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आस्था है राम
भक्ति है राम
समस्त विजयो के मूल हैं राम
भारत की शान है राम
हमारे प्राण हैं राम
जय सिया राम
#मंदिर_बनाओ_श्रीराम_का
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हिन्दी वर्णमाला मे ५२ अक्षर होते है
अ से ज्ञ तक
देवनागरी लिपि में
जब हम इन्हें लिपि बद्ध करते हैं तभी हिंदी लिखना सीखते हैं ।
#हिंदी
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किस ने देखा राम हृदय की घनीभूत पीड़ा को।।
कह भी जो न सके किसी से उस गहरी पीड़ा को।।
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प्राचीन भारत के #महाविनाशकारी_अस्‍त्र_और_शस्‍त्

अक्‍सर हम अपने पौराणिक ग्रंथों के जरिए प्राचीन दुनिया के महाशक्‍तिशाली हथियारों के बारे में सुनते-पढ़ते रहे हैं। वेद, पुराण, रामायण, महाभारत का अध्‍ययन करने से पता चलता है कि प्राचीन भारत एक से बढ़कर एक शक्‍तिशाली और विनाशकारी हथियारों के निर्माण और उनके उपयोग की विधि से परिचित था। तो आइए जानते हैं प्राचीन भारत के उन महाशक्‍तिशाली और विनाशक अस्‍त्र-शस्‍त्रों के बारे में।

अस्‍त्र और शस्‍त्र में अंतर 

 अस्‍त्र और शस्‍त्र इन दोनों शब्‍दों का प्रयोग आज एक साथ किया जाता है। जबकि, हम में से अधिकांश लोग शायद यह नहीं जानते कि इन दोनों का अर्थ बिल्‍कुल अलग-अलग है। 


अस्‍त्र 

प्राचीन भारत में 'अस्त्र' शब्‍द का प्रयोग दरअसल उन हथियारों के लिए किया जाता था जिन्‍हें मन्त्रों के द्वारा दूर से फेंका जाता था। इन्‍हें अग्नि, वायु, विद्युत और यान्त्रिक उपायों से प्रक्षेप किया जाता था। 

शस्‍त्र 

वहीं 'शस्त्र' शब्‍द का प्रयोग ऐसे खतरनाक हथियारों के लिए किया जाता है जिनके प्रहार से चोट पहुंचती हो या मृत्‍यु तक हो सकती हो। 

वैदिक काल में अस्त्र-शस्त्र

वैदिक काल में अस्‍त्र-शस्‍त्र को दो वर्गों में बांटा गया था। (1) अमुक्ता, यानी वे शस्त्र जो फेंके नहीं जाते थे। (2) मुक्ता, यानी वे शस्त्र जिन्‍हें फेंक कर हमला किया जाता था। 

मुक्‍ता के भी चार प्रकार हैं। इनमें, पाणिमुक्ता, यानी हाथ से फेंके जानेवाले और यंत्रमुक्ता, यानी यंत्रों द्वारा फेंके जाने वाले हथियार शामिल हैं। इसके अलावा 'मुक्तामुक्त' यानी वह शस्त्र जो फेंककर या बिना फेंके दोनों प्रकार से प्रयोग किए जाते थे। जबकि, 'मुक्तसंनिवृत्ती' वे शस्त्र हैं जो फेंककर लौटाए जा सकते थे।

ये हैं महाविनाशकारी अस्‍त्र

महाविनाशकारी अस्‍त्रों में अधिकांश दैवीय थे। इन्‍हें मंत्र शक्‍ति के जरिए फेंककर हमला किया जाता था। हर विनाशकारी अस्‍त्रों पर अलग-अलग देवी-देवताओं का अधिकार होता है। इनके मंत्र भी अलग-अलग होते हैं। देवताओं द्वारा प्रदान किये गये इन अस्‍त्रों को दिव्‍य या मांत्रिक अस्‍त्र कहते हैं। आइए जानते हैं कौन-कौन से थे ये 

#आग्नेय : यह एक प्रकार का विस्फोटक अस्‍त्र था। पानी की फुहारों के समान ही यह अग्‍नि बरसाकर सबकुछ जलाकर भस्‍म कर देने में सक्षम था। इसके प्रतिकार के लिए पर्जन्‍य अस्‍त्र का प्रयोग किया जाता था।

#पर्जन्य :यह भी एक प्रकार का विस्फोटक अस्‍त्र था। जल के समान अग्नि बरसाकर सब कुछ भस्मीभूत कर देने की शक्‍ति इसमें भी मौजूद थी। इसके प्रतिकार के लिए पर्जन्‍य का ही प्रयोग किया जाता था।

#वायव्य :इस अस्‍त्र से भयंकर तूफान आते थे और चारो ओर अन्धकार छा जाता था।

#पन्नग :इससे सर्प पैदा होते थे। इसके प्रतिकार के लिए गरुड़ अस्‍त्र छोड़ा जाता था।

#गरुड़ : इस बाण के चलते गरुड़ उत्पन्न होते थे, जो सर्पों को खा जाते थे।

#ब्रह्मास्त्र : यह एक अचूक और अतिविकराल अस्त्र है। इसके बारे में कहा जाता है कि यह शत्रु का नाश करके ही समाप्‍त होता है। इसका प्रतिकार दूसरे ब्रह्मास्त्र से ही हो सकता है।

#पाशुपत : यह एक महाविनाशकारी अस्‍त्र है। इससे समस्‍त विश्व का नाश किया जा सकता है। बता दें कि महाभारतकाल में यह अस्‍त्र केवल कुंती पुत्र अर्जुन के पास ही था।

#नारायणास्त्र :यह भी पाशुपत के समान ही अत्‍यंत विकराल और महाविनाशकारी अस्त्र है। इस नारायण अस्त्र से बचाव के लिए कोई भी अस्‍त्र नहीं है। इस अस्‍त्र को एक बार छोड़ने के बाद समूचे विश्‍व में कोई भी शक्‍ति इसका मुकाबला नहीं कर सकती। मान्‍यता है कि इसका केवल एक ही प्रतिकार है और वह यह कि शत्रु अस्त्र छोड़कर नम्रतापूर्वक अपने को अर्पित कर दे। क्‍योंकि, शत्रु कहीं भी हो यह बाण वहां जाकर ही भेद करता है। इस बाण के सामने झुक जाने पर यह अपना प्रभाव नहीं करता। इन दैवीय अस्‍त्रों के अलावा '#ब्रह्मशिरा' और '#एकाग्नि' आदि विनाशकारी अस्‍त्र भी है।

इनके अलावा शक्‍ति, तोमर, पाश, ऋष्‍टि, वज्र, त्रिशूल, चक्र, शूल, असि, खड्ग, चंद्रहास, फरसा, मु
शल, धनुष, बाण, परिघ, भिन्‍दिपाल, परशु, कुंटा, पट्टी और भुशुण्‍डी भी प्राचीन दुनिया के बेहद शक्‍तिशाली हथियार थे। 
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Historical Rama

Rama is a Historical king of this land.

While Divinity is a matter of faith, historicity is a matter of existence.

Here, the dates of the various key events in Ramayana, including the birth of Rama are historically placed on the timeline using a scientific approach.

Discover the historicity of the legendary hero Rama and the events of Ramayana, along with one of the oldest surviving man-made structure of this world – The Nala Sethu. The continuous references to this bridge, through the ages, are delineated one after the other.

This book offers an inter-disciplinary, researched perspective to the historicity of Rama and other key events in the lifetime of Rama.
https://www.sattvastore.com/historical-rama-eng.html

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शर्म आती है ऐसे #पढ़े_लिखो पर।
एक सीट तक ना दे सके उसे जो सारा दिन इनके लिए #बार्डर पर #तैनात रहता है ।
ताकि ये चैन से सो सके...
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#परंपरा

ब्रह्मा ने वृहस्‍पति को व्‍याकरण पढ़ाया, वृहस्‍पति ने इन्‍द्र को, इन्‍द्र ने भारद्वाज को, भारद्वाज ने ऋषियों को, ऋषियों ने ब्राह्मणों क। वही यह अक्षर समाम्‍नाय है। 

विद्या का मूल लिपी है। वह लिपी आदि में ब्रह्मा ने दी इसलिए भारत की मूल लिपी का नाम #ब्राह्मी_लिपी है।


भारत के अंतों में सर्वत्र म्‍लेच्‍छ बस्तियां हैं। पूर्वान्‍त में किरात और पश्चिम में वयन है, ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्‍य मध्‍य अर्थात आयावर्त आदि में हैं। शुद्र भिन्‍न-भिन्‍न भागों में बिखरे हैं। मोहनजोदड़ो और सौराष्‍ट्र की सीमा स्‍थानों पर यवन और उनके साथी असुरों आदि की बस्तियां थी। कभी ये यवन आदि संस्‍कृत भाषी विशुद्ध आर्य थे। कालान्‍तर में ये म्‍लेच्‍छ हो गए। भारत वर्ष जम्‍बूद्वीप का एक भाग है। पहले जम्‍बूद्वीप पर ही नहीं प्रत्‍युत संपूर्ण द्वीपों के बसनीय खंडों पर आर्यों का निवास था। कालान्‍तर में भाषा में अस्‍पृश्‍यता आयी और म्‍लेच्‍छ लोग उत्‍पन्‍न हो गए। लोगों का स्‍थान संकुचित होता गया। पुन: भारत में भी उनका वास भाग संकुचित हुआ। भारत की सीमाओं पर म्‍लेच्‍छ लोग उत्‍पन्‍न हो गए। अंगिरा, कश्‍यप, वशिष्‍ठ और भृगु ये चार मूल गौत्र थे। अन्‍य गौत्र कर्म से उत्‍पन्‍न हुए। गौत्र परम्‍परा प्राचीन काल से चली आई है। तथागत बुद्ध भी अपना गौत्र जानते थे। गौत्र प्रवर्तक ऋषि भारत में रहा करते थे। उनकी सन्‍तति और उनके शिष्‍य, प्रशिष्‍य सतयुग से चले आ रहे थे। तभी से उनमें से अनेकों की मातृभूमि भारत थी।


समाज के प्रत्‍येक व्‍यक्ति के लिए यह आवश्‍यक है कि वह अपने गौत्र, वेद, उपवेद, शाखा, सूत्र, प्रवर, पाद, शिखा एवं देवता आदि की पूर्ण जानकारी रखे। हमारी 103 शाखायें हैं। #पारीक्ष_ब्राह्मणोत्‍पत्ति के अनुसार इनका सरल एवं सुबोध अर्थ निम्‍न प्रकार है - 

1. गौत्र -  "प्रारंभ में जो ऋषि जिस वंश को चलाता है, वह ऋषि उस वंश का गौत्र माना जाता है। 

2. वेद - "गौत्र प्रवर्तक ऋषि जिस वेद को चिन्‍तन, व्‍याख्‍यादि के अध्‍ययन एवं वंशानुगत निरन्‍तरता पढ़ने की आज्ञा अपने वंशजों को देता है, उस वंश का वही वेद माना जाता है।


3. उपवेद - "वेदों की सहायता के लिए कलाकौशल का प्रचार कर संसार की सामाजिक उन्‍नति का मार्ग बतलाने वाले शास्‍त्र का नाम उपवेद है।


4. शाखा - "प्रत्‍येक वेद में कई शाखायें होती हैं। जैसे ऋग्‍वेद की 21 शाखा, यजुर्वेद की 101 शाखा, सामवेद की 1000 शाखा, अथर्ववेद की 9 शाखा है। इस प्रकार चारों वेदों की 1131 शाखा होती है। प्रत्‍येक वेद की अथवा अपने ही वेद की समस्‍त शाखाओं को अल्‍पायु मानव नहीं पढ़ सकता, इसलिए महर्षियों ने 1 शाखा अवश्‍य पढ़ने का पूर्व में नियम बनाया था और अपने गौत्र में उत्‍पन्‍न होने वालों को आज्ञा दी कि वे अपने वेद की अमूक शाखा को अवश्‍य पढ़ा करें, इसलिए जिस गौत्र वालों को जिस शाखा के पढ़ने का आदेश दिया, उस गौत्र की वही शाखा हो गई। जैसे पराशर गौत्र का शुक्‍ल यजुर्वेद है और यजुर्वेद की 101 शाखा है। वेद की इन सब शाखाओं को कोई भी व्‍यक्ति नहीं पढ़ सकता, इसलिए उसकी एक शाखा (माध्‍यन्दिनी) को प्रत्‍येक व्‍यक्ति 1-2 साल में पढ़ कर अपने धर्म-कर्म में निपुण हो सकता है।


5. सूत्र  - "वेदानुकूल स्‍मृतियों में ब्राह्मणों के जिन षोडश (16) संस्‍कारों का वर्णन किया है, उन षोडश संस्‍कारों की विधि बतलाने वाले ग्रन्‍थ ऋषियों ने सूत्र रूप में लिखे हैं और वे ग्रन्‍थ भिन्‍न-भिन्‍न गौत्रों के लिए निर्धारित वेदों के भिन्‍न-भिन्‍न सूत्र ग्रन्‍थ हैं।


6. प्रवर - "वैदिक कर्म-यज्ञ-विवाहादिक में पिता, पितामह, प्रपितामहादि का नाम लेकर संकल्‍प पढ़ा जाता है (यह रीति कर्म-काण्डियों में अब भी विद्यमान है) इन्‍हें ही प्रवर कहते हैं। इनकी जानकारी के बिना कोई भी ब्राह्मण धर्म-कार्य का अधिकारी नहीं हो सकता, अत: इनका जानना भी अति आवश्‍यक है। 

7. पाद - "वेद-स्‍मृतियों में कहे हुए धर्म-कर्म में पाद नवा कर बैठने की आज्ञा है। जिस गौत्र का जो पाद है, उसको उसी पाद को नवाकर बैठ कर वह कर्म करना चाहिये। 

8. शिखा -  "जिस समय बालक का मुण्‍डन संस्‍कार होता है, उस समय बालक के‍ शिखा रखने का नियम है। जिनकी दक्षिण शिखा है, उनको दक्षिण तरफ और जिनकी वाम शिखा है, उनको वाम की तरफ शिखा रखवानी चाहिये। 

9. देवता - "सृष्टि के आदि में ब्रह्माजी ने जिस देवता द्वारा ऋषियों को जिस वेद का उपदेश दिलवाया, उस वेद का वही देवता माना गया।

जैसे –

अग्निवायुरविभयस्‍तु त्रयं ब्रह्म सनातनम्। 

दुदोह यज्ञसिद्धयर्थमृम्‍यजु: सामलक्षणम्।। (मनु: 1/23)

अर्थ- अग्नि, वायु, सूर्य इन देवताओं से यज्ञ का प्रचार करने के लिए ऋक्, यजु:, साम इन तीन वेदों का प्रचार प्रजापति ने करवाया, इसिलये जिस वेद का जिस देवता ने प्रथम उपदेश दिया, उस वेद का वही देवता माना गया। इस प्रकार गौत्र, वेद, उपवेद, शाखा, सूत्र, प्रवर, शिखा, पाद और देवता इन 9 बातों को जानना प्रत्‍येक ब्राह्मण का धर्म है। इन्‍हीं 9 बातों के आधार पर महर्षियों ने नवगुणित यज्ञोपवीत का निर्माण किया गया था। यज्ञोपवीत (जनेऊ) 9 सूत्रों का होता है, जिसमें प्रत्‍येक सूत्र में इन्‍हीं देवताओं का आह्वान करके उसमें इनकी प्रतिष्‍ठा की जाती है।"
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