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तुम चली जाओगी, परछाईयाँ रह जायेंगी
कुछ न कुछ हुस्न की रानाइयां रह जायेंगी
तुम तो इस झील के साहिल पे मिली
मुझ से जब भी देखूंगा यहीं मुझ को नज़र आओगी
याद मिटती है न मंज़र कोई मिट सकती है
दूर जाकर भी तुम अपने को यहीं पाओगी
-साहिर लुधियानवी
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