Post has attachment
Happy Mother's Day to all my friends...
https://youtu.be/hYMjc_V4SiU

Post has attachment
शहरों में अँधेरा डर सा जाता है
छुप के किसी कोने में, अपने जैसे को ढूढ़ता है
रोशनी हंसती है
मगर उसे नहीं पता कोई रोता है

यहां घरों में खुशीयाँ दौड़ती है
मुस्कान हर किसी के चहरे पे होती है
दहशत तो उन घरों में होता है
जहाँ छत के निचे बारिश होती है

तुम्हे चावल - दाल की फिक्र कहाँ
तुम तो हजारों का पटाका जला देते हो
हमसे पूछों, कई दिनों तक बिना तेल की सब्जी खा के
हम दीवाली मनाते हैं

तुम तो कपड़ों के मुरझाने पे ही उन्हें फेंक देते हो
ज़िन्दगी भर का साथ तो हम निभाते हैं
साबुन में झाग मिले या ना मिले
हम तो पानी से ही धुल के काम चलते हैं

और रहने दो ये दिखावे की वफादारी
भिखारियों को तो तुम दूर से ही सलाम करते हो
और बच के रहना वक्त के लहरों से
ये जिससे रूठ जाता है उसे अपने भी नहीं पहचानते हैं
By Akhand Pratap Chauhan at December 01, 2017
https://bantaadhar.blogspot.in/2017/12/blog-post.html

Post has attachment

Post has attachment
ये तुम्हारी ना समझ है

की जहाँ मैं जाती हूँ 

वहां से वो चला जाता है 

मैं अंधेरों से नफ्रत नहीं करती हूँ 

रोशनी हूँ, रोशनी का धर्म निभाति हूँ 


तुम्हे लगता है जिस महफ़िल में वो आता है 

मैं उस महफ़िल को छोड़ देती हूँ 

ये दूरियां दिखावे की है 

मैं हर जगह उसके पास रहती हूँ 


तुम ध्यान से देखना 

वो मुझमे कहीं रहता है 

और ये उसका हुनर है 

कि मैं उसमे जगमगाती हूँ 


जहाँ मैं ख़त्म होती हूँ 

वहीँ से वो शुरू होता है 

मेरा दिन थका देता है सबको 

सुकून बेचती है उसकी रातें
By Akhand Pratap Chauhan at December 27, 2017 

https://bantaadhar.blogspot.in/2017/12/blog-post_27.html?m=1

Post has attachment
जरा सी ठोकर में तुम बिगड़ जाते हो 

हजारों लोग मेरे उपर से गुजर जाते हैं 

दिल मुझमे भी है

 लोग मुझे पत्थर कहते हैं 


विनम्रता का सूत्रधार हूँ मैं 

लोग थूक जाते हैं  उपर

जूते-चप्पल साफ कर जाते हैं उपर

फिर भी कुछ नहीं कहता हूँ मैं 

दिल मुझमे भी है

 लोग मुझे पत्थर कहते हैं 


तुम्हे छत के नीचे भी सुकूं नहीं मिलता   

मैं धुप में तपता हूँ, ठण्ड में गलता  हूँ 

लहरों की चोटें खा-खा के जीता हूँ  

फिर भी कुछ नहीं कहता हूँ 

दिल मुझमे भी है

 लोग मुझे पत्थर कहते हैं 


हवाओं में कितना भी जहर हो जाये 

उसके मेरे बीच कोई दिवार नहीं हो सकती 

बहुत जल्द भाग जाओगे तुम चन्द्रमा पे 

मेरा पैर हैं जिसपे मैं उसे छोड़ नहीं सकता 

दिल मुझमे भी है

 लोग मुझे पत्थर कहते हैं 


रात चूहे डरा देते हैं 

सांप - बिच्छू सर पे बैठ जाते हैं 

आज तुम्हारे कहने पे बोला हूँ 

वर्ना आजीवन मौन रहता हूँ 

दिल मुझमे भी है 

 लोग मुझे पत्थर कहते हैं 

By Akhand Pratap Chauhan at December 15, 2017 

https://bantaadhar.blogspot.in/2017/12/blog-post_15.html?m=1

Post has attachment
वो तो वहीं रह गए 

जिनकी बातें बड़ी हुआ करती थी 

और उनका नाम शहरों में बिक गया 

जो महफ़िलों में डर जाया करते थे

तुम्हारी बातों में तहजीब नहीं थी 

उसके रोने की वजय कोई और नहीं थी 

कहाँ जाओगे आँसुओं का कर्ज लेके

ये तुमको साजिशों से घेर लेंगे
कितनी भी चलो दुआएँ लेके

By Akhand Pratap Chauhan at December 06, 2017 

https://bantaadhar.blogspot.in/2017/12/blog-post_6.html?m=1

Post has attachment

मेरी नज़रों की बात ना कर 

खुद  पे भी तो गौर कर

हर जुर्म मेरा ही क्यूँ 

कदम तो तेरे भी ना रुके इस राह पे  


करीब आना अगर मेरी गलती थी 

तो दूरियाँ तुमने क्यों नहीं बढाया 

वो रातें  यादगार हुई तो क्या 

इसमें साथ तेरा भी तो था 


अब बात छोड़ो भी लोगों की 

मैं किसी के जुबां  पे पहरा नहीं देता हूँ  

ज़िन्दगी सिर्फ तारीफों से भरी नहीं है 

गाली मिले तो उसका भी स्वागत कर लेता हूँ

तुम्हे लगता है की हमारा प्यार बदनाम हो रहा है
तो हो जाने दो
शोहरत का ये भी एक पहलू है
बस खुश इतने से रहो
की हर किसी की जुबां पे अपना नाम तो जिंदा रहेगा

By Akhand Pratap Chauhan at March 10, 2018 

https://bantaadhar.blogspot.in/2018/03/blog-post_10.html?m=1

Post has attachment
अपने चहरे पे पर्दा नहीं रखती हूँ
जैसी हूँ, वैसी ही नज़र आती हूँ
आसमा की तरह नहीं हूँ
की हर तरह गिरती हुई नज़र आउँ

हाँ कमजोर है मेरे प्यार की दीवार
जो हर कोई तोड़ के निकल जाता है
और तोड़ने वालों से कह देना कोई
ये हमारा दिल है हमेसा खुला रहता है

तुम्हे क्या लगता है, हम मर जायेगें
तुम जिसके भी करीब जाओगे, हमीं याद आयेंगे
और रहने दो मत बचाओ उन रिश्तों को
जिनमे "यकीन" ना हो ........
वो पत्ते हमेशा बिखर के खो जाते हैं
जो डालियों से अलग हो जाते हैं

दिल भर जाये जो तुम्हारा उस तरफ
तो लौट आना मेरे आशियाने की तरफ
ये मेरे रिश्ते हैं
यहाँ नफ्रतें जरा देर से आती हैं
By Akhand Pratap Chauhan
https://bantaadhar.blogspot.in/2018/04/blog-post.html

Post has attachment
माल है गांजा है या मारिजुआना है ये क्या है 

कल्पना का सार है या कल्पना का भण्डार है आखिर ये क्या है 

फेफड़ों तक जाता है ब्रहमाण्ड तक घुमाता है

अघोरियों का प्रिय है महाकाल का प्रसाद है आखिर ये क्या है 


चिलम का मित्र है या रिज़ला का सखा है 

बीज से निकलता है झाड़ी - पत्ती बनके उभरता है आखिर ये क्या है 

प्रकृत की गोंद में ये पलता है जमीन से जुड़ के ये रहता है 

बारिशों में भिगता है धूप में ये जलता है आखिर ये क्या है 


टहनी - टहनी ये टूटता है अपनी आखों के सामने ये सूखता है 

अलग भौकाल इसका रहता है , पत्तियों के साथ मैल इसका बिकता है आखिर ये क्या है 

पूरी दुनिया में ये घुमता है , एकाग्रता में लीन ये रहता है  

कई बिमारों का नास ये करता है,  औषधियों में नाम इसका रहता है  आखिर ये क्या है 
By Akhand Pratap Chauhan at April 21, 2018 

https://bantaadhar.blogspot.in/2018/04/blog-post_21.html?m=1

Post has attachment
dolafz.com
dolafz.com
m.facebook.com
Wait while more posts are being loaded