मानव – जीवन में वैदिक-संस्कृति का महत्व
        आज हम जिस युग में साँस ले रहे हैं ; वह संघर्ष , स्वार्थ , छल , प्रतिस्पर्धा तथा किसी तरह अपने अस्तित्व को बचाये रखने का युग है | नैतिकता का निरन्तर ह्रास हो रहा है | साथ ही मानवीय संवेदनाओं और भावनाओं की भी कोई कीमत नहीं रह गयी है | हम सभी भौतिकता के कीचड़ में इस प्रकार से ओत-प्रोत हैं कि , आँख उठाकर देखने , सोचने और समझने का समय ही नहीं है | क्षणमात्र के लिए यदि हम इसका चिन्तन करें कि , यह क्या हो रहा है ? हम किस तरफ बढ़ रहे हैं ? क्या हमारे जीवन का यही लक्ष्य है ? और क्या हमारे जीवन की पूर्णता इसी में है ? 
        परन्तु हम काल के संघर्षप्रवाह में दूसरे ही क्षण लिप्त होकर भूल जाते हैं , और फिर उसी संघर्ष , आपाधापी तथा स्वार्थ - चक्र में घूमने के लिये विवश हो जाते हैं | 
        यह युग संक्रांति का काल है | जिसमें पुरानी सभ्यता के प्रति मोह तो है , पर नयी सभ्यता में लिप्त हैं | ईश्वर के अस्तित्व को मानते तो हैं , परन्तु अनास्था की साँस लेकर दुविधाग्रस्त भी हैं | पूर्वजों के प्रति सम्मान तो है , लेकिन नयी पीढ़ी के आगे किंकर्तव्यविमूढ़ भी हैं | हमारी प्राचीन ज्ञान-विज्ञानं के प्रति ललक तो है , परन्तु सही मार्गदर्शन के बिना हम हताश , निराश और उदास हैं | इस भागदौड भरी जिन्दगी में क्या हमने दो क्षण रूककर कभी सोचा है , या फिर विचार किया है कि , हम अपने पूर्वजों की सभ्यता और संस्कृति को सुरक्षित रखने के लिये क्या कर रहे हैं ? 
         हमारी इस शिथिलता और उदासीनता से हमारी आँखों के सामने , हमारी आने वाली पीढ़ी उच्छृंखल होती जा रही है | ईश्वर और धर्म का डटकर मखौल उड़ाया जा रहा है | अनुशासन और नियमों की मान्यता समाप्त सी हो गयी है | और हमारी विचारधारा – दर्शन , चिन्तन , मनन आदि के प्रति घृणा के स्तर तक पहुँच चुकी है | और हम हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं | इस सबका मूल कारण हमारा अधार्मिक व अमर्यादित होना है | क्योंकि आज स्वार्थ-सिद्धि ही सबका परम धर्म है | जबकि सत्य , सनातन केवल वैदिक-संस्कृति है | 
         जिसका हमारे देश में पिछले आठ सौ वर्षों से लगातार लोप हुआ जा रहा है | और उसकी जगह जो नये धर्म, संस्कृतियां व सभ्यतायें , पनपे वो सभी ; तीनों शान्तियों को देने मे पूर्णरूप से असमर्थ साबित हुये हैं क्योंकि सम्पूर्ण धर्म केवल वैदिक – संस्कृति है | जिसने इस धरा पर भारतवर्ष को काल गणना के अनुसार लगभग एक अरब, पिच्चानवे करोड, अठानवे लाख, पिचासी हजार, एक सौ सोलह वर्षों तक मार्गदर्शन दिया है | अर्थात वैदिक-संस्कृति ही सत्य, सनातन है | क्योंकि मनुष्य और उसकी सभ्यता के बारे में सबसे प्राचीन इतिहास भी इसी संस्कृति की देन है | जिसमें ऋषियों द्धारा मानव समाज को ब्यवस्थित तरीके से चलाने के लिये मर्यादित आचरण की ब्यवस्था दी गयी, जबकि आज के युग में मर्यादा का सर्वथा अभाव है | यही कारण है कि कालान्तर से आज तक वैदिक-संस्कृति ने अपने अस्तित्व को बनाये रखा है | जो आश्चर्यजनक परन्तु अटल सत्य भी है | 
                      भारतवर्ष मैं रहने वाली सर्वप्रथम जाति आर्य थी | और आर्यों की अपनी संस्कृति भी , वैदिक – संस्कृति ही थी | चूँकि ये संस्कृति आज भी उतनी ही सशक्त , सुब्यवस्थित , सुसंगठित और अनुशासित है , जितनी कि सृष्टि के उदय के समय | और यही प्रमुख कारण रहा है कि , वैदिक-संस्कृति को विश्व – पटल पर आज भी सम्मानित दृष्टि से देखा जाता है | परन्तु आज के भौतिकतावादी युग में , हम इस ब्यवस्था से विमुख होते जा रहे हैं | क्योंकि आज का जन-साधारण उन यम-नियमों का पालन करने में स्वयं बाधक बनता जा रहा है | यम-नियम क्या हैं ? संक्षेप में पांच यम हैं , और पांच ही नियम हैं | जैसे – यम :-  1.  सत्य , 2. अहिंसा , 3. अस्तेय , 4. ब्रह्मचर्य , 5. अपरिग्रह | इसी प्रकार नियम भी पांच हैं -  1. शौच , 2. संतोष , 3. स्वाध्याय , 4. ईश्वर-प्राणिधान , 5. तप |  

भारतीय वैदिक-संस्कृति आप सभी दोस्तों का हार्दिक स्वागत करती है और सभी को इस महान संस्कृति से जुड़ने के लिये आमंत्रित भी करती है ..............धन्यवाद  ||
Wait while more posts are being loaded