भावों की खुशबू
उतार देती हूँ दर्द की स्याही
पजती है हर रात
एक नयी कविता....
पर क्या तुम नहीं जानते
जितनी अधिक जलकुंभी
उतनी अधिक सर्पिल सी जड़े
हरी भरी दिखती झील का
घुटता रहता है
हर साँस बूँद बूँद वेग
आखिर सन्नाटे भी तो अपना
मोल माँगते है ना.....

AT

ये शाम और रौशनी की ये क़तारें

उदासी और गहरी हो गई है

~रईस अमरोहवी

Post has attachment
Soft and easy September days had arrived. Evening came early, but the air remained warm and calm."
– Arthur Schnitzler,
Photo

कितनी तवील क्यूँ न हो बातिल की ज़िंदगी
हर रात का है सुब्ह मुक़द्दर, न भूलना

~अजमल अजमली
तवील = लम्बी , बातिल = असत्य

एक दिलचस्प रदीफ़ वाली ग़ज़ल मुलाहिज़ा फरमाइए...

क्यों हो बाम पे वो जलवा-नुमा, तीसरे दिन
चाँद भी छुप के निकलता है भला, तीसरे दिन ?

ग़र्क़-ए-दरिया-ए-मुहब्बत की नहीं मिलती लाश
वरना डूबा हुआ उभरे है सदा, तीसरे दिन

तीन दिन चश्म के बीमार का कर अपने इलाज
होती मालूम है तासीर-ए-दवा, तीसरे दिन

उम्र यक-हफ़्ता नहीं बाग़ में ऐ गुल, ना भूल
रंग बदले है ज़माने की हवा, तीसरे दिन

छोड़ मत ज़ुल्फ़ के मारे को तू दरिया में अभी
सांप के काटे को देते हैं बहा, तीसरे दिन

~इफ़्तिख़ार इमाम सिद्दीकी

Post has attachment
An autumn evening ;
There is joy too,
In loneliness..

Yosa Buson.
Photo

Post has attachment
People often ask me questions that I cannot very well answer in word-- and it makes me sad to think they are unable to hear the voice of my silence.
Hazrat Inayat Khan
Photo

या हवा ही उडा के ले जाए
या मैं जिसकी हूँ, आ के ले जाए

मैं हूँ मिटटी तो किस ज़मीं की हूँ
कोई इतना बता के ले जाए

है अगर ख़ौफ़ उसको दुनिया का
मुझको मुझसे चुरा के ले जाए

बाज़ुओं में समेट ले मुझको
काश, दरिया बहा के ले जाए

ख्वाब बैठे हैं मेरे सिरहाने,
नींद से कह दो आ के ले जाए

~मेगी आसनानी

Post has attachment
“It was September.

In the last days when things are getting sad for no reason.”

― Ray Bradbury
Photo

पहले तो मैंने शेर पे वाह वाह कमा लिए

मुआफ़ी मांगी बाद में, के वो किसी के थे

~ Unknown
Wait while more posts are being loaded