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इस मंच के सभी सदस्यों के लिए यह अनिवार्य है कि वो इन instructions के अलावा 'Instructions to the members' केटेगरी में पोस्ट की गई सभी instructions को भी एक बार अवश्य पढ़े व् उनका पालन करे। सभी मॉडरेटरस कृपया एक सप्ताह के भीतर यह सुनिश्चित करें कि उनकी स्वयं की एवं अन्य किसी भी सदस्य की स्वरचित रचनाएँ केवल 'Discussion/चर्चा(मेरी रचना)' केटेगरी में ही पोस्ट की गई हों।

हमारे हिंदी कवि-मंच से जुड़े मेरे सभी प्रिय मित्रों व् बच्चों !
आप सभी को यथायोग्य प्रणाम व् शुभाशीर्वाद।
अपनी 19th May' 2016 की पोस्ट और उसमें मिले कमेंट्स के जवाब में इंदिरा बिटिया ने मेरे इस कम्युनिटी के खोलने के उद्देश्य और यहाँ अपने इस मंच पर सख्ती से केवल अपनी स्वरचित हिंदी रचनाओं के पोस्ट करने के बारे में जो भी व्याख्या की है, वो बिलकुल सटीक और सत्य है। हालाँकि हम अपने इस मंच के उद्देश्य के बारे में कम्युनिटी के अबाउट में पहले ही लिख चुके हैं. इसके अलावा मेरे 24th Aug' 2014, पूनम बिटिया के 1st Sep' 2014, मेरे 10th Dec' 2015 और 7th May' 2016 के अनुदेशों (instruction notes) में भी सभी बाते बिलकुल स्पष्ट कर दी गई हैं। इसके बावजूद मैं एक बार फिर से कुछ बाते यहाँ स्पष्ट कर रहा हूँ :- जैसा कि आप सभी जानते हैं और जैसा इस कम्युनिटी के अबाउट में भी लिखा हुआ है कि 'हमारा हिंदी कवि-मंच' नामक इस कम्युनिटी के गठन का हमारा मकसद आप सभी उभरते हुए हिंदी कवियों को एक मंच पर लाना था, ताकि आप सभी न केवल अपनी जैसी ही रूचि रखने वालो के साथ अपनी-अपनी रचनाएँ शेयर कर सकें, बल्कि प्रस्तुत की गई किसी भी रचना पर अन्य सदस्यों की टीका-टिपण्णी और सुझाव पर अमल करके अपनी-अपनी काव्य-लेखन प्रतिभा को और अधिक निखार सकें। मुझे ख़ुशी है कि हमारा यह प्रयास काफी हद तक सफल भी हुआ, जिसका जीता-जागता सबूत है - आप लोगों की उत्कृष्ट रचनाएँ और उनमें अन्य सदस्यों के कमेंट्स। जहाँ तक 'हमारे महान साहित्यकार' केटेगरी बनाने का सम्बन्ध है, उस विषय में इतना ही कहूंगा कि एक दिन इस कम्युनिटी में असंगत (irrelevant) पोस्ट्स को रिमूव करते समय मुझे एक पोस्ट श्रीमती सावित्रीबाई फुले और एक पोस्ट मुंशी प्रेमचंद जैसे महान कवि और साहित्यकार की जीवनी से सम्बंधित भी देखने को मिली, जिन्हें मैं चाहकर व् हमारी इस कम्युनिटी के टाइटल से असंगत (irelevant) कह कर हटा नहीं सकता था, क्यूँकि जिन महपुसरुषों की रचनाएँ पढ़-पढ़ कर हम जवां हुए और समाज में चलने लायक हुए, जिनकी जीवनियों से प्रेरणा लेकर हम आज भी मार्गदर्शन पाते हैं, उन महापुरुषों की जीवनी को अपनी इस कम्युनिटी में असंगत (irrelevant) कह कर हटा सकूँ, इतना कृतघ्न मैं नहीं हो सकता। उनको असंगत (irrelevant) कहना मुझे अपने ही पूर्वजों और बुजुर्गों (जिनकी ऊँगली थामकर हम चलना सीखे) का अपमान करने जैसा ही प्रतीत हो रहा था। इसलिए मैंने इन सभी महान साहित्यकारों की जीवनी से सम्बंधित जानकारी को हम सबके साथ शेयर करने के लिए, आने वाली पीढ़ियों को इनकी जीवनी से प्रेरणा लेने की सुविधा देने के उद्देश्य और इस कम्युनिटी के किसी भी सदस्य की इस प्रकार की प्रेरणादायक पोस्ट्स को अपनी इस कम्युनिटी में संजोए रखने के लिए यहाँ इस मंच में उनके लिए "हमारे महान साहित्यकार" नाम से एक केटेगरी अलग से बना दी। क्यूँकि किसी भी संस्कृति को फलने-फूलने के लिए यह सबसे जरुरी होता है कि उसकी वर्तमान पीढ़ी न केवल अपने पूर्वजो और बुजुर्गों के गौरवशाली इतिहास को जान कर उससे प्रेरणा ले, बल्कि अपने पूर्वजों और बुजुर्गों की गलतियों से भी सबक लेकर उन्हें दोहराने से बचे। और यही हमारा इस केटेगरी को बनाने का एकमात्र उद्देश्य है, ताकि इस कान्वेंट/पब्लिक स्कूल कल्चर में पढ़े हमारे इस मंच के वो युवा सदस्य, जिन्होंने हमारे उन महान साहित्यकारों के बारे में स्कूल में कभी नहीं पढ़ा, वो भी हमारे इन महान साहित्यकारों के बारे में जानें और उन्हें भी हमारे गौरवशाली इतिहास और हमारी भारत-माता पर गर्व हो कि उसकी गोद में इतने महान साहित्यकारों ने जन्म लिया। इसलिए इस सेक्शन में आप सभी इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में अपना नाम लिखा चुके सूरदास, रसखान, कबीर, सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला', महादेवी वर्मा, सुभद्रा कुमारी चौहान, जयशंकर प्रसाद, मुंशी प्रेम चंद आदि हमारे महान कवियों/लेखकों के जीवन-परिचय, उनकी 1-2 मुख्य कविताओं/कहानी की चंद पंक्तियों सहित यहाँ शेयर कर सकते हैं। हो सके, तो इन महान साहित्यकारों से सम्बंधित उस वैब-पेज यानि लिंक का भी उल्लेख अपनी पोस्ट में अवश्य कर दें (जहाँ से आपने स्वयं उसे लिया हो), ताकि यदि हमारे मंच के किसी भी सदस्य को उनके बारे में और अधिक जानने अथवा पढ़ने की इच्छा हो, तो वो उस लिंक पर जाकर उसका लाभ उठा सके। उनकी पूरी रचना को यहाँ पोस्ट न करने देने का उद्देश्य भी यही है, जिसे डॉ. इंदिरा गुप्ता बिटिया ने भी बखूबी समझा है, कि एक तो उनकी रचनाएँ नेट पर न जाने कितनी ही वैब-साइट्स पर उप्पलब्ध हैं, जिन्हें उनमें रूचि रखने वाल कोई भी व्यक्ति वहां से भी देख और पढ़ सकते हैं। दूसरे अगर उनकी सम्पूर्ण रचनाओं को हम यहाँ पोस्ट करने की इजाजत देंगे, तो उनकी महान रचनाओं के सम्मुख हमारे इन उभरते कवियों की रचनाएँ गौण प्रतीत होंगी और इन उभरते कवियों की रचनाओं को इस मंच के अधिकांश सदस्य कोई तवज्जो ही नहीं देंगे, ये बच्चे हतोत्साहित होंगे और उनका काव्य लेखन से धीरे-धीरे रुझान ही खत्म हो जायेगा, जिससे इस मंच के गठन का मूल उद्देश्य भी खतरे में पड़ जायेगा। आशा है कि आप मेरी बात को ठीक से समझ गए होंगे।
इसके अतिरिक्त मुझे यह देखकर आश्चर्यमिश्रित दुःख भी हुआ, जिसे कहे बिना नहीं रह सकता कि हमारे इस मंच के कुछ सदस्यों ने शिक्षित होकर भी इस मंच के नियमों/अनुदेशों को पढ़ने व् उनका पालन करना अपना कर्तव्य नहीं समझा, जबकि यह सभी नियम/अनुदेश उन्हीं के अपने हित में हैं। इसके अलावा मंच के कुछ सदस्य तो आज तक यह भी नहीं समझ पाये, कि उन्हें अपनी रचना केवल ;Discussion' केटेगरी में ही पोस्ट करनी चाहिए, क्यूंकि मंच की अन्य किसी भी केटेगरी में उनका अपनी रचना शेयर करना तर्कसंगत नहीं होगा। कुछ शिक्षित सदस्य अक्सर ही यह गलती करते हैं, इसलिए आज मैं सभी केटेगरी का खुलासा कर रहा हूँ कि कौनसी केटेगरी किस काम में लेनी है, जो इस प्रकार है :-
(1) मेरी रचना (Discussion/चर्चा) : इस मंच के सभी सदस्य अपनी स्वरचित रचनाएँ केवल इसी शीर्षक की केटेगरी के अंतर्गत ही पोस्ट करेंगे तथा आज से पहले पोस्ट किसी अन्य केटेगरी में पोस्ट की गई अपनी रचनाओं को भी शीघ्रातिशीघ्र इसी केटेगरी में स्थानांतरित करेंगे। कम पढ़े लिखे व् अंग्रेजी न जानने वाले सदस्यों की सुविधा के लिए यह आवश्यक है कि सभी रचनाकार/सभी सदस्य इस मंच में अपनी रचनाओं को केवल हिंदी भाषा व् हिंदी लिपि में ही पोस्ट करें ! सभी सदस्य इस नियम का सख्ती से पालन करेंगे व् भविष्य में यानि कल सुबह से इस नियम का उल्लंघन करने वाले किसी भी सदस्य को, भले ही वो कोई भी हो, तुरंत इस मंच से रिमूव कर दिया जायेगा।
(2) सुचना/अनुदेश (Instructions to the members (Rules) : इस केटेगरी में आवश्यकतानुसार समय समय पर केवल मंच संचालक/मॉडरेटर ही अपने अनुदेश (instructions) जारी करेंगे, जिनका पालन इस मंच के सभी, विशेषकर सभी क्रियाशील सदस्यों को अनिवार्य रूप से करना होगा। जिस किसी भी सदस्य की इच्छा इनका पालन करने की ना हो, वह किसी भी समय इस मंच को छोड़कर जा सकता है। लेकिन किसी भी सदस्य को नियमों का उल्लंघन करने की इजाजत हरगिज़ नहीं होगी, फिर भले ही मुझे यह मंच ही सदा-सदा के लिए बंद क्यों न करना पड़े।
(3) मेरा परिचय (Self Introduction of members) : इसके अंतर्गत इस मंच में आने वाले सभी सदस्यों को अपना वास्तविक परिचय, शिक्षा आदि का ब्यौरा देना चाहिए। नकली ID यानि लड़की की फोटो अपनी ID में लगाने वाले पुरूषों/युवकों, अपने असली नाम की बजाए उलजुलूल नाम से ID बनाने वाले लोगों व् मुस्लिम्स (जिनके धर्म के अनुसार लिए देशभक्ति व् धर्मनिरपेक्षता हराम है) के लिए इस मंच की सदस्यता बिलकुल निषेध है। मॉडरेटर इस बात का विशेष ध्यान रखें कि ऐसा कोई भी व्यक्ति हमारे इस मंच का सदस्य कभी न बनने पाए।
(4) शपथ (Pledge for members) : इस केटेगरी में सभी सदस्य, विशेषकर मंच पर अपनी रचनाएँ शेयर करने वाले सभी सदस्य, अपने परिचय सहित इस मंच के नियमों का पालन करने की शपथ लेंगे। जो इस प्रकार होगी :- मैं .............. यह घोषणा करता/करती हूँ कि मैंने इस मंच के सभी नियमों/अनुदेशों को ठीक से पढ़कर यह भी समझ लिया है कि इस मंच के किसी भी नियम/अनुदेश की अवहेलना/अनदेखी करने की स्थिति में इस मंच की मेरी सदस्यता तुरंत समाप्त कर दी जाएगी। और मैं यह भी शपथ लेता/लेती हूँ कि मैं नियमानुसार इस मंच के सभी सदस्यों की रचनाओं को पढ़कर व् उनकी पोस्ट्स में बने कमेंट बॉक्स व् लाइक में अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दूंगा/दूंगी। इसके अलावा किसी रचना में कोई त्रुटि नज़र आने पर सम्बंधित सदस्य को उसके काव्य-लेखन में सुधार हेतु अपना सुझाव भी अवश्य दूंगा/दूंगी। मंच के सदस्यों की बेहतरी के लिए बनाए गए इन सभी नियमों/अनुदेशों का पालन करने की मैं शपथ लेता/लेती हूँ।
(5) मेरा सुझाव (Suggestions from members) : इसके अंतर्गत इस मंच के सदस्य कम्युनिटी के बेहतर रखरखाव के लिए अपने सुझाव दे सकते हैं।
(6) मंच संचालक द्वारा चयनित रचनाएँ : इस केटेगरी का प्रयोग मंच संचालक के अतिरिक्त कोई भी सदस्य नहीं करेगा, क्यूँकि इसमें मंच संचालक समय-समय पर सदस्यों द्वारा लिखी गई सभी रचनाओं का अवलोकन करके उनमें से कोई भी एक रचना पसंद करेगा, जिसे वह रचनाकार के परिचय सहित अपनी प्रोफाइल से पोस्ट के रूप में अपने सर्किल में शेयर करेगा, जिसकी एक कॉपी यहाँ इस केटेगरी में संजोयी जाएगी। इसके लिए सदस्यों से यह भी अपेक्षित है कि वो अपनी रचना लिखते समय व्याकरण व् शब्दों के उचित स्थान पर प्रयोग किये जाने पर विशेष ध्यान दें, ताकि उनकी रचना उत्कृष्ट होकर भी इन त्रुटियों के कारण नज़रअंदाज़ न हो।
नोट : उपरोक्त के अतिरिक्त मुझे यह बात आज फिर से कहनी पड़ रही है कि हमारा इस मंच को बनाने का उद्देश्य आप सभी को एक छत के नीचे इस मंच पर लाना, समान अभिरुचि वाले आप सभी को एक दूसरे से जोड़ना व् एक-दूसरे के सुझाव व् प्रतिक्रिया से आप सभी की प्रतिभा को निखारने का अवसर प्रदान करना है। अतः इस मंच पर अपनी रचनाएँ शेयर करने वाले सभी सदस्यों के लिए यह अनिवार्य है कि वो दूसरे सभी सदस्यों द्वारा पोस्ट की गई रचनाओं पर अपनी प्रतिक्रिया व् टिपण्णी अवश्य ही दे। इस नियम का पालन न करने वाले सदस्य की सदस्यता कभी भी समाप्त की जा सकती है। यदि किसी कारणवश आपको रचना पसंद नहीं, तो भी आपको उस रचना की त्रुटि व् अपना सुझाव कमेंट में अवश्य ही लिखना चाहिए, जिससे कि सम्बंधित सदस्य उस त्रुटि को सुधार कर भविष्य में उसे दोहराने से बच सके।
एक बात मैं 'हमारा हिंदी कवि-मंच' के बारे में जरूर साफ़ करना चाहूंगा कि मैं अपनी स्वयं की हर एक कम्युनिटी में इस बात का विशेष ध्यान रखता हूँ कि उस में किसी भी प्रकार से हमारी भारतीय हिन्दू सभ्यता व् संस्कृति के किसी भी रीति-रिवाजों को लेकर (जिसमें जैन. बोद्ध, और सिख आदि भी शामिल हैं) का अपमान अथवा मज़ाक बिलकुल न हो। इसलिए सभी सदस्य अपनी रचना यहाँ शेयर करते समय इस बात का विशेष अवश्य रखें।

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नव पल्लव , नव कुसुम , नव है अन्न भंडार
नव उमंग, नव चेतना, छाई बसंत बहार ll

नववर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा - सम्वत - 2074 का प्रारंभ इस नूतन वर्ष की आप को हार्दिक शुभ कामनायें।
"नव वर्ष मंगलमय हो"
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🚩🎉 हिन्दवी नववर्ष 🎉 🚩
<<<<<========>>>>>
स्वागतम हिन्दवी नववर्ष
आगमन से द्विगुणित
देश वासियों के हर्ष
आती हैं हिन्दवी नववर्ष
चैत्र पर्व के मध्य
होती जब पूजित चैत्र नवरात्रि
समय रात्रि के ले लेतीं लघुरूप
दिन के समय दिर्घ बन जाती ।
🚩
युगों युगों से तो होती थी
हिन्दवी नववर्ष पालित
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन
हुई थी ब्रह्मा से सृष्टि का सृजन
शुभ दिन मानते प्रारंभ नववर्ष सनातन
सप्तर्षि संवत्सर था सबसे प्राचीन ।
🚩
पहले संवत्सर सप्तर्षि पालित
फिर विक्रमी संवत् सृजित
फिर हुई थी कोई संवत्सर शालिवाहन
जब शक आक्रांता हुए थे पराजित
हुई शकाब्ध की नामसे संवत्सर पालन
वर्ष प्रतिपदा की पौराणिक शुभ दिवस
युगों से सदैव शुभदा दिन समान ही
हिन्दवी नववर्ष रुप मे होती हैं गण्य ।
🚩
है हिन्दवी नववर्ष सनातन संस्कृति के द्योतक
पराधीनता की दिर्घतम अवधि से
जो नहीं था अनुभूत देर तक
पर वर्ष प्रतिपदा की महानता
अनुभूत युगों से जन जन को है विदित ।
🚩
जब हुई विक्रमादित्य की राज्याभिषेक
वर्ष प्रतिपदा की दिवस हुई थी तय
बढाने को राष्ट्र के गौरव विशेष
नववर्ष आयी थी उस दिन
नये हर्षोल्लास लिये
सनातन संस्कृति की पुनः स्थापना को
युगों युगों तक याद दिलाने के लिए ।
🚩
जैसे रामराज्य प्रतिष्ठा करने को कभी
हुए थे श्रीराम चंद्र अभिषिक्त
वैदिक मन्त्रों के उच्चारण
स्वस्ति वाचन के मध्य
वर्ष प्रतिपदा के शुभ दिन वेला में
हुए फिर राजा विक्रमादित्य अभिषिक्त
बन गयी विक्रमी संवत् यादगार
तुम जैसे दिन की नववर्ष त्योहार ।
🚩
आतीं नववर्ष हर वर्ष, वर्ष प्रतिपदा में
सनातनी को याद दिलाने
राणा प्रताप हो या हो राजे शिवाजी
सबको भगवा की गौरव दिखलाने
न जाने पर ऐसा क्या हुआ
एक नया नववर्ष उभरा गणना में
जिसमें न थी कोई सनातनता
हां थी जरुर एक व्यथित पराधीनता ।
🌌 🚩
जैसे वसुंधरा देती है
सभी प्राणियों को आश्रय
वैसे इस देश ने भी दि उदारता से
सबको रहने कि जगह
कुछ आश्रित बन गये लुटेरा
जिनकी देश नहीं थी यह मातृभूमि
मिलि जुली सभ्यताओं में भूले
जन बसती संस्कृति सनातनी ।
🚩
पर शायद आज फिर से उपनित
वह सनातन संस्कृति की संरक्षणवाद
संस्कृति अौर सभ्यता है स्वतः उत्थित
देश मे पालित होने को अबाध
हिन्दवी नववर्ष की आगमन से
जन जन मे है उपनित खुशी अगाध
हे ! नववर्ष तुम लाना हंसी खुशी
उन्नति प्रगति संवृद्धि सौहार्द्र साथ
नववर्ष तुम्हें हैं स्वागत सुस्वागत
हो, पुनः संस्कृति उद्दीप्त संस्थापित
विक्रमादित्य की सनातनी वंशधरों को
करने को पुनः अभिषिक्त अौर अपराजित ।॥
============🙏===============
🖌 # प्रभात # ता. १૪.०३.२०१७ 📝



























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या देवी सर्वभूतेषु
शक्ति-रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै
नमस्तस्यै नमो नमः॥
नवरात्रा एवं नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें।
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भारतेन्दु हरिश्चन्द्र (९ सितंबर १८५०-७ जनवरी १८८५) आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह कहे जाते हैं। वे हिन्दी में आधुनिकता के पहले रचनाकार थे। इनका मूल नाम 'हरिश्चन्द्र' था, 'भारतेन्दु' उनकी उपाधि थी। उनका कार्यकाल युग की सन्धि पर खड़ा है। उन्होंने रीतिकाल की विकृत सामन्ती संस्कृति की पोषक वृत्तियों को छोड़कर स्वस्थ्य परम्परा की भूमि अपनाई और नवीनता के बीज बोए। हिन्दी साहित्य में आधुनिक काल का प्रारम्भ भारतेन्दु हरिश्चन्द्र से माना जाता है। भारतीय नवजागरण के अग्रदूत के रूप में प्रसिद्ध भारतेन्दु जी ने देश की गरीबी, पराधीनता, शासकों के अमानवीय शोषण का चित्रण को ही अपने साहित्य का लक्ष्य बनाया। हिन्दी को राष्ट्र-भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने की दिशा में उन्होंने अपनी प्रतिभा का उपयोग किया।

भारतेन्दु बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। हिंदी पत्रकारिता, नाटक और काव्य के क्षेत्र में उनका बहुमूल्य योगदान रहा। हिंदी में नाटकों का प्रारंभ भारतेन्दु हरिश्चंद्र से माना जाता है। भारतेन्दु के नाटक लिखने की शुरुआत बंगला के विद्यासुंदर (१८६७) नाटक के अनुवाद से होती है। यद्यपि नाटक उनके पहले भी लिखे जाते रहे किंतु नियमित रूप से खड़ीबोली में अनेक नाटक लिखकर भारतेन्दु ने ही हिंदी नाटक की नींव को सुदृढ़ बनाया। उन्होंने 'हरिश्चंद्र पत्रिका', 'कविवचन सुधा' और 'बाल विबोधिनी' पत्रिकाओं का संपादन भी किया। वे एक उत्कृष्ट कवि, सशक्त व्यंग्यकार, सफल नाटककार, जागरूक पत्रकार तथा ओजस्वी गद्यकार थे। इसके अलावा वे लेखक, कवि, संपादक, निबंधकार, एवं कुशल वक्ता भी थे।भारतेन्दु जी ने मात्र ३४ वर्ष की अल्पायु में ही विशाल साहित्य की रचना की। पैंतीस वर्ष की आयु (सन् १८८५) में उन्होंने मात्रा और गुणवत्ता की दृष्टि से इतना लिखा, इतनी दिशाओं में काम किया कि उनका समूचा रचनाकर्म पथदर्शक बन गया।

जीवन परिचय

भारतेंदु हरिश्चंद्र का जन्म ९ सितंबर, १८५० में काशी के एक प्रतिष्ठित वैश्य परिवार में हुआ। उनके पिता गोपाल चंद्र एक अच्छे कवि थे और गिरधर दास उपनाम से कविता लिखा करते थे। १८५७ में प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के समय उनकी आयु ७ वर्ष की होगी। ये दिन उनकी आँख खुलने के थे। भारतेन्दु का कृतित्व साक्ष्य है कि उनकी आँखें एक बार खुलीं तो बन्द नहीं हुईं। पैंतीस वर्ष की आयु (सन् १८८५) में उन्होंने मात्रा और गुणवत्ता की दृष्टि से इतना लिखा, इतनी दिशाओं में काम किया कि उनका समूचा रचनाकर्म पथदर्शक बन गया। भारतेन्दु के पूर्वज अंग्रेज भक्त थे, उनकी ही कृपा से धनवान हुए। पिता गोपीचन्द्र उपनाम गिरिधर दास की मृत्यु इनकी दस वर्ष की उम्र में हो गई। माता की पाँच वर्ष की आयु में हुई। इस तरह माता-पिता के सुख से भारतेन्दु वंचित हो गए। विमाता ने खूब सताया। बचपन का सुख नहीं मिला। शिक्षा की व्यवस्था प्रथापालन के लिए होती रही। संवेदनशील व्यक्ति के नाते उनमें स्वतन्त्र रूप से देखने-सोचने-समझने की आदत का विकास होने लगा। पढ़ाई की विषय-वस्तु और पद्धति से उनका मन उखड़ता रहा। क्वींस कॉलेज, बनारस में प्रवेश लिया, तीन-चार वर्षों तक कॉलेज आते-जाते रहे पर यहाँ से मन बार-बार भागता रहा। स्मरण शक्ति तीव्र थी, ग्रहण क्षमता अद्भुत। इसलिए परीक्षाओं में उत्तीर्ण होते रहे। बनारस में उन दिनों अंग्रेजी पढ़े-लिखे और प्रसिद्ध लेखक - राजा शिवप्रसाद सितारे हिन्द थे, भारतेन्दु शिष्य भाव से उनके यहाँ जाते। उन्हीं से अंग्रेजी शिक्षा सीखी। भारतेन्दु ने स्वाध्याय से संस्कृत, मराठी, बंगला, गुजराती, पंजाबी, उर्दू भाषाएँ सीख लीं।

उनको काव्य-प्रतिभा अपने पिता से विरासत के रूप में मिली थी। उन्होंने पांच वर्ष की अवस्था में ही निम्नलिखित दोहा बनाकर अपने पिता को सुनाया और सुकवि होने का आशीर्वाद प्राप्त किया-

लै ब्योढ़ा ठाढ़े भए श्री अनिरुद्ध सुजान।
वाणासुर की सेन को हनन लगे भगवान॥
धन के अत्यधिक व्यय से भारतेंदु जी ॠणी बन गए और दुश्चिंताओं के कारण उनका शरीर शिथिल होता गया। परिणाम स्वरूप १८८५ में अल्पायु में ही मृत्यु ने उन्हें ग्रस लिया।

साहित्यिक परिचय
भारतेन्दु के वृहत साहित्यिक योगदान के कारण हीं १८५७ से १९०० तक के काल को भारतेन्दु युग के नाम से जाना जाता है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार "भारतेन्दु ने अपनी सर्वतोमुखी प्रतिभा के बल से एक ओर तो वे पद्माकर, द्विजदेव की परंपरा में दिखाई पड़ते थे, तो दूसरी ओर बंग देश "
पंद्रह वर्ष की अवस्था से ही भारतेंदु ने साहित्य सेवा प्रारंभ कर दी थी। अठारह वर्ष की अवस्था में उन्होंने कविवचनसुधा नामक पत्रिका निकाली जिसमें उस समय के बड़े-बड़े विद्वानों की रचनाएं छपती थीं। वे बीस वर्ष की अवस्था मे ऑनरेरी मैजिस्ट्रेट बनाए गए और आधुनिक हिन्दी साहित्य के जनक के रूप मे प्रतिष्ठित हुए। उन्होंने १८६८ में 'कविवचनसुधा', १८७3'हरिश्चन्द्र मैगजीन' और 1874 में स्त्री शिक्षा के लिए 'बाल बोधिनी' नामक पत्रिकाएँ निकालीं। साथ ही उनके समांतर साहित्यिक संस्थाएँ भी खड़ी कीं। वैष्णव भक्ति के प्रचार के लिए उन्होने 'तदीय समाज` की स्थापना की थी। अपनी देश भक्ति के कारण राजभक्ति प्रकट करते हुए भी उन्हें अंग्रेजी हुकूमत का कोपभाजन बनना पड़ा। उनकी लोकप्रियता से प्रभावित होकर काशी के विद्वानों ने १८८० मे उन्हें 'भारतेंदु` की उपाधि प्रदान की। हिन्दी साहित्य को भारतेन्दु की देन भाषा तथा साहित्य दोनों ही क्षेत्रों में है। भाषा के क्षेत्र में उन्होंने खड़ी बोली के उस रूप को प्रतिष्ठित किया, जो उर्दू से भिन्न है और हिन्दी क्षेत्र की बोलियों का रस लेकर संवर्धित हुआ है। इसी भाषा में उन्होंने अपने सम्पूर्ण गद्य साहित्य की रचना की। साहित्य सेवा के साथ-साथ भारतेंदु जी की समाज सेवा भी चलती थी। उन्होंने कई संस्थाओं की स्थापना में अपना योग दिया। दीन-दुखियों, साहित्यिकों तथा मित्रों की सहायता करना वे अपना कर्तव्य समझते थे।
प्रमुख कृतियाँ:

मौलिक नाटक
वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति (१८७३ई., प्रहसन)
सत्य हरिश्चन्द्र (१८७५)
श्री चंद्रावली (१८७६, नाटिका)
विषस्य विषमौषधम् (१८७६, भाण)
भारत दुर्दशा (१८८०, ब्रजरत्नदास के अनुसार १८७६, नाट्य रासक),
नीलदेवी (१८८१, प्रहसन)।
अंधेर नगरी (१८८१)
प्रेमजोगनी (१८७५, प्रथम अंक में केवल चार अंक या गर्भांक, नाटिका)
सती प्रताप (१८८३, केवल चार अंक, गीतिरूपक)
अनूदित नाट्य रचनाएँ
विद्यासुन्दर (१८६८, ‘संस्कृत चौरपंचासिका’ का बँगला संस्करण)
पाखण्ड विडम्वना (कृष्ण मिश्रिकृत ‘प्रबोधचंद्रोदय’ का तृतीय अंक)
धनंजय विजय (१८७३, कांचन कवि कृत संस्कृत नाटक के तीसरे अंक का अनुवाद)
कर्पूर मंजरी (१८७५, सट्टक, कांचन कवि कृत संस्कृत नाटक का अनुवाद)
भारत जननी (१८७७, नाट्यगीत)
मुद्रा राक्षस (१८७८, विशाखदत्त के संस्कृत नाटक का अनुवाद)
दुर्लभ बंधु (१८८०, शेक्सपियर के ‘मर्चेंट आप वेनिस’ का अनुवाद)
निबंध संग्रह
भारतेन्दु ग्रन्थावली (तीसरा खंड) में संकलित है।
"नाटक शीर्षक प्रसिद्ध निबंध (१८८५) ग्रंथावली के दूसरे खंड के परिशिष्ट में नाटकों के साथ दिया गया
काव्यकृतियां
भक्तसर्वस्व,
प्रेममालिका (१८७१),
प्रेम माधुरी (१८७५),
प्रेम-तरंग (१८७७),
उत्तरार्द्ध भक्तमाल (१८७६-७७),
प्रेम-प्रलाप (१८७७),
होली (१८७९),
मधुमुकुल (१८८१),
राग-संग्रह (१८८०),
वर्षा-विनोद (१८८०),
विनय प्रेम पचासा (१८८१),
फूलों का गुच्छा (१८८२),
प्रेम फुलवारी (१८८३)
कृष्णचरित्र (१८८३)
दानलीला
तन्मय लीला
नये ज़माने की मुकरी
सुमनांजलि
बन्दर सभा (हास्य व्यंग)
बकरी विलाप (हास्य व्यंग)
वर्ण्य विषय

भारतेंदु जी की यह विशेषता रही कि जहां उन्होंने ईश्वर भक्ति आदि प्राचीन विषयों पर कविता लिखी वहां उन्होंने समाज सुधार, राष्ट्र प्रेम आदि नवीन विषयों को भी अपनाया। अतः विषय के अनुसार उनकी कविता श्रृंगार-प्रधान, भक्ति-प्रधान, सामाजिक समस्या प्रधान तथा राष्ट्र प्रेम प्रधान हैं।

शृंगार रस प्रधान भारतेंदु जी ने श्रृंगार के संयोग और वियोग दोनों ही पक्षों का सुंदर चित्रण किया है। वियोगावस्था का एक चित्र देखिए-

देख्यो एक बारहूं न नैन भरि तोहि याते
जौन जौन लोक जैहें तही पछतायगी।
बिना प्रान प्यारे भए दरसे तिहारे हाय,
देखि लीजो आंखें ये खुली ही रह जायगी।
भक्ति प्रधान भारतेंदु जी कृष्ण के भक्त थे और पुष्टि मार्ग के मानने वाले थे। उनको कविता में सच्ची भक्ति भावना के दर्शन होते हैं। वे कामना करते हैं -

बोल्यों करै नूपुर स्त्रीननि के निकट सदा
पद तल मांहि मन मेरी बिहरयौ करै।
बाज्यौ करै बंसी धुनि पूरि रोम-रोम,
मुख मन मुस्कानि मंद मनही हास्यौ करै।
सामाजिक समस्या प्रधान भारतेंदु जी ने अपने काव्य में अनेक सामाजिक समस्याओं का चित्रण किया। उन्होंने समाज में व्याप्त कुरीतियों पर तीखे व्यंग्य किए। महाजनों और रिश्वत लेने वालों को भी उन्होंने नहीं छोड़ा-

चूरन अमले जो सब खाते,
दूनी रिश्वत तुरत पचाते।
चूरन सभी महाजन खाते,
जिससे जमा हजम कर जाते।
राष्ट्र-प्रेम प्रधान भारतेंदु जी के काव्य में राष्ट्र-प्रेम भी भावना स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है। भारत के प्राचीन गौरव की झांकी वे इन शब्दों में प्रस्तुत करते हैं -

भारत के भुज बल जग रच्छित,
भारत विद्या लहि जग सिच्छित।
भारत तेज जगत विस्तारा,
भारत भय कंपिथ संसारा।
प्राकृतिक चित्रण प्रकृति चित्रण में भारतेंदु जी को अधिक सफलता नहीं मिली, क्योंकि वे मानव-प्रकृति के शिल्पी थे, बाह्य प्रकृति में उनका मर्मपूर्ण रूपेण नहीं रम पाया। अतः उनके अधिकांश प्रकृति चित्रण में मानव हृदय को आकर्षित करने की शक्ति का अभाव है। चंद्रावली नाटिका के यमुना-वर्णन में अवश्य सजीवता है तथा उसकी उपमाएं और उत्प्रेक्षाएं नवीनता लिए हुए हैं-

कै पिय पद उपमान जान यह निज उर धारत,
कै मुख कर बहु भृंगन मिस अस्तुति उच्चारत।
कै ब्रज तियगन बदन कमल की झलकत झांईं,
कै ब्रज हरिपद परस हेतु कमला बहु आईं॥
प्रकृति वर्णन का यह उदहारण देखिये, जिसमे युमना की शोभा कितनी दर्शनीय है |

"तरनि तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाये |
झुके कूल सों जल परसन हित मनहूँ सुहाये || "
भाषा

भारतेंदु जी के काव्य की भाषा प्रधानतः ब्रज भाषा है। उन्होंने ब्रज भाषा के अप्रचलित शब्दों को छोड़ कर उसके परिकृष्ट रूप को अपनाया। उनकी भाषा में जहां-तहां उर्दू और अंग्रेज़ी के प्रचलित शब्द भी जाते हैं। भारतेंदु जी की भाषा में कहीं-कहीं व्याकरण संबंधी अशुध्दियां भी देखने को मिल जाती हैं। मुहावरों का प्रयोग कुशलतापूर्वक हुआ है। भारतेंदु जी की भाषा सरल और व्यवहारिक है।

शैली

भारतेंदु जी के काव्य में निम्नलिखित शैलियों के दर्शन होते हैं -

१. रीति कालीन रसपूर्ण अलंकार शैली - श्रृंगारिक कविताओं में,

२. भावात्मक शैली - भक्ति के पदों में,

३. व्यंग्यात्मक शैली - समाज-सुधार की रचनाओं में,

४. उद्बोधन शैली - देश-प्रेम की कविताओं में।

रस

भारतेंदु जी ने लगभग सभी रसों में कविता की है। श्रृंगार और शांत की प्रधानता है। श्रृंगार के दोनों पक्षों का भारतेंदु जी ने सुंदर वर्णन किया है। उनके काव्य में हास्य रस की भी उत्कृष्ट योजना मिलती है।

छंद

भारतेंदु जी ने अपने समय में प्रचलित प्रायः सभी छंदों को अपनाया है। उन्होंने केवल हिंदी के ही नहीं उर्दू, संस्कृत, बंगला भाषा के छंदों को भी स्थान दिया है। उनके काव्य में संस्कृत के बसंत तिलका, शार्दूल, विक्रीड़ित, शालिनी आदि हिंदी के चौपाई, छप्पय, रोला, सोरठा, कुंडलियां कवित्त, सवैया घनाछरी आदि, बंगला के पयार तथा उर्दू के रेखता, ग़ज़ल छंदों का प्रयोग हुआ है। इनके अतिरिक्त भारतेंदु जी कजली, ठुमरी, लावनी, मल्हार, चैती आदि लोक छंदों को भी व्यवहार में लाए हैं।

अलंकार

अलंकारों का प्रयोग भारतेंदु जी के काव्य में सहज रूप से हुआ है। उपमा, उत्प्रेक्षा, रूपक और संदेह अलंकारों के प्रति भारतेंदु जी की अधिक रुचि है। शब्दालंकारों को भी स्थान मिला है। निम्न पंक्तियों में उत्प्रेक्षा और अनुप्रास अलंकार की योजना स्पष्ट दिखाई देती है:

तरनि तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाए।
झुके कूल सों जल परसन हित मनहु सुहाए॥
महत्वपूर्ण कार्य

आधुनिक हिंदी साहित्य में भारतेंदु जी का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। भारतेंदु बहूमुखी प्रतिभा के स्वामी थे। कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास, निबंध आदि सभी क्षेत्रों में उनकी देन अपूर्व है। भारतेंदु जी हिंदी में नव जागरण का संदेश लेकर अवतरित हुए। उन्होंने हिंदी के सर्वांगीण विकास में महत्वपूर्ण कार्य किया। भाव, भाषा और शैली में नवीनता तथा मौलिकता का समावेश करके उन्हें आधुनिक काल के अनुरूप बनाया। आधुनिक हिंदी के वे जन्मदाता माने जाते हैं। हिंदी के नाटकों का सूत्रपात भी उन्हीं के द्वारा हुआ। भारतेंदु जी अपने समय के साहित्यिक नेता थे। उनसे कितने ही प्रतिभाशाली लेखकों को जन्म मिला। मातृ-भाषा की सेवा में उन्होंने अपना जीवन ही नहीं संपूर्ण धन भी अर्पित कर दिया। हिंदी भाषा की उन्नति उनका मूलमंत्र था -

निज भाषा उन्नति लहै सब उन्नति को मूल।
बिन निज भाषा ज्ञान के मिटे न हिय को शूल॥
विविध कला शिक्षा अमित, ज्ञान अनेक प्रकार।
सब देसन से लै करहू, भाषा माहि प्रचार॥
हिन्दी को न्यायालयों की भाषा बनाने की महत्ता पर उन्होने कहा-

यदि हिन्दी अदालती भाषा हो जाए, तो सम्मन पढ़वाने, के लिए दो-चार आने कौन देगा, और साधारण-सी अर्जी लिखवाने के लिए कोई रुपया-आठ आने क्यों देगा। तब पढ़ने वालों को यह अवसर कहाँ मिलेगा कि गवाही के सम्मन को गिरफ्तारी का वारंट बता दें। सभी सभ्य देशों की अदालतों में उनके नागरिकों की बोली और लिपि का प्रयोग किया जाता है।
अपनी इन्हीं विशेषताओं के कारण भारतेंदु हिंदी साहित्याकाश के एक दैदीप्यमान नक्षत्र बन गए और उनका युग भारतेंदु युग के नाम से प्रसिद्ध हुआ। हरिश्चंद्र चंद्रिका, कविवचन सुधा, हरिश्चंद्र मैग्जीन, स्त्री बाला बोधिनी जैसे प्रकाशन उनके विचारशील और प्रगतिशील संपादकीय दृष्टिकोण का परिचय देते हैं।
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🌺🌻🌼नव वर्ष की शुभ कामनाएं 🌼🌻🌺

नव वर्ष नव षोडशी
किसलय कुसुम सुहाये
नव वर्ष नव रुप लिये
देखो दबे पाँव आ जाये !

नवरुप नव अलंकार
नवी नवी बयार बहाये
नवी नवी है बात समय की
नक नूतन शृंगार कराये !

आओ करे सन्मान
और कुछ सच्चे वादे कर लै
नव वर्ष नव आगंतुक
इसको सम्मानित कर दे !!

इन्दिरा 🌷


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छुम छुम छन छन करती
कानों में मधुर रस घोलती
बहुत प्यारी लगी थी मुझको
पहली बार देखी जब मैंने
माँ की हाथों में लाल चुड़ियाँ
टुकुर टुकुर ताकती मैं
सदा के लिए भा गयी
अबोध मन को लाल चुड़ियाँ
अपनी नन्ही कलाईयों में
कई बार पहनकर देखा था
माँ की उतारी हुई नयी पुरानी
खूब सारी काँच की चुड़ियाँ

वक्त के साथ समझ आयी बात
कलाई पर सजी सुंदर चुड़ियाँ
सिर्फ एक श्रृंगारभर नहीं है
नारीत्व का प्रतीक है ये
सुकोमल अस्तित्व को
परिभाषित करती हुई
खनकती काँच की चुड़ियाँ
जिस पुरुष को रिझाती है
सतरंगी चुड़ियों की खनक से
उसी के बल के सामने
निरीह का तमगा पहनाती
ये खनकती छनकती चुड़ियाँ

ब्याह के बाद सजने लगती है
सुहाग के नाम की चुड़ियाँ
चुड़ियों से बँध जाते है
साँसों के आजन्म बंधन
चुड़ियों की मर्यादा करवाती
एक दायित्व का एहसास
घरभर में खनकती है चुड़ियाँ
सबकी जरूरतों को पूरा करती
एक स्वप्निल संसार सजाती
रंग बिरंगी काँच  की चुड़ियाँ

चुड़ियों की परिधि में घूमती सी
अन्तहीन ख्वाहिशें और सपनें
टूटते,फीके पड़ते,नये गढ़ते
चुड़ियों की तरह ही रिश्ते भी
हँसकर रोकर सुख दुख झेलते
पर फिर भी जीते है सभी
एक नये स्वप्न की उम्मीद लिए
कलाईयों में सजती हुई
नयी काँच चुड़ियों की तरह
जीवन भी लुभाता है पल पल
जैसे खनकती काँच की चुड़ियाँ

               #श्वेता🍁
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