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केवल बोलने , सुनने , पढने , मान लेने और तर्क की वस्तु नीं ।
हमारे ऋषि - मुनियों ने योग की खोज किसी चिकित्सा - पद्धति के रूप में नहीं की थी । योग की खोज तो इसलिये की गयी थी कि शुद्ध आत्माधारी इस शरीर पर प्राक्रतिक व्याधियों और सांसारिक प्रलोभनों का कोई असर न हो और अपनी पवित्रता बरकरार रखते हुए यह शरीर प्रक्रति से ताल - मेल बनाकर परम् उच्व शक्ति की प्राप्ति कर शके ।
यही कारण हे कि प्रक्रति के खुले वातावरण में रहकर सर्दी , गर्मी , बरसात की मार झेलते हुए भी साधकों का शरीर वर्षो तक स्वस्थ बना रहता था और वे लम्बी आयु प्राप्त करते थे ।
योग दरअसल क्या हे ?

योग शरीर और मन को स्वस्थ और पवित्र बनाए रखने की एक ऐसी अद्भुत कला हे , जिसकी प्रयोग - विधि पूर्णतः वैग्यानिकता पर आधारित हे । यह प्रयोग और अनुभूति की चीज हे : केवल बोलने , सुनने , पढने , मान लेने और तर्क की वस्तु नहीं । यह कोई मतवाद नहीं । तथाकथित हिन्दू , मुस्लिम , बौद्ध , यहूदी , पारसी , इसाई , इत्यादि कट्टर धर्म - सिद्धान्तों से इसका कुछ लेना देना नहीं ।
योग का साधारण अर्थ हे -
जोड़ना । आध्यात्मिक विग्यान में भी इसका अर्थ जोड़ना ही हे :
लेकिन इसका सम्पूर्ण अर्थ होता हे , जोड़ने के साथ- साथ अन्तर के भेद को मिटा देना यानी एकाकार कर देना या एकाकार हो जाना । - दीदी
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योगानंदनम् नारी शक्ति उज्जैन द्वारा आयोजित फैशन शो ।
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