📢 सुना नहीं क्या तुमने जैनों 📢

रांची सरकार द्वारा जारी 'शाश्वत निर्वाण भूमि शिखर जी तीर्थ क्षेत्र पर मीट शॉप खोलने के आदेश' का निषेध करती एवं समस्त जैन समाज को आने वाले समय से आगाह करती मेरी नयी कविता.. थोड़ी भी प्रेरक लगे तो जन जन तक मूल रूप में पहुँचायें.. एवं एकजुटता की प्रेरणा दें..

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सुना नहीं क्या तुमने जैनों,
रांची सरकार ने क्या कहा
सम्मेद शिखरजी की मिट्टी का,
कण कण अब तुम्हे पुकार रहा
अब तो जागो, धर्म बचा लो,
वरना कल तुम कैसे समझाओगे
अपने ही बच्चों को तुम,
कहाँ तीरथ पर ले जाओगे
पहले गिरनार, और अब शिखर जी,
एक एक कर सब यूँ ही चला जायेगा
जैनों के प्रमाणिकता पर भी,
फिर कोई ऊँगली उठाएगा

पर्यटन और विकास हेतु क्या,
मीट शॉप खोलने की ही राह दिखी ??
20 तीर्थंकर की निर्वाण भूमि,
क्या यही पर इनको जगह मिली ?
अहिंसा का सिद्धांत हमारा,
कुछ इसको तो समझ लिया होता
समझा देते हम मर्म धर्म का,
हमको ही बुला लिया होता
'सुगम' सिद्धांतों से अगणित,
यह जैन धर्म हमारा है
बेतुक, विक्लांग आदेशों से,
तुमने हमको ललकारा है
महावीर के शासनकाल में,
यह दुष्कृत्य नहीं होगा
शाश्वत निर्वाण भूमि पर,
मूक पशुओं का वध नहीं होगा..

एक बनो, मजबूत बनो,
जैन धर्म सुरक्षक स्तम्भ बनो
धर्म की रक्षा हम करेंगे ,
आज सब मिल ये सौगंध लो
'सुगम' सहज इन श्वांसों को,
अब संवर्धन में लगाना है
परचम लहराये जैनों का,
ऐसी अलख जगाना है
शाश्वत रहें सिद्धांत हमारे,
शाश्वत तीर्थस्थान हमारे
संरक्षण में जान लगा दो ,
कहीं बच्चे न पछताएं हमारे..
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♦ DO NOT EDIT♦
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जय जिनेन्द्र,

णमो अरिहंताणं,
णमो सिद्धाणं,
णमो आयरियाणं,
णमो उवज्झायाणं,
णमो लोए सव्व साहूणं !
एसोपंचणमोक्कारो, सव्वपावप्पणासणो
मंगलाणं च सव्वेसिं, पढ़मं हवई मंगलं !!

- हम सबको पता है की णमोकार महामंत्र है, बस आज इस मंत्रराज से संबंधित कुछ बातों पे ध्यान देंगे.

# णमोकार महामंत्र, प्राकृत मे लिखा गया है.

# णमोकार महामंत्र के कोई बनानेवाले/लिखनेवाले/रचियेता नही हैं, यह अनादि-निधन मंत्र है.

# णमोकार महामंत्र को सबसे पहले आचार्यश्री भूतबली और पुष्पदंत जी महाराज ने अपने महान ग्रंथराज "षटखंडागाम" मे लिपीबद्ध किया.

# णमोकार महामंत्र को महामन्त्र इसलिए कहा गया है, क्यूंकी सामान्य मंत्र सांसारिक पदार्थों की सिद्धि मे सहायक होते हैं परंतु णमोकार महामंत्र जपने से ये तो प्राप्त होते ही हैं , साथ ही परमार्थ पद प्राप्त करने मे भी ये मंत्र सहायक है.

- आचार्य नेमीचंद सिद्धान्त्चक्रवर्ती जी महाराज ने अपने ग्रंथ द्रव्य संग्रह जी मे भी लिखा है की ,

पणतीस सोल छप्पय चउ दुगमेगम च जवह झापह !
परमेटिठवाचयाणं अणं च गुरुवयेसेण !!५१!!

माने
परमेष्ठी वाचक, 35, 16, 6, 5, 4, 2 और 1 अक्षर के मंत्र का जाप करो. ध्यान करो और अन्या मंत्रो को गुरु के उपदेश से जपो और ध्यान करो.

# णमोकार महामंत्र से 84 लाख मंत्रों की उत्पत्ति हुई है.

# णमोकार महामंत्र , के साथ ॐ लगाना अनिवार्य नही है, क्यूंकी ॐ एक-अक्षरी मंत्र अपने आप मे ही एक मंत्र है.

# णमोकार महामंत्र पढ़ने के लिए कोई मुहूर्त नही होता, इसे तो कहीं भी, कभी भी, मन मे बोल सकते हैं.

# णमोकार महामंत्र मे 5 पद है ... अर्थात पाँच परमेष्ठी को नमस्कार किया है.

# णमोकार महामंत्र मे किसी भी ऐलक, च्छुल्लक, आर्यिका, च्छुल्लिका आदि को नमस्कार नही किया गया है.

# णमोकार महामंत्र को 3 स्वासोछ्वास मे पढ़ना चाहिए.
पहले साँस लेते समय मे णमो अरिहंताणं , और साँस छोड़ते समय णमो सिद्धाणं !
दूसरी साँस मे णमो आयरियाणं और उसे छोड़ते हुए णमो उवज्झायाणं
तीसरी साँस लेते समय णमो लोए और छोड़ते हुए सव्व साहूणं बोलना चाहिए.

# णमोकार महामंत्र का किसी भी अवस्था मे अपमान नही करना, ये मंत्र केवलज्ञान स्वरूप है. अक्सर ऐसा होता है की किसी शास्त्र सभा के अंत मे जिनवाणी माता की स्तुति उपरांत 9 बार णमोकार महामंत्र बोलते हैं.
कई बार, कई लोगों क साथ ये होता है की वो 3-4 या 5 वी बार ही मंत्र बोल पाया ओर बाकी लोगों ने 9 पूरे कर लिए और जयकारा लगा दिया. ऐसी स्थिति मे वो लोग अपना मंत्र बीच मे ही छोड़ देते हैं, यह णमोकार महामंत्र का अपमान ही है.
आप 3 ही बार बोलें पर पूरी शुद्धता से.

# णमोकार महामंत्र को कुछ लोग नमोकार बोलते हैं और
णमो के स्थान पर नमो शब्द का उच्चारण करते हैं, यह सर्वथा ग़लत है.

# क्या णमोकार महामंत्र को इसी क्रम मे पढ़ना अनिवार्या है ?
नही, जिस प्रकार 1 लड्डू को किसी पे तरफ से खाने पर उसका स्वाद एक जैसा ही प्रतीत होता है, उसकी मिठास एक जैसी ही मालूम पड़ती है, ठीक उसी प्रकार इस महा मंत्र को किसी भी क्रम मे बोलने से भी उसका महत्व वही रहता है.

# णमोकार महामंत्र , को बोलना तो मान-वचन ओर काय तीनो योग एक साथ लेके, टीवी देखते हुए, खाते हुए, गाड़ी चलते हुए, इधर उधर देखते हुए इस महामंत्र को बोलना इसका अपमान ही है.

--- णमोकार महामंत्र की जय ---

आज हम पहले आरा के बारे में जानेगे।
१.अवसर्पिणी काल के पहले आरा का नाम क्या है?
१उत्तर:- सुषम-सुषमा
२. अवसर्पिणी काल का पहला आरा कैसा था?
२ उत्तर:- बड़ा ही रमणीय,सुरम्य था।
३. पहले आरे का भूमिभग कैसा था?
३उत्तर :- समतल,रमणीय एवं नाना प्रकार की
काली सफ़ेद आदि पंचरंगी तृणो एव मणियो से
उपशोभित था।
४. पहले आरे में वृक्ष कौनसे थे?
४ उत्तर:- उद्धाल ,कद्धाल , कृतमाल, नृतमाल, दन्तमाल नागमाल आदि
अनेक उत्तम जाती के वृक्ष थे । जो फलों से लदे रहते थे और
अतीव कांति से सुशोभित थे।
५.पहले आरे में जहाँ तहाँ कौनसे वृक्ष अधिक पाये जाते थे?
५.उत्तर:- दस प्रकार के कल्पवृक्ष जहाँ तहाँ समूह रूप में पाये जाते
थे।
६. पहले प्रकार के कल्पवृक्ष कौनसे है?
६.उत्तर:- मत्तांग कल्पवृक्ष।
७. मत्तांग नामक कल्पवृक्ष क्या देता है?
७.उत्तर मादक रस प्रदान करता,जिसको प्राप्त कर प्राणी तृप्त
हो जाते थे।
८. दूसरे प्रकार के कल्पवृक्ष कौनसे है?
८.उत्तर:- भृत्तांग कल्पवृक्ष।
९. भृत्तांग कल्पवृक्ष क्या देता है
९ उत्तर:- विविध प्रकार के भोजन-पात्र-बर्तन देने वाले होते है।
१०. तीसरे प्रकार के कल्पवृक्ष का क्या नाम है?
१० उत्तर:- त्रुटितांग।
११.त्रुटितांग कल्पवृक्ष क्या देता है?
११उत्तर:- नानाविध वाध देता है।
१२. चौथे प्रकार के कल्पवृक्ष का क्या नाम है?
१२.उत्तर:- दीपशिखा कल्पवृक्ष।
१३.दीपशिखा कल्पवृक्ष क्या देता है?
१३उत्तर :- दीपक जैसा प्रकाश करते है।
१४. पांचवे प्रकार के कल्पवृक्ष का क्या नाम है?
१४.उत्तर :-जोतिषिक कल्पवृक्ष।
१५. जोतिषिक कल्पवृक्ष कैसे होते है?
१५.उत्तर :- सूर्य, चंद्र जोतिषिक जैसा उधोत प्रकाश करने वाले होते है।
१६. छठे प्रकार के कल्पवृक्ष का क्या नाम है?
१६.उत्तर :- चित्रांग कल्पवृक्ष।
१७. चित्रांग कल्पवृक्ष क्या क्या देता है?
१७.उत्तर विविध प्रकार की मालाएं आदि देने वाले होते है।
१८. सातवें प्रकार के कल्पवृक्ष का क्या नाम है?
१८.उत्तर:- चित्र रास कल्पवृक्ष।
१९. चित्ररास कल्पवृक्ष क्या देते है?
१९ उत्तर:- विविध प्रकार के रास देने वाले षट् रास भोजन देने वाले होते
है।
२०. आठवे प्रकार के कल्पवृक्ष का क्या नाम है?
२०.उत्तर :- मण्यंग कल्पवृक्ष।
२१.मण्यंग कल्पवृक्ष क्या देते है?
२१.उत्तर:- विविध आभूषण प्रदान करते है।
२२. नवमें प्रकार के कल्पवृक्ष कौनसे है?
२२.उत्तर:- गेहकर कल्पवृक्ष।
२३.गेहकर कल्पवृक्ष क्या देते है?
२३.उत्तर:- विविध प्रकार के गृह निवास स्थान प्रदाता जिसमें युगलिक
आसानी से सुखपूर्वक रह सकते है।
२४. दसवें प्रकार के कल्पवृक्ष कौनसे है?
२४.उत्तर:- अनग्न कल्पवृक्ष।
२५ .अनग्न कल्पवृक्ष क्या देते है?
२५.उत्तर:- वस्त्रों की आवश्यकता पूर्ति करने वाले सुंदर
सुखद महीन वस्त्र देने वाले होते है।
२६. पहले आरे के मनुष्यो का आकर स्वरुप कैसा था?
२६ उत्तर :- पहले आरे के मनुष्य बड़े सुन्दर दर्शनीय होते
थे,सारे अंग
सुव्यवसिथत होते थे।
२७. पहले आरे की स्त्रियाँ कैसी
होती थी?
२७ उत्तर :- श्रेष्ठ और सर्वाग सुंदरता युक्त्त तथा महिलोचित गुणों से
युक्त्त होती थी।
२८. पहले आरे के मनुष्य कितने समय आहार लेते थे?
२८ उत्तर:- तीन दिन के बाद।
२९. पहले आरे के मनुष्य कितना आहार करते थे?
२९ उत्तर:- तुवर की दाल जितना सा आहार करते थे।
३०. पहले आरे के मनुष्यो की पाचन शक्त्ति कैसे
थी?
३० उत्तर:- कबूतर की तरह प्रबल पाचन शक्त्ति वाले थे।
३१. पहले आरे के मनुष्यो को कितनी पसलियाँ थी?
३१ उत्तर:- २५६ पसलियाँ होती थी।
३२. पहले आरे के मनुष्यो की श्वास कैसे होती
थी?
३२ उत्तर:- पदम उत्पल तथा गंध द्रव्यों जैसी सुग़धित
थी।
३३. पहले आरे के मनुष्यो के मुख कैसे होते थे?
३३ उत्तर :- उनके मुख सदा सुवासित सुगंध् युक्त्त रहते थे।
३४. पहले आरे के मनुष्यो की प्रकृति कैसे होती
थी?
३४ उत्तर :- उनके क्रोध,मान,माया,लोभ मंद एवं हल्के होते थे उनका
स्वभाव सरल एवं मृदु होते थे।
३५. पहले आरे के मानवों के कितनी संताने होती
थी?
३५.उत्तर :- दो संताने -एक पुत्र और एक पुत्री।
३६ . पहले आरे के समय पृथ्वी का स्वाद कैसा था?
३६ उत्तर:- मिश्री जैसा था।
३७. पहले आरे के मनुष्यो कहाँ रहते थे?
३७ उत्तर:- वृक्षों रूप घरों में रहते थे।
३८. पहले आरे में भारत क्षेत्र में सोना चांदी हीरें
जवाहरात होते थे?
३८ उत्तर:- हाँ, होते थे पर उन मनुष्यों के उपयोग में नहीं
आते थे।
३९ . पहले आरे के मनुष्यो की आयु कितनी
होती थी?
३९ उत्तर:- लगते आरे तीन पल्योपम एवं उतरते आरे दो
पल्योपम की आयु थी।
४०. क्या पहले आरे के मानवों को एक-दूसरे के प्रति शत्रु भाव होता था?
४० उत्तर:- नहीं, वे मनुष्य वैरानुबंध से रहित होते थे।
४१. क्या पहले आरे में माता-पिता,भाई-बहेन , पुत्र-पुत्री,पु
त्र-पुत्रवधु आदि के रिश्ते होते थे?
४१ उत्तर:- हाँ, होते थे परन्तु उन मनुष्यों का तीव्र प्रेम बंध
नहीं होता था।
४२. क्या पहले आरे में बुखार,हार्टअटैक ,शूल रोग होते थे?
४२.उत्तर:- नहीं,उस समय के मानवों को कोई भी
रोग नहीं होता था।
४३. क्या पहले आरे के मानवों में विवाह होते थे?
४३ उत्तर:- नहीं, विवाह प्रणाली
नहीं थी।
४४. पहले आरे में कितने प्रकार के मनुष्य रहते थे?
४४ उत्तर:- छह प्रकार के मनुष्य रहते थे।
४५ पहले आरे में छह प्रकार के कौनसे मनुष्य रहते है?
४५ उत्तर:-
१. पदम् गंध-पदम् कमल के समान गंध वाले
२. मृग गंध - कस्तुरी सदृश गंध वाले
३. अभय- ममत्व रहित
४. तेजस्वी
५. सह - सहनशील
६. शनैशचरी - उत्सुकता नहीं होने से
धीरे-धीरे चलने वाले।
४६. क्या पहले आरे में कार,बस,ट्रेन प्लेन आदि साधन थे?
४६.उत्तर:- नहीं,वे मनुष्य पाद विहारी -पैदल
चलने वाले होते थे।
४७. क्या पहले आरे में गाय भैस,बकरी,भेड़ आदि थे?
४७.उत्तर :- यह पशु होते थे,पर उन मनुष्यों के उपयोग में
नहीं आते ,वे मनुष्य उनसे दूध आदि प्राप्त नहीं
करते थे।
४८. क्या पहले आरे में हाथी,घोड़े,ऊँट आदि थे?
४८.उत्तर:- हाँ,होते थे,पर उन मनुष्यों के सवारी के काम
नहीं आते थे।
४९. क्या पहले आरे में गेंहु,चावल,मूंग,मटर,बाजरी,मक्क
ी आदि होते थे?
४९. उत्तर :- आज जीयन धान्य उपलब्ध है वे
सभी थे,पर उन मानवों के काम नहीं आते थे।
५०.पहले आरे के मानवों का संहनन कैसा था?
५०.उत्तर:-व्रजऋषभनाराच ।
५१. पहले आरे के मानवों का संस्थान कैसा था?
५१.उत्तर:- समचतुरस्स संस्थान होता था।
५२. पहले आरे के मानवों को कितनी संतान होती
थी?
५२.उत्तर:- दो संतान (युगलिक) एक पुत्र-एक पुत्री।
५३. पहले आरे के मानवी संतान को जन्म कब देती
थी?
५३.उत्तर:-आपनी आयु के ६ मास बाकी रहते थे
उस समय युगलिनी एक युगल अर्थात एक बच्चा व् एक
बच्ची को जन्म देती थी।
५४. कितने दिन रात्री संतान की सार संभाल करते
थे?
५४.उत्तर:- ४९ दिन पालन पोषण करते थे।
५५. ४९ दिन परिपालना करने के बाद सन्तान का क्या होता था?
५५.उत्तर:- वे ४९ दिन में युवा हो जाते थे ,आपन भरण-पोषण करने में
स्वयं समर्थ हो जाते थे।
५६. पहले आरे के स्त्री-पुरूषो की मृत्यु कैसे
होती थी?
५६.उत्तर:- खांसी,छीक,जम्हाई-
उबासी लेकर शारीरिक कष्ट,व्यथा परिताप का अनुभव
नहीं करते हुये काल धर्म को प्राप्त हो जाते थे।
५७. पहले आरे के मनुष्य काल धर्म को प्राप्त कर कहाँ जाते है?
५७.उत्तर:- वे प्रकृति से भद्र,सरल होने के कारण एक मात्र देव गति को
ही प्राप्त करते है।
५८. पहले आरे के मनुष्य अगले भाव का आयुष्य बंध कब करते है?
५८. उत्तर:- निरूपक्रमी आयु होने के कारण आयु के ६माह
शेष रहते (जब युगल को जन्म देते है) तब आयु का बंध करते है।
५९. पहले आरे के मनुष्यों का दाह संस्कारहोता है?
५९.उत्तर:-पहले आरे के मनुष्यों का दाह संस्कार आदि क्रियाएं
नहीं होती है।
६०. पहले आरे के मनुष्यों का मृत देह का दाह संस्कार आदि
नहीं होता है तोह फिर मृत देह की क्या स्थिति
होती है?
६०.उत्तर:- अपने-अपने क्षेत्रो के क्षेत्रपाल आदि देव उन मृत देहो को
उठाकर क्षीर समुद्र में प्रक्षेप कर देते है।
६१. क्षीर समुद्र में उन मृत देहों का क्या होता है?
६१.उत्तर:- कच्छ,मच्छप ग्राह आदि जलचर जन्तु उनका भक्षण कर
जाते है।
६२पहले आरे की स्तिथि कितनी है?
६२. उत्तर:- ४ कोडकोडी सगरोपाम की।
६३.पहला आरा लगते समय मनुष्यों की आयु
कितनी होती थी?
६३.उत्तर:- तीन पल्योपम।
६४. पहला आरा उतरते समय मनुष्यों की आयु
कितनी होती थी?
६४.उत्तर:- दो पल्योपम।
६५.पहला आरा लगते समय मनुष्यों का देहमान कितनी होता
था?
६५.उत्तर:- तीन कोस (गाऊ)
६६.पहला आरा उतरते समय मनुष्यों का देहमान कितनी होता
था?
६६. दो कोस (गाऊ)।
आज पहला आरा यहा समाप्त होता है ।
जिन आज्ञा विरुद्ध कुछ भी लिखा गया हो तोह
मिच्छामी दुक्कड़म।प्रिती शाह।

बंगले , गाड़ी तो
" " जैनियो " " की घर घर
की कहानी हैं.......
.
.
तभी तो ये दुनिया
" " जैनियों " "
की दीवानी हैं.
.
.
अरे मिट गये " जैनोको " मिटाने वाले
क्योकि
" जैन " आदमी का दिमाग खुद एक कहानी है
.
.
ये आवाज नही शेर कि दहाड़ है…..
हम खडे हो जाये तो पहाड़ है….
.
.
हम इस संसार वो सुनहरे पन्ने है…..
जो भगवान महावीर ने ही चुने है….
दिलदार औऱ दमदार
है " जैन "
.
.
व्यवहार एवं व्यापार में मिसाल है " जैन "
ईमानदारी का आधार है
"जैन " ....
पता नही कितनो की जान है
" जैन " "
.
.
सच्चे प्यार पर कुरबान है
" जैन "
.
.
यारी करे तो यारो के यार है
"" " " " जैनी " "
औऱ काॅम्पीटीटर के लिये तूफान है
"" " " जैनी " " ""
.
.
तभी तो दुनिया कहती है बाप रे खतरनाक है
"" " " जैनी " """"
.
.
जैसे शेरो के पुत्र शेर ही ज़ाने जाते हैं,
लाखों के बीच " जैन "
पहचाने जाते हैं।।
.
.
रिसेशन देख कर परेशान हम कभी होते नहीं ,
रिस्क उठाने से हम क़भी डरते नही।
हम अपने आप पर ग़र्व
क़रते हैं,
क्योंकि मार्केट की नब्ज की जानकारी हम रखते हैं ,
.
.
कोई ना भी दे हमें खुश रहने की दुआ,
तो भी कोई बात नहीं...
वैसे भी हम खुशियाँ रखते नहीं,
बाँट दिया करते हैं।............*

मुझे जैन होने का गर्व है .....
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏


"जैनो " की शान के लिये
10 " जैनो "को शेयर करॊ
और उनसे कहे आगे 10 लोगो को शेयर करे।
🙏

श्री मणिभद्र वीर - संक्षिप्त इतिहास

मणिभद्र एक महान राजा थे जो जैन धर्म और इसके संदेशों के प्रति पूर्णतया समर्पित थे।इनके पास अपार संपत्ति थी तथा इन्हें 36 तरह के वाद्य यंत्रों का शौक था।इनकी असीम निष्ठा भक्ति से इन्हें क्षेत्रपाल घोषित कर दिया गया था।

मणिभद्र वीर, अपने पूर्व जनम में उज्जैन में जैन श्रावक माणेकशाह थे।ये एक निष्ठावान श्रावक थे जिनके गुरु महाराज हेमविमल सुरीजी थे।आगरा में महाराज हेमविमल सूरीजी के चातुर्मास के दौरान माणेकशाह अपने गुरु से पवित्रता पर दिए गए उपदेशों व शत्रुंजय की महत्ता से बहुत प्रभावित हुए।इसी प्रभाव के कारण, इन्होंने नवणुनि यात्रा करने के लिए पैदल शत्रुंजय जाने व रयान वृक्ष के नीचे दो दिन के उपवास से इसे संपन्न करने की कठिन तपस्या का संकल्प लिया।

गुरु के आशीर्वाद से, कार्तिकी पूनम के शुभ दिन माणेकशाह ने अपने संकल्प का शुभारम्भ किया।जब वे वर्तमान के मागरवाड़ा के निकट थे, डाकुओं के एक दल ने इन पर व इनके साथियों पर हमला कर दिया और लड़ने लगे।अपने साथियों की जान बचाने के लिए माणेकशाह ने अपने प्राण गवा दिए, इनका सर, धड़ व शरीर का निचला हिस्सा कटकर अलग हो गए ।माणेकशाह, जो नवकार मन्त्र जाप और शत्रुंजय की पवित्रता में पूरी तरह से लीन थे, इन्द्र मणिभद्रवीर देव के रूप में पुनः जन्म लिया।पुराणों के अनुसार लड़ते हुए माणेकशाह का शरीर तीन हिस्सों में कट कर तीन अलग दिशाओं में गिर गया था।पिंडी ( शरीर का निचला हिस्सा) गुजरात के मागरवाड़ा में गिरा, धड़ अर्थात शरीर गुजरात के अग्लोड में गिरा, और मस्तक अर्थात सर मध्य प्रदेश के उज्जैन में गिरा।मूलतया भारत में मणिभद्र वीर के ये तीन स्थान ही हैं - उज्जैन, अग्लोड एवम् मागरवाडा।

कहा जाता है की माणेकशाह के गुरु के शिष्यों को भैरवों की वजह से काफी परेशानी आ रही थीं।देववाणी अनुसार, उनके गुरु मागरवाड़ा आये व इन परेशानियों से पार पाने के लिए ध्यान में विराजित हुए।तब मणिभद्रवीर ने गुरु को भैरवों से उत्पन्न हुई परेशानियों को दूर करने के लिए अपने गुरु को सहायता करने का निश्चय किया।मणिभद्रवीर ने भैरवों को वश में किया।गुरु ने इनका सम्मान करते हुए महा सुद पंचमी को मागरवाड़ा में इनके पिंड को स्थापित कर मंदिर का निर्माण करवाया।
वर्तमान में बड़ी संख्या में भक्तगण मागरवाड़ा जाकर मणिभद्रवीर से अपनी समस्याओं के समाधान व अपनी परेशानियों को दूर करने में मदद के लिए प्रार्थना करते हैं।

ये भी कहा जाता है की अगर कोई भक्त मणिभद्रवीर देव के दर्शन व पूजा तीनो स्थानों पर एक ही दिन में अर्थात सूर्योदय से सूर्यास्त तक के बीच में करते हैं , अपने देव को अपनी भक्ति व प्रार्थनाएं समर्पित करने का ये सबसे उत्तम तरीका है।

मणिभद्र वीर देव की कुछ प्रमुख लक्षण

प्रतिमा पर इनका मुख अधिकतर शूकर ( वाराह ) के रूप में होता है।

इनकी प्रतिमाएँ चार भुजा और कई बार छह भुजाओं के साथ दिखाई देती हैं।

मणिभद्रवीर देव का वाहन ऐरावत है, सफ़ेद हाथी जिसकी एक से अधिक सूँड हैं।

विशेषकर इनकी पूजा अष्टमी, चौदस और दीवाली के दिन होती है।महीने की हर पाँचम को भक्तों की बड़ी संख्या यहाँ आकर इनकी पूजा करते हैं।इनके विशेष दिन रविवार व गुरूवार हैं और इनके भक्त जैन भोजन ( जमीकंद रहित ) पर रहकर भी इनके प्रति अपनी आस्था, सम्मान व्यक्त कर सकते हैं।

सुखड़ी और श्रीफल ( नारियल ) इनका पसंदीदा भोजन है व इन्हें प्रसाद के रूप में अर्पण किया जाता है।

महिलाएँ इनके दर्शन कर सकती हैं, प्रार्थनाएँ दे सकती हैं, इन्हें मान सकती हैं किन्तु इनकी पूजा या प्रतिमा पर केसर चन्दन लगाकर पूजा नहीं कर सकतीं।

मागरवाड़ा

गुजरात के मागरवाड़ा (पालनपुर जिला ) में मणिभद्रवीर दादा के शरीर के निचले हिस्से अर्थात पिंडी की प्रतिमा जी है।इनके भक्त बड़ी संख्या में अपनी पूजा अर्चना समर्पित करने व अपनी मनोकामना पूर्ण करने के लिए यहाँ आते हैं।मणिभद्रवीर देव चमत्कारों की रचना के लिए जाने जाते हैं।कहा जाता है इनकी पूजा करने से धन वैभव मिलता है व बुरी शक्तियों से संरक्षण मिलता है।

अग्लोड

श्री अग्लोड जैन तीर्थ मागरवाड़ा से 80 किलोमीटर ( पौने दो घंटे ) की दुरी पर है।कहा जाता है की मणिभद्रवीर का धड़ अर्थात शरीर यहाँ गिरा था और यहाँ धड़ की ही पूजा की जाती है।भक्त अपनी पूजा मागरवाड़ा में इनके चरणों व शरीर के निचले हिस्से से शुरू करते हुए अग्लोड में शरीर की पूजा कर उज्जैन में सर की पूजा पूर्ण कर सकते हैं।

उज्जैन

उज्जैन में शिप्रा नदी तट पर मणिभद्रवीर दादा का पवित्र मंदिर स्थित है।इस मंदिर से एकदम जुड़ता हुआ मणिभद्रवीर का पुराना घर ( माणेकशाह का घर ) था इसीलिए मंदिर का निर्माण उसी स्थान पर व उसके आसपास ही हुआ है।दादा मणिभद्रवीर का मस्तक अर्थात सर की पूजा यहाँ होती है।

विशेष : मणिभद्र वीर देव की साधना से परिणाम बहुत जल्दी मिलते हैं और जो साधक इनकी सच्ची साधना करते हैं उन्हें शीघ्र ही धन प्राप्ति होती है। इसका कारण है की यक्ष लोक के यक्ष यक्षिणी अदृश्य रूप में उन साधकों को सहयोग करते हैं जो मणिभद्र देव की साधना करते हैं क्योंकि मणिभद्र वीर देव को यक्ष सेना का सेनापति कहा जाता है व यक्ष लोक में इनका एक विशिष्ट स्थान है।

सलाह दी जाती है की मागरवाड़ा से पूजा करके सुबह तड़के ही 6:30 बजे रवाना होकर 8:30-9:00 बजे तक भक्त अग्लोड पहुँच जाएँ।मागरवाड़ा से अग्लोड 80 किलोमीटर की दुरी पर है।अग्लोड से पूजा करके ठीक 10:00 बजे सूर्यास्त से पूर्व उज्जैन पहुँचने के लिए रवाना हो जाना चाहिए ताकि दादा के मस्तक को पूज कर पूजा को पूर्ण किया जा सके।अग्लोड से उज्जैन पहुँचने के लिए 6-7 घंटे लगते हैं।यह दूरी 400 किलोमीटर की है।

चमत्कारी प्रभावशाली मन्त्र

|| ॐ असीआउसा नमः श्री मणिभद्र दिसतु मम: सदा सर्वकार्येषु सिद्धिं ||

जिनआज्ञा विरुद्ध कुछ लिखा गया हो तस्स मिच्छामी दुक्कड़म

जय हो मणिभद्र वीर दादा की

रोज जपते णमोकार,
भाग जाते विकार,
नही रहोंगे बेकार,
सपने होंगे साकार,
आप बनोंगे दिलदार,
जीवन होगा शॉनदार,
श्रद्धा होगी अपार,
तो बढेगा व्यापार,
जपते रहो णमोकार,
जपते रहो णमोकार,
👏 जय जिनेंद्र 👏
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