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Had written this Sanskrit micro-poem for the community "Hall of poets", in order to celebrate its first birthday. :)
Please do clarify if you have doubts over the words and usage.

कवि सभा हृदयं मधुवाङ्मयं
भुवि समस्त गणेषु पृथुश्रवम्
अविततारगणान्वितमद्वयं
द्यवि नमोस्तु निशे च सुधाकरम्

जय सभे! जगदैकगणोत्तमे!
नयतु तावक सायकात् शुभात् I

(c) Kiron Krishnan
भगवतीश्वर शर्मन् (किरणः कृष्णः)

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केसरिया ये रंग पिया मोहे बहुत है भाए..! !

नटखट मोरे जब तो माखन खाये,
मां जसोदा का लाड़ला बाबा नन्द का दुलारा
मां देवकी की आन्खों का तारा
पिता वसुदेव का प्यारा सब्को भाए,
तुझ बिन मोहे कुछ नाहि भाये,
तोहि प्रेम बन्सुरि जब सुनु तो
बन्धन लाज शरम छोड सबे छुटै..
बलम बलम कहती फ़िरुं
मोहन मोहन मै पुकारुं,
अभी यहां थे अभी कहीं हो,
कभी धरा पे कभी गगन मे॓ं
तुम हो काल गति से परे ओ मोहन,
दिल आत्मा सब तुमको ही चाहे
तो सदा ही सुहागन कहलाउं,
कृश्ण कन्हाइ तेरे सङग
कभी राधा तो कभी मीराबाई कहलायुं
इक पाति सांबरे तोहे लिखुं बड़े निर्मोही हो
कभी तो मिलन को आओ
नैन तरसते तो कभी बरसते
तेरा रसता सदा निहारूं
युग युग से तेरि दासी हूं
तो देव की दासी देवदासी
कृषणदासी कहलाउं...! !
अनिता शर्मा
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2016-02-18
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'पुराण' का शाब्दिक अर्थ है - 'प्राचीन आख्यान' या 'पुरानी कथा' । ‘पुरा’ शब्द का अर्थ है - अनागत एवं अतीत। ‘अण’ शब्द का अर्थ होता है -कहना या बतलाना। रघुवंश में पुराण शब्द का अर्थ है "पुराण पत्रापग मागन्नतरम्" एवं वैदिक वाङ्मय में "प्राचीन: वृत्तान्त:" दिया गया है।
सांस्कृतिक अर्थ से हिन्दू संस्कृति के वे विशिष्ट धर्मग्रंथ जिनमें सृष्टि से लेकर प्रलय तक का इतिहास-वर्णन शब्दों से किया गया हो, पुराण कहे जाते है। पुराण शब्द का उल्लेख वैदिक युग के वेद सहित आदितम साहित्य में भी पाया जाता है अत: ये सबसे पुरातन (पुराण) माने जा सकते हैं। अथर्ववेद के अनुसार "ऋच: सामानि छन्दांसि पुराणं यजुषा सह ११.७.२") अर्थात् पुराणों का आविर्भाव ऋक्, साम, यजुस् औद छन्द के साथ ही हुआ था। शतपथ ब्राह्मण (१४.३.३.१३) में तो पुराणवाग्ङमय को वेद ही कहा गया है। छान्दोग्य उपनिषद् (इतिहास पुराणं पञ्चम वेदानांवेदम् ७.१.२) ने भी पुराण को वेद कहा है। बृहदारण्यकोपनिषद् तथा महाभारत में कहा गया है कि "इतिहास पुराणाभ्यां वेदार्थ मुपबर्हयेत्" अर्थात् वेद का अर्थविस्तार पुराण के द्वारा करना चाहिये। इनसे यह स्पष्ट है कि वैदिक काल में पुराण तथा इतिहास को समान स्तर पर रखा गया है।
अमरकोष आदि प्राचीन कोशों में पुराण के पांच लक्षण माने गये हैं : सर्ग (सृष्टि), प्रतिसर्ग (प्रलय, पुनर्जन्म), वंश (देवता व ऋषि सूचियां), मन्वन्तर (चौदह मनु के काल), और वंशानुचरित (सूर्य चंद्रादि वंशीय चरित) ।

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According to Puranic cosmography, the entire Cosmos is divided into seven concentric island continents (sapta-dvipa vasumati) separated by the seven encircling oceans, each double the size of the preceding one (going out from within). The seven continents of the Puranas are stated as Jambudvipa, Plaksadvipa, Salmalidvipa, Kusadvipa, Krouncadvipa, Sakadvipa, and Pushkaradvipa. Seven intermediate oceans consist of salt-water, sugarcane juice, wine, ghee, curd, milk and water respectively.[1][2]
Continent Jambudvipa (Indian Blackberry Island), also known as Sudarshanadvipa, forms the innermost concentric island in the above scheme. Its name is said to derive from a Jambu tree (another name for the Indian Blackberry). The fruits of the Jambu tree are said, in the Viṣṇupurāṇa (ch.2) to be as large as elephants and when they become rotten and fall upon the crest of the mountains, a river of juice is formed from their expressed juice. The river so formed is called Jambunadi (Jambu river) and flows through Jambudvipa, whose inhabitants drink its waters. Insular continent Jambudvipa is said to comprise nine varshas (zones) and eight significant parvatas (mountains).
Markandeya Purana portrays Jambudvipa as being depressed on its south and north and elevated and broad in the middle. The elevated region forms the varsha named Ila-vrta or Meruvarsha. At the center of Ila-vrta lies the golden Mount Meru, the king of mountains. On the summit of Mount Meru, is the vast city of Lord Brahma, known as Brahmapuri. Surrounding Brahmapuri are 8 cities - the one of Lord Indra and of seven other Devatas.
Markandeya Purana and Brahmanda Purana divide Jambudvipa into four vast regions shaped like four petals of a lotus with Mount Meru being located at the center like a pericarp. The city of Brahmapuri is said to be enclosed by a river, known as Akash Ganga. Akash Ganga is said to issue forth from the foot of Lord Vishnu and after washing the lunar region falls "through the skies" and after encircling the Brahmapuri "splits up into four mighty streams", which are said to flow in four opposite directions from the landscape of Mount Meru and irrigate the vast lands of Jambudvipa.[3]
The common names of the dvīpas, having their varṣas (9 for Jambu-dvīpa, 7 for the other dvīpas) with a mountain and a river in each varṣa, is given in several Purāṇas [1]. There is a distinct set of names provides, however, in other Purāṇas [2]. The most detailed geography is that described in the Vāyu Purāṇa [3].
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