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बगैर बांधे बंध जाता है बंधन फर्क करना मुश्किल है हममे और जानवरो में कैसे भेद करे पशु और मनुष्य में
बंधन जो है ही नहीं बंधन के भ्रम मे जीवन गुजार देता है आदमी।
वास्तव में मनुष्य बंधा है अपनी ही बनाई तरह तरह की खूँटियों पे। मनुष्य से ज्यादा समझदार प्राणी इस जगत में कोई और नहीं है। फिर भी लगभग हर आदमी की कहानी जानवरो की तरह बंधे खुट्टी से ज्यादा खूँटियों में है आदमी अपने स्वयं के बनाये माया जाल में स्वयम् ही फंस जाता है। नजर होते हुए भी अन्धो की तरह जीवन बिताता है, खास बात ये है की ऐसे लोगो की जनसख्या नहीं के बराबर है जो अपनी बुद्धिका,विवेक और अपनी अंतरात्मा की समझ का ज़रा भी इस्तेमाल करते हो।शरीर ही इन्सानो का होने क्या कोई इंसान होता है? समझ भी इंसानो जैसी होनी चाहिए।हमे जो समझा दिया जाता हैवो हम समझ का भरम पाल लेते है वैसे ही जैसे जानवर को समझा दिया जाता है,चाहे वो गलत हो या सही,समस्या हो या नहीं, मैंने देखा है ज्यादातर नासमझों द्वारा "समझ" दी जाती रही है।और वे समझाते रहते है क़ि समस्या है और हम मान लेते है।,इसीलिए हम अपने मनुष्य होने का कोई भी लाभ नहीं ले पाते। सच तो ये है की हमारा "मानना" ही हर समस्या को जन्म देता है "मानना' हमेशा से दुसरो से आता है।क्योंकि हम जानने का श्रम करना नहीं चाहते।बगैर जाने आप अपने इंसान होने का गौरव खो देते है।ये कहानी पढ़ कर आपको हसी आये शायद ,क्या आप अपने पे भी हंस सकते है मुझे बहुत ज्यादा फर्क नहीं दिखाई देता हममे और इस के बीच।
एक रेगिस्तान में कई ऊंट अपने मालिक के साथ जा रहे थे। अंधेरा होता देख मालिक एक सराय में रुकने का आदेश दे दिया।
निन्यानवे ऊंटों को जमीन में खूंटियां गाड़कर उन्हें रस्सियों से बांध दिया मगर एक ऊंट के लिए खूंटी और रस्सी कम पड़ गई। सराय में खोजबीन की, पर व्यवस्था हो नहीं पाई।
तब सराय के मालिक ने सलाह दी कि तुम खूंटी गाड़ने जैसी चोट करो और ऊंट को रस्सी से बांधने का अहसास करवाओ।
यह बात सुनकर मालिक हैरानी में पड़ गया, पर दूसरा कोई रास्ता नहीं था, इसलिए उसने वैसा ही किया। झूठी खूंटी गाड़ी गई , चोटें की गईं। ऊंट ने चोटें सुनीं और समझ लिया कि बंध चुका है। वह बैठा और सो गया।
सुबह निन्यानबे ऊंटों की खूटियां उखाड़ीं और रस्सियां खोलीं, सभी ऊंट उठकर चल पड़े, पर एक ऊंट बैठा रहा। मालिक को आश्चर्य हुआ – अरे, यह तो बंधा भी नहीं है, फिर भी उठ नहीं रहा है।
सराय के मालिक ने समझाया– तुम्हारे लिए वहां खूंटी का बंधन नहीं है मगर ऊंट के लिए है। जैसे रात में व्यवस्था की, वैसे ही अभी खूंटी उखाड़ने और बंधी रस्सी खोलने का अहसास करवाओ। मालिक ने खूंटी उखाड़ दी जो थी ही नहीं, अभिनय किया और रस्सी खोल दी जिसका कोई अस्तित्व नहीं था। इसके बाद ऊंट उठकर चल पड़ा।
न केवल ऊंट बल्कि मनुष्य भी ऐसी ही खूंटियों से और रस्सियों से बंधे होते हैं जिनका कोई अस्तित्व नहीं होता।और मजे की बात ऊँट तो रस्सी खोलने के अभिनय से उठ कर चल तो पड़ा कम से कम इतना विवेक तो है उसमे,ओर मनुष्य की रस्सी खोलने जब कोई आता है तो हम क्या करते है उसके साथ या तो फांसी दे देते है या जहर पिला देते हैया मंसूर की तरह उसके अंग अंग काट के मार डालते है असल में मनुष्य बंधता है अपने ही गलत दृष्टिकोण से, मिथ्या सोच से, विपरीत मान्यताओं की पकड़ से। ऐसा व्यक्ति सच को झूठ और झूठ को सच मानता है। वह दोहरा जीवन जीता है। उसके आदर्श और आचरण में लंबी दूरी होती जाती है।
इसलिए ये जरूरी है कि मनुष्य मन से नहीं करे, ध्यान पूर्वक जो भी करे,करे।, लक्ष्य का निर्धारण करे अपने विवेक का इस्तेमाल करे।अगर ना करेगा ,तो बिना उद्देश्य और बिना समझ के जन्मों जन्मों तक चलना ही होगा और सिर्फ थकान, भटकाव और निराशा मिलेगी , मंज़िल नही।हमारा जीवन का उद्धेश्य इन सभी तरह् की खुटीयो से आजाद हो के, सवयं में लींन हो जाना, स्वयं को पा लेना है।

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