्म किसी भी प्रकार से समस्त संसार के ताकतवर देशो पर अपनी हुकूमत चाहते हैं, ताकि संसार के बाकी कमज़ोर देशों को अपनी आधीन कर सकें या इच्छानुसार चला सकें। और यही इच्छा इन दोनों धर्मों की भारत के बारे में भी है। इनका केवल एक ही मकसद है कि किसी भी प्रकार से किसी भी प्रकार से यहाँ के बहुसंख्यक हिन्दू आपस में लड़ें, कमज़ोर हों और उनका हिन्दू धर्म से मोह भंग हो सके और वो यहाँ के बहुसंख्यक हिन्दुओं को अल्प संख्यक बना सकें, ताकि अपनी सुविधानुसार जब जी चाहे इसे एक क्रिश्चियन या इस्लामिक देश में परिवर्तित किया जा सके। क्रिश्चियन देशों में और मुस्लिम देशों में सबसे बड़ा अंतर यही है कि क्रिश्चियन धर्म वाले देश अन्य गरीब देशों के लोगों को अपरोक्ष रूप से लूट-लूट कर अमीर बनना चाहते हैं, तो मुस्लिम धर्मानुयायी अपराध के रस्ते दूसरे धर्मानुयायियों की धन-संपत्ति आदि को हड़प कर के अमीर बनना चाहते हैं, जिसका सबसे बड़ा उद्दाहरण बांग्लादेश और पाकिस्तान सहित सभी मुस्लिम देशों में गैर-मुस्लिम लोगों खासकर हिन्दुओं को मार-पीट कर, उन्हें मारकर अथवा वहां से खदेड़ कर उनकी संपत्ति पर कब्ज़ा किया जाना है। भारत के कश्मीर से हिन्दू 25 साल पहले ही भगा दिए गए, जो आज तक देश के विभिन्न भागों में खानाबदोशों की जिंदगी बसर कर रहे हैं। केरल, आंध्र आदि में तो ओवैसी भाइयों की दादागिरी जगजाहिर है ही, इसके अलावा पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश व् महाराष्ट्र आदि राज्यों के बहुत बड़े भागों को आजकल वहाँ रहने वाले हिन्दुओं ने ही मिनी पाकिस्तान का नाम भी दे दिया है, क्यूँकि वहां केवल मुस्लिम्स की ही हुकूमत चलती है। कश्मीर पहले ही खाली करवा चुके हैं, झारखण्ड के बहुत बड़े भाग में तो ISIS के आतंकवादियों द्वारा हिन्दुओं को घर छोड़कर चले जाने की धमकी के पर्चे भी समाचारों में आ ही चुके हैं और अरुणाचल एवं आसाम आदि में से भी कश्मीर की तर्ज पर हिन्दुओं का पलायन लगातार जारी है। जबकि अमीर गरीब या ऊँच-नीच की ये जातिगत विसंगतियाँ किस धर्म में नहीं हैं? क्या क्रिश्चियन व् इस्लाम में नहीं हैं? क्या क्रिश्चियन धर्म में रोमन कैथोलिक व् प्रूटेस्टेंट नहीं होते? क्या उनमें आपस में शादियाँ आसानी से हो जाती हैं, फिर यह तोहमत केवल हिन्दू धर्म पर ही क्यों लगायी जाती है? क्या इस्लाम में शिया-सुन्नी नहीं होते, जिनमें संसार के सभी कोनों में अक्सर ही मुठभेड़ भी होती रहती हैं? क्या उनमें विभिन्न जातियां नहीं होती? और तो और जो लोग धर्म परिवर्तन करके मुसलमान बन भी जाते हैं, उन्हें भी इस्लाम को शुरू में ही अपनाने वाले लोग भी दोयम दर्जे का मुसलमान यांनी मुहाजिर कहते हैं। मुस्लिम वर्ग के लोग  दिल्ली तो इन मुठभेड़ों का खास गवाह रहा है, जब कुछ साल पहले तक भी मुहर्रम के अवसर पर इस्लाम के इन दोनों वर्गों के लोग ताजिये निकलते वक्त अक्सर ही भिड़ जाया करते थे। अब यह फैसला आपको करना है कि आप मुसलमान बनना चाहते हैं या क्रिश्चियन, क्यूँकि आपको जिन्दा रहने के लिए या तो आपको किसी क्रिश्चियन देश में जा कर बसना होगा या आपको इन दोनों में से एक को तो अवश्य ही चुनना होगा। वर्ना आने वाले 30 साल के बाद तो आपकी भावी पीढ़ी का अंत तय है। इसलिए अभी से सोच लीजिये कि आपको भविष्य में हिन्दू बनना है या क्रिश्चियन। मुसलमान आपको मार-मार कर मुस्लिम बनाएंगे और क्रिश्चियन लालच देकर। लेकिन फायदा क्रिश्चियन बनने में है, क्यूँकि क्रिश्चियन देश लूटते भले ही हों, लेकिन वो किसी को जान से नहीं मारते। वो बात अलग है कि वो आपको लालच देकर क्रिश्चियन बनाने की कोशिश करेंगे। बन गए तो ठीक वर्ना मुसलमान आपको मुसलमान बना देंगे या मार देंगे। लेकिन भारत में रह कर हिन्दू आप किसी भी हालत में नहीं रहेंगे, क्यूंकि तब तक तो यह एक इस्लामिक देश बन चुका होगा। जिसका सबसे बड़ा सबूत संसार के सभी हिन्दू 56 देशों का पहले ही इस्लामिक देशों में तब्दील होना है और पिछले साल 15 अगस्त को भारत को एक इस्लामिक देश बनाने की मांग केरल में उठ भी चुकी है, जिसके फोटोज आप मेरी पुरानी पोस्ट्स में भी देख सकते हैं। इस सबसे बचने का केवल एक ही मार्ग है कि हम सभी आज से ही ये प्रण करें कि ये हालात काबू में आने और इस देश को हिन्दू राष्ट्र घोषित होने तक आज के बाद भारत के किसी भी हिस्से में होने वाले सभी प्रकार के स्थानीय निकायों, वहाँ की विधान सभाओं और केंद्र सरकार के लिए लोकसभा के सभी चुनावों में केवल अपने देशभक्त हिन्दू नेताओं और अपने हिन्दू संगठनों जैसे - भाजपा, शिव-सेना, विश्व हिन्दू परिषद, आरएसएस, बजरंगदल आदि के नेताओं को ही अपना वोट देकर चुनेंगे। ताकि हमारे इन हिन्दू संगठनो के हाथ मज़बूत हों और इनके ज़रिये हम इस देश को वो विषम एवं दुखदायी परिस्थितियां आने से पहले ही जल्दी से जल्दी भारत को एक हिन्दू राष्ट्र घोषित करवा सकें। इससे पहले कि मुस्लिम मैजोरिटी में आकर यहाँ उत्पात मचाएं और इस देश को एक इस्लामिक देश बना पाएं, उससे पहले ही आप को अपने सभी जानकारों को यह मैसेज और सन्देश देकर समस्त भारत में भाजपा की सरकार बनाकर इस देश को भाजपा के ज़रिये एक हिन्दू राष्ट्र में ही बदल दिया जाएँ, क्यूँकि इस बात को तो सभी जानते हैं कि भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने का सपना केवल भाजपा, आरएसएस और अन्य हिन्दू संगठन ही देखते हैं। आप यह भी सोच सकते हैं कि कहीं मैं कोई भाजपा समर्थक तो नहीं? हकीकत तो यही है कि मैं कोई भाजपा समर्थक नहीं हूँ, लेकिन अगर होता भी उससे क्या फर्क पड़ जाता? अगर मैं मुस्लिम संगठनो को भी समर्थन करूँ, तो उससे भविष्य में हिन्दुओं और हिंदुस्तान पर आने वाला यह संकट क्या टल जायेगा? हम आपको कोई आतंकवादी बनने के लिए तो नहीं कह रहे न? बल्कि हम तो आपको केवल इस बात का एहसास कराना चाहते हैं कि इस तथाकथित थोथी धर्मनिरपेक्षता की नीति में क्या रखा है। जबकि प्रथम तो धर्मनिरपेक्षता का अर्थ ही सभी सभी धर्मों को एक समान अधिकार एवं एक समान न्याय देना ही होता है, लेकिन क्या भारत में कभी वास्तव में ऐसा होता भी है? नहीं, उसके दो ही कारण हैँ - पहला कारण कि मुस्लिम खुद ही इसे कभी नहीं मानते और दूसरा कारण यह कि अपने आपको धर्मनिरपेक्ष कहने वाले कांग्रेस और उसके सभी सहयोगी दलों के मुस्लिमपरस्त नेताओं ने इस धर्मनिरपेक्षता की नीति को केवल मुस्लिम तुष्टिकरण और हिन्दुओं के अपमान का ही जरिया बनाकर छोड़ दिया है। फिर क्या दिया है हमें इस धर्मनिरपेक्षता की नीति ने हमें? केवल हम हिन्दुओं को अपने हिन्दू भाइयों से उन थोथे सिद्धांतों के लिए लड़कर अपने ही हिन्दू धर्म और अपने ही देश की जड़ें खोदना ही सिखाया है, वरना न तो यह देश कभी किसी का ग़ुलाम बनता और न ही ये विषम परिस्थितियां कभी हमारे व् हमारे बच्चों के सामने आती? हम आपसे कोई यह तो कह नहीं रहे कि आइये ! हम और आप सभी हिन्दू एकजुट होकर मुसलमानों का कत्लेआम करेंगे? हमारे हिन्दू धर्म और हमारे घर-परिवारों में यह नीचता या बर्बरता तो कभी भी सिखाई नहीं जाती।  लेकिन कम से कम मौजूदा हालात में हम सभी एकजुट होकर ऊपर बताये हुए इस उपाय पर अमल करके इसके ज़रिये अपने देश में आने वाले संकट से तो निपट सकते हैं ना? और हाँ एक बात यह भी याद रखियेगा कि अकेले मोदी जी भी इस विषय में कुछ खास नहीं कर पाएंगे, जब तक कि आप उन जैसे ही कुछ कट्टर देशभक्त और कट्टर हिन्दू नेताओं को उनका इस मुहीम में साथ देने के लिए नहीं चुनते। क्यूँकि हो सकता है कि भारत को एक हिन्दू देश बनाने की घोषणा होते ही मुसलमान सारे भारत में एक बार जोर-शोर से दंगा फैलाने की कोशिश करें? जिसको काबू करने के लिए सारे भारत में सशक्त भाजपा और कट्टर पंथी हिन्दू नेताओं के हाथ में वहां की सत्ता अवश्य होनी चाहिए, खासकर उन प्रदेशों में, जिनमें वहाँ के लोग बड़े भाग को मिनी पाकिस्तान का नाम पहले ही दे चुके हैं, ताकि किसी भी समुदाय के जान-माल की ज्यादा हानि न हो सके। अपने मुस्लिम मित्रों को भी आप यह कहकर भारत को एक हिन्दू राष्ट्र बनाने की इस मुहीम में भाजपा का साथ देने के लिए संतुष्ट कर सकते हैं कि हमारा इतिहास भी इस बात का गवाह है कि प्राचीन काल से आज तक कभी किसी भी हिन्दू राजा ने गैर हिन्दुओं पर अत्याचार नहीं किये, वरना यहाँ कभी कोई दूसरा धर्म पनप ही नहीं पाता, जबकि बाबर, महमूद गजनवी, चंगेज़ खान, तैमूरलंग, मुहम्मद गौरी और औरंगज़ेब समेत न जाने कितने ही मुस्लिम बादशाहों के द्वारा हिन्दू मंदिरों को तोड़ने, उन्हें लूटने और यहाँ की हिन्दू प्रजा पर जुल्मो-सितम के किस्से तो इतिहास में भरे पड़े हैं। उन्हें इस बात का भरोसा दिलाइये कि हिन्दू राष्ट्र बनने के बाद भी उनके साथ किसी किस्म का कोई भेदभाव नहीं किया जायेगा। अगर मेरी बात आपको ठीक से समझ में आ पायी हो, तो आप इसे आगे भी शेयर कर सकते हैं। आप मेरी किसी भी पोस्ट के व्यूज को देखकर सुनिश्चित कर सकते हैं, कि मेरी हर पोस्ट को हज़ारों लोग अवश्य ही देखते हैं। इसलिए अपने इस मैसेज को इस पोस्ट के ज़रिये हज़ारों लोगों को भेज कर अपने हिस्से का अपना काम मैं तो कर चुका हूँ। आगे का काम आपका है कि आप यह मैसेज अपने आगे के हज़ारों लोगों को कैसे भेज पाते हैं अथवा उन्हें भी यह हकीकत कैसे समझा पाते हैं? चाहें तो इसके लिए आप इस मैसेज के हज़ारों प्रिंट छपवाकर यह काम आसानी से कर सकते हैं। लेकिन सावधान ! कांग्रेस व् अन्य राजनीतिक पार्टियों से जुड़े हुए लोगों और कट्टर मुसलमानों से बचकर, क्यूँकि इससे उनकी इस देश को मुस्लिम देश बनाने की साज़िश नाकाम जो हो सकती है, तो ज़ाहिर है कि मेरी तरह आप भी उनकी नज़रों में खटक सकते हैं। क्या आप नहीं जानते कि भारत में भाजपा व् अन्य हिन्दू संगठनो के नेताओं को छोड़कर अन्य सभी नेता, मीडिया, अन्य वर्गों/धर्मों के लोग व् मुस्लिम समुदाय सहित समाज के सभी ताकतवर तबके न केवल कदम कदम पर हिन्दू धर्म के बारे में तरह तरह की उल-जुलूल बातें फैलाने की ही भरसक कोशिश करते हैं, बल्कि अक्सर यह भी देखने में आता है कि ये सभी लोग व् नेता जब कभी उन्हें हिन्दुओं को किसी भी बात पर नीचा दिखाने और अपमान करने का मौका मिलता है, तो उसमें अपनी तरफ से कोई कसर भी बाकी नहीं छोड़ते? इसका भी एक कारण है कि इनमें से अधिकाँश नेता व् मीडिया कर्मी या तो मुसलमान बन ही चुके हैं या बनने को तैयार बैठे हैं, जिसका खुलासा हम पहले की कई पोस्ट्स में भी कर चुके हैं। लेकिन फैसला तुरंत अवश्य करें, वरना देर होने पर तो पछताने का भी कोई फायदा नहीं होगा। 
                       - उमा शंकर पराशर       

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