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चित्तोड़गढ़ किले का इतिहास

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चित्तोड़गढ़ किले – Chittorgarh Fort का निर्माण 7 वी शताब्दी में मौर्य के शासन काल में किया गया था और इसका नाम भी मौर्य शासक चित्रांगदा मोरी के बाद ही रखा गया था। इतिहासिक दस्तावेजो के अनुसार चित्तौड़गढ़ किला 834 सालो तक मेवाड़ की राजधानी रह चूका था। इसकी स्थापना 734 AD में मेवाड़ के सिसोदिया वंश के शासक बाप्पा रावल ने की थी। ऐसा कहा जाता है की इस किले को 8 वी शताब्दी में सोलंकी रानी ने दहेज़ के रूप में बाप्पा रावल को दिया था। 1568 AD में इस किले को अकबर के शासनकाल में इस किले को लूटकर इसका विनाश भी किया गया था लेकिन फिर बाद में लम्बे समय के बाद 1905 AD में इसकी मरम्मत की गयी थी। इस किले का नियंत्रण पाने के लिये तीन महत्वपूर्ण लढाईयाँ हुई थी। 1303 में अल्लाउद्दीन खिलजी ने किले को घेर लिया था। 1535 में गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह ने किले को घेर लिया था और 1567 में मुग़ल बादशाह अकबर ने किले पर आक्रमण किया था। घेराबंदी के काल को यदि छोड़ दिया जाए तो यह किला हमेशा गुहिलोट के राजपूत वंश के सिसोदिया के नियंत्रण में ही था। उन्होंने इसे बाप्पा रावल से अवतरित किया था। इस किले की स्थापना को लेकर कई प्राचीन कहानियाँ भी है और हर घेराबंदी के बाद इसके पुनर्निर्माण की भी बहोत सी कहानियाँ है।
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