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Greetings of #AkshayaTritiya to all ! Also let us pray at the holy feet of Shri Parshuram on the auspicious occasion of #parshuramjayanti
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4/28/17
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Lord Ram teaches us the best lessons of life. Patience, devotion, being happy, calmness, bravery and most of all humanity.

#Happy_Ram_Navami

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⛺दशहरे की सभी भक्तो को बहुत बहुत शुभकामनाए⛺
🌟जय श्री राम🌟

🎪॥ श्रीरामरक्षास्तोत्रम्‌ ॥🎪

⛳श्री गणेशाय नम: ⛳
।अस्य श्रीरामरक्षास्तोत्रमन्त्रस्य ।बुधकौशिक ऋषि: ।श्रीसीतारामचंद्रोदेवता ।अनुष्टुप्‌ छन्द: । सीता शक्ति: ।श्रीमद्‌हनुमान्‌ कीलकम्‌ ।श्रीसीतारामचंद्रप्रीत्यर्थे जपे विनियोग:
॥॥ अथ ध्यानम्‌ ॥
ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्दद्पद्‌मासनस्थं ।पीतं वासोवसानं नवकमलदलस्पर्धिनेत्रं प्रसन्नम्‌ ॥वामाङ्‌कारूढसीता मुखकमलमिलल्लोचनं नीरदाभं ।नानालङ्‌कारदीप्तं दधतमुरुजटामण्डनं रामचंद्रम्‌ ॥
॥ इति ध्यानम्‌ ॥
चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम्‌ ।एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम्‌ ॥१॥ध्यात्वा नीलोत्पलश्यामं रामं राजीवलोचनम्‌ ।जानकीलक्ष्मणॊपेतं जटामुकुटमण्डितम्‌ ॥२॥सासितूणधनुर्बाणपाणिं नक्तं चरान्तकम्‌ ।स्वलीलया जगत्त्रातुमाविर्भूतमजं विभुम्‌ ॥३॥रामरक्षां पठॆत्प्राज्ञ: पापघ्नीं सर्वकामदाम्‌ ।शिरो मे राघव: पातु भालं दशरथात्मज: ॥४॥कौसल्येयो दृशौ पातु विश्वामित्रप्रिय: श्रुती ।घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सल: ॥५॥जिव्हां विद्दानिधि: पातु कण्ठं भरतवंदित: ।स्कन्धौ दिव्यायुध: पातु भुजौ भग्नेशकार्मुक: ॥६॥करौ सीतपति: पातु हृदयं जामदग्न्यजित्‌ ।मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जाम्बवदाश्रय: ॥७॥सुग्रीवेश: कटी पातु सक्थिनी हनुमत्प्रभु: ।ऊरू रघुत्तम: पातु रक्ष:कुलविनाशकृत्‌ ॥८॥जानुनी सेतुकृत्पातु जङ्‌घे दशमुखान्तक: ।पादौ बिभीषणश्रीद: पातु रामोSखिलं वपु: ॥९॥एतां रामबलोपेतां रक्षां य: सुकृती पठॆत्‌ ।स चिरायु: सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत्‌ ॥१०॥पातालभूतलव्योम चारिणश्छद्‌मचारिण: ।न द्र्ष्टुमपि शक्तास्ते रक्षितं रामनामभि: ॥११॥रामेति रामभद्रेति रामचंद्रेति वा स्मरन्‌ ।नरो न लिप्यते पापै भुक्तिं मुक्तिंच विन्दति ॥१२॥जगज्जेत्रैकमन्त्रेण रामनाम्नाभिरक्षितम्‌ ।य: कण्ठे धारयेत्तस्य करस्था: सर्वसिद्द्दय: ॥१३॥वज्रपंजरनामेदं यो रामकवचं स्मरेत्‌ ।अव्याहताज्ञ: सर्वत्र लभते जयमंगलम्‌ ॥१४॥आदिष्टवान्‌ यथा स्वप्ने रामरक्षामिमां हर: ।तथा लिखितवान्‌ प्रात: प्रबुद्धो बुधकौशिक: ॥१५॥आराम: कल्पवृक्षाणां विराम: सकलापदाम्‌ ।अभिरामस्त्रिलोकानां राम: श्रीमान्‌ स न: प्रभु: ॥१६॥तरुणौ रूपसंपन्नौ सुकुमारौ महाबलौ ।पुण्डरीकविशालाक्षौ चीरकृष्णाजिनाम्बरौ ॥१७॥फलमूलशिनौ दान्तौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ ।पुत्रौ दशरथस्यैतौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥१८॥शरण्यौ सर्वसत्वानां श्रेष्ठौ सर्वधनुष्मताम्‌ ।रक्ष:कुलनिहन्तारौ त्रायेतां नो रघुत्तमौ ॥१९॥आत्तसज्जधनुषा विषुस्पृशा वक्षया शुगनिषङ्‌ग सङि‌गनौ ।रक्षणाय मम रामलक्ष्मणा वग्रत: पथि सदैव गच्छताम्‌ ॥२०॥संनद्ध: कवची खड्‌गी चापबाणधरो युवा ।गच्छन्‌मनोरथोSस्माकं राम: पातु सलक्ष्मण: ॥२१॥रामो दाशरथि: शूरो लक्ष्मणानुचरो बली ।काकुत्स्थ: पुरुष: पूर्ण: कौसल्येयो रघुत्तम: ॥२२॥वेदान्तवेद्यो यज्ञेश: पुराणपुरुषोत्तम: ।जानकीवल्लभ: श्रीमानप्रमेय पराक्रम: ॥२३॥इत्येतानि जपेन्नित्यं मद्‌भक्त: श्रद्धयान्वित: ।अश्वमेधायुतं पुण्यं संप्राप्नोति न संशय: ॥२४॥रामं दूर्वादलश्यामं पद्‌माक्षं पीतवाससम्‌ ।स्तुवन्ति नामभिर्दिव्यैर्न ते संसारिणो नर: ॥२५॥रामं लक्शमण पूर्वजं रघुवरं सीतापतिं सुंदरम्‌ ।काकुत्स्थं करुणार्णवं गुणनिधिं विप्रप्रियं धार्मिकम्‌राजेन्द्रं सत्यसंधं दशरथनयं श्यामलं शान्तमूर्तिम्‌ ।वन्दे लोकभिरामं रघुकुलतिलकं राघवंरावणारिम्‌ ॥२६॥रामाय रामभद्राय रामचंद्राय वेधसे ।रघुनाथाय नाथाय सीताया: पतये नम: ॥२७॥श्रीराम राम रघुनन्दन राम राम ।श्रीराम राम भरताग्रज राम राम ।श्रीराम राम रणकर्कश राम राम ।श्रीराम राम शरणं भव राम राम ॥२८॥श्रीरामचन्द्रचरणौ मनसा स्मरामि ।श्रीरामचन्द्रचरणौ वचसा गृणामि ।श्रीरामचन्द्रचरणौ शिरसा नमामि ।श्रीरामचन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये ॥२९॥माता रामो मत्पिता रामचंन्द्र: ।स्वामी रामो मत्सखा रामचंद्र: ।सर्वस्वं मे रामचन्द्रो दयालु ।नान्यं जाने नैव जाने न जाने ॥३०॥दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य वामे तु जनकात्मजा ।पुरतो मारुतिर्यस्य तं वन्दे रघुनंदनम्‌ ॥३१॥लोकाभिरामं रनरङ्‌गधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम्‌ ।कारुण्यरूपं करुणाकरंतं श्रीरामचंद्रं शरणं प्रपद्ये ॥३२॥मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्‌ ।वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये ॥३३॥कूजन्तं रामरामेति मधुरं मधुराक्षरम्‌ ।आरुह्य कविताशाखां वन्दे वाल्मीकिकोकिलम्‌ ॥३४॥आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसंपदाम्‌ ।लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम्‌ ॥३५॥भर्जनं भवबीजानामर्जनं सुखसंपदाम्‌ ।तर्जनं यमदूतानां रामरामेति गर्जनम्‌ ॥३६॥रामो राजमणि: सदा विजयते रामं रमेशं भजे ।रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मैनम: ।रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोSस्म्यहम्‌ ।रामे चित्तलय: सदा भवतु मे भो राम मामुद्धर ॥३७॥राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे ।सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने ॥३८॥इति श्रीबुधकौशिकविरचितं श्रीरामरक्षास्तोत्रं संपूर्णम्‌ ॥॥ श्री सीतारामचंद्रार्पणमस्तु ॥
🎪 जय श्री राम 🎪
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⛳रघुपति रूप जय जय राम⛳
⛳ रामकृष्ण रूप जय जय राम⛳

हनुमान अपने वाल्यकाल में सूर्य को पका फल समझकर उसे पकड़ने की इच्छा से लीलावत् जो ऊपर कूदे, उस दिन एक ही छलाँग में मारुति पाँच सौ योजन ऊपर उठ गये ।हे रघूत्तम ! उस अमावस्या के दिन हनुमान ऊपर उठे थे, क्योंकि जब राहु ने सूर्य के पास जाकर देखा, तो हनुमान उसके ग्रहण की इच्छा से उसके पास ही खड़े थे।राहु भयभीत हो सूर्य को त्याग इन्द्र के पास आया।यहाँ आकर उसने इन्द्र से कहा कि अब मैं आपको भक्षण करता हूँ ।क्योंकि आपने पूर्व में हमें रवि को भक्षणार्थ दिया था, किन्तु वर्तमान में उसमें विघ्न हो गया ।आप इसका निवारण करें अन्यथा मैं आपको ही ग्रास करूँगा ।तब राहु के कथनानुसार इन्द्र सूर्य के पास गये तो देखा कि वहाँ हनुमान उसके समक्ष खड़े हैं ।तब इन्द्र ने उन पर वज्र से प्रहार किया ।उस वज्राघात से हनुमान आकाश से नीचे गिरि कन्दरा में गिर पड़े और उनकी ठुड्डी (हनु) टेढ़ी हो गयी।इसी से उनका हनुमान नाम पड़ा।
यह देख हनुमान के पिता वायु ने क्रोधित होकर अपना गमन स्थगित कर दिया ।वायु का बहना बन्द होने से पृथ्वी पर सब लोग गिरने लगे ।त्रैलोक्य मृतक सा हो गया ।ब्रह्मा इन्द्र को धिक्कारने लगे ।फिर तो वे शीघ्र ही वायु के पास गये और नमस्कार कर प्रार्थनापूर्वक कहा -- हे कंपन! तुम देवराज इन्द्र के अपराध को क्षमा करो।मैं तुम्हारे पुत्र हनुमान को वर देता हूँ ।तब वायु प्रसन्न होकर पुनः बहने लगा।क्षणमात्र में ही त्रैलोक्य जीवित हो गया ।तब ब्रह्मा ने मारुति को वर दिया कि तुम मेरे वचन से वज्रदेह होकर अमर हो जाओ।हे अंजनीपुत्र ! तुम्हारी गति कहीं कुंठित न होगी।हरि में नित्य तुम्हारी उत्तम भक्ति होगी।मैं यह भी वर देता हूँ कि तुम विष्णु की सहायता करने में समर्थ होगे।इतना कह ब्रह्मा अंतरधान हो गये ।राहु पुनः सूर्य के समीप जा पहुँचा।
श्री राम बोले - हे मुनीन्द्र ! अब कृपा कर यह कहिए कि देवराज इन्द्र ने रवि को राहु के लिए क्यों दे दिया था?
अगस्त्य ऋषि बोले -- यह राहु दैत्य स्वयं ही अमृत पान कर अमरत्व को प्राप्त हुआ है और फिर अष्टम् ग्रह भी हो गया ।वह देवताओं को भी दुखदायी हो गया ।तब देवताओं ने उसे सूर्य और चन्द्रमा को इस विचार से दे दिया, कि संसारीजन अपने कार्य हित के लिए धर्म के द्वारा सूर्य और चन्द्रमा को मुक्त करा लेंगे।इसलिए जब जब ग्रहण होता है, तब तब मनुष्य अपने कार्य साधन के लिए सादर दान धर्म से राहु को सन्तुष्ट करते हैं और उसी से सूर्य - चन्द्र को छुड़ा लेते हैं ।
(क्रमशः )
(आनंद रामायण )

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WISH U ALL HAPPY SHREE RAM NAVAMI MY DEAR FRIENDS, HAVE A BLESSED DAY AND TAKE CARE.........
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