चमत्कारिक'पानी प्रयोग':: ज्यादा से ज्यादा शेयर करे और लाभ ले

"बिना खर्च किये ही रोगों से बचकर तन्दुरुस्त बनो"

नई एवं पुरानी प्राणघातक बीमारियाँ दूर करने के लिए यह एक अत्यंत सरल एवं बहुत बढ़िया प्रयोग है। इसको हम यहाँ पानी प्रयोग कहेंगे।

मधुप्रमेह (डायबिटीज), सिरदर्द, ब्लडप्रेशर, एनिमिया (रक्त की कमी), जोड़ों का दर्द, लकवा (पेरेलिसिस), मोटापन, हृदय की धड़कनें एवं बेहोशी, कफ, खाँसी, दमा (ब्रोन्काईटीस), -टी.बी., मेनिनजाईटीस), लीवर के रोग, पेशाब की बीमारियाँ, एसीडीटी (अम्लपित्त), गेस्ट्राईटीस (गैस विषयक तकलीफें), पेचिश, कब्ज, हरस, आँखों की हर किस्म की तकलीफें, स्त्रियों का अनियमित मासिकस्राव, प्रदर (ल्यकोरिया), गर्भाशय का कैंसर, नाक, कान एवं गले से सम्बन्धित रोग आदि आदि।

पानी पीने की रीतिः प्रभात काल में जल्दी उठकर, बिना मुँह धोये हुए बिना ब्रश किये हुए करीब सवा लीटर (चार बड़े गिलास) पानी एक साथ पी लें। ताजा पानी आराम से बैठ कर धीरे धीरे पीए और पानी ठण्डा न हो। तदनन्तर 45 मिनट तक कुछ भी खायें-पियें नहीं। पानी पीने के बाद मुँह धो सकते हैं, ब्रश कर सकते हैं। यह प्रयोग चालू करने के बाद सुबह में अल्पाहार के बाद, दोपहर को एवं रात्रि को भोजन के बाद दो घण्टे बीत जाने पर पानी पियें। रात्रि के समय सोने से पहले कुछ भी खाये नहीं।

बीमार एवं बहुत ही नाजुक प्रकृति के लोग एक साथ चार गिलास पानी नहीं पी सकें तो वे पहले एक या दो गिलास से प्रारंभ करें और बाद में धीरे-धीरे एक-एक गिलास बढ़ाकर चार गिलास पर आ जायें। फिर नियमित रूप से चार गिलास पीते रहें।

बीमार हो या तन्दुरुस्त, यह प्रयोग सबके लिए इस्तेमाल करने योग्य है। बीमार के लिए यह प्रयोग इसलिए उपयोगी है कि इससे उसे आरोग्यता मिलेगी और तन्दुरुस्त आदमी यह प्रयोग करेगा तो वह कभी बीमार नहीं पड़ेगा।

जो लोग वायु रोग एवं जोड़ों के दर्द से पीड़ित हों उन्हें यह प्रयोग एक सप्ताह तक दिन में तीन बार करना चाहिए। एक सप्ताह के बाद दिन में एक बार करना पर्याप्त है। यह पानी प्रयोग बिल्कुल सरल एवं सादा है। इसमें एक भी पैसे का खर्च नहीं है। हमारे देश के गरीब लोगों के लिए बिना खर्च एवं बिना दवाई के आरोग्यता प्राप्त करने की यह एक चमत्कारिक रीति है।

तमाम भाइयों एवं बहनों को विनती है कि इस पानी प्रयोग का हो सके उतना अधिक प्रचार करें। रोगियों के रोग दूर करने के प्रयासों में सहयोगी बनें।
चार गिलास पानी पीने से स्वास्थ्य पर कोई भी कुप्रभाव नहीं पड़ता। हाँ, प्रारंभ के तीन-चार दिन तक पानी पीने के बाद दो-तीन बार पेशाब होगा लेकिन तीन-चार दिन के बाद पेशाब नियमित हो जायेगा।

..... तो भाइयों एवं बहनों ! तन्दुरुस्त होने के लिए एवं अपनी तन्दुरुस्ती बनाये रखने के लिए आज से ही यह पानी प्रयोग शुरु करके बीमारियों को भगायें। आज से हम सब तन्दुरुस्त बनकर जीवन में दया, मानवता एवं ईमानदारी लाकर पृथ्वी पर स्वर्ग को उतारेंगे....

प्रातःकाल में दातुन करने से पहले पानी पीने से कई रोग मिट जाते हैं ऐसा हम लोगों ने अपने बुजुर्गों से कहानी के रूप में सुना है किन्तु अब हमारे देश के बुजुर्गों की बातों का प्रचार-प्रसार विदेशी लोगों के द्वारा किया जाता है तब हमें पता चलता है कि कैसा महान् है भारत का शरीरविज्ञान और अध्यात्म ज्ञान !

Happy holi to all of you & your family.

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ब्राह्मण विरोधियो तुम जैसे सिर्फ़ दूर से ताली बजा सकते हो । जबकि भारत के क्रान्तिकारियो मे 90% क्रान्तिकारी ब्राह्मण थे जरा देखो कुछ मशहूर ब्राह्मण क्रान्तिकारियो के नाम ब्राह्मण स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी
(१) चंद्रशेखर आजाद (२) सुखदेव (३) विनायक दामोदर सावरकर( वीर सावरकर ) (४) बाल गंगाधर तिलक (५) लाल बहाद्दुर शास्त्री (६) रानी लक्षमी बाई (७) डा. राजेन्द्र प्रसाद (८) पण्डित रामप्रसाद बिस्मिल (९) मंगल पान्डेय (१०) लाला लाजपत राय (११) देशबन्धु डा. राजीव दीक्षित (१२) नेताजी सुभाष चन्द्र बोस (१३) शिवराम राजगुरु (१४) विनोबा भावे (१५) गोपाल कृष्ण गोखले (१६) कर्नल लक्ष्मी सह्गल ( आजद हिंद फ़ौज की पहली महिला ) (१७) पण्डित मदन मोहन मालवीय (१८) डा. शंकर दयाल शर्मा (१९) रवि शंकर व्यास (२०) मोहनलाल पंड्या (२१) महादेव गोविंद रानाडे (२२) तात्या टोपे
(२३) खुदीराम बोस (२४) बाल गंगाधर तिलक (२५) चक्रवर्ती राजगोपालाचारी (२६) बिपिन चंद्र पाल (२७) नर हरि पारीख (२८) हरगोविन्द पंत (२९) गोविन्द बल्लभ पंत (३०) बदरी दत्त पाण्डे (३१) प्रेम बल्लभ पाण्डे (३२) भोलादत पाण्डे (३३) लक्ष्मीदत्त शास्त्री (३४) मोरारजी देसाई (३५) महावीर त्यागी (३६) बाबा राघव दास ७) स्वामी सहजानन्द सरस्वती
यह है ब्राह्मणो का भारत की क्रांती मे योगदान , तुम्हारा क्या है ? जरा बताओ तो तुम किस अधिकार से स्व्यं को भारतीय कहते हो और ब्राह्मणो का विरोध करते हो ।
यदि ब्राह्मण ही नही होगा तो किसी का भी अस्तित्व नही होगा ? 

जय भोलेनाथ
जय परशुराम

महाशिवरात्रि कल: इस विधि से करें भगवान शिव की पूजा, जानिए शुभ मुहूर्त
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महाशिवरात्रि(इस बार 10 मार्च, रविवार) के दिन भगवान शिव की पूजा करने से विशेष फल मिलता है। जो व्यक्ति इस दिन भगवान शिव के निमित्त व्रत रखता है उसे अक्षय पुण्य मिलता है। धर्म शास्त्रों में महाशिवरात्रि व्रत के संबंध में विस्तृत उल्लेख है। उसके अनुसार महाशिवरात्रि का व्रत इस प्रकार करें-

शिवपुराण के अनुसार महाशिवरात्रि के दिन व्रती(व्रत करने वाला) सुबह जल्दी उठकर स्नान संध्या करके मस्तक पर भस्म का त्रिपुण्ड तिलक और गले में रुद्राक्ष की माला धारण कर श्वि मंदिर में जाकर शिवलिंग का विधिपूर्वक पूजन करें। इसके बाद श्रृद्धापूर्वक व्रत का संकल्प इस प्रकार लें-
शिवरात्रिव्रतं ह्येतत् करिष्येहं महाफलम्।
निर्विघ्नमस्तु मे चात्र त्वत्प्रसादाज्जगत्पते।।
यह कहकर हाथ में फूल, चावल व जल लेकर उसे शिवलिंग पर अर्पित करते हुए यह श्लोक बोलें-
देवदेव महादेव नीलकण्ठ नमोस्तु ते।
कर्तुमिच्छाम्यहं देव शिवरात्रिव्रतं तव।।
तव प्रसादाद्देवेश निर्विघ्नेन भवेदिति।
कामाद्या: शत्रवो मां वै पीडां कुर्वन्तु नैव हि।।
रात्रिपूजा
व्रती दिनभर शिवमंत्र (ऊँ नम: शिवाय) का जप करे तथा पूरा दिन निराहार रहे। (रोगी, अशक्त और वृद्ध दिन में फलाहार लेकर रात्रि पूजा कर सकते हैं।) धर्मग्रंथों में रात्रि के चारों प्रहरों की पूजा का विधान है। सायंकाल स्नान करके किसी शिवमंदिर में जाकर अथवा घर पर ही (यदि नर्मदेश्वर या अन्य कोई उत्तम शिवलिंग हो) पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुंह करके तिलक एवं रुद्राक्ष धारण करके पूजा का संकल्प इस प्रकार लें-
ममाखिलपापक्षयपूर्वकसलाभीष्टसिद्धये शिवप्रीत्यर्थं च शिवपूजनमहं करिष्ये
व्रती को फल, पुष्प, चंदन, बिल्वपत्र, धतूरा, धूप, दीप और नैवेद्य से चारों प्रहर की पूजा करनी चाहिए। दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से अलग-अलग तथा सबको एक साथ मिलाकर पंचामृत से शिव को स्नान कराकर जल से अभिषेक करें। चारों प्रहर के पूजन में शिवपंचाक्षर(नम: शिवाय) मंत्र का जप करें। भव, शर्व, रुद्र, पशुपति, उग्र, महान्, भीम और ईशान, इन आठ नामों से पुष्प अर्पित कर भगवान की आरती व परिक्रमा करें। अंत में भगवान से प्रार्थना इस प्रकार करें-
नियमो यो महादेव कृतश्चैव त्वदाज्ञया।
विसृत्यते मया स्वामिन् व्रतं जातमनुत्तमम्।।
व्रतेनानेन देवेश यथाशक्तिकृतेन च।
संतुष्टो भव शर्वाद्य कृपां कुरु ममोपरि।।
अगले दिन सुबह पुन: स्नानकर भगवान शंकर की पूजा करके पश्चात व्रत खोलना चाहिए।

पूजन के शुभ मुहूर्त
सुबह 8:10 से 9:40 बजे तक (चर)
सुबह 9:40 से 11:08 बजे तक (लाभ)
सुबह 11:08 से दोपहर 12:30 बजे तक (अमृत)
दोपहर 2:06 से 3:35 बजे तक (शुभ)
शाम 6:32 से रात 8:00 बजे तक(शुभ)
रात 8:00 से 9:30 बजे तक (अमृत)
रात 9:30 से 11:00 बजे तक (चर)

Hamari sabhi mahila mitro ko women's day ki badhai.

विश्व में पहले यह आम धारणा थी कि मांसाहार शाकाहार से अच्छा भोजन है तथा कुछ लोगों का यह मानना था कि मांसाहार शरीर को मजबूत बनाता है और अत्यधिक ऊर्जा प्रदान करता है। इस सोच ने विश्व के अधिसंख्य लोगों को मांसाहारी बनाने के लिए प्रेरित किया। इसी सोच ने समूचे विश्व में बड़े-बड़े और आधुनिक बूचड़खानों को स्थापित किया। मुर्गी पालन, बकरी पालन और सूअर पालन आदि इसी सोच का परिणाम हैं, परन्तु जैसे-जैसे स्वास्थ्य जागरूकता बढ़ी है, लोगों में मांसाहार के प्रति आकर्षण कम हो रहा है। आज विश्व के अनेक देशों में शाकाहार अपनाने पर जोर दिया जा रहा है। भारत तो पहेले ही शाकाहार पर जोर देता रहा है


हमारा देश आहार के मामले में प्राचीन काल से ही जागरूक रहा है। सम्पूर्ण स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए हमारी संस्कृति में आहार और इसकी शुद्धि पर विशेष ध्यान दिया गया है। एक स्वस्थ जीवन के लिए शाकाहार को प्राथमिकता दी गयी है। छान्दोग्योपनिषद् में कहा गया है- "आहारशुद्धौ सत्वशुद्धि:। अर्थात भोजन की शुद्धि होने पर मानव की अन्तरात्मा शुद्ध होती है। "अन्नमयं हि सौम्य मन:" अर्थात जैसा अन्न खाया जाता है, वैसा ही मन, बुद्धि, विचार इत्यादि हो जाते हैं। मनु स्मृति में कहा गया है कि "अन्नं ब्रह्म इत्युपासीत" अन्न ब्रह्म है- यह समझकर उसकी उपासना करनी चाहिए। भागवत पुराण में कहा गया है कि वह व्यक्ति जो स्वाद इंद्रियों को नियंत्रित नहीं कर सकता वह अन्य इंद्रियों पर भी नियंत्रण नहीं रख सकता। वह व्यक्ति जो स्वाद इंद्रियों को नियंत्रित कर लेता है उसकी समस्त इंद्रियां पहले ही नियंत्रित हो जाती हैं। अल्प भोजन करना स्वास्थ्यवद्र्धक होता है। यदि भूख से अधिक भोजन किया जाए तो वह शरीर में विष का काम करता है। बेंजामिन फ्रैंकलिन ने कहा है कि "उदर ही समस्त रोगों का जड़ है।" अंग्रेजी कहावत है "अत्यधिक खाने वाले अपनी कब्र को अपने ही दांतों से खोदते हैं" बहुत से लोग अधिक भोजन करने के कारण उत्पन्न हुए रोगों से मरते हैं।

क्या तुम शूद्र हो?

पहले दो जातियां थीं आर्य और दस्यु। दस्यु को ही अनार्य कहा जाता था। यह सुर और असुर कहलाए। यही देव और दानव कहलाए। इन्हीं दोनों जातियों में से ही लोग ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य बनते थे। इसके लिए बकायदा शिक्षा दी जाती थी। जिसे जो बनना हो उसके लिए रास्ते खुले थे।

शूद्र, क्षत्रिय, वैश्य और फिर ब्राह्मण। शूद्र (क्षुद्र) रस्सी का प्रथम सिरा है तो ब्राह्मण रस्सी का अंतिम सिरा। जन्म से प्रत्येक व्यक्ति शूद्र है। प्रत्येक व्यक्ति शूद्र ही पैदा होता है, लेकिन वह बड़ा होकर कर्म या अपने भावानुसार क्षत्रिय, वैश्य या ब्राह्मणत्व धारण करता है।

दुनिया के हर देश और धर्म में चार तरह के लोग मिल जाएंगे- 
1.पहले वे जो ज्ञान, विज्ञान और धर्म में रुचि रखते हैं और सत्य आचरण करते हैं। पहले किस्म के लोग जरूरी नहीं है कि धर्म-कर्म में रुचि रखने वाले ही हों। वे साहित्य और सृजन के किसी भी क्षेत्र में रुचि रखने वाले हो सकते हैं।

ब्राह्मणत्व से तात्पर्य है जो ब्रह्म में विश्वास रखते हुए श्रेष्ठ चिन्तन व श्रेष्ठ कर्म का हो। दलित, आदिवासी आदि समाज के लोगों में ब्राह्मण मिलते हैं। 

2.दूसरे वे जो राजनीति और शक्ति के कार्य में रुचि रखते हैं। दूसरे किस्म के लोग जरूरी नहीं है कि राजनीति में ही रुचि रखने वाले हों। वे अच्‍छे सैनिक, खिलाड़ी, प्रबंधक और पराकर्म दर्शाने वाले सभी कर्म में रुचि रखने वालों में भी हो सकते हैं।

3.तीसरे वे जो उद्योग-व्यापार में रुचि रखकर सभी के हित के लिए कार्य करते हैं। तीसरे किस्म के लोग व्यापारी के अलावा श्रेष्ठ किस्म के व्यवस्थापक, अर्थ के ज्ञाता, बैंक या वित्त विभाग को संभालने वाले आदि हो सकते हैं।

4.चौथे किस्म के वे लोग जो किसी भी कार्य में रुचि नहीं रखते। जो रा‍क्षसी कर्म में ही रुचि रखते हैं अर्थात जिनकी दिनचर्या में शामिल होता है खाना, पीना, संभोग करना और सो जाना।

चौथे किस्म के लोग जरूरी नहीं है कि पशुवत या राक्षसी जीवन जीने वाले लोग ही हों, वे अपराधी और हर समय बुरा ही सोचने, बोलने और करने वाले लोग भी हो सकते हैं। वे मूढ़ किस्म के लोग होते हैं। ऐसे लोग पढ़े लिखे भी हो सकते हैं और अनपढ़ भी।

शूद्रत्व से अर्थ है ब्रह्म को छोड़कर अन्य में मन रमाने वाला निकृष्ट चिंतन व निकृष्ट कर्म करने वाला। तथाकथित ब्राह्मण समाज में भी शूद्र होते हैं। शूद्र निशाचरी, राक्षसी और प्रेत कर्म करने वाले को कहते हैं।

शनकैस्तु क्रियालोपदिनाः क्षत्रिय जातयः। 
वृषलत्वं गता लोके ब्राह्मणा दर्शनेन च॥ 
पौण्ड्रकाशचौण्ड्रद्रविडाः काम्बोजाः भवनाः शकाः । 
पारदाः पहल्वाश्चीनाः किरताः दरदाः खशाः॥- मनुसंहिता (1- (/43-44) 

अर्थात ब्राह्मणत्व की उपलब्धि को प्राप्त न होने के कारण उस क्रिया का लोप होने से पोण्ड्र, चौण्ड्र, द्रविड़ काम्बोज, भवन, शक, पारद, पहल्व, चीनी किरात, दरद व खश ये सभी क्षत्रिय जातियां धीरे-धीरे शूद्रत्व को प्राप्त हो गयीं।

ब्राह्मण कौन ?
न जटाहि न गोत्तेहि न जच्चा होति ब्राह्मणो।
यम्हि सच्चं च धम्मो च सो सुची सो च ब्राह्मणो॥- बुद्ध

अर्थात ब्राह्मण न तो जटा से होता है, न गोत्र से और न जन्म से। जिसमें सत्य है, धर्म है और जो पवित्र है, वही ब्राह्मण है। 

बुद्ध कहते हैं- जो ध्यानी, निर्मल, स्थिर, कृतकृत्य और आस्रव (चित्तमल) से रहित है, जिसने सत्य को पा लिया है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूं। ब्राह्मण वह है जो निष्पाप है, निर्मल है, निरभिमान है, संयत है, वेदांत-पारगत है, ब्रह्मचारी है, ब्रह्मवादी (निर्वाण-वादी) और धर्मप्राण है। जो पुरोहिताई करके अपनी जीविका चलाता है, वह ब्राह्मण नहीं, याचक है।

बुद्ध कहते हैं उसके ठीक विपरित जो है वह शूद्र है।

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इन्हें जरूर आजमायें -

* घर में तुलसी का पौधा अवश्य लगाएं। इससे परिवार में प्रेम बढ़ता है। तुलसी के पत्तों के नियमित सेवन से कई रोगों से मुक्ति मिलती है।
* ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) को हमेशा साफ-सुथरा रखें ताकि सूर्य की जीवनदायिनी किरणें घर में प्रवेश कर सकें।
* भोजन बनाते समय गृहिणी का हमेशा मुख पूर्व की ओर होना चाहिए। इससे भोजन सुपाच्य और स्वादिष्ट बनता है। साथ ही पूर्व की ओर मुख करके भोजन करने से व्यक्ति की पाचन शक्ति में वृद्धि होती है।
* जो बच्चे में पढ़ने में कमजोर हैं, उन्हें पूर्व की ओर मुख करके अध्ययन करना चाहिए। इससे उन्हें लाभ होगा।
*जिन कन्याओं के विवाह में विलम्ब हो रहा है, उन्हें वायव्य कोण (उत्तर-पश्चिम) के कमरे में रहना चाहिए। इससे उनका विवाह अच्छे और समृद्ध परिवार में होगा।
* रात को सोते वक्त व्यक्ति का सिर हमेशा दक्षिण दिशा में होना चाहिए। कभी भी उत्तर दिशा की ओर सिर करके नहीं सोना चाहिए। इससे अनिद्रा रोग होने की संभावना होती है साथ ही व्यक्ति की पाचन शक्ति पर विपरीत असर पड़ता है।
* घर में कभी-कभी नमक के पानी से पोंछा लगाना चाहिए। इससे नकारात्मक ऊर्जा नष्ट होती है।
*घर से निकलते समय माता-पिता को विधिवत (झुककर) प्रणाम करना चाहिए। इससे बृहस्पति और बुध ठीक होते हैं। इससे व्यक्ति के जटिल से जटिल काम बन जाते हैं।
* घर का प्रवेश द्वार एकदम स्वच्छ होना चाहिए। प्रवेश द्वार जितना स्वच्छ होगा घर में लक्ष्मी आने की संभावना उतनी ही बढ़ जाती है।
* प्रवेश द्वार के आगे स्वस्तिक, ॐ, शुभ-लाभ जैसे मांगलिक चिह्नों को उपयोग अवश्य करें।
* प्रवेश द्वार पर कभी ‍भी बिना सोचे-समझे गणेशजी न लगाएं। दक्षिण या उत्तरमुखी घर के द्वार पर ही गणेशजी लगाएं।
* विवाह पत्रिका कभी भूलकर भी न फाड़े क्योंकि इससे व्यक्ति को गुरु और मंगल का दोष लग जाता है।
* घर में देवी-देवताओं की ज्यादा तस्वीरें न रखें और शयन कक्ष में तो बिलकुल भी नहीं।
* शयन कक्ष में टेलीविजन कदापि न रखें क्योंकि इससे शारीरिक क्षमताओं पर विपरीत असर पड़ता है।
* दफ्तर में काम करते समय उत्तर-पूर्व की ओर मुख करके बैठें तो शुभ रहेगा, जबकि बॉस (कार्यालय प्रमुख) का केबिन नैऋत्य कोण में होना चाहिए।
* घर के भीतर शंख अवश्य रखें। इससे बजाने से 500 मीटर के दायरे में रोगाणु नष्ट होते हैं।
* पक्षियों को दाना खिलाने और गाय को रोटी और चारा खिलाने से गृह दोष का निवारण होता है।
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