में ये पेज अभी के अभी डीलीट करने को तैयार हूँ, अगर मुझे नीचे लिखी सब बातों का सबूत के साथ जवाब मिल जाये...!!
ब्राह्मणों का डीएनए युरेशिया के लोगो से मेच हुआ है, ओर इस बात को सुप्रीम कोर्ट ने प्रमाणित किया है , कया ब्राह्मणों के पास कोई सबूत है की वो भारतीय हैं...??
सच्ची रामायण में ये लिखा है की दशरथ जी की आयू ज्यादा हो गयी थी , इस कारण उनहोने अपनी तीनों रानियां पंडितों को दे दी, तब राम जी ओर उनके तीन भाई पैदा हुए, सच्ची रामायण भी सुप्रीम कोर्ट द्वारा प्रमाणित है, कया कोई ब्राह्मण इसका खंडन कर सकता है...??
ढोल ग्वार शुद्र नारी तीनों ताडन के अधिकारी , ये वचन तुलसीदास जी के हैं , कया कोई इन वचनों को गलत साबित कर सकता है...??
मनुस्मृति में कहा गया है की औरतों को कोई काम स्वतंत्रता से ना करने दिया जाये, ओर शुद्रो को ब्राह्म जी के पेरो से पेदा हुआ कहा गया है , ओर ये भी लिखा है की शुद्रो को परमात्मा ने ब्राह्मणों की सेवा करने के लिये पैदा किया है , कया कोई इस बात को गलत साबित कर सकता है...??
पृथ्वी को एक राक्षस समुद्र में ले गया था तब विष्णु जी ने सुअर का अवतार लेकर पृथ्वी को समुद्र से निकाला था , ये बताओ की पृथ्वी के इलावा घर दूसरा समुद्र कहाँ हैं...??
कृष्ण गीता में कहते हैं की मै अजन्मा अव्यक्त अविनाशी सर्वशक्तिमान हूँ, में ही परमात्मा हूँ , लेकिन कृष्ण जी की मृत्यु किसी का तीर लगने के कारण हो गयी थी , तो सवाल ये है की कया कृष्ण जी सचमुच भगवान थे....??
ब्राह्म जी अपनी ही बेटी सरस्वती पर मोहित हो गये थे , कया कोई इस बात को गलत साबित कर सकता है...??
ब्राह्म जी ने ब्राह्मणों को मुंह से , क्षत्रियों को बाहों को, वेश्यो को लातों से ओर शुद्रो को पैरों से पैदा किया, सबसे पहली बात तो ये है कि ब्राह्म जी पुरूष थे तो इतने लोगों को कैसे पैदा किया, ओर दूसरा सवाल ये है की कया उनके मुह में, बाहों में, टांगों में ओर पैरों में योनि थी जिससे उनहोने ये सब पैदा किये ओर तीसरा सवाल ये है की उनको प्रगनेंट किसने किया..??
एक बार शिव जी, विष्णु जी के मोहिनी रूप पर मोहित हो गये थे, ओर मोहिनी के पिछे भागे थे, अगर शिव जी भगवान थे तो उनकी कामवासना कैसे भडक गयी...??
विष्णु जी ने वामन अवतार लिया था तब उनहोने राजा से तीन पेर जमीन मांगी को, वामन अवतार ने एक पेर में चांद को माप दिया, दूसरे में पाताल को, ओर तीसरा पैर में पृथ्वी को माप दिया तो मेरा सवाल ये है की हमारी पृथ्वी का संतुलन कयो नहीं डोला..??
राम जी ने सीता जी का त्याग कर दिया था , कया कोई भगवान शादी करेगा..?? चलो अगर शादी कर भी ले तो अपनी पत्नी की अग्नि परीक्षा कयों लेगा..??, कयोकि भगवान को तो सब पता होता है तो अग्नि परीक्षा की कया जरूरत..??
शुद्रो को पिछले 5000 साल से पुराण ओर वेद पढने का अधिकार नहीं था , पता है कयों...??
कयोकि पुराणों ओर वेदों में ये सब कचरा भरा हुआ था , शुद्रो की संख्या 80 करोड़ है ओर ब्राह्मणों की संख्या 4-5 करोड़ है फिर भी इन मुठ्ठी भर लोगों ने हमपर 5000 साल राज किया, ओर काल्पनिक भगवानों से हमको डराया, लेकिन अब हमारे बाबा साहेब का राज है ओर हम समझदार हो गये हैं अब हम उसी बात को मानेंगे जिसका हमको प्रमाण मिलेगा, दोस्तों ये पोस्ट सभी पंडितों के मुह पर मारिये ओर उनसे जवाब मांगे, अगर आपने हिम्मत है तो ये पोस्ट शेयर कीजिए।
जय भीम, जय संविधान, जय मूलनिवासी

गुप्त सूत्रो से संकेत RSS प्रमुख मोहन भागवत राष्ट्रपति पद के दौड़ में सबसे आगे
खेल अब शुरू हो गया है
क्या मायने हैं योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाये जाने के ?
आदित्यनाथ कट्टर हिंदुत्व का चेहरा है। मतलब हिन्दूराष्ट्र का प्रतीक।
RSS का 90 साल पुराना एजेंडा, हिन्दू राष्ट्र की स्थापना।
क्या है हिन्दू राष्ट्र ?
मनुस्मृति के अनुसार शासन का चलाना ही हिन्दू राज है। मतलब संविधान में बदलाव और उसे कमजोर करने की और पहला कदम है आदित्यनाथ।
आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाने के पीछे बहुत बड़ी योजना है। इससे हिंदुओं का ध्रुवीकरण होगा और मुस्लिमों,दलितों और आदिवासीयों को कमजोर किया जायेगा। आदित्यनाथ का चेहरा कट्टर हिंदुओं को एक साथ लाएगा और जोड़े रखेगा। दूसरी तरफ मोदी उदारवाद का झूठा चोला ओढ़कर हर वर्ग को अपने साथ जोड़ने का नाटक जारी रखेगा। मौर्य को उपमुख्यमंत्री बनाया जाना इसी योजना का हिस्सा है।
मोदी का यह नाटक तब तक जारी रहेगा जब तक मुसलमान, दलित और आदिवासी बिलकुल टूट नहीं जाते, बिलकुल कमजोर नहीं हो जाते। इसमें कई साल भी लग सकते हैं, कोई आजकल में नहीं होने वाला। दलित और आदिवासी आंदोलनों को ख़त्म किया जायेगा और विपक्ष को भी उभरने नहीं दिया जाएगा।
आदित्यनाथ कट्टर हिंदुओं को BJP के साथ जोड़े रखने के काम आएगा और मोदी विकास के नाम पर बचे लोगों को अपने साथ जोड़कर BJP को सबसे शक्तिशाली बनाने का काम जारी रखेगा।
वैसे यह सिर्फ एक दिखावा होगा, लोगों को मूर्ख बनाये रखने के लिए कि यहाँ लोकतंत्र चल रहा है, लोग अपने वोट से BJP को चुन रहे हैं। लेकिन असली काम करेगी EVM, जिसका उदाहरण अभी UP चुनाव में देखने को मिला। लोग सोचते रहेंगे की मुस्लिम ने BJP को वोट दिया, दलित और आदिवासी BJP के साथ हैं और पूरे भारत का साथ BJP को है।
दरअसल BJP सत्ता में लोगों को उल्लू बनाकर बने रहेगी लोगों ताकि कोई बगावत ना हो जाए, लोग विरोध में ना उतर आएं।
इधर दलितों को भगवान् और कर्मकांडों में उलझा कर ब्राह्मणवाद की नींव मजबूत की जाएगी, दलित और आदिवासी भी अब जमकर जय श्री राम करेंगे और राम की रक्षा के लिए जान देंगे। दलितों का इस्तेमाल मुस्लिमों को कमजोर करने में किया जाएगा। जब तक मुस्लिम टूट नहीं जाते, ख़त्म नहीं हो जाते,वोट बैंक बिखर नहीं जाता, दलित काम के रहेंगे।
मुस्लिमों को कमजोर करने के बाद अगले नंबर दलितों और आदिवासीयों का आएगा। दलितों को बहुत ही चालाकी से कमजोर किया जायेगा। इसके लिए OBC का सहारा लिया जाएगा और दलितों पर जुल्म होंगे ताकि वे अपने अधिकार भूलें।
दलितों और आदिवासीयों को कमजोर करने के लिए कई स्तर पर काम होगा। आरक्षण में बदलाव किये जायेंगे और प्रयास किया जाएगा कि 15-20 साल में इसे बिलकुल कमजोर कर दिया जाये। शिक्षा को आदिवासीयों और दलितों की पहुँच से दूर करने की कार्यवाही शुरू होगी और इस बात के पूरे इंतजाम किये जायेंगे की दलितों ,आदिवासीयों को कभी भी सर्वोच्च पदों पर ना पहुँचने दिए जाये।
बस ज्यादा कुछ नहीं होगा इतना ही होगा की दलित और आदिवासी फिर से गुलाम जैसे हो जाएंगे। नौकरियां कम हो जाएंगी और बेरोजगारी बढ़ जायेगी। इससे गरीबी बढ़ेगी और दलित ,आदिवासी ना चाहते हुए भी गुलामी करने को मजबूर हो जाएंगे।

रातो रात इस मैसेज को इतना फैला दो की आरएसएस का सपना ध्वस्त हो जाये

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*बौद्ध शक्ति पीठ द्वारा जनहित में जारी........

#लोकराजा

राष्ट्रपिता जोतीराव फुले ने कहा था कि बहुजन समाज के होशियार -होनहार बच्चों की शिक्षा में सहायता करो। राजर्षि छ्त्रपति शाहू महाराज व बड़ौदा नरेश श्रीमंत सयाजीराव गायकवाड अपने अंतिम समय तक यही कार्य कर रहे थे । राष्ट्रपिता जोतिराव फुले के अपूर्ण कार्य अर्थात सभी ब्रह्ममणेत्तर लोगों की शिक्षा हेतु 08 सितम्बर 1917 को अनिवार्य शिक्षा का कानून राजर्षि छ्त्रपति शाहू महाराज ने बनाया व 30 सितम्बर 1917 से इसपर अमल भी शुरू करवाया। छत्रपति शाहू महाराज के निर्णय का तिलक व अन्य सभी ब्राह्मणो ने कडा विरोध किया। किन्तु छत्रपति शाहू महाराज शिक्षा का महत्व जानते थे। शिक्षित मनुष्य विचार व तर्क करता है। उसे सही-गलत की परख करना आ जाता है। उसे न्याय व अन्याय ,भला-बुरा ,हित-अहित की समझ आ जाती है। शिक्षित मनुष्य जानकारी-आंकड़े एकत्रित कर सकता है। जानकारी का वर्गीकरण कर सकता है। वर्गिकरण का विश्लेषण कर सकता है। विश्लेषण कर निष्कर्ष निकाल सकता है। निष्कर्ष निकाल कर निर्णय ले सकता है। असंगठित लोगों को संगठित कर सकता है। चिर-निद्रित लोगों को जागृत कर सकता है। दिशाहीन लोगों को दिशा दे सकता है। नेतृत्वहीन लोगों को नेतृत्व दे सकता है। मतलब समाज का उद्धार कर सकता है। यह सब शिक्षा द्वारा हो सकता है इसे राजर्षि छत्रपति शाहू महाराज ने राष्ट्रपिता जोतीराव फुले से जाना था। इसीलिए उन्होने सबसे अधिक ज़ोर शिक्षा पर देने का निश्चय किया व कोल्हापुर को छात्रावासों से पाट दिया।अकेले कोल्हापुर में ही 22 छात्रावास थे। उस काल में महाराष्ट्र ,कर्नाटक ,गुजरात व सिंध सभी मुंबई प्रांत में शामिल थे। इन सभी इलाकों में अंग्रेज़ सरकार ने जितनी राशि का प्रावधान शिक्षा के लिए किया था उससे कहीं अधिक कोल्हापुर रियासत की आमदनी से वे खर्च किया करते थे। यह राशि एक लाख रुपये से अधिक की थी। महाराज की मृत्यु के कई सालों उपरांत सन 1930 में अंग्रेज़ सरकार ने सारे मुंबई प्रांत के लिए 01 लाख रुपये खर्च मंजूर किया। आज स्वतंत्र भारत में बजट का मात्र 1.66 % शिक्षा पर खर्च किया जाता है। शिक्षा पर यदि सबसे अधिक बजट होता है तो अन्य बातों के लिए अधिक बजट रखने की आवश्यकता नहीं पड़ती। किसी विद्वान ने कहा है “The person who opens the schools, closes the jails” .
ब्राह्मणेत्तर लोगों के लिए शिक्षा पर सर्वाधिक बजट रखने वाला एकमात्र राज्य कोल्हापुर है व एकमात्र राजा राजर्षि छत्रपति शाहू महाराज हैं।
-वामन मेश्राम

[4/22, 15:58] vilasp1968: इसे सभी लोग पढ़ें..*
1977 मेँ जनता पार्टी कीसरकार बनी जि मोरारजी द ब्राह्मण थे जिनको जयप्रकाश नारायण द्वारा प्रधानमंत्री पद के लिऐ नामांकित किया था।
चुनाव मेँ जाते समय जनता पार्टी ने अभिवचन दिया था कि यदि उनकी सरकार बनती है तो वे काका कालेलकर कमीशन लागू करेंगे। जब उनकी सरकार बनी तो OBC का एक प्रतिनिधिमंडल मोरारजी को मिला और काका कालेलकर कमीशन लागू करने के लिऐ मांग की मगर मोरारजी ने कहा कि कालेलकर कमीशन की रिपोर्ट पुरानी हो चुकी है, इसलिए अब बदली हुई परिस्थिति मेँ नयी रिपोर्ट की आवश्यकता है। *यह एक शातिर बाह्मण की OBC को ठगने की एक चाल थी*।
प्रतिनिधिमडंल इस पर सहमत हो गया और B.P. Mandal जो बिहार के यादव थे, उनकी अध्यक्षता मेँ मंडल कमीशन बनाया गया।
बी पी मंडल और उनके कमीशन ने पूरे देश में घूम-घूमकर 3743 जातियोँ को OBC के तौर पर पहचान किया जो 1931 की जाति आधारित गिनती के अनुसार भारत की कुल जनसंख्या 52% थे। मंडल कमीशन ने अपनी रिपोर्ट मोरारजी सरकार को सौपते ही, पूरे देश मेँ बवाल खङा हो गया। जनसंघ के 98 MPs के समर्थन से बनी जनता पार्टी की सरकार के लिए मुश्किल खङी हो गयी।
उधर अटल बिहारी बाजपेयी के नेतृत्व मेँ जनसंघ के MPs ने दबाव बनाया कि अगर मंडल कमीशन लागू करने की कोशिश की गयी तो वे सरकार गिरा देंगे। दूसरी तरफ OBC के नेताओँ ने दबाव बनाया ।
फलस्वरूप अटल बिहारी बसजपेयी ने मोरारजी की सहमति से जनता पार्टी की सरकार गिरा दी।
इसी दौरान भारत की राजनीति मेँ एक Silent revolution की भूमिका तैयार हो रही थी *जिसका नेतृत्व आधुनिक भारत के महानतम् राजनीतिज्ञ कांशीराम जी कर रहे थे*।
कांशीराम साहब और डी के खापर्डे ने 6 दिसंबर 1978 में अपनी बौद्धिक बैँक बामसेफ की स्थापना की जिसके माध्यम से पूरे देश मेँ OBC को मंडल कमीशन पर जागरण का कार्यक्रम चलाया। कांशीराम जी के जागरण अभियान के फलस्वरूप देश के OBC को मालुम पड़ा कि उनकी संख्या देश मेँ 52% मगर शासन प्रशासन में उनकी संख्या मात्र 2% है। जबकि 15% तथाकथित सवर्ण प्रशासन में 80% है। इस प्रकार सारे आंकङे मण्डल की रिपोर्ट मेँ थे जिसको जनता के बीच ले जाने का काम कांशीराम जी ने किया।
अब OBC जागृत हो रहा था। उधर अटल बिहारी ने जनसंघ समाप्त करके BJP बना दी। 1980 के चुनाव मेँ संघ ने इंदिरागांधी का समर्थन किया और इंन्दिरा जो 3 महीने पहले स्वयं हार गयी थी 370 सीट जीतकर आयी।
*इसी दौरान गुजरात में आरक्षण के विरोध में प्रचंड आन्दोलन चला*।
मजे की बात यह थी कि इस आन्दोलन में बङी संख्या OBC स्वयँ सहभागी था, क्योँकि ब्राह्मण-बनिया "मीडीया" ने प्रचार किया कि जो आरक्षण SC,ST को पहले से मिल रहा है वह बढ़ने वाला है।
गुजरात में अनु. जाति के लोगों के घर जलाये गये। नरेन्द्र मोदी इसी आन्दोलन के नेतृत्वकर्ता थे।
कांशीराम जी अपने मिशन को दिन-दूनी रात-चौगुनी गति से बढा रहे थे।
ब्राह्मण अपनी रणनीति बनाते पर
उनकी हर रणनीति की काट कांशीराम जी के पास थी। कांशीराम ने वर्ष 1981 में DS4 ( DSSSS) नाम की "आन्दोलन करने वाली विंग" को बनाया। जिसका नारा था 'ब्राह्मण बनिया ठाकुर छोङ बाकी सब हैं DS4!'
DS4 के माध्यम से ही कांशीराम जी ने एक और प्रसिद्ध नारा दिया "मंडल कमीशन लागु करो वरना सिँहासन खाली करो।' इस प्रकार के नारो से पूरा भारत गूँजने लगा।
1981 में ही मान्यवर कांशीराम ने हरियाणा का विधानसभा चुनाव लङा, 1982 मेँ ही उन्होने जम्मू काश्मीर का विधान सभा का चुनाव लङा।
अब कांशीराम जी की लोकप्रियता अत्यधिक बढ गयी।
ब्राह्मण-बनिया "मीडिया" ने उनको बदनाम करना शुरू कर दिया। उनकी बढती लोकप्रियता से इंन्दिरा गांधी घबरा गयीं।
इंन्दिरा को लगा कि अभी-अभी जेपी के जिन्न*से पीछा छूटा कि *अब ये कांशीराम तैयार हो गये। इंन्दिरा जानती थी कांशीराम जी का उभार जेपी से कहीँ ज्यादा बङा खतरा ब्राह्मणोँ के लिये था। उसने संघ के साथ मिलने की योजना बनाई।
अशोक सिंघल की एकता यात्रा जब दिल्ली के सीमा पर पहुँची, तब इंन्दिरा गांधी स्वयं माला लेकर उनका स्वागत करने पहुंची।
इस दौरान भारत में एक और बङी घटना घटी।
भिंडरावाला जो खालिस्तान आंदोलन का नेता था, जिसको कांग्रेस ने अकाल तख्त का विरोध करने के लिए खङा किया था, उसने स्वर्णमंदिर पर कब्जा कर लिया।
RSS और कांग्रेस ने योजना बनाई अब मण्डल कमीशन आन्दोलन को भटकाने के लिऐ हिन्दुस्थान vs खालिस्थान का मामला खङा किया जाय। इंन्दिरा गांधी आर्मी प्रमुख जनरल सिन्हा को हटा दिया और एक साऊथ के ब्राह्मण को आर्मी प्रमुख बनाया। जनरल सिन्हा ने इस्तीफा दे दिया।
आर्मी में भूचाल आ गया। नये आर्मी प्रमुख इंन्दिरा गांधी के कहने पर OPERATION BLUE STAR
की योजना बनाई और स्वर्ण मंदिर के
[4/22, 15:58] vilasp1968: इंन्दिरा गांधी आर्मी प्रमुख जनरल सिन्हा को हटा दिया और एक साऊथ के ब्राह्मण को आर्मी प्रमुख बनाया।* जनरल सिन्हा ने इस्तीफा दे दिया।
आर्मी में भूचाल आ गया। नये आर्मी प्रमुख इंन्दिरा गांधी के कहने पर OPERATION BLUE STAR
की योजना बनाई और स्वर्ण मंदिर के अन्दर टैँक घुसा दिया।
पूरी आर्मी हिल गयी। पूरे सिक्ख समुदाय ने इसे अपना अपमान समझा और 31 Oct. 1984 को इंन्दिरा गांधी को उनके दो Personal guards बेअन्तसिह और सतवन्त सिँह, जो दोनो अनुसुचित जाति के थे, ने इंन्दिरा गांधी को गोलियों से छलनी कर दिया।
माओ अपनी किताब 'ON CONTRADICTION' में लिखते हैं कि शासक वर्ग किसी एक षडयंत्र को छुपाने के लिऐ दुसरा षडयंत्र करता है, पर वह नहीँ जानता कि इससे वह अपने स्वयँ के लिए कोई और संकट खङा कर देता है।' _माओ_की यह बात भारतीय राजनीति के परिप्रेक्ष्य मेँ सटीक साबित होती है।
मंडल कमीशन को दबाने वाले षडयंत्र का बदला शासक वर्ग ने 'इंन्दिरा गांधी' की जान देकर चुकाया।
इंन्दिरा गांधी की हत्या के तुरन्त बाद राजीव गांधी को नया प्रधानमंत्री मनोनीत कर दिया गया। जो आदमी 3 साल पहले पायलटी छोङकर आया था, वो देश का 'मुगले आजम' बन गया। इंन्दिरा गांधी की अचानक हत्या से सारे देश मेँ सिक्खोँ के विरूद्ध माहौल तैयार किया गया। दंगे हुऐ। अकेले दिल्ली में 3000 सिक्खो का कत्लेआम हुआ जिसमें तत्कालीन मंत्री भी थे। उस दौरान राष्ट्रपति श्री ज्ञानी जैल सिँह का फोन तक *प्रधनमंत्री राजीव गांधी*ने रिसीव नहीँ किये। उधर कांशीराम जी अपना अभियान
जारी रखे हुऐ थे। उन्होनेँ अपनी राजनीतिक पार्टी BSP की स्थापना की और सारे देश में साईकिल यात्रा निकाली। कांशीराम जी ने एक नया नारा दिया "जिसकी जितनी संख्या भारी उसकी ऊतनी हिस्सेदारी।"
कांशीराम जी मंडल कमीशन का मुद्दा बङी जोर शोर से प्रचारित किया, जिससे उत्तर भारत के पिछङे वर्ग मेँ एक नयी तरह की सामाजिक, राजनीतिक चेतना जागृत हुई।
इसी जागृति का परिणाम था कि पिछङे वर्ग नया नेतृत्व जैसे कर्पुरी ठाकुर, लालु, मुलायम का उभार हुआ।
अब कांशीराम शोषित वंचित समाज के सबसे बङे नेता बनकर उभरे। वही 1984 का चुनाव हुआ पर इस चुनाव कांशीराम ने सक्रियता नहीँ दिखाई ।पर राजीव गांधी को सहानुभुति लहर का इतना फायदा हुआ कि राजीव गांधी 413 MPs चुनवा कर लाये। जो राजीव जी के नाना ना कर सके वह उन्होने कर दिखाया।
सरकार बनने के बाद फिर मण्डल का जिन्न जाग गया। OBC के MPs संसद मेँ हंगामे शुरू कर दिये । शासक वर्ग फिर नयी व्युह रचना बनाने की सोची।
अब कांशीराम जी के अभियानो के कारण OBC जागृत हो चुका था। अब शासक वर्ग के लिऐ मंडल कमीशन का विरोध करना संभव नहीँ था।
2000 साल के इतिहास मेँ शायद ब्राह्मणोँ ने पहली बार कांशीराम जी के सामने असहाय महसूस किया।
कोई भी राजनीतिक उदेश्य इन तीन साधनोँ से प्राप्त किया जा सकता है वह है-
1) शक्ति संगठन की,
2) समर्थन जनता का और
3) दांवपेच नेता का।
कांशीराम जी के पास तीनो कौशल थे और दांवपेच के मामले मेँ वे ब्राह्मणोँ से 21 थे। अब यह समय था जब कांग्रेस और संघ की सम्पूर्ण राजनीतिक केवल कांशीराम जी पर ही केन्द्रित हो गया।
1984 के चुनावोँ में बनवारी लाल पुरोहित ने मध्यस्थता कर राजीव गांधी और संघ का समझौता करवाया एवं इस चुनाव मेँ संघ ने राजीव गांधी का समर्थन किया। गुप्त समझौता यह था कि राजीव गांधी राम मंदिर आन्दोलन का समर्थन करेगेँ और हम मिलकर रामभक्त OBC को मुर्ख बनाते है।
राजीव गांधी ने ही बाबरी मस्जिद के ताले खुलवाये, उसके अन्दर राम के बाल्यकाल की मूर्ति भी रखवाईं ।
अब ब्राह्मण जानते थे अगर मण्डल कमीशन का विरोध करते है तो "राजनीतिक शक्ति" जायेगी, क्योकि 52% OBC के बल पर ही तो वे बार बार देश के राजा बन जाते थे, और समर्थन करते हैं तो कार्यपालिका में जो उन्होने स्थायी सरकार बना रखी थी वो छिन जाने खा खतरा था।
विरोध करें तो खतरा, समर्थन करें तो खतरा। करें तो क्या करें?
तब कांग्रेस और संघ मिलकर OBC पर विहंगम दृष्टि डाली तो उनको पता चला कि पूरा OBC रामभक्त है।
उन्होँने मंडल के आन्दोलन को कमंडल की तरफ मोङने का फैसला किया। सारे देश में राम मंदिर अभियान छेङ दिया। बजरंग दल का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया जो पिछङा था।
कल्याण सिंह, रितंभरा, ऊमा भारती, गोविन्दाचार्य आदि वो मुर्ख OBC थे जिनको संघ ने सेनापति बनाया।
जिस प्रकार ये लोग हजारोँ सालो से ये पिछङो में विभीषण पैदा करते रहे इस बार भी इन्होंने ऐसा ही किया।
वहीँ दूसरी तरफ *अनियंत्रित राजीव गांधी ने खुद को अन्तर्राष्ट्रीय नेता बनाने एवं मंडल कमीशन का
मुद्दा दबाने के लिऐ प्रभाकरण से समझौता किया* तथा प्रभाकरण को वादा किया कि जिस प्रकार उसकी माँ (इंदिरागा
[4/22, 15:58] vilasp1968: इंदिरागांधी) ने पाकिस्तान का विभाजन कर देश-दुनिया की राजनीति में अपनी धाक पैदा की वैसे वह भी श्रीलंका का विभाजन करवाकर प्रभाकरण को तमिल राष्ट्र बनवाकर देगा।
वहीं राजीव गांधी की सरकार में वी.पी. सिंह रक्षा मंत्री थे।
बोफोर्स रक्षा सौदे में भ्रष्टाचार राजीव गांधी की सहायता से किया गया जिसको उजागर किया गया। यह राजीव गांधी की साख पर बट्टा था।
वीपी सिंह इसको मुद्दा बनाकर अलग जन मोर्चा बनाया। अब असली घमासान था। 1989 के चुनाव की लङाई दिलकश हो चली थी। पूरे उत्तर भारत में कांशीराम जी बहुजन समाज के नायक बनकर उभरे। उन्होने 13 जगहो पर चुनाव जीता जबकि 176 जगहोँ पर वे कांग्रेस का पत्ता साफ करने में सफल हो गये।
राजीव गांधी जो कल तक दिल्ली का मुगल था कांशीराम जी के कारण वह रोड मास्टर बन गया। कांग्रेस 413 से धङाम 196 पर आ गयी। वी पी सिंह के गठबनधन 144 सीटें मिली, जिसके कारण वी पी सिंह ने चुनाव में जाने की घोषणा की और कहा कि यदि उनकी सरकार बनी तो मंडल कमीशन लागू करेंगे।
चन्द्रशेखर व चौधरी देवीलाल के साथ मिलकर सरकार बनाने की योजना वी पी सिंह द्वारा बनायी गयी। चौधरी देवीलाल प्रधानमंत्री पद के सबसे बङे दावेदार थे पर योजना इस प्रकार से बनायी गयी थी कि संसदीय दल की बैठक में दल का नेता (प्रधानमंत्री) चुनने की माला चौ. देवीलाल के हाथ में दे दी जाए । चौ. देवीलाल (इस झूठे सम्मान से कि नेता चुनने का हक़ उनको दिया गया) माला वी पी के गले में डाल दिया। इस प्रकार वी पी सिंह नये प्रधानमंत्री बने।
प्रधानमंत्री बनते ही OBC नेताओं ने मंडल कमीशन लागू करवाने का दबाव डाला। वी पी सिँह ने बहानेबाजी की पर अन्त में निर्णय करने के लिए चौ. देवीलाल की अध्यक्षता मेँ एक कमेटी बनायी।
याद रहे कि मंडल कमीशन के चैयरमैन बी. पी. मंडल यादव थे, शायद इसीलिए मंडल कमीशन की लिस्ट में उन्होने यादवों को तो शामिल कर लिया मगर जाटों को शामिल नही किया।
चौधरी देवीलाल ने कहा कि इसमे जाटों को शामिल करो फिर लागू करो मगर ठाकुर वी पी सिँह इनकार कर दिया।
चौधरी देवीलाल नाराज होकर कांशीराम जी के पास गये और पूरी कहानी सुनाकर बोले मुझे आपका साथ चाहिये। कांशीराम जी बोले कि 'ताऊ तुझे जनता ने "Leader" बनाया मगर ठाकुर ने "Ladder" (सीढी) बनाया।
तेरे साथ अत्याचार हुआ और दुनिया में जिसके साथ अत्याचार होता है कांशीराम उसका साथ देता है।' कांशीराम जी और देवीलाल ने वी पी सिंह के विरोध में एक विशाल रैली करने वाले थे। उसी दौरान शरद यादव और रामविलास पासवान ने वी पी सिंह से मुलाकात की। उन्होँने वी पी से कहा कि हमारे नेता आप नही बल्कि चौधरी देवीलाल है। अगर आप मंडल लागू कर दे तो हम आपके साथ रहेंगे अन्यथा हम भी देवीलाल और कांशीराम का साथ देंगे।
ठाकुर वी पी सिँह की कुर्सी संकट से घिर गयी। कुर्सी बचाने के डर से वी पी सिंह ने मंडल कमीशन लागू करने की घोषणा कर दी।
सारे देश मेँ बवाल खङा हो गया। Mr. Clean से Mr. Corrupt बन चुके राजीव गांधी ने बिना पानी पिये संसद में 4 घंटे तक मंडल के विरोध में भाषण दिया।
जो व्यक्ति 10 मिनिट तक संसद में ठीक से बोल नहीं सकता था, उसने OBC का विरोध अपनी पूरी ऊर्जा से पानी पी-पी कर किया और 4 घंटे तक बोला।
वी पी सिंह सरकार गिरा दी गयी। चुनाव घोषणा की हुयी और एम नागराज नाम के ब्राह्मण ने उच्चतम न्यायालय में आरक्षण के विरोध में मुकदमा (केश) कर दिया ।
इधर राजीव गांधी ने जो प्रभाकरण से वादा किया था वो पूरा नही कर सके थे बल्कि UNO के दबाव मे ऊन्होँने शांति सेना श्रीलंका भेज दी थी। राजीव गांधी के कहने पर प्रभाकरण के साथी कानाशिवरामन को BOMB बनाने की ट्रेनिँग दी गयी थी। जब प्रभाकरण को लगा कि राजीव गाँधी ने धोखा किया। उसने काना शिवरामन को राजीव गांधी की हत्या कर देने का आदेश दिया और मई 1991 मे राजीव गांधी को मानव बम द्वारा ऊङा दिया गया। *एक बार फिर माओ का कथन सत्य सिद्ध हुआ।*और मंडल के भूत ने राजीव गांधी की जान ले ली।
राजीव गांधी हत्या का फायदा कांग्रेस को हुआ। कांग्रेस के 271 सांसद चुनकर आये। शिबु सोरेन व एक अन्य को खरीदकर कांग्रेस ने सरकार बनायी। वी पी नरसिंम्हराव दक्षिण के ब्राह्मण प्रधानमंत्री बने।
दूसरी तरफ मंडल कमीशन के विरोध मे Supreme court के 31 आला ब्राह्मण वकील सुप्रीम कोर्ट पहुँच गये।
लालू यादव बिहार के मुख्यमंत्री थे, पटना से दिल्ली आये। सारे ब्राह्मण-बनिया वकीलों से मिले। कोई भी वकील पैसा लेकर भी मंडल के समर्थन में लङने के लिऐ तैयार नही था।
लालू यादव ने रामजेठमलानी से निवेदन किया मगर जेठमलानी Criminal Lawyer थे जबकि यह संविधान का मामला था, फिर भी रामजेठमलानी ने यह केस लङा। मगर SUPREME COURT ने 4 बङे फैसले OBC के खिलाफ दिये।
1. केवल 1800 जातियों को OBC माना।
2. 52% OB
[4/22, 15:58] vilasp1968: 1. केवल 1800 जातियों को OBC माना।
2. 52% OBC को 52% देने की बजाय संविधान के विरोध में जाकर 27% ही आरक्षण होगा।
3. OBC को आरक्षण होगा पर प्रमोशन मेँ आरक्षण नहीँ होगा।
4. क्रीमीलेयर होगा अर्थात् जिस OBC का INCOME 1 लाख होगा उसे आरक्षण नहीँ मिलेगा।
इसका एक आशय यह था कि जिस OBC का लङका महाविद्यालय मेँ पढ रहा है उसे आरक्षण नहीँ मिलेगा बल्कि जो OBC गांव मेँ ढोर ढाँगर
चरा रहा है उसे आरक्षण मिलेगा।
यह तो वही बात हो गई कि दांत वाले से चना छीन लिया और बिना दांत वाले को चना देने कि बात करता है ताकि किसी को आरक्षण का लाभ न मिले।
ये चार बङे फैसले सुप्रीम कोर्ट के सेठ जी ऍव भट्टजी ने OBC के विरोध मेँ दिये। दुनिया की हर COURT में न्याय मिलता है जबकि भारत की SUPREME COURT ने 52% OBC के हक और अधिकारों के विरोध का फैसला दिया।
भारत के शासक वर्ग अपने हित के लिऐ सुप्रीम कोर्ट जैसी महान् न्यायिक संस्था का दुरूपयोग किया।
मंडल को रोकने के लिऐ कई हथकंडे अपनाऐ हुऐ थे जिसमें राम मंदिर आन्दोलन बहुत बङा हथकंडा था। उत्तर प्रदेश मेँ बीजेपी ने मजबूरी मेँ कल्याण सिंह जो कुर्मी थे उनको मुख्यमंत्री बनाया।
आपको बताता चलूं की कांशीराम जी के उदय के पश्चात् ब्राह्मणोँ ने लगभग हर राज्य में OBC मुख्यमंत्री बनाना शुरू किये ताकि OBC का जुङाव कांशीराम जी के साथ न हो। इसी वजह से एक कुर्मी को मुख्यमंत्री बनाया गया।
आडवाणी ने रथ यात्रा निकाली। नरेन्द्र मोदी आडवाणी के हनुमान बने। याद रहे कि सुप्रीम कोर्ट ने मंडल विरोधी निर्णय 16 नवम्बर 1992 को दिया और शासक वर्ग ने 6 दिसम्बर 1992 को बाबरी मस्जिद गिरा दी गयी। बाबरी मस्जिद गिराने मे कांग्रेस ने बीजेपी का पूरा साथ दिया। इस प्रकार सुप्रिम कोर्ट के निर्णय के बारे में OBC जागृत न हो सके, इसीलिए बाबरी मस्जिद गिराई गयी।
शासक वर्ग ने तीर मुसलमानों पर चलाया पर निशाना OBC थे। जब भी उन पर संकट आता है वे हिन्दु और मुसलमान का मामला खङा करते हैं। बाबरी मस्जीद गिराने के बाद कल्याणसिंह सरकार बर्खास्त कर दी गयी।
दूसरी तरफ कांशीराम जी UP के गांव गांव जाकर षडयंत्र का पर्दाफाश कर रहे थे। उनका मुलायम सिंह से समझौता हुआ। विधानसभा चुनाव हुए कांशीराम जी की 67 सीट एवं मुलायम सिँह को 120 सीटें मिली। बसपा के सहयोग से मुलायम सिंह मुख्यमंत्री बने।
UP के OBC और SC के लोगों ने मिलकर नारा लगाया "मिले मुलायम कांशीराम हवा मेँ ऊङ गये जय श्री राम।"
शासक जाति को खासकर ब्राह्मणवादी सत्ता को इस गठबन्धन से और ज्यादा डर लगने लगा।
इंडिया टुडे ने कांशीराम भारत के अगले प्रधानमंत्री हो सकते हैं ऐसा ब्राह्मणोँ को सतर्क करने वाला लेख लिखा। इसके बाद शासक वर्ग अपनी राजनीतिक रणनीति में बदलाव किया। लगभग हर राज्य का मुख्यमंत्री ऊन्होनेँ शूद्र(OBC) बनाना शुरू कर दिये। साथ ही उन्होने दलीय अनुशासन को कठोरता से लागू किया ताकि निर्णय करते वक्त वे स्वतंत्र रहें।
1996 के चुनावों में कांग्रेस फिर हार गयी और दो तीन अल्पमत वाली सरकारें बनी। यह गठबन्धन की सरकारें थी। इन सरकारों में सबसे महत्वपुर्ण सरकार H.D. देवेगौङा (OBC) की सरकार थी जिनके कैबिनेट में एक भी ब्राह्मण मंत्री नही था। आजाद भारत के इतिहास मे पहली बार ऐसा हुआ जब किसी प्रधानमंत्री के केबिनेट मे एक भी ब्राह्मण मंत्री नही था। इस सरकार ने बहुत ही क्रांतिकारी फैसला लिया। वह फैसला था OBC की गिनती करने का फैसला जो मंडल का दूसरी योजना थी, क्योँकि 1931 के आंकङे बहुत पुराने हो चुके थे। OBC की गिनकी अगर होती तो देश मे OBC की सामाजिक, आर्थिक स्थिति क्या है और उसके सारे आंकङे पता चल जाते। इतना ही नही 52% OBC अपनी संख्या का उपयोग राजनीतिक ऊद्देश्य के लिऐ करता तो आने वाली सारी सरकारेँ OBC की ही बनती। शासक वर्ग के समर्थन से बनी देवेगोङा की सरकार फिर गिरा दी गयी।
शासक वर्ग जानता है कि जब तक OBC धार्मिक रूप से जागृत रहेगा तब तक हमारे जाल मेँ फँसता रहेगा जैसे 2014 मेँ फंसा। शायद जाति अधारित गिनती ओबीसी की करने का निर्णय देवेगौङा सरकार ने नहीं किया होता तो शायद उनकी सरकार नही गिरायी जाती।
ब्राह्मण अपनी सत्ता बचाने के लिये हरसंभव प्रयत्न में लगे रहे। वे जानते थे कि अगर यही हालात बने रहे थे तो ब्राह्मणों की राजनीतिक सत्ता छीन ली जायेगी।
जो लोग सोनिया को कांग्रेस का नेता नहीँ बनाना चाहते थे वे भी अब सोनिया को स्वीकार करने लगे।
कांग्रेस वर्किग कमेटी मे जब शरद पवार ने सोनिया के विदेशी होने का मुद्दा उठाया तो आर.के. धवन नामक ब्राह्मण ने थप्पङ मारा। पी ऐ संगमा, शरद पवार, राजेश पायलट, शरद पवार, सीताराम केसरी, सबको ठिकाने लगा दिया। शासक वर्ग ने गठबन्धन की राजनीति स्वीकार ली।
उधर अटल बिहारी कश्मीर पर गीत गाते गाते 1999 मे फिर प्रधानम
[4/22, 15:58] vilasp1968: उधर अटल बिहारी कश्मीर पर गीत गाते गाते 1999 मे फिर प्रधानमंत्री हुऐ। अगर कारगिल नही हुआ होता तो अटल फिर शायद चुनकर आते। सरकार बनाते ही अटल बिहारी ने संविधान समीक्षा आयोग बनाने का निर्णय लिया।
अरूण शौरी ने बाबासाहब अम्बेडकर को अपमानित करने वाली किताब 'Worship of false gods' लिखी। इसके विरोध मेँ सभी संगठनो ने विरोध किया। विशेषकर बामसेफ के नेतृत्व मेँ 1000 कार्यक्रम सारे देश में आयोजित किये गये। अटल सरकार न े अपना फैसला वापस (पीछे) ले लिया।
ये भी नया हथकंडा था वास्तविक मुद्दो को दबाने का। फिर 2011 में जनगणना होनी थी। मगर OBC की जनगणना नहीँ करने का फैसला किया गया। इसलिए भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में संख्याबल के हिसाब से शासक बनने वाला ओबीसी वर्ग सिर्फ और सिर्फ ब्राह्मणवादी/मनुवादी शासकों का पिछलग्गू बन कर रह गया है। वो अपना नुकसान तो कर ही रहा है, साथ में अपने दलित भाई बंधुओं का भी नुकसान कर रहा है, जो ब्राह्मणवादी सत्ता को समाप्त करने का निरंतर प्रयत्नशील हैं
*जय मुल निवासी *

💐बौद्ध धर्म और डॉ बी0 आर0 अम्बेडकर💐
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भारत मे हिन्दू धर्म मे वार्णिक व्यवस्था के आधार पर मानव में जातियो का विभाजन किया गया। अगर जाति विहीन मनुष्य की संकल्पना की गई होती,तो आज के दौर में विखंडन का सिलसिला नही चलता। न ही जाति,धर्म के नाम पर किसी प्रकार की राजनीति होती। निम्न वर्ग में व्याप्त सामाजिक असमानता छुआछुत,जातिवाद,अंधविश्वास,अशिक्षा के कारण ही मनुष्य के साथ मे जानवरो जैसा कुटिल वर्ताव किया गया। और स्वयं वार्णिक मनुष्य ने इस अंधविश्वास से मानवता का पतन किया। नही तो आज जो देश के निम्न वर्ग को नए मार्ग की तलाश नही करनी पड़ती।मनुष्य की अशिक्षा उसके सारे उन्नति के दरवाजे बंद कर देती है। उसे हर जगह इस प्रगतिशील समाज मे बिना शिक्षा के उपहास का पात्र बनना पड़ता है। उसके साथ अशिक्षा के कारण सर्व सम्पन्न व्यक्ति भी कुटिल वर्ताव करता है।
जीवन की चुनौतियों से निपटने के लिए कठिन संघर्ष करना पड़ता है। नए मार्ग की तलाश करनी पड़ती है। नए मार्ग पर चलने के लिए हिम्मत व उमंग की आवश्यकता होनी जरूरी होती है।
कहते है कि जब समय परिवर्तनशील होता है। तब सारी असमानताएं से संघर्ष की शक्ति प्रकृति प्रदान कर देती है।तब एक महानायक का जन्म होता है।महानायको एवं महांपुरुषो की एक अलग छवि होती है। जो अपने महान कार्यो, विचारो के लिए सदियों तक मानवता के इतिहास में जीवित रहते है।
उनके महान कार्यो की वजह से जीवन मे उन्हें प्रेरणा के बतौर याद किया जाता है।
ऐसे ही महान प्रेरणास्रोत बाबा साहब डॉ बी0 आर0 अम्बेडकर जी ने वार्णिक इतिहास को बदल कर निम्न वर्ग के समाज के विकास के लिए एक नया कीर्तिमान रच दिया। शोषितों के लिए विकास के दरवाजे खोल दिये। उन्होंने अपने जीवन को तो सामाजिक विसंगतियों में जिया,पर एक पिता बनकर शोषितों के हितो के बंद सारे दरवाजे खोल दिये। एक माता पिता तो जन्म का कर्म कर अपना दायित्व पूरा कर सकता है,पर असमानता जैसे मुद्दे पर बाबा साहब के पहले कोई पिता बनकर शोषितों का उद्धार नही करने आया।
उन्होंने ही बुद्ध का धम्म दिया जहां पर ऊंच, नीच, छुआछूत, असमानता के बजाय समानता, भाईचारा, मानवता करुणा का विशाल भंडार उपहार स्वरूप मिला।
भारत में बुद्ध का धम्म सारे धर्मो में अद्वितीय है,पर सवाल ये है कि भारत मे आजादी से पूर्व किस धर्म की मान्यता अधिक थी? और क्यों थी?
बुद्ध धर्म का पतन उसकी अच्छाइयों की वजह से हुआ। क्योंकि धम्म का मार्ग सरल है।सीधा है।राजनैतिक परिदृश्यों से परे रहा है। पर दुनिया मे अन्य धर्मों की प्रतिस्पर्धा भी रही है। जिन्होंने अपने धर्म को राजनीति के उस साम,दाम ,दंड की नीति को अपनाकर अपने धर्म का विस्तार करने के लिए धम्म को भारत के कोने कोने से नष्ट कर दिया।
आज भारत का हर धर्म, जाति का नागरिक बाबा साहब के बनाये संविधान पर चल रहा है। समानता का पाठ पढ़ाता हमारा संविधान धर्म निरपेक्षता की बात करता है। सभी अपने अपने धर्म के नियमो का पालन स्वेच्छा से स्वतंत्र रूप से कर सकते है। क्या यह स्वतंत्र भारत के लिए अच्छा नही है? संविधान से पूर्व धर्म की राजनीति रही है। मगर आज स्वतंत्र व स्वच्छ रास्ते चुनने के लिए सारे विकल्प खुले हुए है।
वर्तमान परिदृश्य में बुध्द के धम्म से हर धर्म के लोग जुड़ गए है। उनका मानना है कि बुद्ध का धम्म चमारो की वजह से दूषित हो रहा है। क्योंकि आम लोगो की अवधारणा बन चुकी है कि बुद्ध का धम्म चमारो का धर्म है। क्योंकि जहां पर धम्म की चर्चा होती है तो वहां पर सबसे पहले डॉ आंबेडकर का नाम बड़े ही श्रद्धा के साथ लिया जाता है। ऐसा होने पर जो लोग अन्य धर्मों से बुद्ध का अनुशरण करने के लिए आये,उनको अम्बेडकर नाम से बड़ी चिढन होने लगी,और वे अम्बेडकर के इतिहास को पचा नही पा रहे है। क्योंकि भारत की आम जनमानस की सोंच सिर्फ चमारो का ही बुध्द धम्म है। तो अन्य वर्गों के लोगो की भी गिनती चमारो में शुरू हो गयी।
क्योंकि उन्होंने बुद्ध के विचारो को धारण करने के बजाय यहां भी जातीय समीकरण को प्रथम स्थान देकर धम्म की बलि चढ़ानी शुरू कर दी।
मैं आज ऐसे लोगों से कहना चाहता हूं कि जो सोचते है कि डॉ आंबेडकर ने धम्म में क्या योगदान किया।
डॉ अम्बेडकर ही ने बुद्ध के धम्म को भारत मे पुनर्जीवित किया और उनको आदर्श मानने वाले उनके शोषित वर्ग ने धम्म का अनुशरण किया। जिनकी वजह से धम्म भारत मे पनपा।
आज भिन्न भिन्न समुदायों के लोग जो धम्म को अंगीकार किये हुए है, जब निम्न वर्ग के आम संबोधन में बाबा साहब के नाम का प्रथम प्रयोग बुद्ध से पहले पाते है तो उन्हें बड़ी घृणा होती है। वे उनको शुद्र,नीच, और न जाने क्या क्या संज्ञाओ से नवाजते है।
उन्होंने धम्म धर्म किया पर बुद्ध के मार्ग का अनुशरण नही किया।क्योंकि बुद्ध के विचारों को आत्मसात करने वाला व्यक

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"हिंदु धर्मावर नेहमी टिका करणेपेक्षा बौध्द धम्म कसा चांगला
हे लोकांना समजावून सांगून धम्माची उंची वाढवा....

आपल्यातील काही लोकांना हिंदू धर्मावर टीका
केल्याशिवाय झोप येत नाही.
टीका करण्याचा हेतू हिंदू
धर्माला चुका, उणिवांवर बोट ठेवून त्या धर्माला
सुधारण्याचा आहे की आपला धम्म त्यापेक्षा किती सरस आहे
हे दाखविण्याचा प्रयत्न आहे हे समजण्याला मार्ग नाही.

आता एकदा हा धर्म सोडल्यावर त्याच्या उणिवा, चुका
दाखविण्याची काय गरज आहे ? आणि आपली सरसताच
दाखवायची असेल तर हिंदू धर्मावर टीका करून काय मिळणार
आहे.

हिंदू धर्माची उंची कमी करण्यापेक्षा आपल्या धम्माची
उंची वाढविण्यात ताकद खर्ची केली तर बरे होईल.

बुद्ध धम्म
म्हणजे अस्सल सोन्याच मौल्यवान रत्नानि जडलेल खणखीत
नाणं आहे, त्यामुळे ते कस वाजवता येईल यासाठी मेहनत घेण
गरजेच आहे.

आजही बौध्द मंडळी पुर्वाश्रमीच्या जाती पाळतातच, भदंतगणाच्या अंगात महाराजकी पुरोहितगिरी घुसली आहे.
हा वर्ग कधीही मांग,
चांभार वा इतर बहुजन समाजाच्या घरी जाऊन कधीही धम्म
सांगत नाही.
नाव उपासक असले तरी बुध्दाची उपासना समजत
नाही.

११ चे लग्न दुपारी ३ वाजता लागते आणि त्याच्याही
बौध्द महासभा, बौध्दजन पंचायत, बौध्दाचार्य आणि भंतेच्या
अनेकाविध पध्दती निघाल्या आहेत. महिलांना आजही हिंदू
धर्माप्रमाणेच व्दितीय दर्जाच स्थान आहे.

बुध्द, बाबासाहेब
यांना गुरु मानून त्यांच्या पावलावर पावुल टाकायचे सोडून,
त्यांचे विचार समाजमनात रुजवण्यापेक्षा आजही त्यांची
केवळ पुजाच केली जाते.

गल्लीबोळातील पण अखील भारतीय
असणाऱ्या धम्म परिषदांच्या नावाखाली एक-दोन दिवशीय
सप्त्याचाच कार्यक्रम होत आहे. हे सर्व आपलेच आहे.

एकंदरित
बुद्ध धम्म ह्या सर्व लोकांनी अशुद्ध करुन ठेवला आहे हे सर्व
दिसत असतांनाही हिंदू धर्मावर बाबासाहेबांचे हवाले देवून
टीका टिप्पण्यांचे उतारेच्या उतारे देण्यात येत आहेत.

पण
आत्मपरीक्षण कुणीच करत नाही. आपण दुसऱ्याला नाव
ठेवण्यापेक्षा स्वता तरी बुद्ध धम्माचा अभ्यास केला आहे
का ?

कधी बाबासाहेबांच कुठल साहित्य वाचले आहे का ?

बाबासाहेबांनी आपल्याला बुद्ध आणि त्यांचा धम्म हां ग्रंथ
दिला तो कुणी वाचत आहे का ?

आणि वाचला तरी त्यातल्या
किती गोष्टींच अनुसरण आपण करत आहोत ?

स्वता तरी धम्म
आचरण अनुसरण करत आहोत का ? ज्यावेळी स्वता अंधश्रद्धा
पाळता त्यावेळी कोठे जातो आपला बुध्दीप्रामाण्यवाद?

ह्या सर्व गोष्टींची उत्तर ज्याने त्याने स्वता आत्मपरीक्षण
करुण शोधली पाहिजेत. तथागतानि जाता जाता आपल्याला
हाच उपदेश दिला आहे. अत्त दिप भव !!

बरेच जन म्हणतिल हे मला माहीत आहे, मग घोड़ कुठ पेंड खातय तर
धम्माच अनुसरण आचरण होत नाहिये.
असो....

तात्पर्य ऐवढेच की, आपली ताकद, वेळ, श्रम आपल्यावरच खर्च
झाली तर बरे होईल.

चला तर मग ,आज स्वयंप्रकाशीत होवून एक निर्णय घेवुया
आजपासून शुद्ध बुद्ध धम्म खऱ्या अर्थाने आचरणात आणायचा,
त्यानंतर बघा कस तुमच आयुष्य बदलून जातय.

👥👥👥👥👥👥👥👥👥
व्यवस्था परिवर्तन की लडाई लडने के लिए इसे समझना अनिवार्य है।
👥👥👥👥👥👥👥👥👥

✍🏽 बहुजनों संगठन शक्ती का निर्माण करो !

*यह दुनिया जितना सच्चाई का साथ देती है*।
*उससे सैकड़ों गुना ज्यादा "शक्ति" का साथ देती है*।
*जीत सत्य की नहीं शक्ति की होती है*।

Power Power 👥👥👥👥👥👥

*लोग शक्ती के साथ होते है*।
*शक्ति का साथ देते है*।
*शक्ति से डरते है*।
*शक्ति का आदर करते है*।
*शक्ति की सुनते है*।
शक्ति से प्रभावित होकर शक्ती से जुडते है।
*शक्ति के लिए काम करते हैं*।
*शक्ति को सलाम करते है*।

*न्याय की लडाई में "सत्य" हमारा सबसे बडा हथियार होता है । इसलिए हमें "सत्य" को कभी नहीं छोडना चाहिए । लेकिन उसके साथ - साथ हमे संगठन शक्ति का निर्माण करना चाहिए*।
नहीं तो सत्य हमारे साथ होने के बावजूद
राजनैतिक शक्ति,
जन शक्ति,
अर्थिक शक्ती जिनके पास है । उन लोगों के द्वारा हम पराजित होते हैं
गुलाम बनाये जाते है।
दुनिया पर सत्य का नहीं शक्ति का राज है।

*शक्ति का प्रभाव होता है*।
प्रभाव से शक्ति का निर्माण होता है

शक्ती निर्माण करने के लिए
*शक्ति का निर्माण और उसका समय समय पर प्रदर्शन करने से और ज्यादा जन शक्ति का निर्माण होता रहता है*।

👤जनशक्ति सबसे बडी शक्ति है।👤

कभी अपने संगठन के बारे में नैगेटिव बातें ना करें ,
*क्योंकि डूबती हुयी नैया में कोई सवार नहीं होना चाहता*।
*इसका सबको ध्यान रखना चाहिए*।


✍🏽 नेतृत्व( Leadership)-शक्ती से ही शक्ति का निर्माण होता है*।
नेतृत्व शक्ति का निर्माण करता है।
असली शक्ति इंजिन में होती है।
*डिब्बों में नहीं। इंजिन नहीं होगा तो डिब्बे कहीं नहीं जा सकते*।
*नेतृत्व दिशा देता है*।
*नेतृत्व लेके जाता है*।
*नेतृत्व संगठित रखता है*।
*नेतृत्व नियंत्रित रखता है*।
*नेतृत्व प्रेरित करता है*।
*नेतृत्व उदाहरण बनता है*।
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नेतृत्व एक विचार है।
*नेतृत्व एक वृत्ती है*।
नेतृत्व त्याग है।
नेतृत्व जिम्मेदारी है।
नेतृत्व एक समझ है।
नेतृत्व एक प्रभाव है।
नेतृत्व एक शक्ति है।
*नेतृत्व का समानार्थी शब्द "त्याग" है*।
Greatness brings responsibilities.
*महानता जिम्मेदारियां लेके आती है*।
*जो निभाता है।उसके साथ ही रहती है*।

##एकच पर्व बहुजन सर्व##
#बहुजन क्रांती मोर्चा#

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