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मत बाँध मेरे पैरो मे #बेङिया अपने # प्यार की
तेरी #दुनिया अलग है और मेरी # मंजिल अलग है
तुझे # खुशियो का # घर बसाना है
और मुझे #श्री_राम__मन्दिर बनाना ह

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Mere desh Ke veer jawan

श्री मद्भागवत-सुधा-सागर
( शुक सागर ) कथा
श्री मद्भागवत पुराण
॥ स्कन्द प्रथम ॥
अध्याय तृतीय भाग द्वितीय ( २ )

भगवान के अवतारो का वर्णन

चाक्षुष मन्वन्तर के अंत में जब सारी त्रिलोकी डूब रही थी, तब उन्होंने 'मत्स्य ' के रूप में दसवाँ अवतार ग्रहण किया और पृथ्वी को नॉवका पर बैठा अगले मन्वन्तर के अवधपति वैवसत्य मनु की रक्षा करी।
जिस समय देवता और दैत्य समुन्द्र मन्थन कर रहे थे । उस समय ग्यारहवाँ अवतार धारण करके ' कच्छरूप ' से भगवन ने मन्दराचल को अपनी पीठ पर धारण किया ।
बारहवी बार 'धन्वतंरी' के रूप में अमृत लेकर समुन्द्र से प्रकट हुवे,
तेरहवीं बार 'मोहिनी रूप' धारण करके दैत्यों को मोहित करते हुये, देवताओ को अमृत पिलाया ।
चौदहवे अवतार में उन्होंने 'नरसिंह रूप' धारण किया*और अत्यंत बलवान दैत्य राज हिरण्यकशिपु की छाती अपने नाखुनो से इस प्रकार फाड़ डाली, जैसे चटाई बनाने वाला सींक को चिर डालता है। *पन्द्रहवी बार वे 'बामन का रूप' धारण करके*भगवान दैत्य राज बलि के यज्ञ में गये। चाहते तो थे वो त्रिलोकि का राज्य माँगे, *उन्होंने तीन पग पृथ्वी ही माँग तीनो लोको को तीन पग में नाप लिया।
सोलहवें अवतार ' परसुराम ' के रूप में जब उन्होंने देखा कि राजस् लोग ब्राह्मणों के द्रोही हो गये है, तब उन्होंने इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रियो शून्य कर दिया ।
*सत्रहवें अवतार में सत्यवती के गर्भ से प्रशराज के द्वारा ' व्यास ' रूप में अवतरित हुये*उस समय लोगो की समझ और धारना शक्ति कम देखकर आपने वेद रूप वृक्ष की कई शाखाये बना दी ।
अठारहवी बार देवताओ के कार्य संम्पन् करने की इच्छा से राजा दशरथ के घर कौशलया के गर्भ से "रामातर ( श्री रामचंद्र ) ग्रहण किया और ' सेतु- बन्ध , रावण वध आदि विर्तस पूर्ण बहुत सी लीलाएँ करी ।
उन्नीसवें और बीसवें अवतार में यदुवंश में बलराम और "श्री कृष्ण नाम से प्रहत होकर पृथ्वी का भार उतारा ।
**************🕉
भागवग पुराण का प्रथम " स्कन्द " का तृतीय अध्याय का
भाग तृतीय ( ३ ) अगली पोस्ट से.....
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