मानों घर भर भूल बैठा...



मानों घर भर भूल बैठा था ठहाकों का हुनर;

खिलखिलाने की वजह बच्चे की किलकारी बनी;



आप जैसी ही तरक्की मैं भी कर लेता, मगर;

मेरे रस्ते की रूकावट मेरी खुद्दारी बनी;



वो नज़र अंदाज़ कर देती है औलादों का जुर्म;

बाँध कर पट्टी निगाहों पर जो गांधारी बनी।

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गुलशन है अगर



गुलशन है अगर सफ़र जिंदगी का;

तो इसकी मंजिल समशान क्यों है;



जब जुदाई है प्यार का मतलब;

तो फिर प्यार वाला हैरान क्यों है;



अगर जीना ही है मरने के लिए;

तो जिंदगी ये वरदान क्यों है;



जो कभी न मिले उससे ही लग जाता है दिल;

आखिर ये दिल इतना नादान क्यों है।
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બીજાં શું વિચારે છે એની તમે જેટલી ઓછી ચિંતા કરશો એટલી સરસ તમારી જિંદગી બનશે.
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पढ़ाई में अच्छा ना होने की वजह से मंगतलाल अपने बेटे पप्पू को हमेशा डांटता रहता था। एक दिन जब दोनों इकट्ठे बैठ कर टीवी देख रहे थे तो अचानक से पप्पू, बोला, पापा मैं जब अपना व्यापार करूंगा तो देख लेना अच्छे-अच्छों के हाथ में कटोरा पकड़ा दूंगा। मंगतलाल ने ये सुना और हैरानी से पप्पू से पूछा, बेटा वो कैसे? बेटा मुस्कुराते हुए बोला, गोल-गप्पे बेचकर।

ये चांदनी रात बड़ी देर के बाद आयी;
ये हसीं मुलाक़ात बड़ी देर के बाद आयी;
आज आये हैं वो मिलने को बड़ी देर के बाद;
आज की ये रात बड़ी देर के बाद आयी

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