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मैं चाहता हूँ: Mein Chahta Hun...
माँ सरस्वती की असीम कृपा से एक स्वरचित कविता जिसका शीर्षक है – “ मैं चाहता हूँ ” चाहता हूँ कि ज़ी भर के तेरे रुख़ को देखूँ, तेरी झील सी आँखो मे तैरना चाहता हूँ ।। चाहता हूँ तेरे लबों पे लब रखना, तुझको अपनी बाहों मे जकड़ना चाहता हूँ ।।...
http://rajulkumar.blogspot.in/2016/12/mein-chahta-hun.html

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"तुम वही हो ना!
जो मेरी अनकही बातों में होती हो।
जो मेरी तन्हा रातों में होती हो।
जो मेरी चलती सांसो में रसी है।
जो मेरी बंद आँखों में बसी है।
जो उन सभी सवालो में है, जिनसे मैं उलझ न सका।
जो उन सभी जवाबो में है, जिन्हे मैं समझ न सका।"

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"तुम वही हो ना!
जो मेरी अनकही बातों में होती हो।
जो मेरी तन्हा रातों में होती हो।
जो मेरी चलती सांसो में रसी है।
जो मेरी बंद आँखों में बसी है।
जो उन सभी सवालो में है, जिनसे मैं उलझ न सका।
जो उन सभी जवाबो में है, जिन्हे मैं समझ न सका।"

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http://rajulkumar.blogspot.in/2015/10/blog-post.html

शक्ति स्वरूपा माँ जगदंबा बस इतना वर दे
मनोकामना पूरी कर दे ।।1।।

कांतिवान शोभा अति सुंदर भाल टीका शोभते
शंख चक्र गदा त्रिशूल धनुष खड़ग कर शोभते
सिंह बिरजती माता जन जन के कष्ट हरे
शक्ति स्वरूपा माँ जगदंबा बस इतना वर दे
मनोकामना पूरी कर दे ।।2।।

प्रचंड कालिका रूप तुम धारे,  रक्तबीज दानव सब मारे
परम शक्ति रूप धरी माता,  महिषाशुर राक्षस संहारे
अन्नापूर्णा रूप माँ जब धरही,  कोटि कोटि की तृष्णा हर लेही
जब माँ शिव वाम भाग बिराजे,  सकल सृष्टि भव सागर तारे
शक्ति स्वरूपा माँ जगदंबा बस इतना वर दे
मनोकामना पूरी कर दे ।।3।।

हे शैलपुत्री,  हे ब्रह्मचारिणी,  हे चंद्रघंटा नमो नम:
हे कुशमंदा,  हे स्कंदमाता,  हे कात्ययिनी नमो नम:
हे कालरात्रि,  हे महागौरी,  हे सिद्धिदात्री नमो नम:
नमो नमो नवदुर्गा मंगलकरनी बुद्धि, विवेक, ओज से भर दे
हे पापनाशनी भवतारिणी माता, उर का दानव हर ले
शक्ति स्वरूपा माँ जगदंबा बस इतना वर दे
मनोकामना पूरी कर दे ।।4।।

ॐ दुर्गायै नमः।।

जलती बुझती लौ
इस ज़िन्दगी की
थम सी गई है
तारों की दुनियां में

कभी बुझती
कभी चुभती
कभी आँखों की किरकिरी
ये मेरे बन जाती

कभी कुछ यूं खिलखिलाती
जैसे कोई स्वप्न परी
अपना आंचल
हवा में लहराती

कभी कुछ कहती मुझसे
कभी बिन कहे
तारों की तरह टूट जाती

जलती बुझती लौ
इस ज़िन्दगी की
थम सी गई है
तारों की दुनिया में..

नेहा

Bewakuf Hote Hai Wo Log
Jo Kitab Me Chahera Daal Ke Padha Karte Hai
Hum To Unme Se Hai Jo Chahere Ko Dekh Ke
Kitab Likh Diya Karte Hai.

हर रोज मैं
मीलो का सफ़र तय करती हूँ
हर रोज मंजिल से मिलती हूँ
फिर हर रोज खुद को
ऊचाइयों पर पाती हूँ
उन पलों के हर पल में
खुद पर खूब इतराती हूँ
फिर जाने क्या होता है
हर दफ़ा उन ऊचाइयों से
नीचे गिरने लग जाती हूँ
सुबह की किरण की रौशनी लिए
फिर कल की मंजिल को
आज का सफ़र बनाने में लग जाती हूँ..
नेहा

मेरी अमावस्या की रात को
पूर्णिमा की चादर दे ना सके तुम
सब कुछ तो दे दिया तुमने
पर ये आसमां दे ना सके तुम
पूछने को तो तुमने
चाँद तारों की सच्चाई पूछ ली
भींगी मेरी पलकों की वजह
जाने क्यू पूछ ना सके तुम
मेरी अमावस्या की रात को
पूर्णिमा की चादर दे ना सके तुम..
नेहा

ये जो है तेरे मेरे एहसासों की डोरी
इसे बस ख़ामोशी में ही पीरोने दो

कुछ ना कहो
अल्फाज़ को मीठी याद बन कर रहने दो

एक दो पल नही है
तेरा मेरे साथ..
हर पल में ज़िन्दगी को जीने दो

कुछ ना कहो
अल्फाज़ को मीठी याद बन कर रहने दो
नेहा..

मेरी ज़िन्दगी गहरे नीले समुन्दर की तरह है
कभी लहरें उठती है, कभी थम जाती है
कभी समुन्दर के लहरों की तरह मचलती हूँ
तो कभी ज़िन्दगी की हकीक़त को
समझ सहम जाती हूँ

जितनी दूर चमकीली सुबह है
इस घनेरे रात से
उतनी ही दूर हमारी धड़कन है हमसे

जितनी समुन्दर की गहराई है
उतनी ही ज़िन्दगी में तन्हाई है

समुन्दर में जितनी गहराई होती है
रहस्य उतने ही होते है
ज़िन्दगी में जितने उतार-चढ़ाव आते है
मंजिल भी उतनी ही खुशी देती है
मेरी ज़िन्दगी गहरे नीले समुन्दर की तरह है...
नेहा
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