दुध पिलाया जिसने छाती से निचोड़कर
मैं निकम्मा कभी 1 ग्लास पानी पिला न सका ।

बुढापे का सहारा हूँ अहसास दिला न सका
पेट पर सुलाने वाली को मखमल,पर सुला न सका ।

वो भूखी सो गई बहू के डर से एकबार मांगकर
मैं सुकुन के दो निवाले उसे खिला न सका ।

नजरें उन बुढी आंखों से कभी मिला न सका ।
वो दर्द सहती रही मैं खटिया पर तिलमिला न सका ।

जो हर जीवनभर ममता के रंग पहनाती रही मुझे
उसे दिवाली पर दो जोड़ी कपडे सिला न सका ।

बिमार बिस्तर से उसे शिफा, दिला न सका ।
खर्च के डर से उसे बड़े अस्पताल ले जा न सका ।

माँ के बेटा कहकर दम तोड़ने बाद से अब तक सोच रहा हूँ,
दवाई इतनी भी महंगी न थी के मैं ला ना सका ।

लालू यादव देश के राजनीतिक धरोहर हैं - रामदेव
लगता है बाबा बिहार में अब पतंजलि ब्राण्ड के अपराधी और नेता बनाने की सोंच रहे हैं।
वैसे लालू जैसा माॅडल मिलना मुश्किल हैं। बस सहाबुद्दीन वाला फ्लेवर मिक्स कर दे तो मजा आ जाएगा।
फिर प्रकाश ज्ञा, अभिषेक चैबे, अनुराग कश्यप, नीतेश तिवारी जैसे फिल्मकारो की राह आसान हो जाएगी।
रामदेव बाबा को भी अब एक फिल्म प्रोडक्शन हाउस खोलना चाहिए ताकि जो भी चीज सही लगे उसे फिल्म में परिवर्तित किया जा सके।
खैर कोई नही काफी दिनो बाद बाबा के मुखारबिन्दु से किसी और की प्रशंसा सुनी है।

लालू यादव देश के राजनीतिक धरोहर हैं - रामदेव
लगता है बाबा बिहार में अब पतंजलि ब्राण्ड के अपराधी और नेता बनाने की सोंच रहे हैं।
वैसे लालू जैसा माॅडल मिलना मुश्किल हैं। बस सहाबुद्दीन वाला फ्लेवर मिक्स कर दे तो मजा आ जाएगा।
फिर प्रकाश ज्ञा, अभिषेक चैबे, अनुराग कश्यप, नीतेश तिवारी जैसे फिल्मकारो की राह आसान हो जाएगी।
रामदेव बाबा को भी अब एक फिल्म प्रोडक्शन हाउस खोलना चाहिए ताकि जो भी चीज सही लगे उसे फिल्म में परिवर्तित किया जा सके।
खैर कोई नही काफी दिनो बाद बाबा के मुखारबिन्दु से किसी और की प्रशंसा सुनी है।

औरत सब संभाल लेती है..

वो "औरत" दौड़ कर रसोई तक ,
दूध बिखरने से पहले बचा लेती है ।

समेटने के कामयाब मामूली लम्हों में ,
बिखरे "ख्वाबों" का गम भुला देती है ।

वक्त रहते रोटी जलने से बचा लेती है , कितनी "हसरतों" की राख उडा देती है ।

एक कप टूटने से पहले सम्हालती है ,
टूटे "हौसलों" को मर्जी से गिरा देती है ।

कपडों के दाग छुडा लेती सलीके से ,
ताजा "जख्मों" के हरे दाग भुला देती है ।

कैद करती "अरमान" भूलने की खातिर",
रसोई के बंद डिब्बों में सजा लेती है ।

नाजुक लम्हों के "अफसोस" की स्याही,
दिल की दीवार से बेबस मिटा लेती है ।

मेज कुर्सियों से "गर्द" साफ करती ,
चंद ख्वाबों पर "धूल" चढा लेती है ।

सबके सांचे में ढालते अपनी जिंदगी, "हुनर" बर्तन धोते सिंक में बहा देती है ,
कपडों की तह में लपेट कुछ "शौक",अलमारी में खामोशी से दबा देती है ।

अजीज चेहरों की आसानी की खातिर ,
अपने "मकसद" आले में रख भुला देती है ।

घर भर को उन्मुक्त गगन में उडता देखने ,
अपने सपनों के पंख काट लेती है ।

हां... हर घर में एक "औरत" है ,
जो बिखरने से पहले ही सब सम्हाल लेती है..!!
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