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नवोत्पल यूँ तो साहित्य की हर विधा का मंच है पर यकीनन पहला ईश्क इसे कविताओं से ही है। ऐसे में कोई कवि जब कविता पर कुछ कहता है तो रूककर छककर तत्व-अर्थ छूने को जी चाहता है।

"कविताएं वे उदास प्रार्थनाएं हैं
जिन्हें मैं ईश्वर से छिपाता हूँ
लेकिन मैं उन्हें छिपा नहीं पाऊंगा
अगर ईश्वर मेरे घर में
मेरी प्रेमिका या पुत्री बनकर आया।"
(अहर्निश सागर)

सिरोही, राजस्थान के अहर्निश सागर एक सुनहले दमकते युवा कवि हैं जिनके पास जीवनराग को महसूसने की इक अपनी ही लय है। दर्शन और शब्दों के उम्दा चितेरे कवि।

"मैं आस्तिक हूँ
घोर आस्तिक
एक अंध श्रदालु
क्यूंकी
मैनें कुछ ग़लतियाँ की हैं
मैं कुछ और ग़लतियाँ करना चाहता हूँ
मैं कुछ लोगों से नफ़रत करना चाहता हूँ
और फिर
अपने किये की क्षमा चाहता हूँ।"

(अहर्निश सागर)

इसप्रकार अहर्निश की कवितायेँ एक लय में चलती हैं--कवि को ईश्वर की जरुरत रहेगी मानव बने रहने के लिए और जिजीविषा की कवितायेँ उसे उदास प्रार्थनाएं लगती हैं ! ये प्रार्थनाएं विरोधाभासी हैं, ठीक प्रकृति-लय की माफिक। अहर्निश जी की 'प्रार्थनाएं' इस बार की नवोत्पल साप्ताहिक चयन की चयनित प्रविष्टि है।

इस बार समीक्षक की महती जिम्मेदारी सम्हाली है आदरणीया डॉ. दीप्ति जौहरी जी ने !
बारीक समझ और सफल अध्यापन के साथ ही साथ जेंडर इश्यूज पर शोधपरक लेखन आपकी साहित्यिक संवेदनशीलता तो बढाता ही है, इसे एक स्तरीय महत्ता भी प्रदान करता है।
इस मणिकांचन संयोग के विविध विन्यास निरखें..!!!
(डॉ. श्रीश)

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नवोत्पल की यात्रा में दिवस गुरूवार की अप्रतिम महत्ता है । अभी यह तय हुआ कि प्रति गुरूवार एक विशेष कविता चयनित की जाए और उसे एक विशिष्ट सम्पादकीय टिप्पणी के साथ प्रकाशित की जाय । पहली कविता चयनित हुई है सागर साहब की । सागर साहब एक पुराने प्रतिबद्ध ब्लॉगर हैं और अपनी तरह की अलहदा कविताओं के शिल्पी । इस अल्हड़ कवि की रचना पर यदि एक संवेदनशील अनुशासित पारखी की टिप्पणी ली जाये तो एक मणि-कांचन संयोग तो घटेगा ही....यह टिप्पणी तैयार की है..हिंदी साहित्य में रचने-बसने वाले डॉ. अभिषेक शुक्ल 'निश्छल' जी ने. आइये आस्वादन लें ! -डॉ. श्रीश


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