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जय हिन्द!.. जय जवान!.. सीमा सुरक्षा बल बीएसएफ के स्थापना दिवस पर देश की सीमाओं के कर्तब्यनिष्ठ वीर पराक्रमी प्रहरियों को कोटी कोटी प्रणाम्! इनके सम्मान में जय हिन्द! तो लिखो मित्रों!
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Absolutely Right
अगर कोई हमें बेपनाह मोहब्बत कर सकता है
तो
नफरत भी उतनी ही कर सकता है,
क्योंकि….
एक खुबसुरत शीशा जब कभी भी तुटता है
तो
वह एक खतरनाक हथियार बन जाता है…

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दोगली कांग्रेस ।

Via MyNt
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एक आइसक्रीम वाला रोज एक मोहल्ले में आइसक्रीम बेचने जाया करता था , उस कालोनी में सारे पैसे वाले लोग रहा करते थे . लेकिन वह एक परिवार ऐसा भी था जो आर्थिक तंगी से गुजर रहा था. उनका एक चार साल का बेटा था जो हर दिन खिड़की से उस आइसक्रीम वाले को ललचाई नजरो से देखा करता था. आइसक्रीम वाला भी उसे पहचानने लगा था . लेकिन कभी वो लड़का घर से बाहर नहीं आया आइसक्रीम खाने .
एक दिन उस आइसक्रीम वाले का मन नहीं माना तो वो खिड़की के पास जाकर उस बच्चे से बोला ,
" बेटा क्या आपको आइसक्रीम अच्छी नहीं लगती. आप कभी मेरी आइसक्रीम नहीं खरीदते ? "
उस चार साल के बच्चे ने बड़ी मासूमियत के साथ कहा ,
" मुझे आइसक्रीम बहुत पसंद हे . पर माँ के पास पैसे नहीं हे "
उस आइसक्रीम वाले को यह सूनकर उस बच्चे पर बड़ा प्यार आया . उसने कहा ,
" बेटा तुम मुझसे रोज आइसक्रीम ले लिया करो. मुझसे तुमसे पैसे नहीं चाहिए "
वो बच्चा बहुत समझदार निकला . बहुत सहज भाव से बोला ,
" नहीं ले सकता , माँ ने कहा हे किसी से मुफ्त में कुछ लेना गन्दी बात होती हे , इसलिए में कुछ दिए बिना आइसक्रीम नहीं ले सकता "
वो आइसक्रीम वाला बच्चे के मुह से इतनी गहरी बात सूनकर आश्चर्यचकित रह गया . फिर उसने कहा ,
" तुम मुझे आइसक्रीम के बदले में रोज एक पप्पी दे दिया करो . इस तरह मुझे आइसक्रीम की कीमत मिल जाया करेगी "
बच्चा ये सुकर बहुत खुश हुआ वो दौड़कर घर से बाहर आया . आइसक्रीम वाले ने उसे एक आइसक्रीम दी और बदले में उस बच्चे ने उस आइसक्रीम वाले के गालो पर एक पप्पी दी और खुश होकर घर के अन्दर भाग गया .
अब तो रोज का यही सिलसिला हो गया. वो आइसक्रीम वाला रोज आता और एक पप्पी के बदले उस बच्चे को आइसक्रीम दे जाता .
करीब एक महीने तक यही चलता रहा . लेकिन उसके बाद उस बच्चे ने अचानक से आना बंद कर दिया . अब वो खिड़की पर भी नजर नहीं आता था .
जब कुछ दिन हो गए तो आइसक्रीम वाले का मन नहीं मन और वो उस घर पर पहुच गया . दरवाजा उस बालक की माँ ने खोला . आइसक्रीम वाले ने उत्सुकता से उस बच्चे के बारे में पूछा तो उसकी माँ ने कहा ,
" देखिये भाई साहब हम गरीब लोग हे . हमारे पास इतना पैसा नहीं के अपने बच्चे को रोज आइसक्रीम खिला सके . आप उसे रोज मुफ्त में आइसक्रीम खिलाते रहे. जिस दिन मुझे ये बात पता चली तो मुझे बहुत शर्मिंदगी हुई .आप एक अच्छे इंसान हे लेकिन में अपने बेटे को मुफ्त में आइसक्रीम खाने नहीं दे सकती . "
बच्चे की माँ की बाते सूनकर उस आइसक्रीम वाले ने जो उत्तर दिया वो आप सब के लिए सोचने का कारण बन सकता हे ,
" बहनजी , कौन कहता हे की में उसे मुफ्त में आइसक्रीम खिलाता था . में इतना दयालु या उपकार करने वाला नहीं हु में व्यापार करता हु . और आपके बेटे से जो मुझे मिला वो उस आइसक्रीम की कीमत से कही अधिक मूल्यवान था . और कम मूल्य की वास्तु का अधिक मूल्य वसूल करना ही व्यापार हे ,
एक बच्चे का निश्छल प्रेम पा लेना सोने चांदी के सिक्के पा लेने से कही अधिक मूल्यवान हे . आपने अपने बेटे को बहुत अच्छे संस्कार दिए हे लेकिन में आपसे पूछता हु क्या प्रेम का कोई मूल्य नहीं होता ?"
उस आइसक्रीम वाले के अर्थपूर्ण शब्द सूनकर बालक की माँ की आँखे भीग गयी उन्होंने बालक को पुकारा तो वो दौड़कर आ गया . माँ का इशारा पाते ही बालक दौड़कर आइसक्रीम वाले से लिपट गया . आइसक्रीम वाले ने बालक को गोद में उठा लिया और बाहर जाते हुए कहने लगा ,
" तुम्हारे लिए आज चोकलेट आइसक्रीम लाया हु . तुझे बहुत पसंद हे न ?"
बच्चा उत्साह से बोला ,
" हां बहुत "
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एक औरत को आखिर
क्या चाहिए होता है?
एक बार जरुर पढ़े ये छोटी सी कहानी:
राजा हर्षवर्धन युद्ध में हार गए।
हथकड़ियों में जीते हुए पड़ोसी राजा के सम्मुख पेश किए गए। पड़ोसी देश का राजा अपनी जीत से प्रसन्न था और उसने हर्षवर्धन के सम्मुख एक प्रस्ताव रखा...
यदि तुम एक प्रश्न का जवाब हमें लाकर दे दोगे तो हम तुम्हारा राज्य लौटा देंगे, अन्यथा उम्र कैद के लिए तैयार रहें।
प्रश्न है.. एक स्त्री को सचमुच क्या चाहिए होता है ?
इसके लिए तुम्हारे पास एक महीने का समय है हर्षवर्धन ने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया..
वे जगह जगह जाकर विदुषियों, विद्वानों और तमाम घरेलू स्त्रियों से लेकर नृत्यांगनाओं, वेश्याओं, दासियों और रानियों, साध्वी सब से मिले और जानना चाहा कि एक स्त्री को सचमुच क्या चाहिए होता है ? किसी ने सोना, किसी ने चाँदी, किसी ने हीरे जवाहरात, किसी ने प्रेम-प्यार, किसी ने बेटा-पति-पिता और परिवार तो किसी ने राजपाट और संन्यास की बातें कीं, मगर हर्षवर्धन को सन्तोष न हुआ।
महीना बीतने को आया और हर्षवर्धन को कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला..
किसी ने सुझाया कि दूर देश में एक जादूगरनी रहती है, उसके पास हर चीज का जवाब होता है शायद उसके पास इस प्रश्न का भी जवाब हो..
हर्षवर्धन अपने मित्र सिद्धराज के साथ जादूगरनी के पास गए और अपना प्रश्न दोहराया।
जादूगरनी ने हर्षवर्धन के मित्र की ओर देखते हुए कहा.. मैं आपको सही उत्तर बताऊंगी परंतु इसके एवज में आपके मित्र को मुझसे शादी करनी होगी ।
जादूगरनी बुढ़िया तो थी ही, बेहद बदसूरत थी, उसके बदबूदार पोपले मुंह से एक सड़ा दाँत झलका जब उसने अपनी कुटिल मुस्कुराहट हर्षवर्धन की ओर फेंकी ।
हर्षवर्धन ने अपने मित्र को परेशानी में नहीं डालने की खातिर मना कर दिया, सिद्धराज ने एक बात नहीं सुनी और अपने मित्र के जीवन की खातिर जादूगरनी से विवाह को तैयार हो गया
तब जादूगरनी ने उत्तर बताया..
"स्त्रियाँ, स्वयं निर्णय लेने में आत्मनिर्भर बनना चाहती हैं | "
यह उत्तर हर्षवर्धन को कुछ जमा, पड़ोसी राज्य के राजा ने भी इसे स्वीकार कर लिया और उसने हर्षवर्धन को उसका राज्य लौटा दिया
इधर जादूगरनी से सिद्धराज का विवाह हो गया, जादूगरनी ने मधुरात्रि को अपने पति से कहा..
चूंकि तुम्हारा हृदय पवित्र है और अपने मित्र के लिए तुमने कुरबानी दी है अतः मैं चौबीस घंटों में बारह घंटे तो रूपसी के रूप में रहूंगी और बाकी के बारह घंटे अपने सही रूप में, बताओ तुम्हें क्या पसंद है ?
सिद्धराज ने कहा.. प्रिये, यह निर्णय तुम्हें ही करना है, मैंने तुम्हें पत्नी के रूप में स्वीकार किया है, और तुम्हारा हर रूप मुझे पसंद है ।
जादूगरनी यह सुनते ही रूपसी बन गई, उसने कहा.. चूंकि तुमने निर्णय मुझ पर छोड़ दिया है तो मैं अब हमेशा इसी रूप में रहूंगी, दरअसल मेरा असली रूप ही यही है।
बदसूरत बुढ़िया का रूप तो मैंने अपने आसपास से दुनिया के कुटिल लोगों को दूर करने के लिए धरा हुआ था ।
अर्थात, सामाजिक व्यवस्था ने औरत को परतंत्र बना दिया है, पर मानसिक रूप से कोई भी महिला परतंत्र नहीं है।
इसीलिए जो लोग पत्नी को घर की मालकिन बना देते हैं, वे अक्सर सुखी देखे जाते हैं। आप उसे मालकिन भले ही न बनाएं, पर उसकी ज़िन्दगी के एक हिस्से को मुक्त कर दें। उसे उस हिस्से से जुड़े निर्णय स्वयं लेने दें।
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रानी पद्मावती को एक काल्पनिक पात्र कहने वालों को मेरा भी एक जवाब !! शेयर करते रहे !! क्या लगता है पद्मावती सामान्य महिला थी ? वो क्षत्रिय समाज का नक्षत्र थीं, आभा थीं, ज्योति थीं ! उनकी इच्छा अनिच्छा से युगांतकारी परिवर्तन सम्भव था....उनकी एक दृष्टि तख़्त पटलने के लिए पर्याप्त थी ! फिर क्या हुआ कि वो सोलह हजार रानियों के साथ अग्नि की आहुति बन गयीं ?? यह उस समय देशभक्ति की सर्वोच्च कसौटी थी, सर्वप्रमुख मानक ! आसान नहीं होता आग में ज़िंदा जल जाना....वो चाहती तो ख़िलजी की बेगम बनकर आलिशान ज़िन्दगी जी सकती थीं...किन्तु उसने यह मार्ग चुना, जो आगामी पीढ़ियों को समष्टि की खातिर व्यष्टि को बलिवेदी पर हवन कर देने के लिए प्रेरित करेगा ! वामपंथियों ! वो अकेली अपने आप में सरकार थीं... जब राणा कैद थे और सेनापति गौरा रुष्ट हुए वन वन भटक रहे थे तब राज्य का सञ्चालन इनकी ही निगेहबानी में हो रहा था....गौरा को मनाकर लाना और राणा के बंधन काटने तक की समस्त व्यूह रचना उनके ही मार्गदर्शन में सम्पन्न हुई थीं ! अब यह बताइये कि पद्मिनी को सती हो जाने के लिए किसने कहा ?? किसी ने नहीं ! यह उनका स्वयं का निर्णय था ! और कितना साहसपूर्ण ! कितनी चौड़ी छाती रही होगी...क्या जिगर रहा होगा और साहस का अपरिमित पारावार........ व्यक्ति अस्तित्व आवश्यक ही नहीं अपितु अपरिहार्य है...किन्तु आप उनका क्या करेंगे जिनके सामने राष्ट्र से बड़ा कुछ भी नहीं...क्योंकि उनका भी यह सिद्धान्त जो बलिदान की बात करता है, आनेवाली पीढ़ियों को बचाने का ही संकल्प है यानी मानव के अस्तित्व के लिए...... आग की लपटों में सिमट कर रह गयीं पद्मिनी किन्तु उसकी यशोगाथा-शौर्यगाथा रजवट के खून खून में और राजस्थान के कण कण में है !!! Zee News

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Good
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