मोहब्बत और मुकद्दर में बरसों से जिद का रिश्ता है,
मोहब्बत जब भी होती है तो मुकद्दर रूठ ही जाता है।

गिरते हुए आँसुओं को कौन देखता है
झूठी मुस्कान के दीवाने हैं सब यहाँ।

लोग वाकिफ हे मेरी आदतो से,
रूतबा कम ही सही पर लाजवाब रखता हूँ।

दिल से बड़ी कोई क़ब्र नहीं है,
रोज़ कोई ना कोई एहसास दफ़न होता है॥

अपने रब के फैसले पर, भला शक केसे करूँ,
सजा दे रहा है गर वो, कुछ तो गुनाह रहा होगा मेरा।

तासीर किसी भी दर्द की मीठी नहीं होती ग़ालिब,
वजह यही है की आँसू भी नमकीन होते है।

आदमी बुलबुला है पानी का,
और पानी की बहती सतह पर,
टूटता भी है, डूबता भी है,
फिर उभरता है फिर से बहता है |

बड़ी अजीब सी है, शहर की रोशनी साहब..
उजालों के बावजूद, चेहरे पहचानना मुश्किल है!

धूप लगती थी गाँव में...मगर चुभती तो न थी "साहिब".!
ऐ शहर...तेरी तो छांव ने भी पसीने निकाल दिए...!!

"शायरी" एक खेल है शतरंज का जिसमें..
"लफ्जो" के मोहरे मात दिया करते हैं |
Wait while more posts are being loaded