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.....चल रहे हैं सभी लेकिन रिश्तों की खबर नहीं,
जीवन की दौड़ में इस कदर फंस चुका है इंसान,
सब से मिलते हैं लेकिन भावनाओं की कद्र नहीं.
Ks...Saini
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तू पत्थर का काहे कान्हा

बन जा मूरत साची एक

न भाये इस जगत की माया

लगन जिया में लागी एक

बतियानी है मन की बतिया

कैसे कहूँ तू चुप है देख

मेरी खातिर मानुष तन धर

मैं बनूँ गोपियाँ अनेक

फिर खेलूँ जमना तट तुम संग

आँख मिचौली मन का मेल

बंसुरी की धुन पुकारे जब जब

पा लूँ तुझको फिर से भेंट

तू ठहरा जगदीश ओ छलिये

तेरे लिये क्या मुश्किल देख

तू चाहे एक पल में रच जाए

नेह का बंधन प्रीत का खेल
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