"भगवा ध्वज के लिए जो भी संभव होगा, मैं करूँगा - बाबासाहब आंबेडकर"
पढ़कर चक्कर आ गए ना?? ऐसा ही होता है, जब कान के नीचे कोई सच्चाई का तमाचा लगाता है...
बाबासाहब आंबेडकर समग्र भाषण :- खण्ड छः. (पत्रिका - गरुड़, दिनाँक 13जुलाई 1947). घटना 10 जुलाई 1947 की है - संविधान सभा द्वारा नियुक्त की गई राष्ट्रध्वज समिति के एक सदस्य बाबासाहब आंबेडकर मुम्बई से दिल्ली जाने के लिए निकले थे. विमानतल पर उन्हें विदा करने हिन्दू महासभा और Schedule Caste Federation के प्रमुख कार्यकर्ता उपस्थित थे. इन लोगों में सीके बोले, एएस भिडे, अनंतराव चित्रे, सुरेन्द्रनाथ टीपनीस, वामनराव चव्हाण इत्यादि लोग मौजूद थे. विमानतल पर विशाल भगवा ध्वज फहराया गया. हिन्दू महासभा के श्री बोले ने आंबेडकर के हाथों में भगवा ध्वज थमाते हुए कहा कि आप राष्ट्रध्वज समिति के सदस्य हैं, यह भगवा ध्वज पूरे देश पर लहराना चाहिए.
आंबेडकर मजाक में बोले, "मेरे जैसे महार के बेटे को आगे करके, क्या आप लोग पीछे रह जाएँगे. आप भी मेरे साथ दिल्ली चलिए, वहाँ जोरदार प्रदर्शन कीजिए... भगवा ध्वज के लिए मेरे द्वारा जो भी संभव होगा मैं प्रयास करूँगा ही..". लेकिन दुर्भाग्यवश राष्ट्रध्वज समिति में अंततः नेहरू की ही चली और तिरंगा मान्य किया गया...
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कहने का तात्पर्य यह है कि अम्बेडकरवादी लोगों के दिलो-दिमाग को वामपंथ और मिशनरी ने "हाईजैक" कर लिया है, ये लोग कभी भी धारा 370 पर, विभाजन के समय मुस्लिमों के क्रूर व्यवहार पर, गाँधी की नीतियों पर तथा भगवा ध्वज पर बाबासाहेब आंबेडकर के विचार आपके सामने आने ही नहीं देंगे... क्योंकि इनकी राजनीति और रोटी घृणा पर चलती है.
लेकिन आप तो जीवंत हैं ना?? तो बात कीजिए, बात आगे बढाईये, अपने दलित भाईयों को सच बताईये...
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