☆संवित्-गुरुपरम्परा और संन्यास संस्कृति☆
भारतीय मानव संस्कृति वैश्विक मानव संस्कृति का मौलिक स्थान है,यहां तक की पूरे भूमण्डल पर जितनी भी अद्यावधि मानवीय सृष्टि का विस्तार हुआ ,उनका मूल भूत स्थान भारत भूमि ही हैं, क्योंकि मनु सन्तान को ही मानव कहते हैं ,"मनोरपत्त्यं मानवः" मनु शतरूपा से जिन्ह शरीरों का आरम्भ होता है, वे शरीर मनुष्य कहलाते हैं ,जैसे कश्यप पत्नी दिति से जिन्ह शरीरों का आरम्भ हुआ ,वे प्राणि दैत्य ,राक्षस, असुर , आदि नामों से कहे जाते हैं, वैसे ही कश्यप ऋषि की पत्नी अदिति से उत्पन्न सन्तान आदित्य से लेकर जितनी भी दैव सृष्टि हुई ,वे देवता हुए , इन्ह तीनों प्राणियों का मूल तो जगत्पिता ब्रह्मा जी ही हैं ,किन्तु इनकी उत्पत्ति को लेकर अलग अलग नाम हो गये , वैसे देखा जाय तो संसार में ये तीन ही विकसित प्राणियों की श्रेणी में आते हैं , लेकिन कुछ प्राणियों का विकास पुण्य और पाप कर्म के अधीन होता है, जिनमें गुणों का प्रभाव विशेष होता है , जैसे देवताओं में सत्त्वगुण की प्रधानता होती है , दैत्यों =असुरों में तमोगुण की प्रधानता होती है , ये दोनों ही प्राणि केवल अपने पूर्व कृत पुण्य पाप पर ही निर्भर होते हैं , इनके लिए नई उन्नति करना या न करना इनके स्वभाव पर निर्भर होता हैं, शास्त्र का संविधान इन्ह पर लागू नही होता है, शास्त्र की आज्ञा केवल मनुष्य पर ही लागू होती है ,यहां तक कि देवता और दानव के नये पुण्य पाप भी नहीं बनते हैं ,केवल इन्हे पूर्व कृत पुण्य पाप का ही फल भोगना होता है, किन्तु मनुष्य एक ऐसा विकसित प्राणि हैं कि यहअपने विकास की सीमा को पार कर सकता हैंं, क्यों कि इन्हेअपने हित अहित का सम्पूर्ण अधिकार प्राप्त होता है, हित अहित का संविधान मात्र वेद हैं , उनकी आज्ञा का पालन करना मनुष्य का नैतिक, और संवैधानिक कर्तव्य होता है, यदि सही तरीके से पालन करता हैं, तो जीवन को सफल बना लेता हैं, प्रमाद वश पालन नहीं करता हैं, तो विफल भी हो जाता हैं, विफलता यदि साधन में लगे रहते होती है ,तो या तो देव योनि में जाता हैं, या असुर बनता है, यदि कुछ किस्मत अच्छी रही और पूर्व कृत कर्मों का समबल प्राप्त हैं तो दुबारा मनुष्य भी बन सकता हैं,मनुष्य यदि बनता है, तो पूर्व के प्रबल संस्कार वश फिर साधना रत हो जाता है, ऐसे ही अनेक जन्मों तक गिरता उठता ,जीव चलता रहता है, साथ ही जब जब मानव शरीर मिलता है ,और कुछ न कुछ सत्कर्म संचित होते रहते हैं , पाप कर्म भी बनते रहते हैं , ये पुण्य और पाप कर्म ही जीव की संसार यात्रा का पाथेय कहलाता है,शास्त्रीय ढंग से इन्ही कर्मों के तीन भेद हो जाते हैं ,(१)सञ्चित (२)प्रारब्धऔर(३)क्रियमाण । (१)संचित कर्म जन्म-जन्मान्तरों के बचे कुचे ,नये पुराने भण्डारण किये हुए होते हैं , उनमें से जो जो कर्म पक कर फल देने के लिए तैय्यार होते हैं , उन्हे प्रारब्ध कहते हैं ,वे फिर जीवों के शरीर बनने के काम आते हैं , उन्हीं शरीरों में जीव अपने ही द्वारा किये हुए पुण्य पाप का फल ,सुख और दु:ख के रूप में भोगता हैं ,जब जब मनुष्य का शरीर जीवों को मिलता है ,तब तब नये पुण्य पाप भी इकट्ठे होते रहते हैं जिन्हे क्रियमाण कर्म कहते हैं , जीवन की शुरुवात से लेकर अन्तिम श्वास पर्यन्त जितने भी कर्म एकत्रित होते हैं वे संचित खाते में जमा हो जाते हैं ,इस प्रकार जीव कर्म जाल में फंसा हुआ ,अनन्त शरीर परम्परा में उलझकर सुख-दु:ख की मार खाता रहता हैंं, दुःख आता हैं तब यह व्यथित होता हैंं, सुख जब इनसे छिनता हैंं तब व्यथित होता है, यह परम्परा तब तक जारी रहेगी , जब तक पुण्य-पाप का चक्र जारी रहेगा ,पुण्यों के फलस्वरूप देवादि शरीरों की प्राप्ति इन्हे होती हैं ,जब पुण्यपाप मिश्रित मात्रा में कुछ सम भाव में होते है ,तब मनुष्य शरीरों में जन्म लेता है , तथा पापों की मात्रा अधिक होने पर तिर्यक आदि चार खानि , चौरासी लाख योनियों में बार बार जन्मता मरता रहता है ।यह जीवों की बदहाली मानव जीवन की असावधानी का ही दुष्परिणाम होता है,यदि इस जीवन में सावधान होकर शास्त्र मर्यादा का पालन करते हुए जीवन के लक्ष्य को समझ लेता है तो उपरोक्त दुर्दशा से जीव बच सकता है ,इसके लिए किसी मार्गदर्शक की आवश्यकता होती है, यह केवल पूर्व के संचित विशेष पुण्यों से ही संभव हो सकता है, भगवत् कृपा तो सभी जीवों के लिए समान ही होती हैं,जीव अपने ही किए गए कर्मों फल भोगते है,परमात्मा किसी को सुखी या दु:खी नहीं करते है,किन्तु देखा यही गया है किसी अपने पुण्य का फल सुख रूप में मिलता है तो कहता यही है कि भगवान की कृपा से मुझे सुख मिल रहा है, किसी को अपने किये पापों का फल दु:ख रूप में मिलता है तो है ,यही कहता हुआ नजर आता है ,हे भगवान आपने मेरे साथ यह क्या किया,यह जीव की बिल्कुल नासमझी है , भगवान ने इस बात का बिल्कुल खण्डन किया है-
" नादत्ते कस्यचित्पापं नचैव सुकृतं विभु:।
अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः।।
अर्थात् परमात्मा किसी के पुण्य या पाप का ग्रहण नहीं करते हैं, उसे प्रभावित नही करते हैं ,वे केवल सर्वज्ञ होने के नाते उनकी व्यवस्था करते हैं ,जीव का विवेक माया-मोह से ढका होने से अल्पज्ञ है, यह कर्म करके भूल जाता है,किन्तु भगवान् समस्त जीवों के जन्म कर्म आदि सबको जानते हैं ,क्योंकि माया में दो शक्ति हैं (१)आवरण शक्ति और (२) विक्षेप शक्ति, ये दोनों जीव में ही रहती है ,इसलिए इनसे प्रभावित रहता है , परमात्मा केवल माया की विक्षेप का शक्ति का आश्रय बनते हैं वह भी हम जीवों के कल्याण हेतु, उनका स्वयं का अपना कोई प्रयोजन नही हैं ।
जीव का अपना जीव भाव ही इनके दु:ख का कारण बनता है, इनसे जब यह सर्वथा मुक्त हो जाता है, तब इन्हे शाश्वत सुख स्वरूप की प्राप्ति होती है, इस जीव भाव के त्याग को ही वेद में संन्यास शब्द से कहा है, किन्तु यह त्याग सहसा नहीं कर सकता हैं , त्याग से पहले शुद्धि की परम आवश्यकता होती हैं, यदि शुद्धि या संशोधन के बिना किसी वस्तु का त्याग कर दिया जाय तो हो सकता हैं कि उसके साथ किसी महत्त्वपूर्ण वस्तु का भी त्याग हो सकता है, इसलिए त्याज्य वस्तु की शुद्धि और संशोधन आवश्यक है ,साथ ही शुद्धि या संशोधन के बिना वस्तु को फैंक दिया तो उसमें जो आवश्यक वस्तु का वियोग असह्य हो सकता है , यह भी संभव है कि जिस बड़े लाभ के लिए हमने त्याग किया वह लाभ हमें मिले ही नहीं ,इसलिए विवेकशील मानव हेयोपादेय वस्तु का विचार करके ही ग्रहण या त्याग करता है,इसके लिए किसी कुशल जानकार की श्रद्धा भक्तिपूर्वक शरण लेनी होती है।इसी को वैदिक सिद्धान्त में गुरु परम्परा कहते हैं , इसलिए हमारे पूर्वज ऋषियों को जब यह पता लगता है कि अब तक हम जिस लाभ को प्राप्त करने के लिए प्रयास रत थे, वह अपने स्वाभाविक तरीके से हमें नहीं मिल सकता है, तब वे बोल पड़े "तद्यथेह कर्मचितो लोक:क्षीयते,एवमेवामुत्र पुण्यजितो लोकःक्षीयते" अर्थात् जैसे यहां मनुष्य अनेक उपायों से अर्थोपार्जन करके जीवनोपयोगी पदार्थ जुटाता है, कालान्तर में वे समाप्त हो जाते है, तो फिर उन्हे जुटाने के लिए दौड़ धूप करता रहता है,आखिर परेशान होकर सोचता है, यह कब तक करता रहूंगा तो,उन्हे इस संसार-परम्परा का आगे या पीछे कोई अन्त दिखाई नही देता है, फिर इनका परलोक के बारे दृष्टिपात होता है तो वहां भी यही हालत देखता है,कि पुण्यों मिलने वाले लोक कालान्तर में समाप्त हो जाते है,फिर कर्म करने के लिए यहीं आना पड़ता है , जब सब जगह की यही हालत है,तो फिर आखिर निराश होने पर हृदयमें एक तड़फ उत्पन्न होती है,जिनसे सहसा दिव्य जीवन की खोज में निकल पड़ता है, किन्तु वह तड़फ भी मनमानी नहीं ,नहीं होनी ,इसलिए वेद भगवान ने कहा-ऐसे साधक के परमहितार्थ कहा-- "परीक्ष्यलोकान् कर्मचितान् ब्राह्मणो निर्वेदमायान्नास्त्यकृत:कृतेन।
तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम् ।।
सर्वज्ञ ऋषियों की मुमुक्षुओं के प्रति यह आज्ञा सिद्ध करती है कि जीव के लिए गुरु सन्निधि कितनी महत्त्वपूर्ण हैं ,इनके बिना जीव का उद्धार संभव ही नहीं हैं ।
अब तक शास्त्रों में तथा शिष्ट महापुरुष के सदाचरण से यही हमें निश्चय होता हैंं कि चाहे कितना भी जीव को लौकिक सामर्थ्य प्राप्त हों , केवल स्वयं की प्रतिभा आदि क्षमता को दरकिनार करके गुरु परम्परा की शरण लेनी ही पड़ती है ।
सृष्टि के आदि पुरुष श्रीब्रह्मा जी ने भगवान् नारायण की शरण शरण ली ,भगवान श्रीरामभद्र ने गुरुवशिष्ठ की शरण ली, जगद्गुरु परिपूर्णावतार श्रीकृष्ण ने सान्दीपनि आश्रम में रहकर गुरुपरम्परा का निर्वहन किया,साक्षात् दक्षिणामूर्त्ति के अवतार स्वरूप आदिजगद्गुरु आचार्य शंकर ने,गोविन्दभगवत्पाद के द्वार पर जाकर संन्यास दीक्षा पूर्वक गुरुपरम्परा की शरण ली ,इन्ह सभी प्रसंगों से साबित होता है कि जीव के उद्धार के लिए मात्र गुरुपरम्परा ही सुदृढ उपाय हैं ।

[v] ☆ संवित् गुरुपरम्परा और तत्त्व जिज्ञासा☆ पृ.संख्या-02
शाश्वत सुख की चाह प्राणिमात्र में होती है , क्योंकि सुख सभी का अभीष्ट पदार्थ है, किन्तु शाश्वत सुख की पहचान केवल जन्मान्तरीय संस्कारित हृदय में ही स्पष्टतया होती है, जीवन की प्राथमिक अवस्था से ही साधक के हृदय की उथल पुथल में आगे बढने का भाव होता है , किन्तु आगे किधर बढा जाय , क्या किया जाय ,कि हमें इस जीवन में भगवान के दर्शन हो जाय, यह दर्शन लालसा बड़ी विचित्र होती है, जिन्हे कभी देखा नहीं , कैसा उनका रूप है , और कैसा उनका स्वरूप हैं , क्योंकि दोनों बातें साधक अपने दैनन्दिन जीवन में पढता सुनता समझता आया हैं कि भगवान का एक रूप होता है,तथा उनका वास्तविक स्वरूप भी होता हैंं, रूप और स्वरूप में कुछ भिन्नता है,या एक रूपता हैंं या विलक्षणता हैंं, यह साधक की वैकल्पिक मनः स्थिति नवविवाहिता कानीन मन जैसी होती है। इधर अपना मयका का प्रेम भी खैंचता रहता हैंं,उधर नव मिलन का स्नेह भी हृदय को उद्वेलित करता रहता है,इसी प्रकार यही दशा साधक मन की विचित्र सी होती है , साधक अपने पूर्व जन्मान्तरीय संस्कार तथा वर्तमान के आध्यासिक संस्कारों के वशीभूत होकर अब तक जिन्हे अपना मान कर मन में स्थान दिया है , वह उन्हे भी बनाए रखना चाहता हैं ,और भगवान से भी मिलना चाहता है,यह दो नौकाओं में पांव रखने के समान हैं , संसार का लगाव भगवत् प्रेम में बाधा खड़ी करता हैं, वह अपनी तरफ खैंचता रहता है,और इधर संसार सागर में डूब कर नष्ट होने का भय भी सताता रहता हैंं, इस रस्साकशी में उलझे हुए साधक को बहुत मुसीबत का सामना करना पड़ता हैं, ऐसी परिस्थिति में स्वयं भगवान ही गुरु के रूप में आकर स्वयं पथ भी बन जाते हैं , पाथेय भी बन जाते हैं , और पथ प्रदर्शक भी वे स्वयं बन जाते हैं , इसलिए गुरु-प्रार्थना में हम रोज बोलते हैं--- , गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुदेवो महेश्वर:।- - गुरु: साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः - - ईश्वरो गुरुरात्मेति मूर्त्तिभेदविभागिने ।- - व्योमवद्व्याप्तदेहाय दक्षिणामूर्त्तये नमः।।- - साधक के लिए परमात्मा ही सब कुछ होता है,केवल बोलने के लिए नहि बल्कि सच्ची श्रद्धा भक्ति से भगवान् को अपना सर्वस्व स्वीकार करना ही अनन्य शरणागति का द्वार हैं ,यही अनन्यश्रद्धा आगे चल कर सर्वात्मभाव में परिणत होती हैं ,इसी को शास्त्रीय भाषा में आस्तिक्य बुद्धि कहते हैं, प्रकरण शास्त्रों में परोक्ष ज्ञान भी कहा गया है।- - ||☆संन्यास और शरणागति ☆||- - जब विभीषण जी भगवान् श्रीरामभद्र के समक्ष आने में संकोच कर रहे थे ,तो भगवान ने उनकी कृपणता को यह कह कर समाप्त कर दिया कि-

सन्मुख होय जीव मोहि जबहि।
जन्मकोटि अघ नासहि तबहि।।
अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।
साधुरेव सः मन्तव्य:सम्यग्व्यवसितो हि सः।।
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति ।
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तःप्रणश्यति ।।
इस आश्वासन की भगवान ने एक शर्त अवश्य रखी--
"मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु"।
साधक के जीवन में यही बहुत बड़ी समस्या है, कि संसार के मन्यमान झूंठे सम्बन्धों को झूठा निश्चय कर उन्हे सर्वथा निकाल कर कैसे फैंका जाय,वैदिक शास्त्रों में संन्यास की परिभाषा भी यही हैं , जब तक परमात्मा में पूर्ण समर्पित भाव नहीं बनता हैं, तब तक संन्यास एक शास्त्रीय व्यवस्था मात्र हैं, इनसे जीवन के उद्धार के साथ कोई सम्बन्ध नही हैं ,इस विषय में यत्र तत्र बहुधा शास्त्र चर्चा आती हैं , इसलिए पूर्णतया भगवत् शरणागति ही संन्यास हैं ।बाह्य आश्रम संन्यास एक आदर्श गुरुपरम्परा हैं जिनका अनुसरण प्रबल वैराग्यवान् साधक ही कर सकता है ।
जब साधक जीवन की इस प्राथमिक कक्षा संन्यास आश्रम में प्रवेश करना चाहता है तो यहीं से उनके अभिनव जीवन की शुरुआत होती है, पूर्व के अनन्त पुण्य परिपाक के फल स्वरूप उन्हे भगवान के ही सगुणविग्रह समर्थसद्गुरु का संयोग होता है ,वह संयोग उन्हे भगवत्प्राप्ति द्वार के समान होता हैं ,किन्तु अन्ध-श्रद्धा से आविष्ट होकर साधक अपने आपको उनके श्रीचरणों में उडेल देता हैं, अन्धश्रद्धा से मेरा तात्पर्य इतना ही है कि , उस वक्त साधक को गुरुतत्त्व की स्पष्टता नहीं होती हैं, अपने आपको पूर्णतया अभिन्न नहीं कर पाता हैं, क्योंकि दोषयुक्त अन्तःकरण में संशय और विपरीत भावना मौजूद रहती है,इन्ह दोनों मूल भूत अज्ञान आवरण भी मौजूद हैं ,केवल विचार शक्ति के प्रवाह से नदी के प्रवाह में डूबते हुए को किनारा हाथ लगने जैसा है,जब तक ऐसी ही स्थिति रहती है तब तक उनमें शिष्यभाव भी प्रगाढ नहीं हो पाता है ,वह गुरु कृपा का अधिकारी ही भी पूर्णतया नहीं बन पाता हैं, जब तक उनके अन्तःकरण में गुरुतत्त्व में भेद भाव ,मनुष्य-भाव , क्षुद्रस्वार्थ , आदि कई विपरीतभावनाएं मौजूद रहती है, जिनके रहते वह गुरुकृपा से वंचित ही रहता हैं।इन्ह सभी दोषों का मात्र उपाय हैं-"संन्यस्य श्रवणं कुर्यात्" 'संन्यास दीक्षा लेकर श्रवण करें ,"श्रोतव्यो मन्तव्यो, निदिध्यासितव्यः" यह पूर्ण समर्पण भाव का पर्याप्त साधन हैं इनका कोई विकल्प भी नहीं है ,यद्यपि भाष्यकार भगवान ने , "सेवानिर्मलचेतसाम्" यह शर्त यहां भी रखी है ,सेवा के बिना श्रद्धा का परिष्कार नहीं हो सकता है , तथा श्रद्धा के विना ज्ञान नहीं हो सकता है ,ये दोनों एक दूसरे के पूरक साधन हैं ।
जबतक गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण भाव उत्पन्न नहीं होता है , तब तक गुरु शिष्य में आत्मीयता का भाव नही होता है, क्योंकि मल विक्षेप आवरण के रहते जिन्ह अंहता ममता के विषयों में सत्यत्व बुद्धि दृढ रहती है, तब तक भगवत् प्रेम और गुरुशरणागति भी नही हो सकती है। साधक हृदय में केवल यह मलीनता कुछ कम हो जाती है , जिनसे उन्हे यह पता लग जाता है कि मैं बन्धन युक्त हूं , मुझे इस बन्धन से छूटना है ,यह कैसे संभव हो सकता है, इस प्रकार की ऊहापोह में उलझा रहता है । ऐसी दशा में उन्हे किसी समर्थ गुरु परम्परा की शरण लेनी चाहिए।,

☆ संवित् गुरुपरम्परा का स्वरूप ☆

गुरु परम्परा का सम्बन्ध सृष्टि के मूल तत्त्व से होता है ,यह चर्चा पहले हो चुकी थी ,साथ ही वही तत्त्व जीवों का प्रलय-कालीनआश्रय भी बनता है, जब पुन: सृष्टि काल सर्जन होता हैं तो वही तत्त्व जीवों पर अपनी अहैतुकि कृपा से स्व स्व कर्मानुसार सब की संसार यात्रा में व्यवस्था भी करते हैं , फिर जब यात्रा में मार्ग निर्देशक भी वे स्वयं ही गुरु रूप में बनते हैं :---
"यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं, यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै"
'जो सृष्टि के आदि में हिरण्यगर्भ ब्रह्मा जी को वेदों को धारण कराते हैं , तथा वेद का उपदेश देकर अभय प्रदान करते हैं' यहां से हमारी गुरु परम्परा अविच्छिन्न रूप से प्रवाहित होती है ,
नारायणं पद्मभवं वसिष्ठं शक्तिं च तत्पुत्रपराशरं
व्यासं शुकं गौड़पदं महान्तं गोविन्दयोगीन्द्रमथास्यशिष्यम्।।
श्रीशंकराचार्यमथास्य पद्मपादं च हस्तामलकं च शिष्यम् ।
तं त्रोटकं वार्तिककारमन्यानस्मद्गुरून्संततमानतोऽस्मिा
श्रुतिस्मृतिपुराणानामालयं करुणालयम्।
नमामि भगवत्पादं शंकर लोकशंकरम् ।।
शंकरं शंकराचार्यं केशवं बादरायणम् ।
सूत्रभाष्यकृतौ वन्दे भगवन्तौ पुनः पुनः
भगवान् शिव ही सनकादि ऋषियों की तपश्चर्या से प्रसन्न होकर श्रीदक्षिणामूर्त्ति के रूप में सनकादिकों को ब्रह्मविद्या का उपदेश दिया,और वे ही कलियुग के कलुषित पाप ग्रस्त मनुष्यों का उद्धार करने के लिए भगवत् पाद आचार्य श्रीशंकर के रूप में प्रकट हुए, यह हमारी निवृत्ति परायण परमसंहपरिव्राजक संन्यास गुरुपरम्परा हैं ,ये दोनो ही परम्परा सृष्टि के मूल तत्त्व से प्रारम्भ होती हैं ।जीवों के उद्धार हेतु दोनो ही परम्पराओं की उपादेयता हैं
वैदिक सनातन धर्म में दो ही परम्पराएं प्रचलित हैं , (१)शैव और वैष्णव ,अद्वैतसिद्धान्त का सम्पोषण-संवर्धन ज्यादातर इन्ही परम्पराओं से होता हैं जिसके प्रवर्तक स्वयं भगवान नारायण हैं ,वे ही सृष्टि के आदि में श्रीब्रह्मा जी को वैदिक परम्परा का उपदेश करते हैं , ब्रह्मा जी अपने ऋषि पुत्रों को सौंपते हैं ,जिनमें दो प्रकार की सन्तान श्रीब्रह्मा जी की हैं , (१) निवृत्ति परायण नैष्ठिक ब्रह्मचारी ,तथा संन्यासी,जैसे सनक,सनन्दन,सनत्कुमार ,सनत्सुजात, तथा देवर्षि नारद जी , ये निवृत्ति-परायण परम्परा सृष्टि के आदि काल से चली आ रही हैं
(२) प्रवृत्ति-परायण परम्परा के बारे में भगवान् स्वयं बतलाते हैं- - "महर्षयः सप्तपूर्वे चत्वारो मनवस्तथा। - - मद्भावा मानसा जाता येषां लोके इमा: प्रजा:।।"भ.गी.10/6 - - - - ☆प्रवृत्ति-निवृत्ति-धर्मद्वय-अनुष्ठानकी-एकफलरूपता☆ - - , इन्ह दोनों परम्पराओं का लक्ष्य एक ही है, क्योंकि कर्मयोग के द्वारा प्रवृत्तिपरायण साधक जिस लक्ष्य तक पहुंचता हैं, निवृत्ति-परायण को भी .वही प्राप्त होता है, इसी को श्रीमद्भगवद्गीता में स्पष्ट रूप से कहा है-
"यत्सांख्यै: प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते।
एवं सांख्यं च योगं च यः पश्यति सः पश्यति"।।भ.गी.5/5,
अर्थात् जो स्थान =कैवल्य मोक्ष या अन्तःशुद्धि, विहित कर्म-त्याग रूप विविदिषा-संन्यास के द्वारा प्राप्त होता है ,वही कर्मफलासक्ति का त्याग पूर्वक भगवत् प्रीत्यर्थ कर्म का अनुष्ठान करने वाले निष्कामकर्योगी को भी वही फल प्राप्त होता है ,इसी को क्रमसमुच्चय कहते हैं , भाष्यकार को यही अभिप्रेत हैं ,इसलिए साधक चाहे निवृत्ति-परायण होकर आगे बढे ,चाहे प्रवृत्ति-परायण होकर चलें दोनों के फल में कोई भेद नहीं हैं , यहां स्थान शब्द से दोनों ही फल लक्षित हैं ,यदि केवल अन्तःकरण शुद्धि हेतु कर्मफलत्यागपूर्वक कर्म का अनुष्ठान करता है, अथवा शास्त्र विहित कर्म का शास्त्र-विधि से त्याग करके विविदिषा संन्यास लेकर साधन रत हैं तो दोनों का फल अन्तःकरण की शुद्धि ही होगा तत्पश्चात् श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ गुरु से महावाक्य का श्रवण करने पर ब्रह्मात्मैक्य भाव से कैवल्य-मोक्ष रूप जो स्थान होगा वह भी एक ही होगा ,फर्क केवल शुद्धि साधक की मनःस्थिति का है , भगवत् प्राप्ति में दोनों ही परम्परा की उपादेयता हैं ,बल्कि श्रीमद्भगवद्गीता में शास्त्र विहित कर्म का स्वरूप से त्याग की बजाय निष्कामभाव से अपने कर्तव्य कर्म के पालन पर विशेष आग्रह इसलिए भी ध्वनित होता है कि प्रायः साधक की मनःस्थिति अकृतोपास्ति ही होती है, ऐसी स्थिति में विहितकर्म का त्याग सफल नहीं होता है-

☆ स्वधर्मानुष्ठान के बिना वैराग्य संभव नहीं है☆
राम चरित मानस में वैराग्य उत्पत्ति का क्रम इस प्रकार बतलाया है,
"धरम तैं विरति योग ते ग्याना।
ज्ञान मोक्ष प्रद वेद बनाना ।।
स्वधर्मानुष्ठान से वैराग्य उत्पन्न होता है, वैराग्य से साधक के मन में निष्कामभाव उत्पन्न होता है जिसको कर्मयोग कहा है, ईश्वरार्पण बुद्धि से जब निष्कामकर्म का करने से अन्तःशुद्ध होने के बाद वेदान्त कार श्रवण-मनन-निदिध्यासन जब करता है तो संशय और विपरीत भावना रहित तत्त्वज्ञान उत्पन्न होता है , तत्त्वज्ञान को ही वेद भगवान ने मोक्ष का साधन बतलाया है।

जीव की शुद्धि का मात्र साधन यही है कि वह वर्ण और आश्रम व्यवस्था का समुचित पालन करें ,अन्य किसी भी उपाय से जीव की शुद्धि संभव नहीं हैं जब तक शुद्धि नहीं होगी ,तब तक अपने अभीष्ट को प्राप्त नहीं कर सकता है । जीव का स्वाभाविक अभीष्ट पदार्थ है,समस्त दु:खों की सदा के लिए निवृत्ति और सदा शाश्वत सुख की प्राप्ति, इसी को वैदिक सिद्धान्त में परम मोक्ष कहते हैं , मोक्ष का अर्थ परम स्वातन्त्र्य भी होता हैं , किन्तु वह स्वातन्त्र्य धर्म सम्मत होना चाहिए, धार्मिक स्वातन्त्र्य प्राणिमात्र का हितैषी होता है, इसलिए ब्रह्मज्ञानी के लिए कहा गया है-"सर्वभूतहिते रता:" ब्रह्मज्ञानी स्वयं सुखस्वरूप होता है ,उनसे जिनका भी तादात्म्य ,होता है ,वह भगवत् स्वरूप ही हो जाता है।ऐसी भगवान् की दिव्य विभूति ही जीव का उद्धार करने में समर्थ होती है ,उसी को गुरु-तत्त्व कहते हैं , उनका अनात्म-तादात्म्य बिल्कुल समाप्त हो जाता है।ऐसे भगवान के सगुणसाकार विग्रह के साथ जीव जब जुड़ जाता है, तो उन्हे गुरुमुखी-संवित्साधक कहा जाता है ,यह जीव की शुद्धि का सर्वोत्तम साधन हैं , इसमें स्वयं का प्रयास निमित्त मात्र होता है,गुरुकृपा उनके हृदय में जमे हुए कार्मिक मल को शोधन करके सात्त्विक बना देती है, "सत्त्वात्संजायते ज्ञानम्" अन्तःकरण में जब सत्त्वसंशुद्धि हो जाती है, तब साधक हृदय में संवित् तत्त्व का विचार उत्पन्न होता है,यह तात्त्विक विचार ही संसार से वैराग्य का हेतु बनता है,उस वक्त साधक के धैर्य की परीक्षा होती है,जल्दीबाजी में अस्वाभाविक निर्णय लेने की इच्छा होती है किन्तु जब तक पूर्ण वैराग्य के बिना गृह त्याग का विचार नहीं करना चाहिए, ,प्रबल वैराग्य हों तो ब्रह्मचर्य आश्रम से भी संन्यास ग्रहण कर सकता हैं, यदहरेव विरजेत् तदहरेव प्रवजेत् "गृहाद्वा वनाद्वा, ब्रह्मचर्याद्वा" ब्रह्मचर्याश्रम से सीधा संन्यास भी ले सकते हैं,,ग्रहस्थ आश्रम से या, वानप्रस्थ आश्रम से ,यहां तक कहा कि जिस दिन वैराग्य हो जायें ,उसी वक्त संन्यासी बन जाना चाहिये ।किन्तु प्रबल वैराग्य होना आवश्यक हैं , जब तक प्रबल वैराग्य नहीं होता है , तब तक भावुकता में बह कर कोई अस्वाभाविक फैसला नही करना चाहिए ,यह शीघ्रता पश्चाताप बन सकती है ,जब तक अन्तःशुद्धि नहीं होती है ,तब तक तत्त्व जिज्ञासा ही नहीं जगती है , तत्त्व जिज्ञासा के बिना संन्यास भी नहीं लेना चाहिए,क्योंकि अन्तःशुद्धि के विना संन्यास जीवन समाज पर भार स्वरूप बन जाता है , निष्काम कर्म ,और निष्काम उपासना का अनुष्ठान किये बिना जीवन का लक्ष्य ही स्पष्ट नही होगा कि मुझे संन्यास लेकर क्या प्राप्त करना है , पेड़ से फल पक कर जब गिरता है ,तब उसमें मिठास ,सुगन्धि आदि सद्गुण आते हैं , जिन्हे जबरदस्ती आधुनिक ढंग से पकाया जाता हैं तो, उनमें न मिठास होता हैंं न सुगन्धि आदि होते है , बल्कि वह जल्दी सड़ कर नष्ट हो जाता है, इसी प्रकार हमारे जीवन की भी यही दुर्दशा हो सकती हैंं
☆गौण संन्यास में शास्त्रविधि-अनौपचारिक☆
मानव मात्र की जिजीविषा चारों पुरुषार्थों पर ही निर्भर होती हैं क्योंकि मनुष्य या तो सुख चाहता है, या सुख के साधन बटोरता है । धर्म-अर्थ-काम और मोक्ष ये चारों पुरुषार्थ ही जीव मात्र की इच्छा के विषय है , इन्हे जब अच्छी प्रकार समझ नहीं लेता हैं , तब तक जीवन अन्धकार-मय बना रहता है, क्योंकि प्राणि स्वभाव से सुखाभिलाषी हैं, दुःख किसी भी प्रकार का कभी भी अभीष्ट नही है , तथा सुख भी शाश्वत भी शाश्वत चाहता हैं , इसी चाहत को वेदान्त दर्शन की भाषा में कैवल्य मोक्ष कहते हैं । यद्यपि जीव इस रहस्य को मोक्ष के नाम से नहीं समझता हैं किन्तु अपनी नासमझी में भी मोक्ष ही चाहता हैंं ,इससे सिद्ध होता है कि प्राणिमात्र की इच्छा का अभीष्ट पदार्थ मोक्ष ही हैं , वही पुरुषार्थ चतुष्टय में साध्य के रूप में बैठा है बाकी तीन पुरुषार्थ मोक्ष के परम्परया साधन हैंं,इस लिए मोक्ष का सीधा सीधा साधन तो भगवान भाष्यकारों ने सर्वकर्मसंन्यास पूर्वक तत्त्व साक्षात्कार को ही निश्चय किया है,यह बात प्रत्येक साधक को निर्भ्रान्त रूप से निश्चय होनी चाहिए, तभी जाकर मानव जीवन का मूल्यांकन करने में समर्थ होता हैंं, अन्यथा ,जानवर की तरह जीवन व्यर्थ ही बीत जाता हैंं ।
जीव-भाव की सर्वथा निवृत्ति ही,मानव जीवन का परम लक्ष्य है ,वह चाहे किसी भी साधन से हों, केवल साधन-पद्धति की ही भिन्नता होती हैं , लक्ष्य दोनों का एक ही हैं ,प्रवृत्ति का अवसान भी निवृत्ति में ही होता है, प्रवृत्ति क्रिया प्रधान होती हैं ,निवृत्ति क्रियाफलावसायी होती हैं ,प्रवृत्ति का सीधा सम्बन्ध प्राकृतगुणों से होता है, निवृत्ति आत्मचैतन्य की स्वाभाविक स्थिति हैं ,निवृत्ति को ही संन्यास शब्द से शास्त्रों में कहा है ,इसलिए ब्राह्मी स्थिति का नाम ही संन्यास शब्द का मुख्यार्थ हैं, क्यों कि जीव के परमार्थ स्वरूप में प्राकृतगुणों का आध्यात्मिक सम्बन्ध है,इस सम्बन्ध का विच्छेद होकर नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभाव सत् चित् आनन्द स्वभाव को आत्मसात् करके देहाध्यास की निवृत्ति ही संन्यास की पराकाष्ठा है , इसी को विद्वत्संन्यास कहा है , किन्तु यह स्थिति साधन के बिना संभव नही हैं , इसलिये वेद भगवान ने विविदिषा- संन्यास का विधान विद्वत्संन्यास के साधन के रूप में किया है-
"तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसाऽनाशकेनैतमे विदित्वा मुनिर्भवति"।
अर्थात् 'ब्रह्मजिज्ञासु या कुलीन संस्कारी ब्राह्मण निष्कामभाव से युक्त होकर इस आत्मतत्त्व को वेदाध्ययन से ,यज्ञ से ,दान से तथा तप के द्वारा जानना चाहते हैं, इन्ही साधनों का अनुष्ठान करते हुए वे मुनि=विद्वत्संन्यासी हो जाते है' इस श्रुति वाक्य से संन्यास की दो श्रेणी स्पष्ट हो गई, (१) विद्वत्संन्यास और (२)विविदिषा संन्यास । विद्वत्संन्यास तो आत्मस्थिति मात्र हैं ,इसमें शास्त्र अपना विधि निषेधात्मक आधिकारिक अंकुश हटा लेता है,क्यों कि जीवन्मुक्त महापुरुष का स्वभाव स्वयं शास्त्र बन जाता है,उनकी समस्त प्रवृत्तियां प्राणिमात्र की हितैषी हो जाती है, यही शास्त्र का स्वरूप हैं । इसलिए बृहदारण्यक श्रुति में ब्रह्मज्ञानी महापुरुष के लिए कहा है,"ईश्वरो ह तथैव स्यात्" अर्थात् ब्रह्मज्ञानी की व्यवहारिक स्थिति ईश्वर तुल्य हो जाती है, परमार्थत: तो "ब्रह्मविद्ब्रह्मैव भवति" ब्रह्मज्ञानी ब्रह्मस्वरूप ही होता है, तथा ब्रह्म=परमात्मा का व्यवहारिक स्वरूप को ही ईश्वर कहा जाता है , इसलिए ब्रह्मज्ञानी महापुरुष का स्वभाव ही शास्त्र होता है, इसलिए उनमें स्वातन्त्र्य स्वाभाविक हैं ,न कि प्राकृत गुणप्रभावी, गुणों का प्रभाव केवल साधक या अन्य प्राणियों पर ही होता है, इसलिए भगवान ने "प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय " शब्द का प्रयोग किया है। अतः विद्वत्संन्यास में विधिनिषेध का अंकुश नहीं होता है।

☆गौण संन्यास का स्वरूप ☆
विविदिषा संन्यास साधन की पराकाष्ठा है ,क्योंकि इसी के द्वारा विद्वत्संन्यास तक साधक को पहुंचना है ,इसलिए इस पर विशेष विचार करना आवश्यक हो जाता है।विविदिषा संन्यास के भी गौण मुख्य रूप से दो श्रेणी हो जाती है , जिसमें मात्र जीव सृष्टि का सर्वथा त्याग ही मुख्य होता है ।बाह्य आश्रम चिन्ह गौण होते हैं ,इसलिए गौण मुख्य भेद होना स्वाभाविक ही हैं ,श्रीमद्भगवद्गीता के षष्ठ अध्याय में इसका संकेत स्पष्ट हैं-
"अनाश्रितःकर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः ।
स संन्यासी च योगी च न निर्ग्निर्न चाक्रियः।।
वास्तव में संन्यास शब्द यहां आसक्ति के अभाव का ही वाचक है , न कि स्वरूप से त्याग संन्यास शब्द का मुख्यार्थ हैं ,संन्यास शब्द का मुख्य अर्थ तो केवल आत्म निष्ठामात्र है, इसलिए अनुगीता में "ज्ञानं संन्यासलक्षणम्" तत्त्व का निश्चय ही संन्यास शब्द का तात्पर्यार्थ हैं , क्यों कि शाब्दिक दृष्टि से संन्यास शब्द >सम् =सम्यक् , अच्छी तरह , नि=नि:शेष , आस = फेंकना ,त्यागना ,इस अर्थ में अनात्म पदार्थों का सर्वथा त्याग ही संन्यास शब्द का अर्थ है,जो जो अनात्म पदार्थों में संभव ही नही हैं,इस बात को समझने के लिए त्याज्य वस्तु संसार के स्वरूप का विचार आवश्यक है, दो ही पदार्थ है, एक सत्य और दूसरा मिथ्या, मिथ्या पदार्थों के भी तीन ही स्वरूप होते हैः- - (१) =ईश्वरीय-सृष्टि =पञ्चीकृतपञ्चकोषात्मकपञ्चपब्रह्माण्डात्मक समस्त भौतिक जगत् ।-

( २) =जैवसृष्टि=

(३) =मिश्रित सृष्टि - - - - (१)ईश्वरीसृष्टि:- जिन्ह पदार्थों का निर्माण केवल ईश्वरीय संकल्पमात्र से होता है-पृथ्वी,जल,तेज, वायु,आकाश, इन्ही पञ्चीकृतमहाभूतों से उत्पन्न हम आपके शरीर, जिन्हे पिण्ड भी कहते हैं ,ये समस्त ब्रह्माण्ड ,सूर्य, चन्द्रमा ,ग्रह,नक्षत्र, नदियां ,पर्वत,वृक्ष आदि जीव की क्षमता से बाह्य संसार को ईश्वरीय सृष्टि कहते हैं , इनका जीव -द्वारा न निर्माण संभव है, न त्याग संभव है ,हां इनका इच्छानुसार बदलाव कर सकता है,किन्तु सर्वथा त्यागने का दम्भ नहीं कर सकता है।

(२) जैव सृष्टि :--जिन्ह पदार्थों का निर्माण केवल जीव अपनी पूर्व जन्मान्तरीय वासना से स्वयं करता है, शरीर आदि अनात्म पदार्थों " मैं " "मेरा" अन्य पदार्थों में 'तू, तेरा काम भाव, काम ,क्रोध , लोभ ,मोह ,राग-द्वैष, आदि जितनी भी मानसिक सृष्टि हैं इन्हे जीव केवल स्वयम् ही निर्माण करता है, इन्ही के कारण जन्म - जन्मान्तरो में भटक रहा है , इन्हे यह बनाने में भी स्वतन्त्र है , त्याग करने में भी स्वतन्त्र है , ईश्वर का मात्र इतना नियन्त्रण स्वीकार करना पड़ता है कि , जीव अल्पज्ञ होने के कारण कर्म करके भूल जाता है , किन्तु ईश्वर सर्वज्ञ होने के नाते इनके जन्म-जन्मान्तर कार हिसाब रखते हैं ताकि ,इनकी संसार यात्रा व्यवस्थित चलती रहे , बल्कि ईश्वर इनकी रचना को प्रभावित नहीं करते हैं , इसलिए कहा गया हैंं, जीव कर्म करने में स्वतन्त्र हैं , किन्तु अपने कर्मों का फल भोगने में पर तन्त्र हैं , यहां तो त्याग का प्रसंग हैं तो , यहा अपनी बनाई सृष्टि का त्याग करने में भी स्वतन्त्र हैं और बनाने में भी स्वतन्त्र हैंं, इसी को लेकर भगवान श्रीकृष्ण ने कहा:-
अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः।
स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्नचाक्रियः।।
"सर्व संकल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते" ।
इसी को गौण संन्यास कहा हैं , इसमें केवल आसक्ति का त्याग ही मुख्य हैं ,बाकी बाहर से कुछ परिवर्तन करने की कोई आवश्यकता नही हैं ।
यह व्यवस्था शास्त्रविहित विविदिषा संन्यास की पोषक हैं,न कि आश्रम व्यवस्था को प्रभावित करने के लिए , यूं कहिये मुख्य संन्यास में अक्षम साधकों के कल्याणार्थ हैं, कुछ लोग इस भगवद्वाक्य का रहस्य न समझ कर शास्त्र विहित संन्यास आश्रम का अपलाप करते हैं ,यह भी दुराग्रह ही हैं ,और वर्ण और आश्रम व्यवस्था मानवीय जीवन यापन का साधन मात्र हैं ,इसके माध्यम से जीव भाव की शुद्धि करना ही लक्ष्य है न कि इनका मिथ्या अंहकार बढाकर ऊंट गले बांधना है, वर्ण और आश्रम व्यवस्था मात्र शुद्धि का साधन है, मैं ब्राह्मण हुं , राजपूत हुं, मैं संन्यासी हूं , बाल ब्रह्मचारी हूं , मैं गृहस्थ हूं , मैं वानप्रस्थ हूं ,यह जीव सृष्टि भी अंहकार प्रयुक्त हों तो बन्धन का कारण बन सकती है , जीव सृष्टि का सर्वथा त्याग ही सच्चा संन्यास है, इस लिए श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार समस्त जीव सृष्टि ही बन्धन का कारण है, इसी का त्याग करना चाहिए, इसी बात को श्रीभगवान ने उपसंहार में कहा:- - "सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज" ।- - समस्त अनात्मभाव का परित्याग करके आत्मभाव में स्थित होना ही सच्चा संन्यास है,- - यहां भगवान् के वचन का तात्पर्य मात्र फलाभिसन्धि सहित कर्तृत्व-भोक्तृत्व आदि समस्त जीव सृष्टि के त्याग को ही संन्यासी योगी की संज्ञा दी है, न कि मुख्य संन्यास के खण्डन में तात्पर्य हैं ,क्योंकि शास्त्रविधि से विहितकर्म का त्याग भी शास्त्रविधि से ही होता है ,इसी को मुख्य संन्यास कहा है,वास्तव में आश्रम व्यवस्था के अन्तर्गत वानप्रस्थ जीवन ही गौण संन्यास जैसा होता है, किन्तु भगवान् श्रीकृष्ण की उदार परिभाषा में मानवमात्र का गौण संन्यास में अधिकार ध्वनित होता है, क्योंकि भगवान ने अनन्यभाव को ही ज्यादा प्राधान्य दिया है, संन्यास का मुख्य तात्पर्य ही अनन्य शरणागति ही संन्यास शब्द का अर्थ है।- - "सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज"। में धर्म शब्द से आध्यासिक सम्बन्ध प्रयुक्त यावत् जीव भाव का समर्पण यहां अभीष्ट हैं , यह भी गौण संन्यास का ही सूचक है,यह स्थिति केवल अनन्य शरणापन्न की ही हो सकती है।- - अब तक गौण संन्यास को लेकर चर्चा की गई , जिसमें गुण ,कर्म स्वभाव के अनुसार मानव मात्र का अधिकार है और कर्तव्य भी , क्यों कि बिना संन्यास के मोक्ष नहीं होता है , यह बात जब शास्त्र में आती है , उसका तात्पर्यार्थ यही होता है कि बिना संन्यास अपने संवित् स्वरूप का बोध संभव नहीं हैं , संवित् बोध के बिना मोक्ष नहीं होगा, विविदिषा संन्यासी के लिए शास्त्र की आज्ञा हैं कि "संन्यस्य श्रवणं कुर्यात् "संन्यासी बन कर श्रवण करें , अब सभी तो शास्त्रविधि से मुख्य संन्यासी बनने के योग्य नहीं हैंं, मोक्ष प्राणिमात्र का अभीष्ट पदार्थ हैं फिर कैसे इसका समाधान हों, इस विषय में गुरुजनों से जो भी जानकारी हमें मिली , जैसा हमने स्वयं ने जीवन में समझा ,तदनुसार अपने हृदय के भाव प्रकट किये , हमने भी शास्त्रविधि से "विविदिषा संन्यास "की दीक्षा गुरुजनों से प्राप्त की , उस पर भी प्रकाश यथा-मति डालने का प्रयास करता हूं ...- - शास्त्र में आश्रम संन्यास जिसको मुख्य संन्यास भी कहते है, वह मुख्यतया दो प्रकार का सुना है,(१) विद्वत्संन्यास, और (२) विविदिषा संन्यास ,(१)आत्मज्ञान की इच्छा से शास्त्रविहित कर्तव्य कर्म को शास्त्रविधि से त्याग करने विविदिषा संन्यास कहते हैं, (२)दृढ अपरोक्ष ब्रह्मात्मैक्य बोध होने के बावजूद जीवन मुक्ति के सुख को इस ववर्त्तमान शरीर में रहते हुए अपरोक्ष अनुभूति का अनुभव करने के लिए विद्वत्संन्यास स्वेच्छा से स्वीकार करता हैं,इसके लिए शास्त्रविधि नहीं हैं कि आपको संन्यास धारण करके ऐसा जीवन बिताना है ,तथा भेद प्रभेद भी नहीं होते हैं , वह तो केवल जीवन मुक्ति के सोपान को पार करके , विदेह कैवल्य प्राप्तिस्वरूप ही होता है।तत्त्वज्ञान की सप्तभूमिकाओं में से , (१)असंगसक्ति,(२)पदार्थाभाविनी, और(३)तुरीयगा , इन्ह तीनभूमिकाओं को जब सर्वथा पार कर लेता है , तब वह स्वयं पूर्णतया ब्रह्मभाव में स्थित होकर विदेह कैवल्य को प्राप्त कर लेता है,हाँ इतना अवश्य हैं कि यदि विद्वत्संन्यासी महापुरुषों की प्रारब्ध प्रवृत्ति प्रधान होती हैं,तो वे श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ महापुरुष जब तक असंगसक्ति=पञ्चमभूमिका में रहते है तब तक आचार्य धर्म का पालन मुमुक्षु ओं के लिए उपदेश आदि करते हैं किन्तु स्वभाव उनका निवृत्ति प्रधान होने के नाते अभ्यास की प्रगाढता से वे आगे की पदार्थाभाविनी में प्रविष्ट होने लगते है ,तब बाह्य उपदेश आदि वाग् व्यवहार तो विरल हो जाता हैं ,किन्तु साधक का उनके पास बैठने मात्र से संशय मिटने लगते हैं यह स्थिति श्रीदक्षिणामूर्त्ति आचार्यमूर्ति की स्थिति होती है , वही आचार्यमूर्ति जब सप्तम भूमिका तुरीयगा तक पहुंच जाते हैं तो विदेह स्वरूप हो जाते हैं , ऐसी स्थिति जीवन्मुक्त महापुरुषों की देखने सुनने को हमें मिली हैं ,शास्त्र में तों उनके बारे में यत्र तत्र बहुधा प्रमाण सुलभ हैं ।किन्तु प्रत्यक्ष प्रमाण की अपनी महत्ता है।- - - - ☆जीवन्मुक्तपरमहंसों की ब्राह्मीस्थिति☆- - - - बहुत कुछ रहस्य शास्त्रों में लिखा हुआ है उन्हे हम श्रद्धा भक्तिपूर्वक पढ सुन कर सन्तोष कर लेते हैं ,किन्तु ऐसे जीवन्मुक्त महापुरुषों के हमें दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ ,भले ही आधुनिक अल्पज्ञ लोग उनमें रुग्ण आदि की कल्पना करें ,किन्तु प्रत्यक्ष प्रमाण सबसे प्रबल होता है , उनके लिए अन्य प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती है , एक बार की बात हैं ,ऋशिकेस्थ ब्रह्मविद्या पीठ में जब में स्वाध्यायरत था , तब एक जीवन्मुक्त महापुरुष के दर्शनार्थ जाता था , एक दिन उन्हे मूल उपनिषद् पाठ सुना रहा था तो जहां मेरी वाणी स्खलित होती थी ,वहां वे तुरन्त टोक देते थे , वे संस्कृत में ही बोलते थे , मुझे कहते थे , "अशुद्धं मा वक्तव्यं" अब बताइये अन्य बाहर का व्यवहार सब कुछ सेवक संभालता था , भूख प्यास आदि की उन्हे प्रतीति नही होती थी , भाग्यशाली सेवक भी ऐसे ही उनकी सेवा में रहते थे कि शरीर दो प्रतीत होते थे किन्तु व्यावहारिक जीवात्मा एक ही था ,सेवा में इतने तन्मय थे कि उन्हे सब कुछ पता रहता कि किस वक्त महाराजश्री को क्या आवश्यकता हैं , अबोध शिशु को जैसे मां संभालती हैं ,वैसे उन्होने अपने गुरुदेव की सेवा की,महाराजश्रीको बाहर का वातावरण याद दिलाना पड़ता था उन्हे कुछ भी भान नही रहता था ,लम्बे समय तक यही स्थिति हमने"छोटे महाराज"श्री स्वनामधन्य स्वामी हरिहरतीर्थ जी महाराज का इसी रूप में दर्शन किया था, इस अवस्था को महज एक बीमारी कह कर यदि कोई उपेक्षा करें तो उनका दुर्भाग्य ही समझना चाहिए,प्रत्यक्ष हमने उनकी पदार्थाभाविनी षष्ठ भूमिका की स्थिति का दर्शन किया था , वे पुण्य श्लोक उत्तराखण्ड की प्रत्यक्ष अन्तिम विभूति थी जिन्होने विद्यानगरी काशी से ऋशिकेस्थ ब्रह्मविद्या पीठ की प्रधानाचार्य के रूप में पचास वर्षों तक परमविरक्तभाव से ब्रह्मविद्या की उपासना पठन-पाठन के रूप में अनवरत करते रहे , हमें उनके विग्रह-दर्शन का परम लाभ प्राप्त हुआ, आज भी जब वे स्मृति पटल पर आते हैं तो , हमें भावविभोर कर देते हैं।एक और महान विभूति हमारे परम गुरु "बड़े महामहाराज"श्री स्वनामधन्यनिरंजन पीठाधीश्वर महा मण्डलेश्वर पदवाक्यपारावारीण विद्वच्छिरोमणि विद्वद्वरिष्ठ के हमें दर्शन तो सुलभ नहीं हुए किन्तु उनकी हमने महिमा बहुत सुनी ,वे परमहंस संन्यास परम्परा के यति-कुल भूषण थे ,उनका सम्पूर्ण जीवन प्रशस्तगुणों का भण्डार बना हुआ है,उनकी दैनिक दिनचर्या के बारे में सुनता हूं ,तो मैं रोमांचित हो जाता हूं, मैंने उनके अन्तिम जीवन की दिल्ली विश्वनाथ संन्यास आश्रम की घटना एक वृद्ध सन्त से सुनी कि--
वे एक बार अपने कक्ष में बैठे थे ,उस वक्त सभी व्यावहारिक जिम्मेदारियों से बिलकुल मुक्त थे ,आश्रम की व्यवस्था सम्बन्धित सुझाव तत्कालीन निरंजन पीठाधीश्वर आचार्य महामण्डलेश्वर श्रीस्वामीमहेशानन्दगिरि को महाराज सुझाव भेजा तो मण्डलेश्वर जी अपने सहज भाव में कहा दिया किसी जब "ऐसा करें , वैसा करें ,तो हमें किसलिए बिठाया" सेवक ने आकर मण्डलेश्वर जी की बात आकर सुना दी ,बस उसी वक्त किसी को भी बिना बताए बस अड्डे से बस में बैठकर पुष्कर राज राजस्थान में आकर इतने उपराम हो गये कि किसी से व्यवहार नहीं रखा , उसका परिणाम यह हुआ कि- ऐसी निर्द्वन्द्व स्थिति में पहुंच गये कि एक महिने तक समाहित स्थिति में रह कर शरीर छोड़ा , बीच बीच उनकी दृष्टि भी किसी भाग्यशाली पर पड़ती थी।किन्तु बाह्य व्यवहार से सर्वथा विरल स्थिति में देह त्याग किया ,यह स्थिति, सप्तम तुरीयगा की वर्णित स्थिति थी , षष्ठ भूमिका में प्रारब्धवशात् अन्न , जल से शरीर चलता रहता है , दूसरे के खिलाने पर प्राण उस सामग्री को नीचे खैंच लेते हैं ,और सप्तम भूमिका में खिलाने पर भी वह अन्ना पान प्राण अन्दर खैंचता नही पाते हैं , केवल शरीर जीवित रहता हैं ,किन्तु ज्यादा समय तक शरीर जीवित नहीं रह सकता है । यह स्थिति सप्तम भूमिका की हैं , ऐसी ही हालत हमारे परम गुरु श्री स्वामी नरसिंह गिरि जी महाराज की स्थिति तत्कालीन महानुभावों ने अनुभव की थी , इतना अवश्य हैं , ये भूमिका आदि विषय साधना की प्रगाढ तारतम्य स्थिति का फल हैं न कि ब्रह्मविद्या का ,ब्राह्मी स्थिति केवल संशय और विपरीत भावना से रहित दृढ अपरोक्षानुभूति का ही फल हैं , प्रवृत्ति निवृत्ति का सम्बन्ध मात्र प्रारब्ध और उपासना से ही होता है ।

☆ जीवन्मुक्तों की प्रवृत्तिप्रधान ब्राह्मी स्थिति ☆
सदृशं चेष्टते स्वस्या: प्रकृतेर्ज्ञानवानपि।
प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रह किं करिष्यन्ति ।।सभी जीव अपने स्वभाव से बन्ध कर व्यवहार करते हैं,स्वभाव का अतिक्रमण कोई कर नहीं सकता है ,यहां तक की तत्त्वज्ञानी महापुरुषों को प्रारब्ध वश अपने गुणकर्मस्वभाव वश ही चेतावनी होती हैं ,भगवान् के "ज्ञानवानपि" शब्द को खैंचता तान करने की आवश्यकता नहीं है कि यहां ज्ञान कौन सा लिया जाय ,ज्ञान से तत्त्वज्ञान लेने पर भी कोई आपत्ति नही होनी चाहिये ,क्यों कि ज्ञान प्रारब्ध का केवल असर कम कर सकता है ,बाकि प्रारब्ध कर्म तरकस से छूटे तीर के समान होते है, तत्त्वज्ञान प्रारब्ध वेग शुरु होने के बाद दृढ हुआ है,हम चाहे कि प्रारब्ध कर्म हमें किसी भी प्रकार प्रभावित न करें , किन्तु ऐसा होता नहीं हैं, जैसा गुण कर्म स्वभाव से प्रारब्ध बनकर आया उसी के अनुरूप चेष्टा होती है,इतना अवश्य है कि ज्ञानी की प्रारब्ध के साथ नित्यसत्त्वापत्ति होती है, जिनसे विवेकजाग्रत रहता है तथा साधक के परमहितार्थ ही प्रवृत्ति होती हैं।
जिस तत्त्वज्ञानी महापुरुष की प्रवृत्ति प्रधान प्रारब्ध होती है उनकी प्रारब्ध अमुक्त जीवों की प्रारब्ध से जुड़ी होने के कारण साधकों के कल्याणार्थ प्रवृत्ति होतीहैं ,जिनसे अनेक साधकों का अभीष्ट सिद्ध होता है ।

☆ विविदिषा संन्यास विचार☆
वर्णाश्रम व्यवस्था मानवता की मौलिक धरोहर है ,इसके बिना मानवता प्रायः अर्थ शून्य हो जाती है ,क्योंकि यह सम्पूर्ण विश्व संवैधानिक धाराओं से सुव्यवस्थित हैं , इनका पालन करने वाला पुरस्कृत होता है, तथा धाराओं का अतिक्रमण करने वाला दण्डित किया जाता है।
मानव को अपनी मानवता कायम रखने के लिए मानवीय संविधान का पालन अवश्य करना चाहिए , न करने पर मनुष्य को अपने पाप का परिणाम भुगतना पड़ता है, यहां के संविधान का
उल्लंघन करने पर व्यक्ति दांये बाये होकर बच सकता है, किन्तु सर्वज्ञ परमात्मा से छुपाव करके किसी भी प्रकार से बच नहीं सकता है, इसलिए ईश्वर को साक्षी मान कर ,अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए ।ईश्वरीय संविधान केवल वेद हैं , उसमें मानवता सम्पादन के अनिवार्य कर्तव्य कर्म का विधान किया गया हैं , उसे अवश्य
सम्पादन करना चाहिए । इसलिए शास्त्र ने मनुष्य को सावधान किया कि "ऋणानि त्रिण्यपाकृत्य मनो मोक्षे विवेशयेत्" वर्णाश्रम धर्म का पालन करके तीनों ऋणों से मुक्त होकर मन को मोक्ष में लगाना चाहिए, तथा मोक्ष केवल सर्वहित कर्मसंन्यास पूर्वक आत्मज्ञान से ही हो सकता है , अन्य किसी भी साधन से मोक्ष संभव नही है।
इसके लिए बहुधा शास्त्र प्रमाण हैं :-"-ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशै:" 'आत्मदेव को जान कर (जीव)सभी बन्धनों से मुक्त हो जाता है'।"ऋते ज्ञानान् न मुक्ति:"' ज्ञान=आत्मज्ञान के बिना मोक्ष नही हो सकता है'। "तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति नान्य पन्था विद्यतेऽयनाय" उस 'परमात्मदेव को (आत्मरूप से) जान कर ही (जीव) अतिमृत्यु=बार बार जन्म-मरण को पार कर सकता है, अन्य कोई उपाय नहीं है'।इन्ह सभी शास्त्र वचनों से सिद्ध होता है कि सभी शास्त्रविहित कर्मों का शास्त्रविधि से त्याग=संन्यास पूर्वक वेदान्तशास्त्र के श्रवण मनन निदिध्यासन से ही मोक्ष प्राप्त हो सकता है, इसलिए तीनों वर्णो के संस्कार होकर शास्त्र विधि से स्वीकार्य कर्मो का शास्त्र-विधि से त्याग करके चतुर्थ आश्रम संन्यास आश्रम में प्रविष्ट होकर मोक्ष साधना आरम्भ करनी चाहिए , गौण संन्यास की चर्चा पहले हो चुकी है , अब तो केवल शास्त्रविधि केवल पालन पर ही ज्यादा प्रकाश डालना है , विद्वत्संन्यासी और गौण संन्यासी के लिए शास्त्र विधि की आवश्यकता नहीं है , वह तो आचार सिद्ध हैं , स्वाभाविक स्थिति के लिए शास्त्रविधि आवश्यक नहीं हैं , यहां इतना विशेष समझना चाहिए कि बिना विविदिषा संन्यास के नाम विद्वत्संन्यास सिद्ध हो सकता हैंं न गौण-संन्यास, क्यों कि तीव्र मुमुक्षु के बिना किसी भी साधन से तत्त्वसाक्षात्कार नहीं हो सकता हैंं ।
तत्त्वसाक्षात्कार के बिना मोक्ष असंभव हैं , सद्गति तो किसी साधन साध्य के पुण्यों से होकर सकती हैंं, किन्तु सद्गति के साथ दुर्गति का सम्बन्ध दिन-रात जैसा हैंं ,इसलिए मानव जीवन की सफलता के लिए "संन्यस्य श्रवणं कुर्यात्"संन्यासी होकर (अध्यात्मशास्त्र का)श्रवण करना चाहिए।क्योंकि वेदान्तश्रवण-मनन-निदिध्यासन से दोष निवृत्ति होती हैं और निर्दोष अन्तःकरण में महावाक्य के श्रवण मात्र से ब्रह्मात्मभाव की अनुभूति होकर जीव सदा के लिए जन्म-मरण परम्परा से मुक्त हो जाता है।

☆ मोक्ष केवल आत्मज्ञान से ही संभव है☆

आत्मज्ञान के बिना मोक्ष संभव नहीं हैं ,यह बात युक्ति से भी सिद्ध है।आखिर बन्धन क्या हैं, इस बात को बहुत अच्छी तरह समझना चाहिए, नही तो बन्धन मुक्ति, आदि शब्दों को बोलते पढते हमारा जीवन बीत जायेगा हम वहीं के बने रहेंगे जहां से चले थे।बात यह हैं कि जीवात्मा का शरीर ही सबसे बड़ा बन्धन हैं ,किसी भी कार्य को अपनी इच्छा के बिना मजबूरी से स्वीकार करने को हम बन्धन रूप मानते हैं , क्या करें जी मजबूरी हैं , एक तरह से हार कर लाचार बनना ही बन्धन हैं , हमारे अतीत जीवन में अधिकतर ऐसी परिस्थिति बनती आई हैं , इसी को हमने जीवन की संज्ञा देकर मजबूरन इसे घसीट रहे हैं । इसके लिए शरीर परम्परा से हमेशा के लिए मुक्त हो जाना ही हमारा परम स्वातन्त्र्य हैं ,क्यों कि शरीर रहते हम दुखों से छूट नहीं सकते हैं , जब तक शरीर परम्परा बन हुई है तब तक संयोग वियोग जन्य दुःख परम्परा भी बनी रहेगी, दु:ख की उपस्थिति हमें सताती हैं , सुख का वियोग हमें सताता हैं, ये दोनों परम्परा शरीर रहते मिट नही सकती हैं, इसलिए ऐसा कोई उपाय खोजा जाय कि शरीर बनना बन्द हो जावें।- - यहां शरीर परम्परा को समझने के एक दूसरे के कार्य कारण को समझना आवश्यक हैं: शरीर बनता है पुण्य और पाप से , किसी भी जीव का कोई ऐसा शरीर नहीं जो कि केवल पुण्य बना हो, इसलिए पुण्य और पाप से ही शरीर बनते हैं , हां यह बात अलग हैं कि किसी के शरीरों में पुण्यपाप की मात्रा का व्यतिक्रम हों ,देवादि शरीरों में पुण्य की मात्रा अधिक होती है, मनुष्यों से भिन्न प्राणियों के शरीरों में की मात्रा अधिक होती है,तथा मनुष्य शरीरों में पुण्य-पाप का मिश्रण होता है । इसलिए शरीर मात्र पुण्य पाप का ही परिणाम हैं , पुण्य-पाप बनते हैं रागद्वेष से राग से पुण्य बनने का अर्थ हैं कि जिनसे चित्त का लगाव होता हैंं, उनके प्रति हमारा व्यवहार भी अच्छा होता हैंं, जि तत्र ना जितना हम अच्छा व्यवहार करते हैं , उतना सामने वाले व्यक्ति को आराम लगता हैंं, वही आराम हमारे अन्तःकरण में उनके पुण्य कर्मों के साथ सम्बन्धित होकर सामने वाले के पुण्यों को अपने अन्तःकरण के माध्यम से क्रियमाण के साथ सम्बन्धित होकर कारण शरीर में संचित होकर जमा राशि बन जाता हैंं, ऐसे ही पाप कर्म की भी यही प्रक्रिया हैंं, जिस प्राणि से हमारी द्वेष पूर्ण व्यवहार करते हैं , हमारे अन्तःकरण का सम्बन्ध उनके पाप कर्मों के साथ जुड़ जाता है , वे ही द्वेष प्रयुक्त पाप हमारे अन्तःकरण में प्रवेश होते रहते हैं , जब तक शरीर रहता हैं तब तक वे क्रियमाण पाप रहते हैं , शरीरान्तर में वे ही पुण्यपाप प्रारब्ध बनकर सुख और दु:ख के रूप में जीव को भोगने पड़ते हैं , इसलिए मनुष्य शरीर जिन्ह जिन्ह प्राणियों के साथ रागात्मक सम्बन्ध जुडता है ,वे पुण्य भावि शरीर में सुख के रूप में जीव भोगता है , तथा जिन्ह जिन्ह शरीरों में प्राणियों के साथ द्वेषबुद्धि से व्यवहार हुआ वे पाप बनकर परम्परया कारण शरीर (मूलाअज्ञान )में जमा होकर भावि शरीरों में दु:ख रूप से जीवों को भोगना पड़ता है।अज्ञान को मूलाअज्ञान भी इसी लिए कहते हैं ,यह सारे बन्धनों का मूल =जड़ हैं इसी प्रकार यह पुण्य-पाप परम्परा उत्तरोत्तर शरीरों का निर्माण करती रहती है, और जन्मान्तरीय शरीरों की परम्परा चलती रहती है।
यह पुण्यपाप और शरीरों की परम्परा अनादि काल से चली आ रही है,इस शरीर परम्परा का अन्त करने के लिए हमें इनके कार्यकारणात्मक स्वरूप पर विशेष विचार करना होगा।
शरीरों का कारण पुण्य-पाप , पुण्य-पाप का कारण रागद्वेष, रागद्वेष का कारण है, अनुकूल-प्रतिकूलवृत्ति।यह कार्यकारण की शृंखला है ,जैसे शृंखला=सांकल से पशु को बांधा जाता है ,ऐसी ही यह सांकल है।
जो पदार्थ हमें अच्छा लगता है ,तो यही कहते सुना है कि यह व्यक्ति ,वस्तु , परिस्थिति मेरे अनुकूल है ,बस व्यक्ति उस अनुकूलता को अपने हृदय से चिपका लेता है , उसे छोड़ना नही चाहता है ,यही चित्त का लगाव ही राग है ,तो राग का कारण है अनुकूलवृत्ति ,जिसको योगशास्त्र में शोभनबुद्धि कहते ,जिससे विषयवस्तु दृढ होकर चित्त के चिपक जाती है , वही दशा द्वेष की है , जो प्रतिकूल होता है ,उनसे हृदय में द्वेष भाव बनता है , यह द्वेष भाव ज्यूं ज्यूं प्रतिकूलता बढती जायेगी, उतना द्वेष शत्रुता में बदलता चला जायेगा , बस उनका भुगतान करने के लिए शत्रु बन कर जन्म लेना ही पड़ेगा ,तो यह सिद्ध हुआ कि राग-द्वेष कार कारण बनी ,अनुकूल-प्रतिकूलवृत्ति।
अब सवाल यह है कि यह अनुकूल-प्रतिकूलवृत्ति वृत्ति बनी कैसे ? देखा यह गया है कि दो विरोधी पदार्थ एक आश्रय में नहीं रह सकते हैं , किसी को भी यह कहते हमने नहीं सुना मै अपने लिए अनुकूल हूं, या प्रतिकूल , इस भाव के लिए हमारे सामने कोई भिन्न पदार्थ होना चाहिए, बस भिन्नता का भाव बनते ही समीचीनता असमीनतना का भाव तत्काल बनने लग जायेगा , इसी को अनुकूल प्रतिकूल भाव कहते है, तो इसका कारण हैं भिन्नबुद्धि ,या भेद वृत्ति ठीक या ठीक नही, निश्चय कर लेती है।इससे सिद्ध हुआ किसी हमारी भेद बुद्धि ही इसी कसौटी आनुकूल्य प्रातिकूल्य भाव की जनक हैं।
इसी भेद बुद्धि को मिटाने के लिए हमें हमारी बुद्धि को अभेद में स्थापित करना होगा ,जब बुद्धि अभिन्नता=आत्मतत्त्व के साथ एकीभूत हो जाती है,तो अद्वैत तत्त्व का साक्षात्कार सर्वत्र अस्ति भाति प्रिय एक अद्वितीय अखण्ड रूप से ब्रह्माकार वृत्ति उदय होकर मूलाअज्ञान को नष्ट कर कर देती है, अज्ञान नष्ट हो जाने से अद्वैत ज्ञान उदय हुआ, अद्वैत ज्ञान से द्वैत=भिन्नबुद्धि नष्ट हो गई,भिन्नबुद्धि नष्ट हो जाने से आनुकूल्य प्रातिकूल्य भाव मिट गया , आनुकूल्य प्रातिकूल्य भाव मिट जाने से राग-द्वैष नष्ट हो गया, राग-द्वैष नष्ट हो जाने से पुण्य-पाप का आध्यासिक नष्ट हो गया ,अर्थात् शरीरारम्भक=संचित् कर्म का नाश हो गया , वर्तमान प्रारब्ध कर्म भोग कर समाप्त हो जायेगा ,या अद्वैततत्त्व का साक्षात्कार हो जाने से प्रारब्धकर्म का सम्बन्ध विच्छेद होकर दृढमिथ्यात्व निश्चय हो गया ,इस प्रकार मोक्ष केवल ज्ञान से ही संभव है, अन्य कोई उपाय नहीं है यह बात युक्ति से सिद्ध हुई ।
तत्त्वज्ञान से मोक्ष चाहे युक्ति से सिद्ध हों, चाहे शास्त्र से ,बात घूम फिर कर वहीं आती है कि जीव भाव का सर्वथा त्याग हुए बिना मोक्ष संभव ही नही है , जीव भाव का सर्वथा नष्ट हो जाना ही संन्यास हैं , यह संन्यास भी शास्त्रीय हों चाहे, गौण,हो या मुख्य ,विविदिषा हो चाहे विद्वत्संन्यास, सभी प्रकार के संन्यास का मुख्य प्रयोजन मोक्ष ही हैं। संन्यास आश्रम तो केवल मोक्ष के साधन ज्ञान को परिपक्व बनाये रखने का साधन मात्र है, संन्यास आश्रम जीवन का लक्ष्य नहीं है।
शास्त्रविधि से विरजा हवन आदि कृत्य सम्पादन के बाद संन्यासी के लिए मात्र प्रणव का जप , प्रणव अभ्यास, प्रणव विचार ही मुख्य कर्तव्य होता है, संशय और विपरीत भाव की निवृत्ति के लिए वेदान्तशास्त्र का श्रवण-मनन-निदिध्यासन करना, तथा बाह्य प्रवृत्ति का त्याग करके अपने स्वरूप के चिन्तन में समय व्यतीत करना ,यही संन्यास आश्रम की दिनचर्या होती है,
☆ एक परमविरक्त सन्यासी का आदर्श जीवन ☆
एक बार किसी सन्त के जीवन के बारे में चर्चा चल रही थी, तो सुना कि जब से उन्होने संन्यास लेकर गृह त्याग किया ,तब से आजीवन कभी पांव पसार कर नही सोये , पांव पसार कर सोने का मतलब हैं कि हम निश्चिन्त हैं ,जीवन में हमेशा चिन्ता रहनी चाहिए कि हम कहीं विफल न हो जायें ,क्योंकि वेद भगवान का स्पष्ट कथन हैं:- "इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति न चेदिहावेदीन्महती विनष्टि:" यदि इस मानव शरीर मे आत्म साक्षात्कार हो गया तो ठीक है, यदि नही हुआ तो महान विनाश के गर्त में चले जाओगे , वहा गिरने के बाद अनन्त काल तक नहीं निकल पाओगे ,अर्थात् चौरासी लाख अधम श्रेणी पाप योनि शरीरों की परम्परा मेंं गिर गये तो वहां से अनन्त काल तक नहीं निकल पायेंगे
जिस महापुरुष की मैं ने चर्चा सुनी ,वे थे स्वनामधन्य पूज्य पाद उत्तर आम्नाय ज्योतिपीठ जोशीमठ व श्रीद्वारिकापीठद्वय के शंकराचार्य श्री स्वामी कृष्ण बोधाश्रम जी महाराज ,उन्होने अपने गुरुदेव तत्कालीन शंकराचार्य श्री स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती जी महाराज की आज्ञा शिरोधार्य करके इन्ह दोनों पीठों का दायित्व संभालते वक्त निवेदन किया था कि मेरी वेदान्तसाधना मेंं बाधा न आयें , इसके लिए थोड़ा पीठ के दायित्व में संशोधन चाहता हूं ,उन्होने कहा कि पीठ की परम्परा की पूजा किसी निष्ठावान् पण्डित के द्वारा कराई जाय , तो उनके विरक्तस्वभाव को देखते हुए उस परम्परा में परिवर्तन करना पड़ा , तात्पर्य मेरा यह कहने का इतना ही है किसी,संन्यास धर्म का दायित्व इतना हैं कि एक क्षण भी स्वरूप से बाह्य चेष्टा पतन जहा मानी गई हैं , केवल स्वस्वरूपातिरिक्त चिन्तन ही संन्यास धर्म का प्रतिबन्धक हैं ,इसलिए भाष्यकार भगवान समसमुच्चय को बिलकुल सहन नहीं करते हैं,यदि स्वभाव वश पूर्व संस्कार हठात् किसी ,जप ,पूजा , या किसी भी शास्त्रविधि प्राप्त साधना में मन खिंचता हैंं, उन्हे प्रयास पूर्वक हटाना भी नहीं चाहिए, यदि सहज स्वभाव से होता हैंं, कोई आपत्ति नहीं हैंं, जब मन का स्वभाव ही कुछ न कुछ अवलम्बन के बिना न रहने का हैंं तो , उसमे पर दबाव बनाना भी ठीक नहीं हैंं ।वह कृत्य शरीर यात्रा स्वरूप प्रारब्ध के साथ जुड़ जाता है , भगवान् का संकेत भी है :- "सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्" अर्थात् स्वभाव से जुड़े हुए दोषयुक्त सत्कर्म को भी नहीं छोड़ना चाहिए, प्रयासपूर्वक छोड़ना भी एक तरह से अनात्म तादात्म्य हैं ,"येन त्यजसि तत्त्यज" जिनके द्वारा छोड़ा जाता है , उन्ही को भी छोड़ देना चाहिए,आग्रह मात्र ही अनात्म तादात्म्य का पोषक हैं।
महाराजश्री स्वामी कृष्णबोधाश्रम जी के दर्शन लाभ तो मुझे नहीं हुआ, किन्तु उनके जीवन से जुड़े प्रसंग मुझे प्रभावित करते रहते हैं ,वेदान्त निष्ठामात्र उनकी विचित्र थी । वे महापुरुष योगी और ब्रह्मज्ञानी उभयनिष्ठावान् थे ,एक बार उनसे एक सन्त मिलने गये तो महाराज श्री ध्यान में बैठे थे ,वे सन्त भी ध्यानस्थ होकर वही पास में बैठ गये , बहुत देर के बाद जब वे ध्यान से उठे , मुंह लगे सन्त ने पूंछ लिया कि महाराज जी आप ध्यान किसका कर रहे थे , उन्होने सहज भाव से उत्तर दिया कि मैंने पञ्चदशी कण्ठस्थ कर रखी है , उनके श्लोकों के अर्थ का अनुसन्धान करता हुं।
उनकी इस उभय साधन की परिपक्वता का लोगों को तब पता लगा ,जब उन्हे शरीर छोड़ना था तो काशी में धर्म सम्राट पूज्य पाद करपात्र महाराजश्री के पास टेलिग्राम कराया कि आप शीघ्र दिल्ली पधार जाएं,आपसे विशेष बात करनी है , महाराज करपात्री जी ने टेलिग्राम किया कि आप तुरन्त विमानद्वारा काशी आ जायें , शरीर काशी में छोड़ना अच्छा होगा , पुन: शंकराचार्य जी ने टेलिग्राम कराया कि मुझे मेरी निष्ठा में पूर्ण विश्वास हैं , आप शीघ्र दिल्ली आ जायें, महाराज करपात्री जी दिल्ली आये , बात चीत कुछ नही की मठ के उत्तराधिकारी की वसीयत लिखी हुई हाथ में थमा कर ॐ "नमो नारायणाय ॐ " इतना बोल कर शरीर को त्याग दिया, यह महाराज श्री की निष्ठा समस्त संन्यासी समाज के लिए परम अनुकरणीय हैं ,योगबल से शरीर को अपनी इच्छा से छोड़ना ,और वेदान्तशास्त्र के बल पर अपनी निष्ठा पर पूर्ण विश्वास , यह अद्भुत आदर्श हमें दिशा निर्देश देता है कि साधक में कितना आत्मविश्वास होना चाहिए ।
प्रसंग तो विविदिषा संन्यास का चल रहा था बीच में संन्यास धर्म के शिष्टाचार के कुछ उदाहरण मेरे स्मृति पटल पर आ गये थे ,संन्यास आश्रम आत्मज्ञान की साधन-सामग्री में सर्वोत्तम साधन हैं ,जिसमें आत्मनिष्ठा की स्थिति के लिए पर्याप्त अवकाश मिल जाता है, जो आलसी और प्रमादी साधक हैं , उनका इस आश्रम में पतन भी बहुधा देखने सुनने को मिलता हैं ,यह तत्परता की कमी से ही होता है,इसलिए शास्त्र विधि का पालन अत्यन्त आवश्यक हो जाता है। इस विषय को स्पष्ट करने के यह स्वल्प प्रयास किया गया । विविदिषा संन्यासी के लिए आचार संहिता की संन्यासोपनिषद् श्रीनारदपरिव्राजपकोपनिषद् में जो विशेष चर्चा आई हैं ,उसे यहां दिग्दर्शन कराया जा रहा है-

-विविदिषा-संन्यासी=- - ज्ञान के लिए जो शास्त्र विधि से कर्म त्याग करके अनात्म तादात्म्य का सर्वथा त्याग करने की भावना के लिए साधन रूप से जिस आश्रम को स्वीकार किया जाता है , उसे विविदिषा संन्यास आश्रम कहते है ।- - त्यज धर्ममधर्मं च उभेसत्यानृतेत्यज । उभे सत्यानृते त्यक्त्वायेन त्यजसि तत्त्यज ।।अर्थात् धर्म=शास्त्रविहित सदाचार ,तथा अधर्मं=शास्त्र निषिद्ध दुराचार इन्ह दोनों का परत्याग करके ,जिस अनात्म अंहकार से इन्ह सदाचार -दुराचार का त्याग किया ,उस अंहकार से भी अपने आपको=व्यापक साक्षी स्वरूप से निश्चय करके व्यष्टि-समष्टि प्रपञ्च का दृढमिथ्यात्व पूर्वक ब्रह्मात्मभाव में स्थित हो जाओ ,यह तात्पर्यार्थ हैं , यही वास्तविक संन्यास हैं।इसी संन्यास के साधन तारतम्य को लेकर चार भेद हो जाते हैं ।विविदिषा संन्यास के ही साधन तारतम्य को लेकर चार श्रेणी हो जाती है-----
(१) वैराग्यसंन्यासी (२) ज्ञानसंन्यासी,
(३)ज्ञानकर्मसंन्यासी(४)कर्मसंन्यासीति चातुर्विध्यमुपागतः।
(१)वैराग्यसंन्यासी:-तद्यथेति दृष्टानुश्रविकविषयवैतृण्यमेत्यप्राक्पुण्यकर्मविशेषात् संन्यस्तः स वैराग्यसंन्यासी।।- - (२)ज्ञानसंन्यासी- -शास्त्रज्ञानात्पापपुण्यलोकानुभवश्रवणात्प्रपञ्चोपरतो देहवासनां शास्त्रवासनां लोकवासनां त्यक्त्वावमनान्नमिव प्रवृत्तिं सर्वं हेयं मत्त्वा साधन चतुष्टय सम्पन्नो यःसंन्यस्यति स एव ज्ञानसंन्यासी ।- - (३)ज्ञानकर्मसंन्यासी
क्रमेण सर्वमभ्यस्य सर्वमनुभूय ज्ञानवैराग्याभ्यां स्वरूपानुसन्धानेन देहमात्रावशिष्टःसन्यस्य जातरूपधरो भवति स ज्ञानवैराग्य-संन्यासी।ब्रह्मचर्यं समाप्य गृही भूत्वा वानप्रस्थाश्रममेत्य वैराग्याभावेऽप्याश्रमक्रमानुसारेण यः सन्यस्यति स सर्वकर्मसंन्यासी।
(४) कर्मसंन्यासी-ब्रह्मचर्यं समाप्य गृही भूत्वा वानप्रस्थाश्रममेत्यवैराग्याभावेऽप्याश्रमक्रमानुसारेण यःसंन्यस्यति, स कर्मसंन्यासीति ।ज्ञान के लिए जो शास्त्र विधि से कर्म त्याग करके अनात्म तादात्म्य का सर्वथा त्याग करने की भावना के लिए साधन रूप से जिस आश्रम को स्वीकार किया जाता है , उसे विविदिषा संन्यास आश्रम कहा जाता है। उनके चार भेद भेद हैं-
(१)वैराग्यसंन्यासी-
पूर्व के प्रबल पुण्य संस्कारों के फल स्वरूप यहां इस लोक में प्रारब्धानुसार प्राप्त भोगों में आसक्ति का अभाव ,तथा परलोक स्वर्गादि सुखों के प्रति मानसिक अनासक्ति और अरुचि होकर विहित कर्मों के अनित्यत्व सातिशयत्वआदि दोषों की संभावना निश्चय करके कर्म का परित्याग करना ही वैराग्य संन्यास हैं।
(२) ज्ञानसंन्यासी -अध्यात्मशास्त्र ज्ञान से इहलोक और परलोक के भोगों में क्षयिष्णु सातिशयत्व अनित्यत्व आदि दोषोद्भवपूर्वक देहवासना लोकवासना,तथा शास्त्रवासना का वमन किये अन्नजुगुप्सा की तरह हेय मान कर साधन चतुष्टय सम्पन्न होकर शास्त्र कर्म का शास्त्र-विधि से त्याग को ज्ञानसंन्यास कहते हैं।- -(३)ज्ञानकर्मसंन्यास--सब कुछ संसार के उतार चढाव की वास्तविकता का परिणाम सामने आ जाने बाद ,जब अपनी आरम्भ की गई प्रवृत्तियां समाप्त होने को आयें ,अपना उत्तराधिकारी जब हमारे दायित्व का वहन करने में सक्षम हों,कुछ दिन वान प्रस्थान जीवन का अभ्यास का अभ्यास करें ताकि जिन्ह लोगों,में हमारा बचा रागद्वेष समाप्त करके हमेशा के लिए उनसे मुख मोड़ सकें , अपने अन्तर्मन का परीक्षण जारी रखें ,जिन्ह वस्तुओं ,व्यक्तियों , परिस्थियों के साथ लम्बा समय बिताया ,उनके बिना भी मेरा मन भगवत् चिन्तन में सतत लगा हुआ है ,तथा मेरे यहां घर परिवार में में रहने न रहने से कोई फर्क नहीं पड़ रहा है, ऐसी दशा में सब कुछ व्यवहारिक बन्धनों का मन से त्याग करते हुए समर्थ सद्गुरु का आश्रय ग्रहण करके हमेशा के लिए शास्त्रविहित कर्म का परित्याग करके वेदान्तशास्त्र के श्रवण-मनन-निदिध्यासन की प्रबल इच्छा से विविदिषा संन्यास ग्रहण करना ही ज्ञानकर्मसंन्यास हैं , अथवा अपने आपको शुद्धबुद्धमुक्तस्वभाव, सच्चिदानन्द रूप से निश्चय करके " नैव किञ्चित् करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्"।इस भगवद्वाक्य के आधार पर पारिव्राज्य-संन्यासविधि से विहितकर्मो का परित्याग करके "संन्यासविधि" का पालन करना ही ज्ञानकर्मसंन्यास हैं।- -(४)केवल कर्मसंन्यासी-ब्रह्मचर्य आश्रम का समापन करके गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करें ,गृहस्थ आश्रम के बाद वानप्रस्थ आश्रम का पालन करें ,तत्पश्चात् वैराग्य न होने पर भी विहित कर्मों का आश्रम-क्रम से शास्त्रविधि का परित्याग करके पारिव्राज्य-संन्यास आश्रम को स्वीकार करना ।यह विविदिषा संन्यास विद्वत्संन्यास संन्यास का साधन है।
- वास्तव में हमें इस निबन्ध को संकलित करने का विचार आना स्वाभाविक ही था ,हमारे परम आराध्य पूज्यश्री गुरुदेव संवित् गुरुपरम्परा के संस्थापक परमहंस परिव्राजकाचार्य श्रीमत्स्वामी ईश्वरानन्दगिरि जी महाराज की "संन्यास हीरक जयन्ती" के पावन उपलक्ष्य पर कुछ सुमन समर्पण का मन में भाव आया तो सोचा कि इस अवसर पर प्रासंगिक क्या हो सकता हैं, तो मेरे मन में संन्यास के बारे में बहुत लम्बे समय से कुछ विशेष स्पष्टीकरण की इच्छा थी, तो हमने यह लेखन कार्य पूज्यश्री के पावन संन्यास जीवन के साठ वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में इस शुभेच्छा को पूर्ण करने का प्रयास किया गया है ,जब से हमने य लेखन कार्य प्रारंभ किया ,तब से बहुत समाहित भाव अनुभव हुआ ,अपने हृदय में पूज्यश्री को साक्षी के रूप में अनुभव करते हुए ,उन्ह की जैसी मेरे समाहित मन में प्रेरणा स्फूरित हुई ,लिखता गया, यह कार्य निर्विघ्न सम्पन्न हुआ , इसमें दक्षिणामूर्ति एवं ,भाष्यकार के प्रत्यक्ष विग्रह अनुग्रह मूर्त्ति पूज्यश्री का आशीर्वाद ही मानता हूं , जयशंकर, ॐ नमो नारायणाय ॐ शम् ।।-
- ☆श्रीनारदपरिव्राजपकोपनिषद् ☆-
- ॐ भद्रं कर्णेभिरिति शान्तिः---
☆ नारदं प्रति शोनकादीनां प्रश्नः☆
अथ कदाचित् परिव्राजकाभरणो नारदः सर्वलोकसंचारं कुर्वन्नपूर्वपुण्यस्थलानि पुण्यतीर्थानि तीर्थीकुर्वन्नवलोक्य,चित्तशुद्धिं प्राप्य,निर्वैरः शान्तः,दान्तःसर्वतो निर्वेदमासाद्य,स्वरूपानुसंन्धानमनुसन्धाय,नियमानन्दविशेषगण्यं मुनिजनैरुपसंकीर्णं नैमिशारण्यं पुण्यस्थलमवलोक्य,सरिगमपधनिसज्ञैर्वैराग्यबोधकरैः स्वरविशेषैःप्रापञ्चिकपरांगमुखैर्हरिकथालापैः स्थावरजंगमनामकैर्भवद्भक्तिवशेषैर्नरमृगकिपुरुषामरकिन्नराप्सरोगणन संम्मोहयन्नागतं ब्रह्मात्मजंभगवद्भक्तं नारदमवलोक्य द्वादशवर्षसत्रयागोपस्थिताः श्रुताध्ययनसम्पन्नाःसर्वज्ञास्तपोनिष्ठापराश्च ज्ञानवैराग्यसंपन्ना: शौनकादिमहर्षयःप्रत्युत्थानं कृत्वा,नत्वा यथोचितातिथ्यपूर्वकमपवेशयित्वा, स्वयं सर्वेऽप्युपदिष्टा भो भगवन् ब्रह्मपुत्र, यह कथं मुक्त्युपायः ?अस्माकं वक्तव्यम् ।।१।।
☆विदेहमुक्तिलाभोपायोपदेशः☆
इत्युक्तस्तान् होवाच नारदः। सत्कुलभवोपनीतः सम्यगुपनयनपूर्वकं चत्वारिंशत् संस्कारसम्पन्नः स्वाभिमतैकगुरुसमीपे स्वशाखाध्ययनपूर्वकं सर्वविद्याभ्यासं कृत्वा,द्वादशवर्षशुश्रुषापूर्वकब्रह्मचर्यं,पञ्चविंशतिवत्सरं गार्हस्थ्यं,पञ्चविंशतिवत्सरं वानप्रस्थाश्रमं,तद्विधिवत् क्रमान्निर्वर्त्य,



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