भारतीय संस्कृति में आस्था रखने वाले मनुष्य, नित्य नियमित गायत्री की उपासना करते हैं। गायत्री मंत्र ऋग्वेद के छंद 'तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्' 3.62.10 और यजुर्वेद के मंत्र ॐ भूर्भुवः स्वः से मिलकर बना है .
ऋग्वेद के इस मंत्र में सविता-सूर्य-प्रकाश-ज्ञान की उपासना है इसलिए इसे सावित्री भी कहा जाता है।


अन्ततः ‘हम सभी एक हैं’ क्योंकि समस्त प्राणी मात्र ही खासकर मानव-शरीर, चाहे जितने भी हों, उसमें एक ही ‘हम’ वास करता है, इसीलिए ‘हम सभी एक हैं’ दूसरा कोई नहीं’। मानव हमारी जाति है। परमप्रभु हमारा पिता और उन्ही की संकल्परूपा आदि-शक्ति हमारी माता है। समस्त नर-नारी भाई-बहिन हैं। सम्पूर्ण धरती ही हमारा खेत है। सम्पूर्ण धरती की सम्पत्ति ही हमारी सम्पत्ति है। उसकी उचित रक्षा व्यवस्था हमारा कर्त्तव्य है। सत्य, न्याय एवं सद् भाव प्रेम ही हमारा जीवन है और सत्य, न्याय के साथ परमप्रभु की शरण में पूर्ण समर्पण भाव से ही कायम रहना हमारी पारिवारिकता की विधि-व्यवस्था है।

भारत का समाज अत्यंत प्रारम्भिक काल से ही अपने अपने स्थान भेद, वातावरण भेद, आशा भेद वस्त्र भेद, भोजन भेद आदि विभिन्न कारणों से बहुलवादी रहा है। यह तो लगभग वैदिक काल में भी ऐसा ही रहा है अथर्व वेद के 12वें मण्डल के प्रथम अध्याय में इस पर बड़ी विस्तृत चर्चा हुई है एक प्रश्न के उत्तर में ऋषि यह घोषणा करते हैं कि जनं विभ्रति बहुधा, विवाचसम्, नाना धर्माणंम् पृथ्वी यथौकसम्।सहस्र धारा द्रवीणस्यमेदूहाम, ध्रिवेन धेनुंरनप्रस्फरत्नी।।
अर्थात विभिन्न भाषा, धर्म, मत आदि जनों को परिवार के समान धारण करने वली यह हमारी मातृभूमि कामधेनु के समान धन की हजारों धारायें हमें प्रदान करें।विभिन्नता का यह स्तर इतना गहरा रहा  कि केवल मनुष्य ही नहीं अपितु प्रकृति में इसके प्रवाह में चलती रही तभी तो हमारे यहां यह लोक मान्यता बन गयी कि कोष-कोष पर बदले पानी चार कोष पर वाणी।यहां वाणी दो अर्थों में प्रयोग होता है। वाणी एक बोली के अर्थ में और पहनावे के अर्थ पानी भी दो अर्थी प्रयोग एक सामाजिक प्रतिष्ठा के अर्थ में दूसरा जल के।इस विविधता में वैचारिक विविधता तो और भी महत्वपूर्ण है। संसार में पढ़ाये जाने वाले छः प्रकार के दर्षन का विकास भारत में ही हुआ कपिल, कणाद, जैमिनी, गौतम, प्रभाकर, वैशेषिक आदि अनेक प्रकार की परस्पर विरोधी विचार तरणियां (श्रृंखला) इसी पवित्र भूमि पर पली बढ़ी और फली फूली वैदिक मान्यताओं का अद्वैत जब कर्मकाण्डो के आडम्बर से घिर गया तो साक्य मूनि गौतम अपने बौद्ध दर्शन से समाज को एक नयी दिशा देने का प्रयास किया। उनके कुछ वर्षों बाद केरल एक विचारक और दार्शनिक जगत्गुरु शंकराचार्य ने अपने अद्वैत दर्शन के प्रबल वेग में बुद्धवाद को भी बहा दिया। और इतना ही नहीं वरन पूरे भारत में वैदिक मत की पुर्नप्रतिष्ठा कर दी। लेकिन जगत गुरु शंकर का यह अद्वैत की विभिन्न रूपों में खण्डित होता रहा। इस अद्वैत दर्शन को आचार्य रामानुज ने विशिष्ट अद्वैत के रूप में खण्डित कर दिया महावाचार्य ने द्वैत वाद के रूप में खण्डित कर दिया, वल्लभाचार्य ने द्वैत अद्वैत के रूप में खण्डित कर दिया तिम्वाकाचार्य ने द्वैतवाद के रूप में खण्डित कर दिया और अन्त में चैतन्य महाप्रभु ने अचिन्त्य भेदा भेद के रूप में खण्डित कर दिया। इस खण्डन-मण्डन और प्रतिष्ठापन की परम्परा को पूरा देश सम्मान के साथ स्वीकारता रहा। यहां तक कि हमने चार्वाक को भी दार्शनिको की श्रेणी में खड़ा कर लिया लेकिन वैदिकता के विरोध में कोई फतवा नहीं जारी किया गया। यहां तो संसार ने अभी-अभी देखा है कि शैटनिक वरसेज के साथ क्या हुआ बलासफेमी की लेखिका डाॅ. तहमीना दुरार्ती को देश छोड़ कर भागना पड़ा, तसलीमा नसरीन की पुस्तक लज्जा से उन लोगों को लज्जा भी नहीं आती और नसरीन के लिए उसकी मातृभूमि दूर हो गयी है। लेकिन भारत की विविधता हरदम आदरणीय रही है। इसी का परिणाम रहा है कि यहां 33 करोड़ देवी-देवता बने सच में इससे बड़ा लोकतांत्रिक अभियान और क्या हो सकता है हर स्थिति का इसके स्वभाव के अनुरूप उसे पूजा करने के लिए उसका एक आदर्श देवता तो होना ही चाहिए। यही तो लोकतंत्र है। लेकिन इस विविधता में भी चिरन्तन सत्य के प्रति समर्पण सबके चित्त में सदैव बना रहा। तभी तो भारत जैसे देश में जहां छः हजार से ज्यादा बोलियां बोली जाती हैं वहां गंगा, गीता, गायत्री, गाय और गोविन्द के प्रति श्रद्धा समान रूप से बनी हुई है। केरल में पैदा होने वाला नारियल जब तक वैष्णो देवी के चरण में चढ़ नहीं जाता है तब तक पूजा अधूरी मानी जाती है। आखिर काशी के गंगाजल से रामेश्वरम् महादेव का अभिषेक करने पर ही भगवान शिव प्रसन्न होते हैं। भारत के अन्तिम छोर कन्याकुमारी अन्तद्वीप में तपस्या कर रही भगवती तृप सुंदरी का लक्ष्य उत्त में कैलाश पर विराजमान भगवान चन्द्रमौलीस्वर तो ही है। भारत में जो भी आया, वह उसके भौगोलिक सौन्दर्य और भौतिक सम्पन्न्ता से तो अभिभूत हुआ ही, बौद्धिक दृष्टि से वह भारत का गुलाम होकर रह गया। वह भारत को क्या दे सकता था? भौतिक भारत को उसने लूटा लेकिन वैचारिक भारत के आगे उसने आत्म-समर्पण कर दिया। ह्वेन-सांग, फाह्यान, इब्न-बतूता, अल-बेरूनी, बर्नियर जैसे असंख्य प्रत्यक्षदर्शियों के विवरण इस सत्य को प्रमाणित करते हैं। जिस देश के हाथों में वेद हों, सांख्य और वैशेषिक दर्शन हो, उपनिषदें हों, त्रिपिटक हो, अर्थशास्त्र हो, अभिज्ञानशाकुंतलम् हो, रामायण और महाभारत हो, उसके आगे बाइबिल और कुरान, मेकबेथ और प्रिन्स, ओरिजिन आॅफ स्पेसीज या दास कैपिटल आदि की क्या बिसात है? दूसरे शब्दों में भारत की बौद्धिक क्षमता ने उसकी हस्ती को कायम रखा।
भारत के इस अखंड बौद्धिक आत्मविश्वास ने उसके जठरानल को अत्यंत प्रबल बना दिया। उसकी पाचन शक्ति इतनी प्रबल हो गई कि इस्लाम और ईसाइयत जैसे एकचालकानुवर्तित्ववाले मजहबों को भी भारत आकर उदारमना बनना पड़ा। भारत ने इन अभारतीय धाराओं को आत्मसात कर लिया और इन धाराओं का भी भारतीयकरण हो गया। मैं तो यहां तक कहता हूं कि इस्लाम और ईसाइयत भारत आकर उच्चतर इस्लाम और उच्चतर ईसाइयत में परिणत हो गए। धर्मध्वजाओं और धर्मग्रंथों पर आधारित इन मजहबों में कर्मफल और पुनर्जन्म का प्रावधान कहीं नहीं है लेकिन इनके भारतीय संस्करण इन बद्धमूल भारतीय धारणाओं से मुक्त नहीं हैं। भक्ति रस में डूबे भारतीयों के मुकाबले इन मजहबों के अभारतीय अनुयायी काफी फीके दिखाई पड़ते हैं। भारतीय मुसलमान और भारतीय ईसाई दुनिया के किसी भी मुसलमान और ईसाई से बेहतर क्यों दिखाई पड़ता है? इसीलिए कि वह पहले से उत्कृष्ट आध्यात्मिक और उन्नत सांस्कृतिक भूमि पर खड़ा है। यह धरोहर उसके लिए अयत्नसिद्ध है। उसे सेत-मेंत में मिली है। यही भारत का रिक्थ है।
सनातन संस्कृति के कारण इस पावन धरा पर एक अत्यंत दिव्य विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र निर्मित हुआ। प्राकृतिक पर्यावरण कठिन तप, ज्ञान, योग, ध्यान, सत्संग, यज्ञ, भजन, कीर्तन, कुम्भ तीर्थ, देवालय और विश्व मंगल के शुभ मानवीय कर्म एवं भावों से निर्मित इस दिव्य इलेक्ट्रो-मैगनेटिक फील्ड से अत्यंत प्रभावकारी विद्युत चुम्बकीय तरंगों का विकिरण जारी है, इसी से समग्र भू-मण्डल भारत की ओर आकर्षित होता रहा है और होता रहेगा। भारतीय संस्कृति की यही विकिरण ऊर्जा ही हमारी चिरंतन परम्परा की थाती है। भूगोल, इतिहास और राज्य व्यवस्थाओं की क्षुद्र संकीर्णताओं के इतर प्रत्येक मानव का अभ्युदय और निःश्रेयस ही भारत का अभीष्ट है। साम्राज्य भारत का साध्य नहीं वरन् साधन है।यहां तो सृष्टि का कण-कण अपनी पूर्णता और दिव्यता के साथ खिले, इसका सतत् प्रयत्न किया जाता है। विश्व सभ्यता और विचार-चिन्तन का इतिहास काफी पुराना है। लेकिन इस समूची पृथ्वी पर पहली बार भारत में ही मनुष्य की विराट रहस्यमयता पर जिज्ञासा का जन्म हुआ। सृष्टि अनन्त रहस्य वाली है ही। भारत ने दोनों चुनौतियों को निकट नजदीक से देखा। छोटा-सा मनुष्य विराट सम्भावनाआंे से युक्त है। विराट सृष्टि में अनंत सम्भावनाएं और अनंत रहस्य हैं। जितना भी जाना जाता है उससे भी ज्यादा बिना जाने रह जाता है। सो भारत के मनुष्य ने सम्पूर्ण मनुष्य के अध्ययन के लिए स्वयं (मैं) को प्रयोगशाला बनाया। भारत ने समूची सृष्टि को भी अध्ययन का विषय बनाया। यहां बुद्धि के विकास से ‘ज्ञान’ आया। हृदय के विकास से भक्ति। भक्त और ज्ञानी अन्ततः एक ही निष्कर्ष पर पहुंचे। भक्त अंत में ज्ञानी बना। भक्त को अन्ततः व्यक्ति और समष्टि का एकात्म मिला। द्वैत मिटा। अद्वैत का ज्ञान हो गया। ज्ञानी को अंत में बूंद और समुद्र के एक होने का साक्षात्कार हुआ। व्यक्ति और परमात्मा, व्यष्टि और समष्टि की एक एकात्मक प्रतीति मिली। ज्ञानी आखिरकार भक्त बना।

हजारों वर्षों से यह परम्परा रही है कि बद्रीधाम और काठमाण्डू के पशुपतिनाथ का प्रधान पुजारी केरल का होगा और रामेश्वरम् और श्रृंगेरीमठ का प्रधान पुजारी काशी का होगा यही तो विविधता में एकता का वह जीवन्त सूत्र है जो पूरे भारत को अपने में जोड़े हुए है। पाकिस्तान स्थित स्वातघाटी के हिंगलाज शक्तिपीठ के प्रति पूरे भारत में समान रूप आस्था और आदर है। तो समग्र हिमालय को पूरा भारत देवताओं की आत्मा कहता है इसी कारण हमारे ऋषियों ने पूरे भारत के पहाड़ों, नदियों और वनों को सम्मान में वेदों में गीत गाये। कैसे कोई भारतीय भूल सकता है उस सिन्धु नदी को जिसके तट पर वेदों की रचना हुई।विविधता और अनेकता भारतीय समाज की पहचान है। विविधता के कारण ही भारत देष में बहुरूपता के दर्षन होते हैं। लेकिन यही गुण भारतीय समाज को समृ़द्ध कर एक सूत्र में बांधने का कार्य करता है। हो भी क्यों न? क्योंकि हम उस सम्पन्न परपंरा के वाहक हैं जिसमें वसुधैव कुटुम्बकम की भावना निहित है।

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥७॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥८॥


अर्थात जब जब धर्म की हानि होने लगती है और अधर्म आगे बढ़ने लगता है, तब तब मैं स्वयं की सृष्टि करता हूं, अर्थात् जन्म लेता हूं । सज्जनों की रक्षा एवं दुष्टों के विनाश और धर्म की पुनःस्थापना के लिए मैं विभिन्न युगों (कालों) मैं अवतरित होता हूं ।

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥

हमारा मूल मंत्र यही है -- ” अयं बन्धुरयं नेति गणना लघुचेतसां | उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकं || ”

यदि हम और आप संकुचित दायरे से ऊपर उठकर सारी सृष्टि के कल्याण के बारे में सोचें, तो हमारा जीवन सफल हो सकता है। यही हमारे पूर्वजों का भी उद्घोष रहा है। सारा जगत अपना है।
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