Comments - शिक्षामित्र की आत्महत्या पर एक रचना-
धू-धू कर जल रही चिता का आखिर उत्तरदायी कौन ?
थूक हमारे सबके मुँह पर यह ले गया विदाई कौन ?
तथाकथित इस सभ्य जगत के मुँह पर कालिख पोत गया,
मानवता का दम्भ हमारा अपने हल से जोत गया।
बैठ गगन में हम सबके अविवेकों पर मुस्काता कौन ?
सम्वेदना सहानुभूति से वंचित हमें बताता कौन ?
यह है शिक्षामित्र,बिलखती पत्नी जिसकी देख रहे,
माता पिता,अनाथ पुत्र पुत्री की पीड़ा कौन कहे।
इसका दोष मात्र इतना था यह भावुक था, भोला था,
इसे व्यवस्था में आस्था थी अत: न मुँह से बोला था।
था कर्तव्यनिष्ठ, बच्चों को भी यह पाठ पढ़ाता था,
पैंतिस सौ पाकर तन मन से अपना धर्म निभाता था।
चौदह वर्ष व्यतीत हुये पर इसका धैर्य नहीं टूटा,
तनख्वाहें बढ़ गईं सभी की, इसका रोष नहीं फूटा।
चौदह वर्ष योग्यताओं पर इसकी ध्यान दिया किसने,
इसकी क्षमता पर सवाल बतलाओ खड़ा किया किसने।
किंतु हाय, दुर्दैव! एक दिन ऐसी भी आँधी आई,
इसका वेतन बढ़ा, कृपा कुछ सरकारों ने दिखलाई।
गजब हुआ उस दिन, काबिलियत पर इसकी संदेह हुआ,
लाखों शत्रु निकल आये, सबका समाप्त हर स्नेह हुआ।
छीन लिया रोटी का टुकड़ा, अपनी पीठ थपथपाई,
भारतीयता गई भाड़ में, ऐसी संस्कृति दिखलाई।
सह न सका अपमान, घोर कुंठा में हृदय विदीर्ण हुआ,
आशाओं का ढहा महल, सपनों का सीना जीर्ण हुआ।
जीवन लीला कर समाप्त, हमको आईना दिखा गया,
सारे के सारे 'सिस्टम' पर , प्रश्नचिह्न वह लगा गया।
काम एक, असमान किंतु वेतन, यह रीति मिटेगी कब ?
भारत की धरती से यह दुखदायी धुंध छँटेगी कब ?

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